इंद्रधनुष सतरंगा - 10

इंद्रधनुष सतरंगा

(10)

रहने का इंतज़ाम

‘‘साहब, मेरा नाम बानी है। सोलह बरस की उम्र से यह काम कर रहा हूँ।’’ फेरीवाला कर्तार जी को बता रहा था। वह अधलेटे उसकी बात सुन रहे थे।

‘‘घर पर कौन-कौन है?’’

‘‘पत्नी है। पाँच बच्चे हैं। एक बिटिया है। बस, उसके हाथ पीले करने की फिकर खाए रहती है। देखिए, ऊपरवाले की कृपा कब होती है। साहब, हम लोग तो ऊपरवाले के भरोसे ही जीते हैं।’’ फेरीवाला बताता जा रहा था और कनखियों से कर्तार जी पर उसका असर भी देखता जा रहा था।

‘‘कितना कमा लेते हो, महीने भर में?’’

बानी ने कर्तार जी की तरफ चोर निगाहों से देखा। उनके चेहरे पर तैरते सहानुभूति के रंग देखकर वह अपनी आवाज़ में और करुणा घोलता हुआ बोला, ‘‘बहुत मेहनत की तो सात-आठ सौ रुपए।’’

‘‘बस--!’’ कर्तार जी उठ बैठे, ‘‘इस महँगाई के जमाने में सिप़फऱ् सात-आठ सौ रुपए! वाहे गुरू, वाहे गुरू!’’

कर्तार जी ने आँखे बंद करके हाथ जोड़ लिए।

‘‘साहब,’’ बानी फिर बोला, ‘‘हमारे लिए क्या होली क्या ईद। जिस दिन पेट भर जाए, उसी दिन त्योहार। हमारे तीज-त्योहार तो गलियों की ख़ाक छानते बीतते हैं। बच्चे पूछते हैं बाबा जी कब आएँगे, तो उनकी अम्मा बहला देती है। पर साहब, वह बहलाए भी कब तक। छोटा बाबू डेढ़ बरस का है। तुतलाकर बाबा-बाबा कहने लगा है। उसकी बड़ी याद आती है।’’ यह कहकर बरन चुप हो गया और कर्तार जी के चेहरे पर अपनी बातों का असर देखने लगा।

कर्तार जी की आखें सचमुच भीग गईं थीं। वह वैसे भी भावुक कि़स्म के इंसान थे। अक्सर उन्हें इसका घाटा भी उठाना पड़ता था। लोग उनसे उधार माँगने आते, यह पता होते हुए भी कि वापसी मुश्किल है, वह दे बैठते। अपनी यह आदत उन्हें ख़ुद बुरी लगती थी। हर बार नुकसान उठाने के बाद सोचते कि अगली बार ऐसा बिल्कुल नहीं करेंगेे। पर ढाक के वही तीन पात। कोई मुँह लटकाए सामने आ जाता, बस, उनकी जेब ख़ाली हो जाती।

‘‘साहब,’’ बानी कनखियों से कर्तार जी की तरफ देखता हुआ बोला, ‘‘सावन में बिटिया ससुराल से घर आएगी। हम यहाँ परदेस में। इतनी दूर।’’

‘‘लेकिन तुमने तो अभी कहा था कि अभी बिटिया की शादी नहीं हुई है !’’ कर्तार जी एकदम चौंककर बोले।

बानी पल भर को हड़बड़ा गया। कर्तार जी को भावुक करने के चक्कर में वह कुछ ज़्यादा ही बोल गया था। पर यह सब काम करते उसे पच्चीस साल हो गए थे। माथे की गहरी रेखाओं में उसका अनुभव ही नहीं, चालाकी भी साफ टपकती थी। उसने बात सँभाल ली, ‘‘म--मेरा मतलब है धरमू की बिटिया। उसकी बिटिया भी अपनी बिटिया जैसी ही है।’’

अब तक उसी मुद्रा में ठहरे कर्तार जी संतुष्ट हो गए और फिर से अधलेटे हो गए।

…….

