इंद्रधनुष सतरंगा - 4

इंद्रधनुष सतरंगा

(4)

दावत हो गई

शाम को जब सारे लोग पार्क में टहल रहे थे तो घोष बाबू ने कहा, ‘‘आज कितना सूना-सूना लग रहा है।’’

‘‘हाँ, सचमुच,’’ गायकवाड़ उदासी से बोले।

‘‘पंडित जी हम लोगों के बीच उठते-बैठते ही कितना थे? पर आज उनके न होने से कितनी कमी महसूस हो रही है।’’ पटेल बाबू बोले।

‘‘अरे यार, तुम सब कैसी बातें कर रहे हो? पंडित जी हमेशा के लिए थोड़े ही गए हैं, आ जाएँगे दो एक दिनों में।’’ घोष बाबू ने माहौल हल्का करने की कोशिश में कहा।

‘‘हाँ, वह तो ठीक है, लेकिन पता नहीं उनके भाई साहब के क्या हाल ---’’ बात पूरी करते-करते मौलाना साहब का मोबाइल बज उठा। फोन को कान से सटाकर ‘हैलो’ कहते ही उनका चेहरा खिल उठा। उधर से पंडित जी बोल रहे थे, ‘‘यहाँ सब ठीक है। आप लोग चिंतित मत होना। भैया अब ठीक हैं। डॉक्टर जी कह रहे थे कि हृदयाघात गंभीर था। कोई भी अनहोनी हो सकती थी। पर भगवान की दया से अब सब ठीक है। भैया ख़तरे से बाहर हैं। मेरी तरफ से सबको बता दीजिएगा और धन्यवाद भी कह दीजिएगा। यह आप ही लोगों की प्रार्थनाओं का फल है।’’

ख़बर पाकर सब ख़ुश हो उठे।

‘‘बड़ी अच्छी ख़बर है,’’ पटेल बाबू बोले।

‘‘हाँ, सचमुच!’’ गायकवाड़ का चेहरा भी खिल गया।

‘‘एक अच्छी ख़बर और है, भाइयो,’’ घोष बाबू गुप्ता जी की ओर रहस्य भरी नज़रों से देखते हुए बोले।

‘‘वह क्या?’’ सबने घोष बाबू को घेर लिया।

‘‘गुप्ता जी बता दूँ?’’ घोष बाबू शरारती ढंग से मुस्कराए।

गुप्ता जी एकदम सकपका गए।

कर्तार जी अधीरता से बोले, ‘‘अब बताओ भी, घोष बाबू, पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो।’’

‘‘तो सुनो! आज गुप्ता जी के घर----’’

‘‘हाँ-हाँ, गुप्ता जी के घर---?’’ लोग और पास सरक आए।

‘‘---नया टीवी आया है।’’ घोष बाबू ने स्वर तेज़ करते हुए एकदम कहा।

‘‘सच! वाह-वाह! बधाई हो, बधाई हो !’’ सब ख़ुशी से तालियाँ बजाने लगे।

‘‘तब तो बाक़ायदा दावत होनी चाहिए,’’ गुल मोहम्मद ने कहा।

‘‘हाँ-हाँ, बिल्कुल !’’ सबने एक स्वर में समर्थन किया।

‘‘नहीं-नहीं, मैंने तो पुराना टी0वी0 ‘एक्सचेंज ऑफर’ में बदला है।’’ गुप्ता जी घबराए हुए बोले।

‘‘इससे कोई मतलब नहीं,’’ गायकवाड़ बोले, ‘‘हम तो इतना जानते हैं कि तुम्हारे घर में नया टी0वी0 आया है, बस।’’

‘‘हाँ-हाँ, और नई चीज़ आने पर सबको पार्टी देना कॉलोनी की परंपरा रही है; यह सबको पता है।’’ कर्तार जी बोले।

‘‘बिल्कुल सही, बिल्कुल सही,’’ सभी ने सुर में सुर िमलाया।

‘‘मुझसे बेहतर कौन जान सकता है,’’ गायकवाड़ रोनी सूरत बनाते हुए बोले, ‘‘स्कूटर के टायर बर्स्ट होने पर नए डलवाए, तो भी तुम सबने दो सौ रुपए ख़र्च करवा डाले थे।’’

‘‘और मेरे बारे में भूल गए,’’ घोष बाबू बोले, ‘‘मैं तो सिर्फ पच्चीस रुपए का नया रुमाल लाया था और तुम सबने मिलकर दो किलो लड्डू खा डाले थे।’’

‘‘हाँ-हाँ, तो गुप्ता जी कब मना कर रहे हैं। क्यों गुप्ता जी?’’ कर्तार जी ने गुप्ता जी की ओर देखा।

‘‘नहीं-नहीं, मेरा टी0वी0 नया थोड़े ही है---’’ गुप्ता जी फिर अपना पुराना राग अलापने लगे।

गुप्ता जी को तरह-तरह से को घेरने की कोशिश होने लगी। लेकिन गुप्ता जी पक्के कंजूस थे और इस तरह आसानी से माननेवाले नहीं थे। पर मुहल्ले के लोग भी कुछ कम नहीं थे। सब अपने-अपने दिमाग़ दौड़ाने लगे। तभी घोष बाबू को एक आइडिया आया।

‘‘अरे--रे, ठहरो-ठहरो एक गड़बड़ हो गई,!’’ वह एकाएक बोले।

‘‘कैसी गड़बड़!’’ गुप्ता जी का अंधविश्वासी मन ठनका।

तीर निशाने पर लगता देख घोष बाबू का हौसला बढ़ गया, ‘‘देखिए, जब किसी मास की प्रतिपदा सोमवार को पड़ती है तो घर में कोई चीज़ नहीं लाई जाती, नहीं तो बड़ा अनिष्ट हो जाता है। क्यों मोबले?’’

