Deh ki Dahleez par - 20 - last part in Hindi Moral Stories by Kavita Verma books and stories PDF | देह की दहलीज पर - 20 - अंतिम भाग

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देह की दहलीज पर - 20 - अंतिम भाग

साझा उपन्यास

देह की दहलीज पर

संपादक कविता वर्मा

लेखिकाएँ

कविता वर्मा

वंदना वाजपेयी

रीता गुप्ता

वंदना गुप्ता

मानसी वर्मा

कथा कड़ी 20

अब तक आपने पढ़ा :- मुकुल की उपेक्षा से कामिनी समझ नहीं पा रही थी कि वह ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है ? वह फैंटसी में किसी के साथ अपने मन की बैचेनी दूर करने की कोशिश करती है। उस फैंटसी में वह सुयोग को पाती है। मुकुल अपनी अक्षमता पर खुद चिंतित है। एक अरोरा अंकल आंटी हैं जो इस उम्र में भी एक दूसरे के पूरक बने हुए हैं। सुयोग अपनी पत्नी प्रिया से दूर रहता है एक शाम उसकी मुलाकात शालिनी से होती है जो सामने वाले फ्लैट में रहती है। उनकी मुलाकातें बढ़ती जाती हैं और उन्हें एक दूसरे का साथ अच्छा लगता है। वरुण भी शालिनी के साथ बातचीत करता है। वहीं नीलम मीनोपॉज के लक्षणों से परेशान है। नीलम के ऑपरेशन की खबर से राकेश चिंता में आ जाता है वह अपने जीवन में नीलम की उपस्थिति शिद्दत से महसूस करता है जिसे हॉस्पिटल में कामिनी भी महसूस करती है और मुकुल के साथ खुद के संबंधों पर विचार करती है। अरोरा अंकल के बीमार पढ़ने से कामिनी मुकुल की उसके जीवन में अहमियत पर विचार करती है। अरोरा अंकल सुयोग को जीवन में समझौते का महत्त्व समझाते हैं और सुयोग इस पर विचार करते व्यस्त हो जाता है। शालिनी सुयोग की व्यस्तता समझती है और तरुण और सुयोग के बीच खुद को असमंजस में पाती है। मुकुल और राकेश एंड्रोपॉज के लक्षणों पर बातें करते हुए बहुत सारी जानकारी साझा करते हैं और मुकुल और कामिनी के रिश्ते में एक समझदारी पैदा होती है।

