Yaadon ke ujale - 1 books and stories free download online pdf in Hindi

यादों के उजाले - 1

यादों के उजाले

लाजपत राय गर्ग

(1)

आज प्रह्लाद को मन मारकर कार्यालय आना पड़ा था। उसके बॉस का सख़्त आदेश न होता तो इस समय वह आने वाली मीटिंग की फाइल तैयार करने की बजाय अपनी पत्नी रेणुका के पास अस्पताल में होता। आज सुबह जब वह उठा तो रेणुका को स्नानादि से निवृत्त हुआ देखकर उसने पूछा - ‘आज इतनी जल्दी कैसे तैयार हो गयी हो?’ तो उसने उत्तर दिया था - ‘आप भी जल्दी से फ़ारिग हो लो। इतने मैं नाश्ता और दोपहर का खाना बना लेती हूँ। पिछले एक पहर से रह-रहकर ‘दर्द’ उठ रहे हैं। ऑफिस जाने से पहले डॉक्टर को दिखा आते हैं।’ और वह तुरत-फुरत तैयार होकर उसे लेकर डॉ. लता के नर्सिंग होम के लिये घर से निकल लिया था। जब डॉ. लता ने चैकअप के पश्चात् रेणुका को एडमिट करने के लिये कहा तो प्रह्लाद ने अपनी बहिन मंजरी को फ़ोन करके सारी स्थिति से अवगत कराया और उसे शीघ्रातिशीघ्र अस्पताल पहुँचने के लिये कहा।

मुश्किल से आधा घंटा बीता होगा कि मंजरी अपने बेटे श्यामल को लेकर अस्पताल पहुँच गयी। डॉक्टर ने रेणुका को एडमिट करके प्रह्लाद को बताया कि अभी समय लग सकता है, इसलिये आप प्रतीक्षा करें। प्रह्लाद पहले ही ऑफिस से लेट हो रहा था, अत: वह बहिन और भांजे को रेणुका के पास छोड़कर ऑफिस आ गया। बॉस ने लेट आने के लिये उसे डाँटा और कहा कि अब बिना कहीं और ध्यान लगाये मीटिंग की फाइल तैयार करने में लग जाओ। मुझे दो घंटे में कम्पलीट फाइल चाहिए।

फाइल तैयार करते हुए भी उसकी नज़र बराबर मोबाइल के स्क्रीन पर लगी हुई थी। दिल में धुकधुकी लगी थी रेणुका का कुशल-मंगल जानने की। इसी बीच फाइल का काम पूर्ण हो गया। जब बॉस फाइल देख रहा था, तभी मोबाइल की रिंगटोन बजने लगी। उसने ‘एक्सयूज मी सर’ कहा और बाहर आकर कॉल सुनी। मंजरी कह रही थी - ‘प्रह्लाद, यह डॉक्टर तो कोई बात ही नहीं सुनती और रेणुका की तकलीफ़ बढ़ती जा रही है। मेरी मानो तो रेणुका को सिविल अस्पताल ले चलते हैं। वहाँ डॉ. आर.के. वर्मा है, उसकी बड़ी अच्छी रेप्यूटेशन सुनी है। तुम जल्दी से आ जाओ।’

कॉल सुनकर जब वह वापस आया तो बॉस ने उसकी घबराहट को लक्ष्य कर पूछा - ‘प्रह्लाद, ख़ैरियत तो है?’

‘सर, अस्पताल से सिस्टर का फ़ोन था। कह रही थी कि वाइफ़ की कंडीशन ठीक नहीं। उसे सिविल अस्पताल लेकर जाना है।’

क्योंकि फाइल बॉस के मन मुताबिक़ तैयार की गयी थी, इसलिये उसने कहा - ‘प्रह्लाद, तुम अभी चले जाओ और अपनी वाइफ़ को सँभालो। यदि किसी तरह की ज़रूरत पड़े तो मुझे बताना, मैं सिविल सर्जन को फ़ोन कर दूँगा।’

प्रह्लाद तुरन्त ऑफिस से निकल लिया। रास्ते भर वह बॉस के सुबह और अब के बर्ताव के विषय में सोचता रहा। सुबह उसका व्यवहार कितना रूखा व तल्ख़ था और अब कितना सहानुभूतिपूर्ण! शायद बॉस भी विवश था सुबह। अपना काम अधूरा हो तो उस स्थिति में किसी का भी व्यवहार बॉस जैसा ही होता। कल उसे मीटिंग में जाना है और फाइल मेरे सिवा और कोई तैयार कर नहीं सकता था। इसलिये अगर उसने डाँट भी दिया था तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, क्योंकि अस्पताल से फ़ोन तब आया जब मैं बॉस का काम उसके मन-मुताबिक़ कर चुका था।

जब प्रह्लाद नर्सिंग होम पहुँचा तो डॉक्टर दोपहर के खाने के लिये अपने निवास जो कि नर्सिंग होम के ऊपर ही है, पर गयी हुई थी। प्रह्लाद ने नर्स को कहकर डॉक्टर को नीचे बुलाया और कहा कि हम रेणुका को सिविल अस्पताल ले जाना चाहते हैं, आप अपना बिल ले लें और हमें जाने दें। डॉ. लता ने उसे धैर्य रखने के लिये कहा, लेकिन वह रेणुका को सिविल अस्पताल ले जाने के लिये अड़ गया तो डॉ. लता ने अपना बिल वसूल करके रेणुका की रेफ़रल रिपोर्ट बना दी।

रेणुका की एडमिशन फाइल जब अटेंडेंट ने डॉ. आर.के. वर्मा के सामने रखी तो ‘श्रीमती रेणुका वाइफ़ ऑफ श्री प्रह्लाद राय’ पढ़ते ही डॉक्टर के मन में कुछ-कुछ होने लगा। अगले ही क्षण मन ने कहा, दुनिया में एक ही प्रह्लाद तो नहीं है, न जाने कितने लोगों का नाम प्रह्लाद होगा! फिर भी मन नहीं टिका। उसने बेल बजायी। अटेंडेंट तुरन्त हाज़िर हो गया।

डॉक्टर - ‘तरसेम, रेणुका पेशेंट के साथ कौन है?’