मौलाना साहब का एक कमरा बहुत दिनों से ख़ाली पड़ा था। हर जगह धूल की एक मोटी परत जमी हुई थी। रोशनदान में फाख़्ता ने घोंसला बना रखा था। अलमारी के नीचे बर्रों का एक परित्यक्त और सूखा छत्ता लगा हुआ था। तिनकों और बीट की चित्रकारी ने पूरा फर्श चितकबरा बना रखा था।

मौलाना साहब का घर काफी बड़ा था। शुरू में जब इधर की ज़मीन कोई नहीं पूछता था, तब उन्होंने ख़रीदी थी। मकान भी बड़ी लगन से बनवाया था। बड़े-बड़े कमरे, ऊँची-ऊँची छतें, लंबे-चौड़े नक्काशीदार दरवाजे़-खिड़कियाँ। पर आँगन उन्होंने कच्चा ही रख छोड़ा था। हालाँकि बारिश में काफी किच-किच हो जाती थी, लेकिन लोगों के कहने पर भी उन्होंने फर्श नहीं बनवाया था। कहते थे, ‘‘कच्ची ज़मीन पर बूँदें पड़ने से जो सोंधी महक उठती है, वह पक्के आँगनों में कहाँ?’’

मौलाना साहब ने शेरवानी उतारकर कुर्ते की आस्तीनें समेट लीं और पाजामा ऊँचा करके सफाई में जुट पड़े। पीछे-पीछे फेरीवाला भी आ गया। उन्हें सफाई करता देखकर बोला, ‘‘क्यों गुनहगार बनाते हैं, साहब। लाइए मैं कर लेता हूँ।’’

‘‘हाँ-हाँ, तुम भी आ जाओ। एक से भले दो। दोनों जुटते हैं, काम जल्दी हो जाएगा। क्या नाम है तुम्हारा?’’ मौलाना साहब ने पूछा।

‘‘धरमू, साहब।’’

‘‘ठीक है धरमू, तुम अलमारियों और खिड़की-दरवाज़ों की धूल साफ कर लो। मैं झाड़ू लगा लेता हूँ। फिलहाल अभी लेटने-बैठने लायक़ हो जाए, फिर बाक़ी बाद में धीरे-धीरे होता रहेगा।’’

दोनों सफाई के काम में जुट गए।

धरमू सफाई कम कर रहा था, चीज़ों को छू-छूकर देख ज़्यादा रहा था। मुरादाबादी फूलदान, लकड़ी का टेबिल लैंप, नक्काशीदार फ्रेम में मढ़ा शीशा, पुरानी दीवार घड़ी। हर चीज उसके लिए कौतूहल से भरी थी। वह एक-एक चीज़ को हसरत से उठाकर देख रहा था।

मौलाना साहब को सुस्ती नापसंद थी। हर काम वह झटपट करते थे। जल्दबाज़ी के बावजूद उनके काम में एक सलीक़ा होता था। कर्तार जी मज़ाक़ में कहा करते थे, ‘‘जल्दी का काम शैतान का नहीं, जल्दी का काम मौलाना साहब का।’’ अगर मौलाना साहब के साथ कोई धीरे-धीरे काम करे तो वह बहुत खीझते थे। इसलिए अपने काम वह ख़ुद करने में विश्वास रखते थे। लेकिन धरमू को धीरे-धीरे काम करता देखकर आज उन्हें ग़ुस्सा नहीं आ रहा था, बल्कि मन में सहानुभूति जग रही थी।

लगभग घंटे-डेढ़ घंटे साफ-सफाई करने के बाद जब काम से फुरसत हुई तो मौलाना साहब बोले, ‘‘भई, कमरा तो साफ हो गया, लेकिन हम लोग धूल से अट गए। ख़ुदा क़सम, इस वक़्त कोई देख ले तो पहचानने से इंकार कर दे।’’

‘‘पर सरकार, हीरा धूल में गिर जाए तो भी हीरा ही रहता है।’’ धरमू ने चापलूसी भरे अंदाज़ में कहा।

