Hone se n hone tak - 30 in Hindi Social Stories by Sumati Saxena Lal books and stories PDF | होने से न होने तक - 30

होने से न होने तक - 30

होने से न होने तक

30.

हर वर्ष की तरह जाड़े की छुट्टी से पहले वार्षिक उत्सव और उसके बाद कुछ दिन के लिए विद्यालय बन्द होना था। डाक्टर दीपा वर्मा ने कल्चरल कमेटी से कहा था कि हम लोग जा कर अध्यक्षा और प्रबंधक से जा कर मिल लें और मुख्य अतिथि वे किसे बुलाऐंगे उनसे तारीख और समय तय कर लें ताकि कार्ड आदि के सभी काम समय से किए जा सकें। उस दिन दीपा दी को किसी ज़रूरी मीटिंग में यूनिवर्सिटी जाना था।’’

पिछले सालों के एक दो कार्ड हम लोगों ने साथ रख लिए थे कि वे चाहें तो वैसे ही कार्ड मुख्य अतिथि के नाम,तारीख और समय की रद्दो बदल के साथ छपने दिए जा सकते हैं। पिछले वर्ष नये मैनेजमैंण्ट के आने के पंद्रह दिन के भीतर ही सालाना जलसा निबट गया था और कार्यक्रम की पूरी रूपरेखा पहले से तय हो चुकी थी। कार्ड देखते ही मिसेज़ चौधरी की भृकुटि टेढ़ी हो गयी थी,‘‘यह नीता गुप्ता कौन हैं?’’

‘‘जी मैं’’ नीता ने उत्तर दिया था।

‘‘और यह स्नेहल साह ?’’

‘‘जी पिछले साल स्टूडैन्ट यूनियन की प्रैसीडैन्ट थी।’’नीता ने उसी शान्त स्वर में कहा था।

‘‘ये नाम कार्ड में क्यो छपे हैं ?’’बहुत ही तीखे स्वर में उन्होने पूछा था।

‘‘मैडम हमारे यहॉ सालों से कार्ड में कल्चरल कमेटी का नाम भी जाता रहा है।’’नीता के स्वर में अभी भी कोई उतार चढ़ाव नही है।

‘‘नानसैन्स’’उनके स्वर में हिकारत है,‘‘यहॉ तो सालों से न जाने क्या क्या गड़बड़ चल रहा है। बट नॉट नाऊ।’’

बगल में बैठी मानसी ने जैसे अपनी कुर्सी पर करवट बदली थी। नीता उनका शीघ्र उत्तेजित हो जाने वाला स्वभाव जानती हैं सो उसने बहुत ही धीरे से मानसी के पैरों पर अपना हाथ रखा था जैसे शॉन्त रहने के लिए कहा हो।

मिसेज़ चौधरी ने उन्ही तेज़ निगाहों से नीता की तरफ,फिर निगाह घुमा कर बाकी लोगों की तरफ देखा था,‘‘मैं आप सबसे इस बारे में कुछ डिस्कस करना नहीं चाहती। बेहतर हो कि आप अपनी प्रिंसिपल को भेजें मुझसे बात करने के लिए।’’

‘‘जी मैम’’ और हम सब उठ कर खड़े हो गये थे।

बाहर निकल कर मानसी ने झल्लाना शुरू किया था,‘‘काम हम लोग करेंगे और अगर कार्ड पर नाम भी चला जाएगा तो इनकी मान हानि हो जाएगी। तुमने कहा क्यो नहीं कि शशि अंकल लिखवाते थे यह नाम और उसके बाद राम सहाय जी।’’

नीता ने उन्हें शान्त कर दिया था,‘‘मानसी जी बहुत साल छप लिया अब नही भी छपेगा तो फर्क ही क्या पड़ता है।’’

पर स्टूडैन्ट यूनियन की प्रैसीडैन्ट क्षिप्रा जैन बाहर निकल कर उदास हो गयी थी। कितनी ख़ुश थी वह कार्ड पर अपने नाम के छपने को लेकर। नीता उसे समझाती रही थीं। वैसे मिसेज़ चौधरी से बात कर के कार्यक्रम को लेकर हम सभी का उत्साह ठंडा पड़ चुका़ था। लगने लगा था हम काम कर नहीं रहे हैं हमसे काम कराया जा रहा है। तब अनायास महसूस होने लगा था कि अपना कालेज तो अब पराए हाथों मे चला गया।अचानक ही कंधों के ऊपर नौकरी का बोझ महसूस होने लगा था।

