Hone se n hone tak - 29 in Hindi Social Stories by Sumati Saxena Lal books and stories PDF | होने से न होने तक - 29

होने से न होने तक - 29

होने से न होने तक

29.

हरि सहाय जी ने नये मैनेजमैण्ट को चार्ज दे दिया था। हमारा डिग्री कालेज जिस मूल संस्था के अन्तर्गत काम करता है उस का नाम बाल एवं महिला कल्याण परिषद है जिसकी देखरेख में हमारे डिग्री कालेज से लेकर प्रायमरी सैक्शन तक अलग अलग शिक्षण संस्थॉए आती हैं। इसके अतिरिक्त एक प्रोडक्शन सैन्टर है जहॉं ग़रीब और बेसहारा औरतों को सिलाई कढ़ाई और चिकनकारी का काम सिखाया जाता है। इन स्त्रीयों को बजीफा तो मिलता ही है साथ ही यहॉ बने सामान की बिक्री से जो भी पैसा मिलता है उसका कुछ प्रतिशत भी उन्हे दिया जाता है। सुनते हैं इस संस्था की फाउन्डर मिसेज़ सहाय ने बड़े शौक से इस सैक्शन की शुरूआत की थी। वे स्वयं ढॅूडकर सिलाई कढ़ाई के नमूने लाती थीं और अपनी देख रेख में काम कराती थीं। पुराने लोग बताते हैं कि उस ज़माने में लखनऊ वाले यहॉ की ऐनुअल सेल का इंतज़ार किया करते थे। इसके अलावा गॉव के कुछ ऑगनवाणी प्रोजैक्ट भी परिषद की देखरेख में चलते हैं। इन सारे ही यूनिट्स की अलग अलग प्रबंध समीतियॉ हैं जो अंततः परिषद् द्वारा संचालित है। अभी तक शशि अंकल और राम सहाय जी परिषद के अध्यक्ष और डिग्री कालेज के प्रबंधक दोनो का ही काम संभालते रहे थे। किन्तु नए तंत्र में इन दोनो ही पदों को अलग कर दिया गया है। श्रीमती मनोकामना चौधरी नए तंत्र की अध्यक्षा बनायी गयी हैं अतः वे सभी यूनिट्स के काम की देखभाल करेंगीं। सुनील कुमार गुप्ता पी.जी.कालेज के प्रंबधक बने हैं। बाकी विभागों में पहले से कार्यरत प्रबंध समीतियॉ यथावत् काम करती रही थी। मिसेज चौधरी परिषद के अन्तर्गत काम करने वाली सभी संस्थाओं पर नियंत्रण करती हैं और गुप्ता पी.जी.कालेज का काम देखते हैं।

राम सहाय जी ने अध्यक्ष का चार्ज मिसेज़ मनोकामना चौधरी को और डिग्री विभाग के प्रबंध का कार्य भार डाक्टर सुनील गुप्ता को सौंप दिया था। अगले दिन ही नए प्रबंधतंत्र की तरफ से स्टाफ की मीटिंग बुलायी गयी थी। टीचर्स के साथ बैठक हुयी थी। सबसे पहले अध्यक्षा ने उठ कर अपना परिचय दिया था फिर प्रबंधक सुनील कुमार गुप्ता का। उसके बाद आदेश दिया था कि एक एक टीचर उठ कर अपना परिचय स्वयं दें। आप लोग केवल अपना नाम और सब्जैक्ट बताऐं...बाकी आपके बारे मे हमें जो भी जानना होगा वह जानकारी हम स्वयं आपकी प्रिंसिपल से ले लेंगे। आप के प्लस और आपके माइनस भी।’’

