JAN-MDIN in Hindi Moral Stories by Rajesh Bhatnagar books and stories PDF | जन्म दिन

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जन्म दिन

कहानी- “जन्म दिन”

राजेश कुमार भटनागर

जब शुरू-शुरू में वह काम पर लगी थी तो खामोश रहा करती थी। मैंने जब उसे पहली बार देखा था तो मन में एक टीस लिए पूछ बैठा था -

‘‘क्या नाम है तुम्हारा ?‘‘

‘‘खुशी‘‘ उसने पोछा लगाते-लगाते जवाब दिया था ।

‘‘पढ़ती हो ?‘‘

‘‘अगर पढ़ती तो यहाँ कैसे आती ? स्कूल छोड़ दिया है।‘‘

‘‘क्यों ?‘‘

मेरे इस सवाल पर वो खामोश हो गई थी। फिर बड़े संयत स्वर में बोली थी-

‘‘मेरी माँ मर गई। बाप शराबी है तो स्कूल कैसे जाऊँ ? तीन छोटी बहनें हैं उनको कौन खिलाये ? इसीलिए अंकल आठवीं पढ़कर छोड़ दी। बस अब तो खूब काम करूंगी और अपनी छोटी बहनों को पढ़ाऊंगी।

वो काम करके चली गई थी। मैंने दरवाजा बन्द कर लिया था। पत्नी सुबह ही स्कूल पढ़ाने चली जाती थी। बच्चों की शादी कर चुका था सो बेटा जयपुर और बेटी बरेली रहते थे। मैंनें घड़ी पर नज़र डाली तो चौंक पड़ा। नौ बज चुके थे और मुझे ऑफिस जाना था सो जल्दी-जल्दी दाढ़ी बनाने लगा। दिमाग खुशी की बातों में अटका था। ईष्वर भी क्या-क्या खेल खिलाता है। किसी को जी भरकर लुटाता है और किसी को कंगाल बनाकर दर-दर की ठोकरें खिलाता है। पढ़ने, खाने-खेलने के दिनों में बेचारी खुशी की खुशियाँ ही रूठ गई थीं जैसे।

खैर वो काम पर आती रही। कभी-कभी मैं उसकी ज़िन्दगी में ना चाहते हुए भी झाँकने की कोशिश करता। तब वो खुलकर सब कुछ साफ बताने लगी कि उसकी माँ ने किसी राजपूत से प्रेम विवाह किया था और वह शराबी निकल गया। फिर उसकी माँ एक लड़के की चाह में हड्डियों का ढ़ांचा बन गई और उसे और उसकी तीन छोटी बहनों को शराबी बाप के हवाले छोड़ सदा के लिए दुनिया से रूख़सत हो गई।

और एक दिन वो बेहद उदास सी घर में प्रविष्ट हुई तो मैंने पूछ लिया -

‘‘आज इतना मुंह क्यों लटका हुआ है खुशी.... क्या बात है ? तबीयत तो ठीक है तेरी ?” वो कुछ नहीं बोली। चप्पल उतारकर हाथ में झाड़ू ले कमरा झाड़ने लगी। मुझसे नहीं रहा गया तो मैंनंे उसकी बांह पकड़कर अपनी ओर खींचते हुए पूछ लिया-

‘‘बता ना क्या बात है ? तबीयत तो ठीक है ?‘‘ बस इतना कहते ही वह झाड़ू छोड़कर फूट-फूट कर रो पड़ी -

“अंकल रश्मि ......।‘‘

‘‘क्यों क्या हुआ रश्मि को ?‘‘ मैंनें चिंतित हो पूछा।

‘‘रश्मि माँ बनने वाली है।‘‘

‘‘क्या .........? मैं भौचक्का सा रह गया।

‘‘हाँ, उसका पड़ौस के लड़के से चक्कर था ।”

‘‘अब......? अब क्या होगा ? बिन ब्याहे मां....। क्या लड़के के घरवालों को पता है ?‘‘

‘‘हाँ, वो राजी हैं मगर बालिग नहीं होने के कारण शादी नहीं हो सकती। अंकल रश्मि ने मेरी नाक कटवा दी। मैंनें उसके लिए क्या-क्या सोचा था। ठाठ से तोरण मरवाती और इज्ज़त से विदा करती मगर........... ।”