अब आगे

सुबह कामिनी की नींद खुली तो उसने खुद को मुकुल के आगोश में पाया। वह गहरी नींद में सोए मुकुल के मासूम चेहरे को देखती रही और हौले से उसके होठों से अपने तप्त होंठ छुआ दिए। कामिनी के बालों ने मुकुल के चेहरे को छुआ जिससे कुनमुना कर उसने करवट बदली। रात उसके नाइट सूट के बटन से खेलते कामिनी ने उन्हें खोल दिया था मुकुल का घुंघराले रोएँदार सीना नाईट ड्रेस से झांक रहा था। कामिनी के शरीर में फिर सिहरन उठने लगी। तकिए के ऊपर रखी मुकुल की बांहों ने मानों खुला निमंत्रण देने के लिए सीने को निर्बाध कर दिया था। उसके अधखुले होंठ कामिनी के होठों को खुद में समा जाने को पुकार रहे थे। कामिनी की आंखों में बीती कई रातों की रति क्रियाएं कौंध रही थीं जब वह और मुकुल एक दूसरे से खेलते घंटों बिता देते थे। अंग अंग ही नहीं रोएँ रोएँ से रस बरसता था। कामिनी की उंगलियों की थिरकन बढ़ने लगी और नींद में ही मुकुल की उंगलियाँ मचल उठीं। उनकी थरथराहट महसूस करते कामिनी की इच्छा तीव्र हो गई उसने मुकुल के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। अचानक दो बलिष्ठ बाँहों ने उसे घेर लिया और कामिनी की गोलाइयों को आजाद कर दिया। क्षणांश में कमरे का मौसम बदल गया कामदेव के तीर से बिंधे दोनों के तन मन में बसंत खिल गया फुलवारी महक उठी और दोनों उसकी खूबसूरती में लीन हो गए। मुकुल के मन में आज अपने अक्ष पर कामिनी की चाहतों को साध लेने का विश्वास था। वह कल रात राकेश की बातों से था, कामिनी के व्यवहार की तीव्रता के सौम्यता में बदलने से था या डॉक्टर प्रकाश से अपनी परेशानी शेयर कर उसके समाधान की आश्वस्ति से लेकिन आज वह वही पुराना मुकुल था, कामिनी का मुकुल। रेगिस्तान की तप्त भूमि सी कामिनी बारिश के इंतजार में बिछी हुई थी जल्दी ही वे एकाकार हो गए। इस तपन को शांत करने के लिए बूंदों के जिस आवेग की जरूरत थी उस तक पहुँचने के पहले ही मुकुल हाँफने लगा। उसने चरम पर पहुँचने की भरपूर कोशिश की लेकिन कामिनी की चाहतों का बोझ उसे अपनी क्षमता से ज्यादा लगा जिसे अक्ष साध न पाया। मुकुल धम से बिस्तर पर लेट गया। अतृप्त कामिनी बसंती फुलवारी से अचानक बंजर वीरान में धकेल दिए जाने से हतप्रभ रह गई, उसकी आँखों में आँसू आ गए मुकुल पर अचानक आए क्रोध ने नफरत का रूप ले लिया और उसने उपेक्षा से मुँह फेर लिया। देर तक वे दोनों दो ध्रुव बने रहे। मुकुल खुद से शर्मिंदा और कामिनी का अपराधी महसूस कर रहा था तो कामिनी जीवन की निस्सारता को। कामिनी की चिकनी सुडोल पीठ हौले हौले हिल रही थी मुकुल ने धीरे से उसे थामा तो वह भड़क गई, "मत छुओ मुझे" और अपने कपड़े समेट कर बाथरूम में चली गई। देर तक बाथरूम में नल चलने की आवाज आती रही।
कांताबाई कामिनी की सूजी आँखें उतरा चेहरा देखकर हैरान थी। काम करते-करते वह चोरी छुपे कामिनी को देखकर अंदाजा लगा रही थी कि क्या बात हो सकती है? इतने बड़े घरों में इतनी सुख-सुविधा के साथ दीदी को क्या दुख हो सकता है वह समझ ही नहीं पा रही थी। "कांता आज नाश्ता बना दे मेरा सिर बहुत भारी है" कहते हुए कामिनी प्लेटफॉर्म थाम कर खड़ी हो गई।
"दीदी आप कमरे में जाकर आराम करो मैं सब कर दूँगी। कामिनी किचन से बाहर निकली बेटी ने उसे देखकर थाम लिया" क्या हुआ मम्मी? "
