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मृत्‍यु किस्‍तों में

कहानी--

Mrreduy thatirits में

आर। एन। सुनगरया

'' कितना ही सोचूँ ..... पर कह नहीं पाती ..... ''

'' लेकिन ...... प्रदर्शित तो मैं ही करूँगा। 'कैसे मुँह खुलेगा। ’’

'' खुल्ल! खुल्ल! खुल्ली !!! .......... हे राम ........... इस असाधारण खॉंसी ने मुझे फिर से: बुरी तरह जकड़ ली और मैं दौड़ के बाद दुबले घोड़ों की तरह हॉँकने लिया। सारा शरीर अकड़ गया। औंखों में अंधरा सिमट गया। सर चकराने लगा। और मैं हांफते-हांफते पलंग पर जिर्निव सी चिपका गया। कमरा का सन्तनाटा जैसे थर्रा गया। ''

जैसे मेरा अंतिम समय करीब है। मेरे डबडबाई ऑखों में अतीत के टुकड़े दिखावटी तैरने लगे ........।

....... ऑगन में नवउदित सूर्य की कोमल किरणें बिखरी हैं, हंसना है। बबली और उसके पापा निश्चिंत बाल क्रीड़ाओं में लीन हैं। मैं उनहें बचपन के रोल में देखकर मुसकुराती हुई भैरता के बारे में पहुँचती हूँ। '' बचपन में आप कितने खूबसूरत लगते हैं।

'' अच्छा। ''

उनका यह शबद काफी भारी सा लगा। मेरी नज़रें उनकी नज़रों में जवानी का उमड़ता तूफान मेह और कर रही हूँ। कितने सुहानी हैं वे ऑखें, उनकी चमक, उनकी निर्मलता। मैं भी बैठती हूँ। '' आओ नाश्‍ता करें। ''

'' बबली चलो लिखकर के लिये देर हो रही है। '' मैंने उनहें फिर से: मुसकुराकर देखा, '' आप भी .... ''

'' क्या मुझे भी अंकल के लिए देर हो रही है। '' तुरनीत उनकी और मेरी मुदुराहट खुली हंसी में बदल गई।

बबली ने फौरन बिस्किट पर हाथ मारा और खाने लगी। मैंने उनकी ओर से पलेट को बढ़ाई उसमें से उन्होंने एक टोस शांति उठाकर, बबली की ऑख बचाई और मेरे होंठों से शपर्स कर दिया। मैंने झट उनका हाथ थामकर टोस कुतर लिया। उसका पद्यवाद जरा-जरा लग रहा था कि ....... '' ओह! ''

मुँह कड़वाहट से भरा हुआ है!, जी बेहद बेचैन है! शरीर शिथिल और अचेत सा पलंग पर बिछा है! जोड़-जोड़ में, और सबसे जियादा पीठ में असहनीय दर्द दौड़ने लगा है। उफ! अतीत से कितना विपरीत और भयानक है यह वर्तमान।

नाराज तो होंगे पर सब कुछ स्पस्ट बता दूँगी। लेकिन वे भी नहीं छोड़ेंगे। शहर में जगह-जगह आंटीदोलन, हड़ताल जुलुस आदि-आदि के कारण पुलिस को फुरसत कहना, रात-दिन! और वे मेरे लिए हर रि और उठाने के लिए तैयार हो जायेंगे। अभी तक प्रभाव पिछले कुछ महिने की घटना को भूली नहीं हूँ मैं ..........

........ बबली को सुलाने के बाद दो बार दरवाजा खोलकर देखना भी पड़ा था। पर अभी तक नहीं आये, पहले घर तो आते ही हैं। मेरे साथ खाना खा रहा है। पता नहीं बात है। आज तब बहुत देर कर दी आने में।

'' हाय मधु! ''

मैं चौंक गया! वे पीछे हाथ बॉंधे खड़े मुसकुरा रहे थे। औंखों में विशेष खुशी लहरा रही थी। हंसते हुए बोले, खाना खा खाना खा लो मुझे नींद आ रही है। ’’ मैं तुरन्त नाराजगी का अभिनय करते हुए रूखे-रुके शिकर में बोली और रसोई की ओर मुड़ गई।

'' ऐसे ना को मोड़ो, जान पे आ जाएगी! मुसकुरा ऐसा कि बस चैन आ जाए। '' मैं उनके इस शांत शायरीयम अन्नदज की कची डोरी से तरंगित होती खिंचती हुई उनकी ओर, '' हॉँ फरमाइए शायर साहब। ''

'' ये लो। '' उन्होंने एक बड़ा साप मेरे हाथों में थमाया और बड़े-बड़े डग भरते बाथरूम की गली में चले गए।

पैकेट खोला-उसमें वे सब चींजे थीं, जो मैं मन ही मन चाहती थी और कभी कभार उनसे इनके लाने का संकेत भी कर चुकी थी, पर वे पगार कम होने या अन्‍य आर्थिक झंझटों के कारण नहीं खरीद सक रहे थे।

आश्‍चर्य है आज इतने पैसे कहॉं से आ गये। पगार तो इतनी नहीं मिली होगी? उनके आते ही मैंने कुछ गम्‍भीरता पूर्वक झिझकते हुये पूछा, ‘’ये सब.....?’’