वहॉ से लौट कर दीपा दी को बताया था तो कुछ देर के लिए उन्होंने अपने माथे को अपने हाथों पर टिका लिया था।

कालेज के चपरासी रामनाथ ने बताया था कि चंदर भाई के पिता नही रहे। रामनाथ कौशल्या दी के घर के आउट हाउस में ही रहता है इसलिए उनसे उसका हर दिन ही मिलना होता है। हम सब में उसी बारे में बात होती रही थी,‘‘नब्बे साल तो उनकी उमर रही ही होगी’’ मैं ने कहा था।मैं उन से मिल चुकी थी और कौशल्या दी से अक्सर उन के बारे में बात होती रहती थी।

‘‘वे यहॉ आ कर रहना नही चाहते थे और चन्दर भाई भी जाने को तैयार नही थे। सुना है काफी समय से ढीले ही चल रहे थे। चलो अच्छा है मुक्त हो गए।’’केतकी ने अपनी टिप्पणी दी थी।

‘‘जो भी हो उनके आने पर हम लोगों को उनसे मिलने जाना चाहिए।’’नीता ने कहा था।

‘‘दीदी जैसे ही आऐं फौरन ही बताना रामनाथ।’’

उनके लौट कर आने की बात सुन कर हम लोग उन दोनो से मिलने गये थे। कौशल्या दी अपनी आदत के विपरीत काफी चुप गुमसुम सी लगी थीं। ऐसा लगा था जैसे वे सारी जिम्मेवारियों से मुक्त एकदम शांत हो गई हों। चन्दर भाई अभी नहीं आए थे,‘‘हवेली के लिए डील तय करनी है इसलिए वहीं रुक गए हैं,’’ उन्होंने बताया था।

हम लोगो को अजीब लगा था कि फिर दीदी ने आने की इतनी जल्दी क्यों की है। वे रिटायर हो चुकी हैं। यहाँ उन्हें कोई काम नहीं। वैसे भी चन्दर भाई के घर बाहर के सभी काम अभी तक वे ही निबटाती रही हैं। दीदी के बिना चन्दर भाई अधूरे से लगते हैं। दीदी से कहा था तो वे बेहद सुस्त सा हंस दी थीं,’’नहीं बेटा, चन्दर उस हवेली के मालिक हैं, ज्ौसा चाहें, जो चाहे करें। मैं कहाँ बीच में आती हूँ.। मेरा अब वहॉ रुकने का कोई काम नहीं था,’’ इसके बाद उन्होंने उस बारे में कोई बात नहीं की थी। रियासत सरकार पहले ही ज़ब्त कर चुकी थी। घर का सारा सामान उन्होंने अपनी दोनों नन्दों और उनके बच्चों को सौंप दिया था। हवेली का काम चन्दर भाई को निबटाना था।

हफ्ते दस दिन बाद मैं बुआ के पास गयी थी। वहॉ से जल्दी ही उठ ली थी। लौटते पर एकदम से कौशल्या दीदी का ध्यान आया था। सोचा इतने पास तो हैं उनसे भी मिल लेते हैं। कौशल्या दी के पास जाना मुझे हमेशा अच्छा लगता है। वहॉ जा कर एक अजब सी शान्ति मिलती है, जैसे अपने किसी धर्म के निर्वाह के बाद। वे पिछली बार की तरह सुस्त तो नहीं लग रही थीं पर अपनी आदत के अनुसार चपल वाचाल भी नहीं थीं। तभी चन्दर भाई का फोन आया था। वह बहुत प्यार से उनका हालचाल पूछती रही थीं। तभी उधर से कुछ कहा गया था और दीदी की आवाज़ में तीखापन आ गया था,’’देखिए चन्दर जी उस हवेली के बारे में मैं कोई बात करना नहीं चाहती,कोई भी,कैसी भी। आई विल नाट। आपने मुझे बता दिया था कि वह आपकी प्रापर्टी है। उससे जो पैसा मिलेगा वह भी अकेले आप का है। मुझे उससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए तो वही सही। वैसे भी। ख्ोैर छोड़िए।’’ फिर वे उनसे इधर उघर की बात करती रही थीं,‘‘अच्छा डार्लिंग अपना ख्याल रखना।’’ फोन रखने से पहले उन्होंने कहा था और रिसीवर नीचे रख दिया था।