" कुछ नहीं सिर भारी है" कामिनी ने उससे नजरें चुराते हुए कहा उसे डर था कि कहीं उसकी हताशा का राज बेटी पर न खुल जाए। दो अनुभवी आँखें चुपचाप सब देख रही थीं लेकिन उनके अपने दायरे थे चुप रहना उनकी मजबूरी थी। उन्होंने एक बार मुकुल को देखा जो अखबार की ओट में चेहरा किए कनखियों से कामिनी को देख रहा था और उदास था।
कमरे में देर तक कामिनी अपने आप में छटपटाती रही बेटी नाश्ता लेकर आई उसने मना कर दिया। कॉलेज जाने का मन न हुआ उसने सिक लीव का मैसेज छोड़ा। बच्चे कॉलेज चले गए मुकुल भी तैयार होकर ऑफिस चले गए कामिनी वैसे ही पड़ी रही। सबके जाने के बाद मांजी कमरे में आईं उसे नींद में जानकर उसे चादर ओढ़ाकर वह भी चुपचाप चली गईं। बाहर रिमझिम फुहारें पड़ रही थीं लेकिन कामिनी के तन और मन पर ठंडक का नामोनिशान न था। कुक खाना बना गई थी लंच में मुकुल ने आकर उसे जगाया। कामिनी सोई नहीं थी वह तो तपते बीहड़ बियाबान में भटक रही थी "चलो खाना खा लो।"
"मुझे भूख नहीं है आप खा लीजिए माँजी को भी खिला दीजिए।"
"हम भी खा लेंगे लेकिन तुम्हारे साथ, चलो उठो सुबह नाश्ता भी नहीं किया है। मुकुल ने साधिकार कहा तो कामिनी मना नहीं कर पाई। मुंँह हाथ धोकर वह डाइनिंग टेबल पर पहुँची तब तक मुकुल ने खाना सर्व कर दिया था तीनों चुपचाप खाना खाते रहे।
खाने के बाद किचन समेटकर कामिनी रूम में पहुँची मुकुल ने कहा "तैयार हो जाओ कहीं जाना है।"
"कहाँ ?"
"जाना है कहीं तैयार हो जाओ मैं बाहर वेट कर रहा हूँ।" कामिनी को असमंजस में डाल कर मुकुल बाहर चला गया। इस तरह बे वक्त बाहर जाना कहाँ जाना है यह भी नहीं पता कैसे तैयार हो कामिनी? उसके मन में फिर चिढ़ पैदा हुई लेकिन आज मुकुल का व्यवहार अप्रत्याशित था इसलिए वह इंकार न कर सकी। करीब आधे घंटे बाद हल्की फुल्की गुलाबी सिंथेटिक्स प्लेन जॉर्जेट विद बॉर्डर साड़ी में सच्चे मोतियों की माला कर्णफूल और कंगन पहने बालों को एक क्लचर में ढीला सा बाँधे कामिनी जब कमरे से बाहर आई तो मुकुल उसे देखता रह गया। जॉर्जेट में उसका फिगर और खूबसूरती से उभर रहा था।
"कहाँ जा रहे हैं" गाड़ी में बैठते ही कामिनी ने पूछा।
"देखते हैं" संक्षिप्त जवाब दिया मुकुल ने। थोड़ी ही देर में गाड़ी शहर के बाहर सुरम्य वादियों के बीच थी। बारिश ने धरती के कलेजे को अंकुआ दिया था हरियाली की चादर आँखों को सुकून दे रही थी। धुले धुले पेड़ों की शाखाएँ हवा में झूम कर नवयौवना सी लहरा रही थीं। कामिनी खामोशी से प्रकृति के श्रृंगार को देख रही थी तभी एक मोड़ से आगे एक काॅटेज रेस्टोरेंट्स के कुछ पहले मुकुल ने गाड़ी रोक दी। कामिनी ने हैरानी से मुकुल को देखा "क्या हुआ?"
"मुझे तुमसे कुछ बात करना है" कामिनी का हाथ अपने हाथों में लेते मुकुल ने कहा।
कामिनी हैरान थी कि ऐसी क्या बात है जिसे करने मुकुल ऐसी बारिश में उसे लेकर इतनी दूर आए हैं। वह इंतजार करती रही और मुकुल कुछ देर खामोश रहे मानों शब्द जुटा रहे हों। "कामिनी आज सुबह जो कुछ हुआ उसकी सफाई नहीं दे रहा हूँ लेकिन तुम्हें जानना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? काम का स्ट्रेस, बढ़ता वजन और उम्र का तकाजा कि वह पौरुषीय दुर्बलता महसूस करने लगे और उसके उलट कामिनी उफनती पहाड़ी नदी सी। उसके आवेग को संभालने में अक्षम होते गए और फेल होने के डर ने उनका रहा था आत्मविश्वास भी तोड़ दिया। डॉ प्रकाश के पास जाना दवाइयाँ काउंसलिंग सभी की कहानी बताते हुए मुकुल ने बताया कि आज सुबह अच्छी शुरुआत के बावजूद कामिनी के आवेग के सामने वे थरथरा गए और एक सेकंड को आया यह विचार उन्हें तोड़ गया।