‘’हॉं मधु!’’ वे तौलिये से हाथ पोंछते हुये मेरे करीब आये, ‘’मैं तुम्‍हें किसी भी तृष्‍णा में जलती हुई नहीं देख सकता। मेरी जिन्‍दगी का मकसद है-तुम्‍हारी और बबली के होंठों पर हंसी और चेहरे पर प्रसन्‍नता।‘’

मैं सोच-संसार में खो गई। उससे उन्‍होंने मुझे निकाला, ‘’अरे। तुम खामोश क्‍यों हो गई।‘’ मेरे कंधे पर हाथ रख कर,’’ये चोरी नहीं की मैंने। कुछ एडवान्‍स कुछ उधार और शेष पगार।‘’

मेरा बदन एक अज्ञात भय से कॉंप सा गया। मैंने उन्‍हें अपनी चाहत और अभाव को मेहसूस ही क्‍यों होने दिया....

‘’खुल्‍ल...खुल्‍ल।‘’ ओह! चुड़ैल खॉंसी ने फिर दबोच लिया मुझे, सारे बदन में बिजली कड़कने लगी। ऑंखों में गर्रेरू भर आये और मुँह में स्‍वाद रहित बलगम भर गया, जो ऑंखें भींचकर पलंग के नीचे पुन: जमीन पर ही अविलम्‍ब ही थूँकना पड़ा, ‘’थक्‍क... से।‘’

कुछ मिनिट बाद पुन:पूर्व सा क्रम चल पड़ा.... उस दिन बताते-बताते जैसे होंठों को ताला पड़ गया हो। जब उन्‍होंने कहा था, ‘’खूब खाया करो, बड़ी दुबली होती जा रही हो।‘’ कैसे कुछ कहती पिछले कर्ज का प्रभाव अभी तक अपना प्‍यासा पंजा फैलाये हुये था। अब और ना जाने किस-किस के सामने हाथ फैलाना पड़ जाये उन्‍हें। नौकरी भी भाग-दौड़ और व्‍यस्‍तता तथा उस पर और व्‍यस्‍तता तथा ऊपर से ये असाधारण चिन्ता और। महिना पन्‍द्रह दिन में तो एक-आधे दिन के लिये घर आते हैं.....नहीं-नहीं। बैचेन हो जायेंगे वे...हे देव! कैसे कहूँ- तुम्‍हारी और मेरी सांसें मिलना। अपना साथ-साथ खाना-पीना तथा बबली का भी मेरे समीप रहना, हानिकारक है। ओह! बताऊँ तो खतरा, ना बताऊँ तो खतरा।

‘’हाय मधु!’’

ये आवाज? ओ! वो आ गये। उठने की हिम्‍मत नहीं....पलंग के बाईं ओर जमीन पर देखा, खून मिश्रित बलगम के थक्‍के के थक्‍के चिपके हुये भयानक से लग रहे हैं।‘’

‘’अरे मधु!’’ आवाज फिर कौंधी, ‘’सोई है क्‍या?’’

‘’मधु!’’ मेरी पथराई निगाहें जमीन पर पड़े खून के कतरों और बलगम के थक्‍के में खप गईं, मेरे समझ में नहीं आ रहा है, क्‍या आज से मेरी ही तरह उनकी भी मृत्‍यु किस्‍तों में शुरू हो रही है।

्‍यों ं ।''

। ना

♥इति♥

संक्षिप्‍त परिचय

1-नाम:- रामनारयण सुनगरया

2- जन्‍म:– 01/ 08/ 1956.

3-शिक्षा – अभियॉंत्रिकी स्‍नातक

4-साहित्यिक शिक्षा:– 1. लेखक प्रशिक्षण महाविद्यालय सहारनपुर से

साहित्‍यालंकार की उपाधि।

2. कहानी लेखन प्रशिक्षण महाविद्यालय अम्‍बाला छावनी से

5-प्रकाशन:-- 1. अखिल भारतीय पत्र-पत्रिकाओं में कहानी लेख इत्‍यादि समय-

समय पर प्रकाशित एवं चर्चित।

2. साहित्यिक पत्रिका ‘’भिलाई प्रकाशन’’ का पॉंच साल तक सफल

सम्‍पादन एवं प्रकाशन अखिल भारतीय स्‍तर पर सराहना मिली

6- प्रकाशनाधीन:-- विभिन्‍न विषयक कृति ।

7- समप्रति --- शवनिवृत्स्यता के पर्चों को प्रिन्टिंग प्रेस का संचालन &

लेखन लेखन।

8- समपर्क: - 6 ए / 1/8 भिलाई, जिला-दुर्ग (छ। ग।)

मो। / वहाट्सएपप नं.- 91318-94197

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