Chai ka aashiq in Hindi Love Stories by Shanti Khant books and stories PDF | चाय का आशिक।

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चाय का आशिक।

जिंदगी से चाय निकल जाए तो बाकी बस सिर दर्द बचता है।
चलो तो फिर आज मोहब्बत की आच पर हम तुम इश्क वाली चाय बनाते हैं।

कप: आज हम तुम मिले हैं बहुत समय के बाद ऐसा समय आया है।
चाय: आज मिले तो है फिर फरियाद किस बात की?
हम तुम मिले हैं तो आज उसका आनंद लो।

कप: तू सिर्फ मेरी है।

चाय: हा जरूर मैं तुम्हारी भी हूं।

कप: तुम्हारी भी हूं मतलब?
मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूं।

चाय: प्यार तो प्यार है मैं तो सबके लिए हूं।
कप: तुम क्या कर रही हो? मेरी तो समझ से बाहर है।

चाय: मेरा जन्म तो सबको प्यार करने के लिए ही हुआ है।

कप: मुझे तो बस इतना ही पता है कि मैं तो तुम्हारे लिए ही जन्मा हु।
जिंदगी से चाय निकल जाए तो बाकी बस सिर दर्द बचता है।

चाय: लेकिन मुझे कोई बांधकर नहीं रख सकता।

कप: मेरा प्रेम तुम्हारे लिए बंधन नहीं हो सकता, लेकिन मैं तो सिर्फ तुमसे प्यार करता हूं तो क्या तुम सिर्फ मुझसे प्यार नहीं कर सकती।

चाय: प्यार में हार जीत नहीं होती प्यार में बंधन भी नहीं होता और मुझे बंधन जैसा लग रहा है।

कप: क्या प्यार हर जगह अलग होता है?

चाय: क्या प्यार करने की रीत अलग होती है? क्या हर जगह वह बदलती रहती है?

कप: मैंने तो तुझको हर किसी के साथ हंसते ,रोते उठते ,बैठते देखा है।

कभी कूलहड के साथ, कभी कांच की प्याली के साथ ,कभी प्लास्टिक के कप के साथ।

चाय :सही कहा तूने मैं तो सिर्फ प्यार बांटने के लिए ही आई हूं ,इसलिए मैं हर जगह पहुंच जाती।
हूं ,कभी दोस्तों के बीच ,कभी दो प्रेमी के साथ कभी पति पत्नी के बीच ,कभी कभी मेहमानों के बीच कभी पार्टी में ।

किसी खास को ज्यादा देर रुकने को कहना ।
शाम तक थक जाने पर नई ताजगी का सहारा देना
दोस्तों की बातचीत में बीता हुआ लम्हा ।
प्रेमिका के घर से शादी का आया हुआ रिश्ता।
इन सबके बीच जिंदगी की मजा है और वह तभी आता है जब उबाल अच्छा हो।

मैं कभी किसी से भेदभाव नहीं रखती हर धर्म में मेरा अस्तित्व है।
मुझे तो बस उनके अंदर प्यार बनाए रखना है ,और मैं सबको प्यार देती हूं,मैं तो सबके लिए हु।

कप: क्या तुम मुझे दूसरे के साथ देख सकती हो।

चाय: मेरा प्यार तो परिशुद्ध है।
हम एक दूसरे के साथ रहे या ना रहे लेकिन हम दो नों ,जहां भी जाए जहां भी रहे प्यार सबको देते रहेंगे।

पत्तियों से रिश्ते रंगों को भर ,उबलती हु मे
शायद वह भी जाने कीस विरह वेदना में हो ।
फिजा ओमे सफेद उड़ती भाप को लिए पुरानी यादों की भीनी भीनी सी सुगंध ।
सुबह नींद से जाग कर भी तलब भरा आलस हूं मैं।

कप: तुझे देखती ही आदत लगी है तेरी बातों की ।
लत लग गई तुझे कैसे मैं बताऊं कि सोबत तेरी मुझपे क्या असर कर गई है।

आज फिर चाय की मेज पर एक हसरत बीछी हे ।
ऐसा प्यार देखकर प्याली ओर केटली देखती रह गई।

चाय सिर्फ चाय नहीं दवा है दुख की दर्द की मोहब्बत की।
चाय का प्यार तो कुछ अलग ही है ,वह कभी दो भागों में नहीं बटती कॉफी की तरह कभी हॉट और कभी कॉल्ड।
जितने भी कदम बढ़े मैखाने की ओर चाय के दीवाने हो गए मुझसे मिलने के बाद।
चाय और कप एक दूसरे से रूबरू हुए और आतुरता की राह अब खत्म हो गई।
क्योंकि हम तो चाय के दीवाने हैं चाय को भी अपने पर गुरुर होता है।
बखूबी वह जानती है कि उसका हम पर शुरूर होता है।