कामिनी चुपचाप सुनती रही जैन मैडम की कही बातें उसके दिमाग़ में घूमने लगीं "लेकिन आप तो दवाइयाँ ले रहे हैं फिर क्या दवाइयों से कोई फायदा नहीं हो रहा है?"
"ऐसा नहीं है दवाई अपना असर दिखा रही हैं। आज सुबह मैं फिर गया था डॉक्टर के यहाँ, लेकिन यह क्षमता जितनी शारीरिक है उतनी ही मानसिक भी। मैंने उन्हें बताया कि एक सेकंड के लिए तुम्हारी उत्तेजना को देखकर आया ख्याल मुझे तोड़ गया तो उन्होंने कहा.... । हिचकिचाकर मुकुल चुप हो गया।
"क्या कहा उन्होंने" किसी अनहोनी की आशंका में कामिनी ने बेचैनी से पूछा।
"उन्होंने कहा कि तुम्हारे हार्मोन डिसबैलेंस के कारण तुम्हारे आवेग बढ़ जाते हैं अगर तुम भी किसी हार्मोन थेरेपी और काउंसलर से बात करो तो... । मुकुल ने बात अधूरी छोड़ दी।
कामिनी को कल रात की राकेश मुकुल की बातें याद आने लगीं। मतलब यही है कि इस उम्र का उद्वेग सामान्य नहीं बल्कि किसी अनियमितता की ओर इशारा कर रहा है। जिसने उसके और मुकुल के प्यार भरे इस संबंध को बेतरतीब कर दिया है और वह अब तक सिर्फ मुकुल को दोष देती रही जबकि अनजाने में ही सही वह भी इसमें दोषी है। उसकी आँखें भर आईं उसने अपना सिर मुकुल के कंधे पर टिका दिया और धीरे से बुदबुदाई "मुझे माफ कर दो मुकुल।"
"इसमें हम दोनों का ही दोष नहीं है। देह की यह दुनिया जितनी सरस है उतनी ही उलझी हुई भी। अब चलें सामने रेस्टोरेंट में कुछ खा लें आज सब्जी बहुत बुरी बनी थी खाना खाते ही नहीं बना।"
"क्या सच में कौन सी सब्जी बनी थी?" कामिनी ने याद करने की कोशिश की।
" चलो छोड़ो यहाँ का स्वीट हनी पोटैटो और हरा भरा कबाब बहुत टेस्टी है। उसके साथ चाय पिएंगे फिर शाम को डॉक्टर से तुम्हारे लिए अपॉइंटमेंट लिया है" मुकुल ने गाड़ी आगे बढ़ाकर रेस्टोरेंट की पार्किंग में खड़े करते हुए कहा।
सुयोग के पिछले कुछ दिन बहुत उधेड़बुन में बीते प्रिया से दूरी और अकेलापन असहनीय हुआ जा रहा था। पिछले कुछ दिनों से वह लगातार जॉब वैकेंसी पर नजर रख रहा था। अरोरा अंकल की बात ठीक थी लेकिन इतना बड़ा फैसला लेने की हिचक भी थी। इस बीच वह वीकेंड में मम्मी के पास चला गया उसे अचानक आया देखकर खुशी के आंसू छलक आए उनके। दिनभर उनका प्यार खाने के रूप में उमड़ता रहा और वह तृप्त होता रहा। उसने बात छेड़ी कि अगर प्रिया को उसके शहर में जॉब नहीं मिल रही तो वह प्रिया के शहर में जॉब ढूँढ ले तो कैसा रहे? एक पल को सन्नाटा छा गया फिर पापा ने बात संभाली "हाँ हाँ क्यों नहीं, वैसे भी प्राइवेट जॉब में स्विच ओवर चलता रहता है इसमें बड़ी बात क्या है? तुम दोनों साथ रहोगे यह ज्यादा जरूरी है। मम्मी ने भी मुस्कुराते हुए सहमति दी तो जैसे उसका दिल हल्का हो गया।
" मैं जॉब देख रहा था सोचा पहले आप लोगों की राय ले लूँ कहीं मेरा फैसला गलत तो नहीं नहीं?"
"बेटा कैरियर जरूरी है लेकिन परिवार उससे ज्यादा जरूरी है, तुम दोनों साथ रहो सुखी रहो हम तो यही चाहते हैं।" सुयोग जब वापस लौटा तो बहुत हल्का महसूस कर रहा था।