मीटिंग जल्दी ही निबट गयी थी। शायद अध्यक्षा को कहीं और जाना हो गया था। कमरे से बाहर निकलते तक मिसेज चौधरी को कुछ याद आ गया था और उन्होंने पलट कर दीपा दी की तरफ देखा था,‘‘डाक्टर वर्मा राम सहाय जी कुछ बता रहे थे कि आप लोगों ने बुक्स के लिये कुछ अपील निकाली है। वह यह भी बता रहे थे कि आप लोगों ने ब्रिटिश कॉउसिल को भी इस बारे में कोई एप्लीकेशन दी है।’’

कौशल्या दी कुछ बोलने के लिये आगे को बढ़ी थीं। दीपा दी जब तक कुछ जवाब देतीं तब तक मिसेज़ चौधरी ने कौशल्या दी की तरफ बिना पूरी तरह से देखे हुए उनकी बात काट दी थी, ‘‘डाक्टर वर्मा हम चाहते हैं कि कल आप अपनी लाइब्रेरी कमेटी के साथ अपनी पूरी कारैस्पॉन्डैन्स और पेपर्स ले कर हमसे मिल लें।’’उन्होंने अपनी कलाई पर बॅधी घड़ी की तरफ देखा था,‘‘ग्यारह बजे मेरे कमरे में।’’ और वे दीपा दी की तरफ बिना दुबारा देखे आगे बढ़ ली थीं।

मीटिंग में कुछ भी ऐसी बात नहीं हुयी थी जिसे अच्छा या बुरा कुछ भी कहा जा सके। पर पता नहीं क्यों हम लोग खिन्न हो गये थे। दीपा दी भी उलझी हुयी सी लगीं थीं। अध्यक्षा का बात करने का तरीका हिकारत भरा लगा था और उनके तेवर बेहद आक्रामक।

अगले दिन हम लोग ठीक समय पर अध्यक्षा के कमरे में पहुच गये थे। किताबों के लिये भेजी जाने वाली अपील उन्होंने पढ़ना शुरु की थी और उनकी भृकुटी टेढ़ी होने लग गयी थी, ‘‘इस चिट्ठी में तो आप लोगों ने सिर्फ अपने डिग्री कालेज का यशोगान किया है। परिषद में और सैक्शन भी तो हैं। उनके बारे में तो आप लोगों ने कुछ लिखा ही नहीं है। क्या आप लोगों को नही पता कि आप के साथ ही प्रायमरी से ले कर इन्टर तक पॉच और ऐजूकेशनल यूनिट्स हैं। इसके अलावा प्रोडैक्शन सैन्टर है। पास के गॉवों मे हमारी सात ऑगनवाड़ियॉ चल रही हैं।’’ उन्होंने बगल में खड़े स्टैनो की तरफ देखा था,‘‘बाबू जी परिषद की सारी डिटेल्स आप इन्हें भेज दीजिये।’’ वे व्यंग से मुस्कुरायी थीं,‘‘बल्कि वे आप सभी सैक्शन्स में भेज दीजिये। लगता है यहॉ के लोग अपनी आर्गेनाइज़ेशन के बारे में पूरी तरह से कुछ जानते ही नहीं हैं। लगता है इन लोगों को कभी किसी ने कुछ बताया ही नहीं है।’’

दीपा दी स्तब्ध रह गयी थीं। उन्होने प्रतिवाद किया था,‘‘मैडम यह डिग्री कालेज से जाने वाली अपील है। यह एप्लीकेशन परिषद की तरफ से नही जा रही है।’’

मिसेज़ चौधरी ने तेज़ निगाहों से देखा था,‘‘उससे क्या फरक पड़ता है?’’