मैं चुपचाप बैठी रही थी। उनका इतनी जल्दी लौट आना,उनकी उदासी, उनके स्वर की थकान सबका कारण मुझे समझ आ गया था। यह भी समझ आ गया था कि उन्होंने हवेली के एक भी सामान पर हाथ क्यों नहीं लगाया। निशानी की तरह भी अपने लिए कुछ नहीं रखा।

काफी दिन बाद चन्दर भाई खाली हाथ लौट आए थे। हवेली की सेल पर सरकार की तरफ से स्टे आर्डर आ गया था। राय साबह के पितामह को वह हवेली किसी मुगल बादशाह ने उपहार स्वरुप दी थी। उसे हैरिटेज प्रापर्टी घोषित कर दिया गया था और उस पर से परिवार के अधिकार निरस्त कर दिए गए थे। लौटने के बाद चन्दर भाई वकीलों से राय मशविरा, मुकदमें का मसविदा और स्टेट डिपार्टमैन्ट के चक्कर लगाने में व्यस्त हो गए थे। इतना व्यस्त उन्हें पहले कभी नहीं देखा था और कौशल्या दी उनकी देखभाल और ख़ातिर में लगी रही थीं।

एनुअल फंक्शन को केवल एक दिन रह गया है। लड़कियो को कल के लिए सभी आवश्यक निर्देश दे दिए गए थे। कल कालेज से कौन सा सामान ले कर आडिटोरियम पहुंचना है इसकी पूरी लिस्ट पहले से तैयार कर ली गयी है। मैं,मानसी और रेनू सक्सेना उस लिस्ट के अनुसार सारा सामान बॅधवा कर अलग रख रही थीं। तभी अंशू और मीरा दौड़ते हुए आए थे,‘‘रोहिणी दी’’ उसने रोहिणी दी की तरफ देखा था। उसके स्वर मे हड़बड़ाहट है...उसी बौखलायी निगाह से उसने नीता की तरफ देखा था,‘‘नीता दी प्रैसीडैन्ट मैडम का सन्देश आया है कि वे मैनेजर और मैनेजमैंण्ट से कुछ और लोग कल के फंक्शन का ग्रैन्ड रिहर्सल देखना चाहते हैं। आडिटोरियम की सजावट का पूरा प्लान भी समझना चाहते हैं वे लोग।’’

‘‘ऐसे कैसे’’ नीता परेशान हो गयी थीं ‘‘इतने दिन से तो मिसेज़ चौधरी शहर में थीं नहीं। अब आज लौटी हैं तो इन्हे सब कुछ देखना जानना है। बारह बज चुके हैं। पहले से कुछ कहा नहीं अब आख़िरी क्षण पर। पूरा दिन इस फार्मैलिटी में बर्बाद हो जाएगा। लड़कियॉ थक कर पस्त हो जाऐंगी सो अलग।’’नीता उठ कर खड़ी हो गयी थी ‘‘ऐसा करो मीरा तुम जा कर लड़कियॉ जमा करो कहीं इधर उधर न हो जाऐं और अंशु तुम जा कर कैंण्टीन में बच्चों के लिए पूरी सब्जी का आर्डर दे दो इन बच्चों को अब शाम तो हो ही जाएगी।’’

मीनाक्षी बड़बड़ाने लगी थी ‘‘यह प्रबंधतंत्र समस्या तो समझता नहीं। यह लड़कियॉ दूर दूर से आती हैं...भूखी प्यासी। अब इनके घर जाने का टाइम हुआ तो। घर वाले परेशान होंगे सो अलग।’’