लेकिन मौलाना साहब ने जैसे सुना नहीं। वह अपने आप में खोए थे। बुदबुदाते हुए बोले, ‘‘निकलना था काम से, पर अब तो लगता है पहले नहाना पड़ेगा।’’

मौलाना साहब ने इतनी धीरे से कहा कि धरमू नहीं सुन पाया मगर बाहर खिड़की पर ताक लगाए मोबले ने सुन लिया। खीझकर बोले, ‘‘हाँ-हाँ, अभी टाइम ही क्या हुआ है? दो घंटे ही तो हुए हैं।’’

‘‘अरे मोबले तुम यहीं हो?’’ मौलाना साहब चौंककर बोले, ‘‘देखो भई, वक़्त तो ज़्यादा हो गया है, पर नहाना तो पड़ेगा ही। और नहा लिया तो चाए पीना भी ज़रूरी हो जाएगा। लेकिन यक़ीन मानो इसके बाद एक सेकंड लेट नहीं होउँगा।’’

‘‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं। मैं तो कहता हूँ खाना भी खा लाीजिए और एक नींद सो भी लीजिए, फिर आराम से चलेंगे। देर कहाँ हुई? अभी तीन ही तो बजे हैं।’’

मोबले ने खीझकर कहा और बड़बड़ाते हुए वहीं खिड़की के नीचे उकड़ूँ बैठ गए।

……

पंडित जी ने उत्साह में आकर हामी भले ही भर ली थी, पर किसी मेहमान को घर में रख पाना उनके लिए इतना आसान न था। उनके सब कामों का समय और तरीक़ा नियत था। सोना-उठना, खाना-पीना, पढ़ना-लिखना सबका अलग-अलग टाइम-टेबिल बना हुआ था। लोग भी उनकी इस आदत से परिचित थे इसलिए कभी मिलना-जुलना हुआ तो बाहर ही मिल लिया करते थे। पंडित जी झेंपते तो बहुत, पर आदत से मजबूर थे। रही-सही क़सर उनकी सफाई-पसंदगी की आदत पूरी कर देती थी। भूल से कोई उनकी चौखट पर चप्पल पहनकर खड़ा हो जाए। बस, पूरा घर तीन बार धुलते थे। लुटिया-थाली छू जाए, तो समझ लो दिन भर का उपवास।

पंडित जी इस समय अपने आँगन में असमंजस की स्थिति में खड़े थे। क्या करें, समस्या को कैसे निपटाएँ, इसी पर सोच विचार कर रहे थे।

उधर अतिथि देवता, जिसका नाम बरन था, कीचड़ भरे पैर लिए बाहरी कमरे में उकड़ूँ बैठा बीड़ी फूँक रहा था। पूरा कमरा धुएँ से भरा हुआ था।

काफी सोच-विचार के बाद पंडित जी अंदर आए और धुएँ के कारण साँस रोके-रोके बोले, ‘‘मेरे विचार से दक्षिणवाला कमरा आपके लिए उपयुक्त रहेगा। उसका एक द्वार बाहर की ओर भी खुलता है। मैं अभी सारा प्रबंध कर देता हूँ।’’

इतना कहकर वह आँगन में निकल आए और लंबी-लंबी साँसे लेने लगे।

‘‘जैसी आपकी मजऱ्ी भगवन्---’’ बरन अंदर से खाँसता हुआ बोला।

उसकी आवाज़ से लगता था कि वह पैर पसारकर लेट गया है।

‘‘हे, भगवान!’’ पंडित जी मन ही मन चिंता में डूब गए कि कहीं उसने अपने गंदे पैर तख़त पर न फैला लिए हों। बीड़ी पता नहीं बुझाई या सुलगती छोड़ दी।

पंडित जी हड़बड़ाहट में दूसरे कमरे में दौड़ गए और जल्दी-जल्दी सारा इंतज़ाम करने लगे।

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Ayaan Kapadia 1 month ago

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बहुत रोचक। कहानी कहने का ढंग ऐसा सशक्त कि सारा मंजर चल-चित्र सा कल्पना के पर्दे पर चल पड़ता है।