कौशल्या दी ने ज़ोर देकर अपनी बात कही थी,‘‘बी.सी.एल.हमें यह किताबें हमारी ऐकैडेमिक एक्सीलैन्स और हायर एजूकेशन के लिये देगा। हमारे सोशल वर्क से उनका कोई मतलब नही है। इसीलिये हम ने अपने बारे में बताते समय अचीवर टीचर्स के बारे में और अपने टापर बच्चों के बारे में डिटेल में लिखा है...उन की क्वालिफिकेशन्स,उनकी स्पैशलाइज़शन की फील्ड। बच्चों के सैक्शन से, प्रोडक्शन सैन्टर से और ऑगनवाड़ियों से उनका और उनकी किताबों का कोई लेना देना नही है।’’

पर मिसेज़ चौधरी कोई बात सुनने के लिये तैयार नही थीं। वहॉ से लौट कर दीपा दी ने मौन धारण कर लिया था। कौशल्या दी ने लाइब्रेरी कमेटी से लिख कर इस्तीफा दे दिया था। दीपा दी के हर आग्रह के जवाब में वह एक ही वाक्य बोलती रही थीं,‘‘आई कान्ट वर्क विद फूल्स।’’

घण्टी हो गयी थी। कौशल्या दी रजिस्टर उठा कर क्लास में जाने के लिये खड़ी हो गयी थीं। उनके चेहरे पर पीड़ा है। कुछ क्षण के लिये वे चुपचाप खड़ी रही थीं,‘‘दीपा अब सब कुछ फ्यूटाइल अफर्ट है। इस प्रकार की बेवकूफी भरी अपील से हमें ब्रिटिश काउॅसिल एक किताब भी नही देगा। इन फैक्ट कोई भी नही देगा।’’और वे कमरे से बाहर निकल गयी थीं।

हम सब चुप बैठे रहे थे और कौशल्या दी चली गयी थीं। पूरे कमरे का माहौल उदास और पराजित सा लगने लगा था। मुझे किताबों को ले कर राम सहाय जी का उत्साह और ख़ुशी याद आती रही थी। अभी पिछले महीने ही कौशल्या दी अपनी अपील ले कर दिल्ली जाने की और बी.सी.एल. में जा कर मिलने की योजना बना रही थीं। शायद कमरे में बैठे हम सभी उसी बारे में सोच रहे थे। पर कोई कुछ बोला नही था।

हमारे डिग्री विद्यालय की प्रबंध समीति से केवल राम सहाय जी ही नहीं गये थे। लगभग पूरा प्रबंधतंत्र ही बदल गया था या हो सकता है कि पहले जिन सदस्यों की लगभग मौन उपस्थिति मात्र थी वे अनायास ही सक्रिय हो गए थे। प्रबंधतंत्र की ओर से दैनदिन के साधारण कामों में हस्तक्षेप होने लग गया था। लगा था केवल लोग ही नहीं बदले है, कालेज की हवाऐं तक बदल गयी हैं। प्रबंधतंत्र और स्टाफ के बीच अचानक संबधो के समीकरण भिन्न हो गए थे। एक रूलर और हम सब रूल्ड। वे लोग राजा और हम सब उनकी प्रजा। दीपा दी भी। बल्कि शायद उनके चारों तरफ ही शिकंजे सबसे अधिक कसे जाने लगे थे।

राम सहाय जी ने अपने लगभग तीन साल के कार्य काल में एक बार भी पूरे स्टाफ से कोई बैठक नहीं की थी। किसी काम के सिलसिले में एक दो टीचर से मिलना हो गया तो वह अलग बात थी। शशिकांत अंकल साल में एक बार सालाना जलसे की समाप्ति पर सभी को लंच पर आमंत्रित करते थे। इसके अतिरिक्त वार्षिक उत्सव के आयोजन के क्रम में कल्चरल कमेटी की टीचर्स से उनका मिलना होता रहता था। वैसे भी अपने स्टाफ के साथ उनके परिवार जैसे संबध थे। अब यह तीसरा मैनेजमैंण्ट, कालेज के इतिहास में भी और यहॉ के अधिकांश स्टाफ के अनुभव में भी। थोड़े से समय के भीतर होने वाला यह तीसरा प्रबंधतंत्र।