और सिसक पड़ी थी वह ।

खुशी की खुशियों को उसकी छोटी बहन ने ग्रहण लगा दिया था। शायद अशिक्षा का यही परिणाम होता है । शराब, अशिक्षा हमारे देश के लिए अभिशाप बन गई है । छोटी सी उम्र में भविष्य बर्बाद हो रहे हैं इसी अशिक्षा और शराब के कारण ना जाने कितनी रश्मियां और खुशी अपना भविष्य बर्बाद कर रही हैं । मैं कभी खुशी, कभी रश्मि, कभी उसकी छोटी बहनों को लेकर सोच में पड़ जाता । आखि़र क्या होगा इन अनाथ सी बच्चियों का ...।

अक्सर जब खुशी काम कर रही होती, दरवाज़ा खड़कता और खुशी बोल पड़ती-

“मेरी छोटी बहनें होंगी अंकल दरवाज़ा खोल दो ।”

मैं दरवाज़ा खोल देता । दोनों छोटी बहनें आतीं और खुशी उनको बीस रूपये थमा देती । वे रूपये लेकर चली जातीं । पूछने पर खुशी बताती, मैं आती हूं तो ये सोती रहतीं हैं । अब दूध-चाय लेकर जायेंगी तब चाय बनायेंगी और टोस्ट खायेंगी ।

इसे नियति कहूं या विधि का विधान जो ,खुशी बिन ब्याही क्वांरी मां बन बैठी थी अपनी छोटी बहनों की । बड़े होने के नाते मां जैसा फ़र्ज अदा कर रही थी छोटी उम्र में ही । एक कसक उसके दिल में रह-रहकर उठती, काश....वह रश्मि को डोली में बैठाकर विदा कर पाती तो उसकी मां की आत्मा को कितनी शांति मिलती....। कितनी ही बार उसने मुझसे बड़े जोश और विश्वास से कहा था-

“देखना अंकल मैं मेरी नेहा और सुमन की शादी ऐसी धूमधाम से करूंगी...। तोरण मरवाऊंगी...। डोली में बैठाकर विदा करूंगी उन्हें । रश्मि की तरह नहीं, जिसने मेरे अरमान ख़ाक में मिला दिये....।” कहते-कहते आंखें भर आईं थीं उसकी ।

शायद दोनों छोटी बहनों ने भी स्कूल छोड़कर झाड़ू-पोछे का काम पकड़ लिया था । कई बार मैं देखता जनवरी की कड़क सर्दी में जब पैर ज़मीन पर रखने की भी हिम्मत नहीं पड़ती तब वे दोनों भी अपने अधढके बदन को बाहों में दबाये ठण्ड से बचने की नाकामयाब कोशिश करती । और एक दिन मुझसे खुशी ने कहा था-

“एक बात बोलूं ?”

“एक क्या दो बोल न ।”

“अंकल इनर कितने का आता है ?”

“क्यों ?”

“अंकल मेरी नेहा को बहुत ठण्ड लगती है उसके लिए और सुमन के लिए एक-एक इनर ला दो न, मेरे महीने से पैसे काट लेना ।” कहकर झेंप सी गई थी जैसे कुछ ग़लत कह दिया हो ।

“और तुझे ठण्ड नहीं लगती ? तुझे भी तो ठण्ड लगती हागी ।”

“अरे मेरा क्या है, मैं तो बड़ी हूं । अंकल मेरी बहने तो अभी छोटी हैं बस उनको कोई तकलीफ ना पहुंचे । अगर ठण्ड से बीमार पड़ गईं तो काम की छुट्टी हो जायेगी और मेरे पास तो दवाई के पैसे भी नहीं रहते...।” वह काम में लग गई थी । और मैं सोचने लगा था परिस्थितियों ने उसे उम्र से पहले ही कितना बड़ा बना दिया है....।

मैं दूसरे ही दिन तीनों के लिए एक-एक इनर ले आया था । वह तीसरा इनर हाथ में ले मुझसे बोली थी-

“अरे अंकल मेरे लिए भी ....? क्यों लाये आप ? मैं तो रह लेती बिना इनर के ही...। अब महीने में से आप तीनों के पैसे काट लेना।” उसने तीनों इनर बड़े संतोष के साथ जतन से थैली में रख लिए थे । मैंने शाम को पत्नी को सब बताया था तो वह बहुत खुश होकर बोली थी, “अच्छा किया बेचारी गरीब है उनसे पैसे मत लेना ।”

और एक दिन खुशी खुशी हाथों में अख़बार लिए दौड़ती-हांफती सी चली आई थी-

“अंकल ...अंकल....। आपकी कहानी छपी है इसमें ।”

“अच्छा ! ला दिखा ।”

“आपको नहीं पता ? मैंनें सारे मोहल्ले को दिखाई आपकी कहानी, और धीरज को भीकृ।”

“ये धीरज कौन है भई ?”