अंशू खड़ी रही थी ‘‘रोहिणी दी कितने लोगो के लिए आर्डर देना है’’ वह बेहद सुस्त लग रही है एकदम रोई रोई सी।

नीता ने मेरी तरफ देखा था ‘‘करीब चौबीस पच्चीस लोगों के लिए तो कहना ही पड़ेगा। क्यों इतना ठीक रहेगा न ?’’कई लोग राय देने लगे थे। अंशू चली गयी थी।

‘‘क्या बात है यह अंशू बहुत सुस्त लग रही है?’’मैंने नीता से कहा था।

‘‘हॉ।’’नीता ने मेरी तरफ देखा था,‘‘अपने भाई से परेशान है। अंशू के सिग्नेचर बना कर उसके एकाउण्ट में से बड़ी रकम निकाल ली है। बेटा मॉ के दिल की धड़कन है। वैसे भी वह ख़ुद भी भाई को पुलिस को तो दे नही सकती।’’

‘‘अरे।’’अंशु के लिये मन अजब तरह से दुखी होने लगा था।

तभी एन.सी.सी. की लड़कियॉ गार्ड आफ आनर के लिए रोहिणी दी और नीता से निर्देश लेने के लिए आ कर खड़ी हो गयी थीं। माली गेट की सजावट के लिए पूछने को कमरे के बाहर इन्तज़ार कर रहा है।

सारे काम जल्दी से निबटा कर सब लोग आडिटोरियम पहुंच गए थे। दीपा दी वहॉ पहले से पहुच चुकी थीं। प्रैक्टिस के लिए चलाया जाने वाला टेप लगा दिया गया था। मिसेज़ चौधरी की भृकुटि ऊपर को सिमट गयी थी,‘‘आप लोग कैसेट पर प्रोग्राम देंगे?’’ मिसेज चौधरी ने तीखी निगाह से दीपा दी की तरफ देखा था।

जवाब रोहिणी दी ने दिया था,‘‘जी नहीं सिंगर और म्यूज़िशियन रहेंगे।’’

‘‘तब ?’’उन्होने उसी तेज़ स्वर में पूछा था ‘‘आप लोग ग्रैन्ड रिहर्सल का मतलब नही जानते क्या?’’

मानसी अपने को संयत नहीं रख पायी थीं,‘‘जी पता है पर पॉच मिनट के नोटिस पर हम उस सब का इंतज़ाम नहीं कर सकते थे।’’मानसी के स्वर में तेज़ी है,‘‘वैसे भी हम फाइनल प्रोग्राम के एक दिन पहले अपनी सिंगर का गला थकाना नही चाहते।’’

‘‘अच्छा’’ मिसेज चौधरी के स्वर में व्यंग है जैसे मज़ाक उड़ा रही हैं। कुछ कहने को उन्होने मुह खोला था और मानसी की तरफ देखा था फिर लगा था जैसे कुछ सोच कर चुप हो गयी थीं फिर उन्होने अपने बगल में खड़ी महिला की तरफ देखा था ‘‘देखा मिसेज़ पंत आपने कि हमारी टीचर्स कुछ ज़्यादा ही चाहती हैं।’’ उन्होने फुसफुसा कर कहा था पर पास खड़े औरों ने भी सुना था। मिसेज़ पंत नाम की वह महिला लगा था एकदम संकोच से भर उठी थीं जैसे आस पास खड़े हम लोगो की निगाहो से बच रही हों। नीता डर गयी थीं कि मानसी पलट कर कुछ जवाब न दे दें। उन दोनो की निगाह मिली थी और मानसी चुप रही थीं। बाद मे मानसी बहुत बड़बड़ाई थीं कि तुम सब इस औरत को इस कदर बर्दाश्त क्यों कर रहे हो। देखना थोड़े दिन में यह हमारे सिर पर तांडव करेंगी।’’

ऐसे एक एक बात पर रिएक्ट करने से कोई फायदा है क्या। फिर पहले यह तो पता हो कि दीपा दी क्या चाह रही हैं। नहीं तो हम लोगो का गुस्सा उन्हे झेलना पड़ेगा।’’

Sumati Saxena Lal.

Sumati1944@gmail.com

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