‘‘हाँ-हाँ, बिल्कुल,’’ मोबले घोष बाबू की आँखों का इशारा ताड़ गए।

गुप्ता जी ठहरे पक्के अंधविश्वासी। एकदम गिरफ्ऱत में आ गए। पर यह भी ख़तरा लग रहा था कि लोग मज़ाक़ न बना रहे हों। डरते-डरते पूछा, ‘‘इससे नुक्सान क्या होता है?’’

‘‘नुकसान?’’ घोष बाबू को मौका मिल गया। बड़ी-बड़ी आँखें निकालकर शुरू हो गए, ‘‘अरे पूछो मत, जान-माल पर परेशानियाँ आती हैं। चोरी, डकैती, बीमारी। जितने की चीज़ आती है, उससे बीस गुने का नुकसान करा जाती है।’’

‘‘हे भगवान!’’ गुप्ता जी घबराए, ‘‘इससे बचने का कोई उपाय तो होगा?’’

‘‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं। तुम, अपने मोबले को कम समझते हो। कामरूप के पुराने तांत्रिक हैं। तंत्र-मंत्र में इन्हें महारत हासिल है। और फिर मुसीबत के समय दोस्त ही तो दोस्त के काम आता है, क्यों मोबले?’’

‘‘हाँ-हाँ। बिल्कुल!’’

‘‘तो अब क्या रह गया, मोबले ने ‘हाँ’ कह ही दी। बस, अब जो सामान ये बताएँ तुम ला दो। समझो हो गया काम।’’

‘‘सामान? कैसा सामान?’’

‘‘महाशय, अनुष्ठान में लगने वाला सामान। जब तक कोई अनुष्ठान पूरे विधि-विधान के साथ नहीं किया जाता उसका लाभ नहीं मिलता।’’

‘‘ठीक है, नोट कराइए,’’ गुप्ता जी ने दुखी भाव से छोटी-सी नोटबुक निकाली, जो हमेशा उनकी जेब में पड़ी रहती थी।

‘‘हाँ, लिखो,’’ मोबले अपनी मुस्कराहट दबाते हुए बोले, ‘‘एक किलो भूरी भैंस का घी।’’

‘‘भूरी भैंस का न मिले, तो क्या काली का चल सकता है?’’ कर्तार जी ने झूठी गंभीरता दिखाते हुए पूछा।

‘‘हाँ, चल जाएगा। लेकिन भूरी भैंस का मिल जाए तो ज़्यादा बेहतर है।’’ मोबले ने मुस्कराहट दबाते हुए कहा, ‘‘आगे लिखो--- एक किलो बेसन, ढाई किलो मैदा, दो किलो शकर, दो किलो बासमती चावल, एक किलो ताज़ा दही----’’

मोबले ने सामानों की एक लंबी-चौड़ी लिस्ट लिखा दी। गुप्ता जी लिखते जा रहे थे और पसीना पोछते जा रहे थे।

दूसरे दिन गुप्ता जी रिक्शे पर सारा सामान लदाकर भागे आए और पसीना पोंछते हुए बोले, ‘‘मोबले भाई, सामान आ गया है। अनुष्ठान कब शुरू करेंगे?’’

‘‘मेरे ख़्याल से रात आठ-नौ तक ठीक रहेगा,’’ कहकर मोबले ने आँखों ही आँखों में घोष बाबू की राय पूछी।

‘‘हाँ-हाँ, यह टाइम हम सबको ‘सूट’ करेगा। ठीक है गुप्ता जी, अब आप जाकर शेष प्रबंध करिए। हम लोग ठीक समय पर पहुँच जाएँगे,’’ घोष बाबू बोले।

‘‘शेष प्रबंध? अब कैसा प्रबंध?’’

‘‘दावत का प्रबंध!’’

‘‘किसकी दावत का?’’

‘‘हम सबकी और किसकी। आखिर ये इतना सामान किसलिए लाए हैं?’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘आप क्या समझे, यह भूत भगाने का नुस्खा है? महाशय, मोबले ने यह सारा सामान दावत के लिए लिखाया है। अब जल्दी जाइए और दावत की तैयारी करिए।’’

गुप्ता जी को काटो तो ख़ून नहीं। ग़ुस्सा भी और खिसियाहट भी। पर अब हो क्या सकता था। बड़बड़ाते हुए घर लौट गए।

उस रात मुहल्लेवालों ने गुप्ता जी की दावत में जमकर मौज मारी।

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Junaid Chaudhary Verified icon 2 months ago

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S Nagpal 2 months ago