पल जो यूँ गुज़रे - 8

पल जो यूँ गुज़रे

लाजपत राय गर्ग

(8)

निर्मल का अन्तिम पेपर पच्चीस को हो गया, किन्तु जाह्नवी का आखिरी पेपर इकतीस अक्तूबर को था। निर्मल अपने आखिरी पेपर के बाद सिरसा जाना चाहता था, क्योंकि उसे सिरसा से आये हुए लगभग तीन महीने हो गये थे। किन्तु जाह्नवी का अन्तिम पेपर अभी बाकी था, सो उसने सिरसा जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। दीवाली में पन्द्रह—बीस दिन रह गये थे। उसने सोचा, बार—बार जाने की बजाय दीवाली पर चार—पाँच दिन घर लगा आऊँगा। तदनुसार उसने पत्र लिखकर घरवालों को सूचित कर दिया और अपने पेपर अच्छे होने की भी सूचना दे दी।

जाह्नवी जब अपना आखिरी पेपर देकर कॉलेज से बाहर आई तो निर्मल को गेट पर प्रतीक्षारत पाया। यह तो उनमें तय हो चुका था कि जाह्नवी के आखिरी पेपर वाले दिन वे मिलेंगे, लेकिन यह तय नहीं हुआ था कि कौन पहल करेगा। एक तो जाह्नवी का पेपर आशा से कहीं अधिक अच्छा हुआ था, दूसरे, निर्मल प्रतीक्षा करता मिला तो जाह्नवी की प्रसन्नता द्विगुणित हो गयी।

निर्मल — ‘कैसा हुआ पेपर?'

‘बहुत बढ़िया, उम्मीद से कहीं बेहतर। मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम मुझे यहाँ मिलोगे। तुम्हारा आखिरी पीरियड तो दो बजे समाप्त होता है ना?'

‘लास्ट पीरियड तो दो बजे ही समाप्त होता है, किन्तु मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था। यह बताओ कि मेरा पीरियड लगाकर तुम्हारे पास देर से पहुँचने में तुम्हें अधिक प्रसन्नता होती या अब हुई है?'

‘बड़ा टेढ़ा प्रश्न कर दिया है तुमने। यदि मैं कहती हूँ कि तुम्हें इस समय यहाँ पाकर मैं अधिक प्रस हूँ तो सीधा—सा अर्थ होगा कि मुझे तुम्हारी पढ़ाई की कतई चता नहीं है, लेकिन स्वार्थी दिखने के आरोप को सहते हुए भी यही कहूँगी कि तुम्हें यहाँ देखकर मैं अधिक प्रस हूँ।.....अब ये बातें छोड़ो। किसी अच्छे रेस्तरां में खाना खाते हैं, फिर फिल्म देखेंगे, उसके बाद घूमेंगे।'

‘कहाँ चलना है?'

‘यह तुम डिसाइड करोगे, क्योंकि शहर तुम्हारा है, मैं तो यहाँ आज की रात तक मेहमान हूँ। लेकिन आज का बिल मैं अदा करूँगी।'

‘वाह! दो विरोधी बातें कर रही हो। एक तरफ स्वयं को मेहमान मानती हो, दूसरी ओर बिल भी खुद ‘पे' करना चाहती हो।'

‘अपनी बात सांझेदारी में काम करने की हुई थी। एक काम मैंने तुम पर छोड़ दिया, दूसरा स्वयं ले लिया।'

‘जब बिल खुद अदा करने की कह रही हो तो मेरे हिस्से क्या आया?'

‘यह शहर तुम्हारा है, तुम इसकी लोकेशन अच्छी तरह जानते हो। इसलिये कहाँ जाना है, का निर्णय तुम्हारे हिस्से में।'

निर्मल अच्छी तरह समझता था कि जाह्नवी उसपर किसी भी तरह का आर्थिक बोझ नहीं डालना चाहती। आखिर फैसला हुआ कि खाना सेक्टर सत्रह में खाया जाये, फिर जगत थियेटर में फिल्म देखें और उसके बाद ‘वडो शॉपग'।

फिल्म के मध्यान्तर में स्नैकस और घूमते—फिरते इंडियन कॉफी हाउस में कॉफी आदि लेने के पश्चात्‌ दोनों में से किसी को भी डिनर करने की इच्छा नहीं रह गयी थी। इसलिये नौ बजे तक दोनों पूरी तरह थककर जाह्नवी के होटल पहुँचे। जब निर्मल उससे विदा लेने

लगा तो जाह्नवी बोली — ‘निर्मल, अब यूनिवर्सिटी तक कहाँ जाओगे? यहीं मेरे पास ही रुक जाओ। कल सुबह तो मुझे जाना ही है, इस प्रकार कुछ और बातें कर लेंगे।'