नीलम अब तेजी से ठीक हो रही थी कॉलेज जाने की आपाधापी न होने से सुबह सुकून दायक हो चली थी। सुबह-सुबह घर में पंडित रविशंकर के सितार या जगजीत सिंह की गज़लों की स्वर लहरियाँ गूंजतीं। खाना वह अपनी देखरेख में बनवाती और कभी-कभी राकेश कुक और नीलम को किचन के बाहर कर खुद कुछ स्पेशल बनाता। ऑपरेशन के पहले काउंसलर की कही बातें राकेश के जेहन में थीं और वह यही सोच रहा था कि वह खुद को आगे भी कंट्रोल में कर लेगा लेकिन ऐसा कर नहीं पा रहा था। कभी पोर्न देखता तो कभी इस कदर ख्यालों में खोया रहता कि खुद को कंट्रोल नहीं कर पाता। अंततः उसने हार्मोन थेरेपी लेने का निश्चय किया। नीलम से बात की तो उसने भी हौसला बढ़ाया आखिर इसमें हर्ज क्या है शरीर के बदलाव हैं और उन्हें नियमित करने के लिए इलाज ही विकल्प है। डॉक्टर ने बातचीत करते हुए राकेश को बताया कि आपने सही निर्णय लिया है तकनीक ने लिप्सा के शॉर्टकट उपलब्ध करवा दिए हैं लेकिन लॉन्ग टर्म में इनके परिणाम भयंकर होते हैं। अत्यधिक पॉर्न ब्लू फिल्म से उपजी तीव्र उत्तेजना ड्रग्स के नशे की तरह होती है जिससे खुद पर काबू करना मुश्किल होता है। आजकल के युवा बिना सोचे समझे इस नशे का सेवन करते रहते हैं और अपने रिश्तो में असफल होकर गहरे अवसाद में आ जाते हैं। समाज का टैबू होने के कारण न किसी को बता पाते हैं न सही सलाह ले पाते हैं। कुछ काउंसलिंग और हार्मोनल थेरेपी के बाद राकेश काफी बेहतर महसूस करने लगा। ऑफिस की व्यस्तता के बाद घर में उसने मोबाइल से दूरी बना ली हाँ नीलम के इर्द-गिर्द बने रहकर उसे छेड़ना रोमांटिक गाने गाना उसने नहीं छोड़ा। अब तो नीलम भी उसके साथ गुनगुनाने लगती और उनकी प्रेम लहरियाँ घर की दर ओ दीवार को गुंजा देतीं।
शालिनी का अब ऑफिस में भी तरुण से बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया था। कभी-कभी सुनैना की आँखों की शरारत से शालिनी झेंप सी जाती तो कभी उसे आँखें तरेर कर घुड़क देती, लेकिन सच तो यह था कि बरसों जिस बियाबान में वह अकेली भटकती रही थी उससे बाहर आकर रिश्तों की आहट सुनना अच्छा लग रहा था। वह और तरुण कभी-कभी लंच में ऑफिस के बाहर किसी रेस्त्रां में चले जाते तो कभी ऑफिस के बाद आइसक्रीम खाते घंटों बातें करते। सुयोग से संपर्क बना हुआ था प्रिया के लिए उसका प्यार और फिक्र शालिनी को सुकून तो देते साथ ही उसकी खुद की जिंदगी में खालीपन का एहसास भी भरते थे।
दवाइयों और काउंसलिंग से कामिनी काफी हद तक अपने आवेगों पर काबू पा रही थी। शाम के समय उसने योग और ध्यान के लिए क्लास ज्वाइन कर ली थी। पहाड़ी नदी का वेग अब मंथर मैदानी नदी के सौंदर्य के साथ निखर कर मुकुल को भी खूब लुभा रहा था।
उस दोपहर को अरोरा अंकल का फोन आया उन्होंने कामिनी और मुकुल को तुरंत बुलाया तो वह घबरा गई। "सब ठीक तो है न अंकल हम बस पहुँचते हैं"
उसकी आवाज की हड़बड़ाहट भांपकर अंकल ने कहा "अरे अरे सब ठीक है घबराने की जरूरत नहीं है आराम से आओ।"
मुकुल और कामिनी वहाँ पहुंँचे तो सोसाइटी के अध्यक्ष और वकील सहित कुछ लोगों को वहाँ देखकर अचरज में पड़ गए। खुलासा करते हुए अंकल ने कहा" मैं अपनी वसीयत लिख रहा हूँ। हम दोनों में से किसी को भी कुछ भी होता है तो दूसरे के रहने के लिए वृद्ध आश्रम में बुकिंग करवा रहा हूँ। आप लोगों को गवाही के लिए बुलाया है।"