वह मुस्कराकर नीची नज़र करके खड़ी हो गई थी ।

“अरे बता तो....कौन धीरज....?”

“हमारा पड़ौसी है ।”

“तो उसके नाम से ऐसे शरमा क्यों रही है ? कुछ चक्कर है क्या ?” मैंने उसके हाव-भाव से उसका दिल टटोला था । उसकी कजरारी बड़ी-बड़ी आंखों में शर्म का पर्दा उतर आया था-

“मुझको बहुत चाहता है । जहां-जहां काम करती हूं पीछे-पीछे आ जाता है । कहता है तुझसे ही ब्याह करूंगा ।”

“ओह !” मैं चक्कर में पड़ गया था । तो यह भी अभी से...? आखि़र ये हो क्या रहा है ? हमारी संस्कृति, हमारा समाज किस ओर जा रहा है...? मैंने उससे पूछा था-

“और तू...? तू भी उसे चाहती है ?”

उसने अंगूठा ज़मीन में रगड़ते हुए “हां” में सिर हिला दिया था ।

“पागल है क्या ? अभी तेरी उम्र ही क्या है ? क्या करता है वो ? क्या उम्र है उसकी ? उसके घर वाले ...?”

“उसने घर वालों को भी कह दिया है कि वो मुझसे प्यार करता है और मुझसे ही ब्याह करेगा नही ंतो अपनी जान दे देगा । उसके घर वाले राज़ी हैं मुझसे उसकी शादी करने के लिए । अभी मज़दूरी करता है । इक्कीस का पूरा होते ही शादी कर लेगा ।”

“पागल हो तुम लोग...। पढ़ने-लिखने भविष्य बनाने से ज़्यादा तुम्हें इतनी सी उम्र में प्यार ...मोहब्बत...?” मैंने चिढ़ते हुए उसे अख़बार वापस दे दिया था । मन ही मन बड़बड़ाया था- भाड़ में जाओ तुम सब...।

वो दूसरे ही दिन अपनी टी.सी. लिए आ खड़ी हुई थी-

“अंकल ये मेरा फार्म भर दो न । आधार कार्ड बनवाना है । धीरज की मां ने वकील से बात की है हमारी शादी की । कोर्ट मैरिज के लिए आधार कार्ड की ज़रूरत पड़ेगी ।”

मैं उसकी शक्ल देखता रह गया था । फिर उसकी टी.सी. में जन्म तारीख पर नज़र मारी थी । सोलह की पूरी हो चकी थी । जन्म दिन बारह जनवरी का था जो निकल चुका था । मगर वो अपनी छोटी बहन नेहा का जन्म दिन नहीं भूली थी । फार्म भरवाकर बोली थी-

“अंकल ! प्लीज़ मुझे दो दिन की छुट्टी दे दो न ।”

“क्या करेगी दो दिन ?”

“देखो, एक दिन तो आधार कार्ड बनवाने में लगेगा और परसों मेरी नेहा का जन्म दिन मनाऊंगी । कल उसे नये कपड़े दिलवाऊंगी । परसों केक लाऊंगी और डी.जे. लगाऊंगी ...। कभी-कभी तो उनको भी लगगे कि मेरी मां नही तो क्या, मेरी बड़ी बहन तो है।”

मैं उसका विश्वास से भरा चेहरा देखता रह गया था । फिर मैंने कहा था-

“और तेरा जन्म दिन...? खुद अपना जन्म दिन भूल गई ? बारह जनवरी को था, कभी का निकल भी गया ...।”

“मेरा जन्म दिन कौन मनाए...? अंकल पापा को तो शराब से फुर्सत नहीं । उनकी बला से घर में कुछ भी हो.... कोई कहीं भी जाये, कोई भी आये....। सुबह से ही कच्ची शराब पीकर पड़ जाते हैं गली में । मेरी मां होती तो वो...?” कहते-कहते उसकी आंखें आंसुओं से भर आईं थीं । मैंने आधार कार्ड के फार्म के साथ सौ रूपये का नोट उसके हाथ पर रख दिया था-

“ये नेहा को मेरी तरफ से चॉकलेट के दे देना ।” और मन ही मन खुशी के अगले जन्म दिन पर उसके घर जाकर उसका जन्म दिन मनाकर खुशियों का तोहफा देने की ठान बैठा था ।