निर्मल सोच में पड़ गया। दिन में जाह्नवी के साथ होटल के कमरे में दो घंटे बिताना एक बात थी, सारी रात उसके कमरे में साथ रहना अलग बात है। वह कोई निर्णय नहीं कर पा रहा था। उसकी मनःस्थिति हेमलेट जैसी थी — ज्व इम वत दवज जव इम (करूँ या ना करूँ?)। उसकी दुविधाजनक मनोदशा को भाँपते हुए जाह्नवी ने कहा — ‘मैं तुम्हारे व्यक्तित्व से पूरी तरह परिचित हो चुकी हूँ। तुम अपने मन में किसी भी प्रकार की दुविधा मत रखो और आओ, कमरे में चलते हैं।'

जाह्नवी के मन की निश्छलता तथा पारर्दिशता को समझते हुए निर्मल बिना कोई सवाल—जवाब किये उसके साथ हो लिया।

कमरे में पहुँचते ही जाह्नवी ने सूटकेस में से पायज़ामा और टॉप निकाल कर निर्मल को पकड़ाते हुए कहा — ‘चेंज कर लो, बहुत थक गये हैं, फिर लेट कर बातें करेंगे।'

निर्मल के चेंज करने के बाद जाह्नवी ने कपड़े बदले और आकर अपने बेड पर लेट गयी। निर्मल पहले ही बेड पर पसर चुका था। पेपरों में अच्छी परफार्मेंस के बाद दोनों प्रसन्न व आशावान थे। दोनों ने दिल खोलकर बातें की। बातों में विषयान्तर अपनी—अपनी अभिरुचियों से लेकर साहित्य, पारिवारिक सम्बन्धों और भविष्य की कल्पनाओं तथा योजनाओं तक रहा।

साहित्य की चर्चा चल रही थी कि एकाएक जाह्नवी ने पूछा — ‘निर्मल, तुमने डॉ. हरिवंश राय ‘बच्चन' की आत्मकथा पढ़ी है?'

‘आत्मकथा के दो खण्ड आ चुके हैं, इतना तो पता है, किन्तु पढ़ने का मौका नहीं मिला।'

‘आत्मकथा के प्रथम खण्ड — ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ' — तो मैंने पहले ही पढ़ लिया था। दूसरा भाग — ‘नीड़ का निर्माण फिर' — अभी कुछ महीने पहले ही प्रकाशित हुआ है। शिमला में यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में मिल गया था, ‘इशू' करवा लिया। दो ही दिन में पढ़ गयी। ‘बच्चन' साहब ने अपने जीवन की घटनाओं का जिस बेबाकी से वर्णन किया है, पाठक अचम्भित रह जाता है। डॉ. धर्मवीर भारती, ‘धर्मयुग' के सम्पादक ने इसे हिन्दी के हज़ार वर्षों के इतिहास में ऐसी पहली घटना बताया है, जब अपने बारे में सब कुछ इतनी बेबाकी, साहस और सद्‌भावना से कह दिया गया है। यह तो तुमने पढ़ा ही होगा कि ‘बच्चन' जी की वर्तमान पत्नी श्रीमती तेजी बच्चन यानी फिल्मी कलाकार अमिताभ बच्चन की माता श्रीमती तेजी बच्चन ‘बच्चन' जी की दूसरी पत्नी हैं।'

‘हाँ, इतना तो जानता हूँ।'

‘‘बच्चन' जी ने तेजी जी के साथ अपने प्रथम मिलन का जो वर्णन ‘नीड़ का निर्माण फिर' में प्रस्तुत किया है, वह अद्वितीय है। दिल को रूला देने वाला ऐसा प्रसंग साहित्य में और कहीं मिलना मुश्किल है। 1941 की अन्तिम रात्रि और 1942 की प्रथम भोर से पूर्व ‘बच्चन' जी और तेजी जी जो उस समय मिस तेजी सूरी थीं तथा फतेहचन्द कॉलेज, लाहौर में साइकोलॉजी पढ़ाती थीं, का प्रथम मिलन इलाहाबाद में उनके कॉमन फ्रेंड के घर हुआ, जहाँ ‘क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?' गीत की इन पंक्तियों —

एक भी उच्छ्‌वास मेरा

हो सका किस दिन तुम्हारा?

उस नयन में बह सकी कब

इस नयन की अश्रुधरा?

सत्य को मूंदे रहेगी

शब्द की कब तक पिटारी?

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?

क्या करूँ!

