मुख़बिर - 27

मुख़बिर

राजनारायण बोहरे

(27)

फिरौती

अगले दिन में किस्सा सुनाने का मन बना रहा था कि यकायक रघुवंशी ने पूछा -‘‘ तुम कितनी फिरौती दे आये थे -गिरराज !‘‘

‘‘ कतई नहीं साहब, एकऊ रूपया ना दियो हमने !‘‘ मैंने मजबूत आवाज में हमेशा की तरह जवाब दिया।

‘‘ मैं बताता हूं दरोगा जी, इसका तो पूरा किस्सा मुझे मालूम है।‘‘ दीवान हेतमसिंह ने बीच में दखल दिया और मेरी हंसी सी उड़ाता बोला-‘‘गिरराज के बाप ने अपनी तीन बीघा जमीन बेच के एक लाख दये औैर लल्ला पंडित की घर वाली ने अपने जेवर गिरवी रख के पिचत्तर हजार पहुंचाय हते । इन दोउअन की फिरौती वाही मास्टर के हाथन से गयी थी साहब, जिसके यहां ये लोग पंद्रह दिन पड़े रहे ।‘‘

‘‘वो साला मास्टर रहता कहां है ? अपन लोग सीधा उसे ही पकड़ लें न ! काहे को यहां दर-दर की ठोकर खाते भटक रहे है ?‘‘ सहसा रघुवंशी ने मुझसे पूछा था, तो मैं अचकचा गया और सिर्फ इतना कह पाया था-‘‘ हम तो इतनो जानि सके कै वो राजस्थान में कहीं रहतु है ।‘‘

‘‘ लेकिन मजेदार बात ये रही साहब, कै घर लौटि के इन हरामियों ने वही बात कही जो इनके बाप बागियो नें इन्हे सिखा दइ हती । पतो है साहब! .............जब आई जी साहब ने इनते पूछी कि तुम कैसे भाग आये, क्या कुछ फिरौती दी ? तो साफ नट गये, कहने लगे कि एकऊ रूपया ना दियो साहब । डाकू सो रहे हते, हमने मौका देखो और भजि आये।‘‘

मै मन ही मन सोच रहा था कि हम तो अपनी जान की कीमत दे के छूटे, लेकिन डाकुओं के इलाके में तैनात तुम्हारे पुलिस के लोग तो सिर्फ शांति से अपनी नौकरी कर लेने के बदले में इन बागियों की ऐसी-ऐसी मदद करते है, कि कहना भी बुरा लगता है । क्या कभी उनसे किसी ने इसका हिसाब किया ?

उस दिन हैडकानिस्टिबिल हेतम मेरे बगल में चल रहा था । बस मैंने उसे जरा सा छेड़ दिया कि ‘ इन बागियों को पनपाने में पुलिस वालों की मिली भगत तो होती है दीवानजी ‘, तो वह भीतर से फट सा पड़ा था । बोला-‘‘ तुम तो खुद बागियों के इलाके के रहने वाले हो सब जानते हो । हम कहा करें, ससुरे हम अपनी जान थोड़ी गंवाइ दें । हमे तो इनही बीहड़न में नौकरी करनो है, हमारे लरिका-बच्चा अकेले कौन के भरोसे छोड़ देगे हम । सरकार ससुरी कहां हथेली लगा लेगी । बागी कहा नहीं करि सकत्त ? उन्हे का रोक है? वे तो खुले सांड़ हैं, , जहां चाहें जाकर निपिटा सकतु हैं ।‘‘

