इंद्रधनुष सतरंगा - 3

इंद्रधनुष सतरंगा

(3)

पंडित जी की पतलून

‘‘अरे मौलाना साहब, कर्तार जी! सब आ जाओ, जल्दी!’’

एक दिन घोष बाबू ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे।

आवाज़ सुनकर जो जिस हालत में था, वैसा ही निकल भागा। मौलाना साहब अलीगढ़ी पाजामे पर आधी बाँहोंवाली बनियान पहने स्कूटर धुलने में लगे थे। पटेल बाबू जालीदार बनियान और फूल छपी लुंगी पहने आराम फरमा रहे थे। कर्तार सिंह नहा-धोकर बाल सुखा रहे थे। गायकवाड़, मोबले, पुंतुलु आदि भी अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। पर घोष बाबू की आवाज़ सुनी तो काम छोड़कर सब दौड़े आए।

मन ही मन घबराहट भी थी कि जाने क्या अनहोनी हो गई। कहीं कोई मुसीबत तो नहीं आ खड़ी हुई, जो घोष बाबू इस तरह गला फाड़कर चिल्ला रहे हैं। लेकिन दौड़कर पहुँचे तो वहाँ नज़ारा ही कुछ और था। घोष बाबू पेट पकड़े हँस-हँसकर दोहरे हुए जा रहे थे।

‘‘क्या घोष बाबू? तुम्हें हर वक़्त मज़ाक़ सूझता रहता है। कभी तो संजीदा रहा करो। ख़ामख़ा डरा दिया।’’ मौलाना साहब झुँझलाते हुए बोले।

‘‘ग़ुस्सा थूक दीजिए, ऐसी चीज़ दिखाऊँगा कि आप सब हैरान रह जाएँगे,’’ घोष बाबू ने मुश्किल से हँसी रोकते हुए कहा, ‘‘वो देखिए सामने!’’

सामने पंडित जी खड़े थे--पैंट-शर्ट पहने।

पैंट-शर्ट और पंडित जी? हैरत की बात तो सचमुच थी। मुहल्लेवालों ने आज पहली बार उन्हें इस डेªस में देखा था, नहीं तो वह हमेशा धोती-कुर्ता ही पहनते थे।

हड़बड़ाकर दौड़े आए लोगों की झुँझलाहट पल भर में दूर हो गई। पंडित जी को देखकर ठहाके लगने लगे और शोर मचने लगा। पैंट-शर्ट पहनकर पंडित जी ख़ुद भी असहज महसूस कर रहे थे और जब लोगों का हुजूम सामने आ खड़ा हुआ तो एकदम सिटपिटा गए। न जाने कब की रखी चुस्त पैंट और मुड़ी-तुड़ी-सी शर्ट में वह लग भी अजीब रहे थे।

‘‘ओए! अपना पंडित तो साहब बन गया।’’ कर्तार सिंह तालियाँ बजाते हुए बोले।

‘‘हीरो नं0 वन!’’ गायकवाड़ ने चिल्लाकर कहा।

मौलाना साहब क़रीब पहुँचकर पंडित जी को टहोका लगाते हुए बोले, ‘‘अमाँ किसी पार्टी-शार्टी में जा रहे हो तो हमें भी साथ लेते चलो।’’

‘‘नहीं-नहीं वो----’’ पंडित जी से बोलते नहीं बन रहा था।

‘‘अजी हम सब से क्या छिपाना,’’ पटेल बाबू बोले।

लोगों के हँसी-मज़ाक़ से पंडित जी रुआँसे हो गए।

‘‘अरे-अरे!’’ घोष बाबू गंभीर होते हुए बोले, ‘‘सब चुप रहो पंडित जी को बुरा लग गया।’’

सब ख़ामोश हो गए। एक पल के लिए सन्नाटा-सा छा गया।

‘‘पंडित जी बात क्या हुई, कुछ बताइएगा तो सही।’’ मौलाना साहब क़रीब पहुँचकर बोले।

‘‘दिल्ली जा रहा हूँ।’’ पंडित जी ने बताया।

‘‘दिल्ली! इस वक़्त! किस ट्रेन से? इस वक़्त तो किसी ट्रेन का समय नहीं है।’’ कर्तार जी ने हैरानी के साथ कहा। उन्हें पूरा टाइम-टेबिल याद था।

‘‘सुपरफास्ट विलंब से है, वह मिल जाएगी।’’

‘‘क्या रिज़र्वेशन नहीं है?’’ मौलाना साहब ने हैरत के साथ पूछा।

‘‘नहीं आपात स्थिति में जाना पड़ रहा है।’’

‘‘ये पैंट-शर्ट झाड़कर किस आपात स्थिति में जा रहे हैं?’’ पटेल बाबू ने फिर चुटकी ली।

‘‘अभी-अभी दूरभाष से सूचना मिली है कि बड़े भैया को हृदयाघात हुआ है। चिकित्सालय में भर्ती हैं। चाचा जी ने कहा तो यही कि सब ठीक है, पर मुझे उनका घबराया स्वर सुनकर चिंता हो रही है।’’ कहते-कहते पंडित जी की आवाज़ भर्रा गई।

भीड़ में सन्नाटा छा गया। सब पत्थर की मूरत बन गए। सबके सिर ग्लानि से झुके जा रहे थे। सोचा क्या था, निकला क्या।

पंडित जी आगे बोले, ‘‘सुपरफास्ट में भीड़ अधिक होती है। आरक्षण है नहीं। इसलिए पतलून पहन ली कि यात्र में सुविधा रहे।’’

‘‘या अल्लाह!’’ मौलाना साहब का चेहरा स्याह पड़ गया।

‘‘वाहे गुरू! सब भला करना,’’ कर्तार जी ने आँखें बंद करके दोनों हाथ जोड़ लिए।

‘‘पैसे-वैसे की ज़रूरत तो नहीं।’’ घोष बाबू क़रीब आकर बोले।

‘‘नहीं, नहीं, धन्यवाद। आवश्यकता हुई तो आप ही लोगों से कहूँगा। आप लोगों के सिवा यहाँ अपना कौन है?’’ कहते हुए पंडित जी मौलाना साहब की ओर मुड़े, ‘‘रहमत भाई, आप से एक प्रार्थना है।’’

‘‘आप हुक्म करिए,’’ मौलाना साहब पूरे ध्यान से बोले।

‘‘मेरे पौधों का ध्यान रखिएगा। गर्मियों के दिन हैं। लू के कारण पानी शीघ्र सूख जाता है। यदि समय निकालकर----’’

‘‘पंडित जी, आप बेपि़फ़क्र होकर जाइए। मुझे पता है कि आप अपने पौधों से बच्चों जैसी मोहब्बत करते हैं।’’

‘‘और तुलसी-चौरे पर-----’’ पंडित जी थोड़ा सकुचाते हुए बोले।

‘‘कहने की ज़रूरत नहीं है पंडित जी, जब अपनी अमानत हवाले की है तो उसकी हिप़फ़ाज़त और देखभाल की सारी जि़म्मेदारी मेरी है।’’ मौलाना साहब ने उनका कंधा थपथपाकर कहा, ‘‘इत्मीनान से जाइए। भाई साहब की देखभाल करिए। हम सब दुआ करेंगे कि वह जल्द सेहतयाब हो जाएँ।’’

गुप्ता जी अपना स्कूटर निकाल लाए। पंडित जी ने सबसे विदा ली और भीगी आँखों से स्टेशन की ओर बढ़ चले।

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