अंकल की बेटी भी वीडियो कॉल पर उपस्थित थी अपनी बेबसी पर उसे रोना आ रहा था लेकिन अंकल ने हंँसी मजाक से माहौल को हल्का बनाने की पुरजोर कोशिश की। हालाँकि कभी-कभी अपनी आवाज के कंपन को वे भी छुपा नहीं पा रहे थे। आंटी बहुत खामोश थीं। सबके जाने के बाद सिर्फ कामिनी और मुकुल रुके थे तब आँटी ने बताया कि "उस दिन अचानक बीपी बढ़ने और हॉस्पिटल में भर्ती होने के बाद दोनों अब अपनी उम्र और असहायता को महसूस करने लगे हैं।"
"अगर मुझे कुछ हो गया बेटा तो आंँटी को संभाल लेना, उन्हें व्यवस्थित वृद्धाश्रम में पहुंँचाकर यह फ्लैट किराए पर चढ़ा देना ताकि उन्हें किसी चीज की दिक्कत न हो।"
" कुछ नहीं होगा आपको" कामिनी और आँटी ने लगभग साथ-साथ कहा। कामिनी ने कसकर मुकुल का हाथ पकड़ लिया खो देने का भय उसे सिहरा गया।
वे बातचीत कर ही रहे थे तभी सुयोग वहाँ आया "अरे आओ बेटा बड़े दिनों बाद आना हुआ" आंटी ने हुलसते हुए कहा तो सुयोग सकुचा गया।
" जी आँटी थोड़ा व्यस्त था नई जॉब ढूंढने में, संडे को शिफ्ट कर रहा हूँ।"
"अरे अचानक"
"जी अंकल आपकी बात सीधे भेजें में घुस गई और बस कर लिया फैसला कि लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन और नहीं।"
"अरे भाई फिर तो तुम्हें फेयरवेल देना चाहिए। ऐसा करो कल रात तुम सब हमारे साथ डिनर करो" आंटी ने कहा।
" अरे आंटी आप परेशान न हों कल सुयोग की फेयरवेल हमारे यहाँ होगी हमारी मैरिज एनिवर्सरी भी है आप सभी का साथ और आशीर्वाद यह दिन खास बना देगा" कहते हुए कामिनी ने मुकुल की तरफ देखा।
कामिनी ने पार्टी के लिए नीलम राकेश और शालिनी को भी फोन किया शालिनी ने बधाई देते हुए कहा" लेकिन कल मुझे किसी के साथ डिनर पर जाना है। "
"अरे तो उस किसी को भी साथ ले आओ हम तुम्हें पूरी प्राइवेसी देंगे" कामिनी ने हंसते हुए कहा तो शालिनी मना नहीं कर पाई।
पार्टी में खूब रौनक थी धीमी आवाज में रोमांटिक गीत, स्वादिष्ट खाने की खुशबू, राकेश का नीलम के इर्द-गिर्द घूमना, तरुण का शालिनी को ताकते रहना, वीडियो कॉल पर प्रिया का सबसे बातें करना, अरोरा अंकल आंटी का परिवार के साथ का अहसास करना माँजी का बेटे बहू को फिर पहले जैसे साथ देख तसल्ली से मुस्कुराना।
कामिनी सोच रही थी कि देह की दहलीज पर ठहर गये रिश्ते प्यार और समझदारी से संवारे जा सकते हैं। तरूण ने धीरे से मुकुल से कुछ कहा और कमरे में म्यूजिक की आवाज बंद हो गई लेकिन एक तराना गूँज उठा 'क्या खूब लगती हो बड़ी सुंदर दिखती हो' अपने घुटनों के बल बैठ तरुण ने लाल गुलाब देकर शालिनी को प्रपोज किया और शालिनी ने शर्मा कर गुलाब ले लिया। कमरा तालियों से गूँज उठा सबने उन दोनों को बधाइयाँ दीं। सुयोग ने शालिनी से कहा आपने सही फैसला लिया है बस जहाँ भी रहें साथ रहें मेरे जैसे लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप के चक्कर में कभी मत पड़ना। अरोरा अंकल ने जोर से ठहाका लगाया और बोले देखो हमारी अगली पीढ़ी तैयार हो गई है जो संबंधों में साथ का महत्व समझती है। सभी जोर से हँस पड़े।

सबका ध्यान बंटा देखकर शालिनी तरुण के साथ बालकनी में आ गई वीडियो कॉल पर मम्मी पापा को तरुण से मिलवाने।

समाप्त

कविता वर्मा

Kvtverma27@gmail.com

कविता वर्मा

निवास इंदौर

विधा लेख लघुकथा कहानी उपन्यास

प्रकाशन

कहानी संग्रह परछाइयों के उजाले, कछु अकथ कहानी

उपन्यास छूटी गलियाँ (प्रिंट और मातृभारती पर उपलब्ध)

पुरस्कार अखिल भारतीय सरोजिनी कुलश्रेष्ठ पुरस्कार

अखिल भारतीय शब्द निष्ठा सम्मान

ओंकार लाल शास्त्री पुरस्कार बाल साहित्य के लिए।