दुखी हेतमसिंह मुझे सुनाता रहा था ...........कि पुलिस की तरफ से जाने-अनजाने इन डाकुओं की मदद तो होती ही रहती है । वायरलेस वाला मिश्रा अपने विभाग की आगे की योजनायें तनिक से रूपयों के लालच में बागियों तक पहुंचा देते है। .....हां, कई कर्मचारी जैसे नरवरिया जी लालच तो नहीं करते, लेकिन .उनमें से बहुत से ऐसे हैं जो जाति-विरादरी के दबाब में सूचनायें देने का काम करते हैं, .......दरअसल बागीयों की विरादरी के तमाम कर्मचारी पुलिस में ऊपरसे नीचे तक भरे पड़े हैं सो बागी उनपे अपने रिश्तेदारों से दबाब डलवाते हैं और मन मारके विभाग की खबरें बागियों को सोंप देते हैं । और भैया........................कई बार ये भी होता है कि खबर मिलने के चार-छह घंटे बाद जानबूझ कर पुलिस कर्मचारी वारदात वाली जगह देर से पहुंचते है, जिससे बागी अपना काम करके सुरक्षित जगह पहुंच जाते है, ..........इस लेट-लतीफी की वजह यह है कि एक तो पुलिस को तैयारी में कुछ समय भी लगता है, क्यों कि बंदूक लेना, एम्यूनेषन लेना, गाड़ी में डीजल डलवाना वगैरह की खाना पूरी करने में देर लगती है और दूसरी यह कि अपनी सुरक्षा की चिन्ता में भी पुलिस जान बूझ कर देर करती है ताकि बागीर उस जगह से दूर निकल जावें और खतरा टल जाये । क्योंकि बागी तो जंगल के कोने-कोने से बाकिफ होते हैं, और पुलिस वाले ऐसी जगहो से अंजान रहते हैं सो वे नई जगह बिना तैयारी और जानकारी के घुसने में अपनी जान जोखिम में डाल देना मानते हैं।...........पुलिस के पुराने वायरलेस सेट भी बागियों के पास सारी सूचनायें पहुंचा देते है, क्योंकि किसी भी टाजिस्टर सेट का एफ एम बैण्ड लगा लो पुलिस वायरलेस पर होने वाली बातचीत का एकएक शब्द आसानी से सुनाई आ जायेगा ।

हेतम ने यह भी बताया था कि बागियों के सुरक्षित रहने का सबसे बड़ा कारण उनके विश्वस्त मुखबिर होना है, वे लोग बड़े पक्के जासूस रखते हैं अपने। उनकी तुलना में पुलिस अपने मुखबिरों को न उतनी सहायता दे पाती, न वे इतने गुप्त रह पाते है, कि डाकुओं की उन पर नजर ही न पड़े, सो पुलिस को ज्यादा सही सूचनायें ही नही मिल पातीं। जबकि डाकुओं के मुखबिर एकदम गुप्त रहते है। इसके लिये वे प्रायः उन्हे पकड़ के लोगों के सामने कभी नहीं बुलाते, खुद जाकर उनसे मिल आते है। फिर डाकू लोग मुखबिरों के लिए इतना पैसा देते हैं कि पुलिस कल्पाना भी न कर सकेगी ।

हेतम की बातों से मुझे ऐहसास हो चला था कि डाकुओं को खोजने के इस अभियान में भी छोटा कर्मचारी उतनी रूचि क्यों नहीं दिखा रहा, जितनी बड़े अफसर दिखा रहे है। सच है सबकी अपनी-अपनी मजबूरी है़, लेकिन आखिर पुलिस की भी तो कुछ डयूटी है न ! मन ही मन एक तर्क उठा था मेरे सामने। अपनी मजबूरियों की वजह से डाकुओं को सहयोग देते और उन्हे पनपाते ये पुलिस वाले जाने कितने निरपराध लोगों को मरवाये दे रहे है, जाने कितने लोगों को फिरौतीयों की भारी रकम से पूरी तरह लुटाये दे रहे हैं ।

हम भी तो लुट ही गये ! घर लौट कर दद्दा ने सारी कहानी सुनाई थी मुझे । जिस दिन हमारी पकड़ हुई देर रात तक तो कोई खबर ही नहीं मिली, क्योंकि सबको पता था कि मैं चुनाव करवाने गया हंू, पता नहीं किस गांव में क्या इंतजाम करवाते फिर रहे होंगे ।

रात बारह बजे गांव का कोटवार आया और उसने दद्दा को जगा कर बताया कि मेरा अपहरण हो गया है । दद्दा सकते में आ गये -हमाये पास का धरो है लला ! हमाये लरिका को डाकू काहे को पकरेंगे ?

लेकिन सच तो सच था, उनके इस तरह पूछने या विश्वास न करने से घट चुकी घटना वापस तो नहीं हो जाती । घर भर को जगा कर दद्दा ने इस घटना से अवगत कराया तो घर में कोहराम मच गया । आधी रात को रोहाटे पड़ गये हमारे यहां।

पुरा - परौस के लोगों ने समझा कि मेरे घर कोई मौत हो गई । हमारे बीहड़ों में पकड़ हो जाने को भी मौत से कम नही मानते । आधी रात को ही मर्द-औरते हमारे घर जुटने लगे, लेकिन जिसे भी सचाई का पता लगता वह तुरंत ही वहां से खिसक जाता ।

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