ने दो अज़नबी व्यक्तियों को चौबीस घंटे में जीवनसाथी बना दिया।'

‘इसमें कोई शक नहीं कि दिल से उपजी कविता पत्थर—दिलों को भी पिघला देती है।......जाह्नवी, डिनर के समय तो खाने का बिल्कुल मन नहीं था, लेकिन अब पेट में चूहे कूदने लगे हैं, क्या समाधन हो सकता है?'

‘बारह बजने वाले हैं। होटल में ग्यारह बजे तक ही सर्विस करते हैं। मेरे पास बिस्कुट का पैकेट पड़ा है, उसी से काम चलाना पड़ेगा।'

‘अरे नहीं। यह चण्डीगढ़ है, यहाँ काम चलाने वाली बात नहीं। हमारी यूनिवर्सिटी के बाहर पीजीआई के सामने नाईट फूड—स्ट्रीट में सारी रात खाने—पीने को मिलता है। चलो, वहाँ चलते हैं, लेकिन आना—जाना पैदल ही पड़ेगा, इस समय ऑटो वगैरह तो मिलना मुश्किल है। हाँ, किस्मत अच्छी हुई तो वापसी पर ऑटो मिल भी सकता है।'

‘चलते हैं। देखते हैं कि नाईट फूड—स्ट्रीट तुम्हारी यूनिवर्सिटी की बदौलत चलती है या पीजीआई के कारण!'

और वे होटल के चौकीदार को डेढ़—दो घंटे में वापस आने की कहकर यूनिवर्सिटी की ओर चल दिये।

जब वे वहाँ पहुँचे तो स्टूडैंट्‌स की भीड़ देखकर जाह्नवी तो हैरान रह गयी। कहा — ‘निर्मल, ये तुम्हारी यूनिवर्सिटी के स्टूडैंट्‌स सारी रात खाने—पीने में ही लगे रहते हैं क्या? ये लोग पढ़ते कब होंगे?'

‘इस यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थी पंजाब के रहने वाले हैं अथवा पंजाबी पृश्ठभूमि से आये हैं और पंजाबियों को खाना—पीना बहुत पसन्द होता है। ये तो उस कहावत पर यकीन करते हैं — भूखे पेट ना होय भजन, गोपाला। इनके बारे में मशहूर है कि ये रोज संकल्प करते हैं कि कल से डाइटग शुरू करेंगे और तुझे तो पता ही है कि ‘कल' कभी आता नहीं। अपने ओवरवेट लड़के के लिये भी दूसरों के सामने उसके दादा—दादी के मुँह से यही निकलता है — मुंडा बहुत कमजोर हो गया है।'

‘तुम भी तो पंजाबी हो, किन्तु तुम में तो ऐसा कोई लक्षण नहीं है, न ही तुम ओवरवेट हो। तुम्हारी दादी यदि कहेगी कि ‘मुंडा बहुत कमजोर हो गया है,' तो ठीक ही कहेगी।.......यहाँ आना सार्थक रहा।'

उन्होंने पराँठे खाये, चाय पी और जैसे ही वापस जाने के लिये मुड़े, एक ऑटो रिक्शा वाले ने ‘बस स्टैंड, बस स्टैंड' कहते हुए उनके पास आकर स्पीड आहिस्ता कर दी। उनका होटल बस स्टैंड के रास्ते में ही था, अतः वे दोनों उसमें बैठ गये।

कमरे में पहुँचते ही निर्मल बोला — ‘अब पेट फुल है, गहरी नींद आयेगी। नो मोर टॉकग। गुड नाईट,' कहते ही उसने चादर ओढ़कर करवट बदल ली।

रात को देर तक जागते रहने के बावजूद जाह्नवी को सात बजे तक हर हालत में उठना था, क्योंकि उसे दस बजे वाली बस पकड़नी थी, इसलिये वह सात बजे का अलार्म लगाकर सोयी थी। जब अलार्म बजा तो उसने तुरन्त बन्द कर दिया ताकि निर्मल की नींद न टूटे। जब उसने निर्मल की ओर देखा तो उसकी श्वास समगति से चल रही थी यानी वह गहरी नींद में था। उसने परदा हटा कर देखा। यद्यपि कमरे की खिड़की से सूर्य—नारायण के दर्शन नहीं हो रहे थेे, फिर भी चम्पई उजाला लिये उषा की लालिमा आकाश को देदीप्यमान कर रही थी, सवेरा कमरे में घुसने को तैयार था। इसलिये उसने परदा वापस खींच दिया ताकि निर्मल की नींद में दखल न पड़े और स्वयं आहिस्ता—आहिस्ता अपने कपड़े—लत्ते सम्भाल कर बाथरूम में चली गयी। जब वह नहाने—धोने से फारिग होकर बाहर आई तो उसने देखा, निर्मल अभी भी सोया हुआ था। घड़ी साढे सात बजा रही थी। निर्मल को अभी और सोने दिया जा सकता था। इसी बीच जाह्नवी ने कमरे में चारों तरफ, अलमारी तथा बाथरूम में एक बार फिर से नज़र दौड़ाई यह देखने के लिये कि कहीं कोई चीज़ पैक करने से छूट तो नहीं गई। निश्चत होकर कि सब कुछ सम्भाल लिया है, उसने निर्मल को उठाने के लिये उसके पैरों में गुदगुदी की।