फिर अचानक ही खुशी ने अपना बन्द कर दिया । मैं भी ड्यूटी पर बाहर चला गया । आया तो देखा दूसरी बाई काम कर रही है । पूछने पर पत्नी ने बताया कि खुशी ने आना बन्द कर दिया तो मैंने इसे लगा लिया । अब उसका तो पता नहीं आये ना आये.....कुछ कहा भी नहीं और एकदम काम छोड़ दिया । सामने वाली ने भी दूसरी बाई लगा ली है ।

मैं सोच में पड़़ गया कि आखि़र खुशी को हुआ क्या ? कहीं उसका बाप.....? बाप तो स्वर्ग नहीं सिधार गया....? ना...ना... ईश्वर ना करे । तो फिर क्या हुआ जो काम छोड़ दिया । समय पर पैसे दे रहा था, खाना-पीना....सब कुछ...। मैं उसका घर नहीं जानता था नहीं तो घर चला जाता । मगर दूसरी बाई लग चुकी थी सो उसके घर जाकर भी क्या करता ...? मगर मुझे उसका जन्म दिन याद था और मन में जो ठानी थी उसे पूरा करने का इरादा भी पक्का था सो समय का इन्तज़ार करने लगा । मैं उसकी ज़िन्दगी से इस कदर जुड़ चुका था कि उसे भूल पाना कठिन हो रहा था । उसका अपनी बहनों के प्रति प्रेम, उसकी समझदारी, त्याग ...सब कुछ याद आता । उसके बारे में जानने की जिज्ञासा सदैव बनी रहती । उस पर कहानी लिखने का मन जो बना लिया था मैंनें ।

और नियत बारह जनवरी उसके जन्म दिवस पर अपने प्रण के मुताबिक केक और उसके लिए एक जोड़ी कपड़े लेकर ढूंढता-ढांढता पहुंच ही गया था उसके घर । दरवाज़ा खटखटाने पर उसकी छोटी बहन नेहा निकल कर आई थी, “अरे अंकल...!” दौड़कर अन्दर गई थी । टूटा-फूटा छोटा सा गन्दा घर था उसका जिसके हर कोने में गुटखे की पीक के निशान हो रहे थे । टूटा दरवाज़ा, बिना पुती दीवारें....ईंटें अपने दांत दिखाती जैसे मुंह चिढ़ा रही थीं ...। खुशी कमरे से निकल आई थी । हाथ में छोटा बच्चा था । एक बार मुझे देखकर मुस्कराई थी । आश्चर्य और खुशी का भाव उसके चेहरे पर झलका था पर दूसरे ही पल उसके चेहरे पर गंभीरता छा गई थी ।

मैंने केक और कपड़े एक ओर रखते हुए कहा था-

“पता है आज मैं क्यों आया हूं यहां ...? तुझे पता है आज कौन सी तारीख है ...? बारह जनवरी....तेरा जन्म दिन है पगली ।”

हैप्पी बर्थ डे टू यू कहते हुए उसके सिर पर हाथ फेर दिया था मैंनें ।

“काम क्यों छोड़ दिया अचानक तूने ?” फिर गोद में बच्चे को देख पूछ बैठा था-

“ये बच्चा....बच्चा किसका है ?”

वो ख़ामोश थी । उसके होंठ फड़फड़ाये थे और आंखें आंसुओं से भर गई थीं । फिर बड़ी कोशिशें के बाद उसके मुंह से निकला था-

“मेरा है...।”

“तो क्या तूने धीरज से शादी....?”

“नहीं, मैं भी रश्मि की तरह बिन ब्याही.....।” कहते-कहते सिर मेरे कन्धे से टिकाकर रो पड़ी थी । मैं ऊपर से नीचे तक पसीने से भीग गया था । मेरा भी गला अवरूद्ध हो गया था । चाहकर भी कुछ नहीं कह सका था उससे, ना ही कुछ पूछ सका । जन्म दिन का तोहफा और उल्लास उसकी मज़बूर ज़िन्दगी के समन्दर में कहीं गहरे डूब गया था । जानता था जिन परिस्थितियों में वह जी रही थी उन परिस्थितियों में अपना विश्वास, धैर्य, और संयम कायम रख पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था । मैं उसके सिर पर हाथ फेर कर बस इतना ही कह पाया था-

“तेरे जन्म दिन का केक और तेरे कपड़े हैं....।”

वो अपनी आंखों में आंसुओं का सैलाब लिये मुझे देखती रही थी और मैं उसके लिये लाये तोहफे को उसके खुरदुरे कठोर हाथों में रख अनायास ही लौट पड़ा था ।

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(राजेश कुमार भटनागर)

एल-27, विवेकानन्द कॉलोनी, भगवानगंज,

अजयनगर, अजमेर- 305001

मो. 9413227987/8949415256