अब तो इस नये प्रबंधतंत्र को आये भी एक साल बीत चला। कालेज की हवाओं में दिन ब दिन बेगानापन महसूस होने लगा है। कभी कभी लगने लगता है कि अपनेपन के उस अहसास को एक आदत की तरह हम सब ज़बरदस्ती पकड़े बैठे हैं, नही तो अपनी मुठ्ठी से धीरे धीरे वह अधिकार फिसलता जा रहा है।

गर्मी की छुट्टी से पहले कौशल्या दी को फेयरवैल दे दिया गया था। नौकरी उन्होने चाहे जब भी शुरू की हो पर इस विद्यालय से उनका रिश्ता बहुत पुराना था। शशि अंकल के ज़माने में जब भी कौशल्या दी के रिटायर्मैट की बात होती थी तब हमेशा ही वे बड़े अधिकार से कहते थे,‘‘अरे कौशल्या तुम्हें छोड़ेगा कौन। रिटायर होने के बाद तुम स्टाफ में नही मैनेजमैंट मे बैठना।’’वे हॅसते हुए आस पास बैठे सब लोगो की तरफ देखते,‘‘इससे पूछो यह ज़िदा रह सकती है कालेज के बिना। भई कालेज तो नहीं रह सकता कौशल्या के बग़ैर।’’ और कौशल्या दी की ‘हो हो’ की तेज़ हॅसी और शशिकॉत अंकल के ठहाकों के बीच सबकी हॅसी दब जाती। पर अब शशिकान्त भटनागर नहीं हैं...कौशल्या दी एक फेयरवैल लॅच और साथियों की तरफ से उपहार ले कर चुपचाप विदा हो गयी थीं। साथ वालों ने कहा था ‘‘दीदी आती रहिएगा’’। निकट महसूस करने वाले हम सब ने सोचा था कि दीदी के घर जाते रहेंगे।

विद्यालय के लंबे से कॉरिडार में कौशल्या दी थम कर खड़ी हो गयी थीं। वे अभी तो यहीं हैं, अभी तो यहॉ से बाहर उन्होंने कदम भी नहीं रखा है तब भी आज उन्हें देख कर क्यो लग रहा है जैसे उनके पैरों के नीचे की यह ज़मीन और सिर के ऊपर छत का वह टुकड़ा उनका नहीं है। हम में से बहुत से लोगों के साथ का वह नाता भी अब नही है। लगा था वह रिश्ता अब बीत चुका। कुछ रिश्ते इतने अस्थायी, इतने कमज़ोर क्यो होते हैं कि साथ साथ चलते चलते काल का एक छोटा सा क्षण उन्हे पूरी तरह से अनहुआ कर देता है।

हम सब आस पास खड़े हैं उनके, पर लगता है जैसे वे एकदम अकेली हो गयी हों। उन्होने गर्दन घुमा कर चारों तरफ देखा था। सब उन्हें ही देख रहे हैं,‘‘चलना चाहिए अब,’’ उन्होने धीरे से कहा था। सब उनके चलने की ही प्रतीक्षा कर रहे हैं जैसे। शायद कुछ लोग समय के लंबे खिंचते जाने से ऊब रहे हैं। मुझे लगा था अब उन्हे सच मे जाना चाहिए। अब समय का और देर तक खि्ांचना अशोभनीय होता जा रहा है। पर मैं चुप हॅू। वे चलने लगीं तो गेट के बाहर आ कर दीपा दी ने उन्हे अचानक गले से लगा लिया था और बहुत देर तक ल गाए रही थीं। दीपा दी ने अपने ड्राइवर को गाड़ी सामने लाने का इशारा किया था। शायद उन्होने उससे पहले से कह रखा है पर कौशल्या दी पास खड़े रिक्शे के ऊपर तत्पर सी बैठ गयी थीं।

शशि अंकल को गए लगभग चार साल हो चुके। आज कौशल्या दी भी गयीं।

Sumati Saxena Lal.

Sumati1944@gmail.com

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