आँखें मलते हुए निर्मल उठा। घड़ी देखी तो आठ बज चुके थे। जाह्नवी को पूरी तरह तैयार हुआ देखकर निर्मल बोला — ‘अरे, तुमने मुझे पहले क्यों नहीं जगाया?'

‘घंटा—एक पहले जब मैं उठी थी तो तुम गहरी नींद में थे। मैंने डिस्टर्ब करना उचित नहीं समझा। इतने में मैं इत्मीनान से तैयार हो गयी। दूसरे, तुमने कौन—सा स्नानादि करना है, इसलिये भी तुम्हें पहले नहीं जगाया। अब तुम फ्रेश हो लो, मैं होटल का हिसाब चुकता कर आऊँ। और हाँ, तुम नाश्ते में क्या लोगे?'

‘मैं तो चाय ही पीऊँगा, लेकिन तुम थोड़ा हैवी नाश्ता कर लेना, क्योंकि शिमला पहुँचते—पहुँचते तो ढाई—तीन बज जायेंगे।'

नाश्ता करते—करते नौ बज गये। समय को देखते हुए निर्मल ने कहा — ‘चलो, अब नीचे चलें। ऑटो मिलने में भी पाँच—सात मिनट लग सकते हैं।'

‘निर्मल, मैं तुमसे यहीं विदा लेना चाहती हूँ।'

‘क्यों, मैं भी तो बस स्टैंड तक चल रहा हूँ।'

‘मेरा मतलब, मैं विदा होने से पहले तुमसे गले लगकर मिलना चाहती हूँ जो बस स्टैंड पर सम्भव नहीं होगा।'

‘ओह्‌ह तो यह बात है, बड़ी इमोशनल हो रही हो।'

‘निर्मल, आज के बाद, यदि परीक्षा—परिणाम ठीक आये तो जनवरी—फरवरी में ही मिलेंगे। चण्डीगढ़ में जो समय तुम्हारे साथ व्यतीत किया है, उसके पश्चात्‌ अकेले इतना लम्बा समय कैसे कटेगा, समझ में नहीं आता।'

और जाह्नवी ने निर्मल को झप्पी में ले लिया। मुख ऊपर कर निर्मल के माथे पर चुम्बन अंकित कर दिया और निर्मल को बाँहों के घेरे से मुक्त करते हुए इन्टरकॉम से डॉयल कर रिसेप्शन पर लगेज़—ब्वॉय को भेजने तथा ऑटो मँगवाने के लिये कहा।

जब वे बस स्टैंड पर पहुँचे तो शिमला जाने वाली बस दिल्ली से आ चुकी थी। निर्मल बस में चढ़कर सीट देखने लगा। ड्राईवर के पीछे वाली सीट खाली थी। उसने जाह्नवी को अन्दर बुलाया। निर्मल ने सामान बस में चढ़ाया, जाह्नवी सामान ठीक से रखने लगी। इतने में निर्मल टिकट—काऊँटर से टिकट ले आया और जाह्नवी को टिकट पकड़ाने के लिये बस में चढ़ा।

टिकट लेते हुए जाह्नवी ने कहा — ‘मैं बस में ही ले लेती, तुमने क्यों जल्दी की?'

‘टिकट तो लेनी ही थी। मैं ले आया। तुम निश्चत होकर बैठो। पहुँचने के बाद पत्र लिखना,' यह कहता हुआ वह बस से नीचे उतर गया, क्योंकि बस चलने का समय हो गया था।

बस चलने पर हाथ हिलाकर बॉय—बॉय करता हुआ निर्मल लोकल बस की ओर हो लिया।

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Harsh Parmar 1 week ago

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Imran Saiyed 2 weeks ago

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Anami Indian 1 month ago

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भाव,भाषा एवं शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट उपन्यास ।जीवन के लिए प्रेणादायी सन्देश। अध्ययन के प्रति गहन निष्ठा जागृत कर करने वाला। पारस्परिक व्यवहार में शालीनता प्रदर्शित करने वाला श्रेष्ठ धारावाहिक। शुभकामनाएं।