‘डॉक्टर साहब, पेशेंट के साथ एक आदमी, एक औरत और एक बालक है।’

‘आदमी को बुलाकर लाओ।’

अटेंडेंट को आदेश देकर डॉक्टर रेणुका ने एडमिशन फाइल में डॉ. लता के रिमार्क्स को पढ़ने के अंदाज़ में सिर नीचा कर लिया, क्योंकि आगन्तुक यदि ‘उसका’ प्रह्लाद है तो वह एकाएक इतने सालों बाद उसका सीधे सामना नहीं करना चाहती थी। जब प्रह्लाद ने केबिन में प्रवेश करते हुए ‘नमस्ते डॉक्टर साहब’ कहा तो चिर-परिचित आवाज़ के कानों से टकराते ही डॉ. वर्मा ने चेहरा ऊपर उठा कर देखा। दोनों की नज़रें मिलीं। प्रह्लाद ने आश्चर्यचकित होकर कहा - ‘डॉक्टर साहब, आप....?’

डॉ. वर्मा मन-ही-मन प्रसन्न थी कि उसका अंदाज ग़लत नहीं था। उसने खड़े होते हुए प्रह्लाद को स्वयं द्वारा दिये गये नाम से सम्बोधित करते हुए कहा - ‘आओ पप्पी! क्यूँ अनजानों की तरह ‘डॉक्टर साहब’ पुकार रहे हो? क्या मेरा नाम भी भूल गये?’

डॉक्टर के मुख से अपना नितान्त व्यक्तिगत नाम तथा प्यार-भरा उलाहना सुनकर प्रह्लाद कुछ क्षणों के लिये अवाक् रह गया। फिर उसने कहा - ‘नहीं डॉक्टर साहब,.... ओह सॉरी.... रवि। मुझे नहीं पता था कि रवि अब डॉ. आर.के. वर्मा हो गयी हैं। यह भी नहीं मालूम था कि आप यहाँ पोस्टिड हैं ।’

‘पप्पी, एक तुम ही हो, जो मुझे डॉक्टर बनने के बाद भी ‘रवि’ पुकारते रहे हो। मेरे तो कान पक्क गये ‘डॉक्टर साहब’, ‘डॉ. वर्मा’ सुनते-सुनते। आज मुद्दतों बाद तुम्हारे मुँह से ‘रवि’, वह भी उलाहना देने के बाद, सुनकर मुझे कितनी प्रसन्नता हुई है, मैं बता नहीं सकती! ....अरे! तुम अभी तक खड़े हो, बैठो। ..... और, यह क्या ‘आप, आप’ लगा रखा है, सीधे-सीधे उसी तरह बुलाओ जैसे पाँच साल पहले तक बुलाया करते थे।’

प्रह्लाद ने बैठते हुए कहा - ‘रवि, सबके सामने तुम्हें ‘रवि’ बुलाना क्या अच्छा लगेगा?’

‘पप्पी, अभी तो हम दोनों हैं, ‘सब’ कहाँ हैं? चलो, औरों के सामने डॉक्टर बुला लेना, लेकिन ‘साहब’ तब भी मत लगाना।’

‘जैसा तुम्हारा हुक्म।’

‘यह हुई ना बात। अब बताओ, डॉ. लता के नर्सिंग होम से यहाँ आने की वजह? प्रेगनेंसी के शुरू से उसी से चैक करवा रहे था ना?’

प्रह्लाद ने डॉ. रवि को बताया - ‘हाँ रवि, शुरू से डॉ. लता का ही ट्रीटमेंट चल रहा था। हमेशा अच्छी तरह देखती थी, किन्तु आज उसने रेणुका को एडमिट करने से दोपहर तक खुद एक बार भी नहीं देखा, केवल नर्स ही देखती रही। आज डॉक्टर लता का बिहेवीयर बड़ा इनडिफ्रेंट था। जिस रूम में रेणुका को रखा था, उसका कूलर भी प्रोपर्ली काम नहीं कर रहा था। इतनी गर्मी और ह्यूमिडिटी! ऊपर से लेबर पेन्स में रेणुका का बुरा हाल था। डॉक्टर को रूम बदलने के लिये कहा तो कहने लगी, यही रूम अवेलेबल है। मैं तो ऑफिस में बिजी था। मंजरी दीदी ने मुझे बुलाया और रेणुका को यहाँ लाने की सलाह दी। उसे भी नहीं पता था कि हमारी रवि ही डॉ. आर.के. वर्मा है। उसने बस तुम्हारी रेप्यूटेशन सुनी थी।’

‘दीदी भी आई हुई हैं?’

‘हाँ, वही तो रेणुका को देख रही हैं।..... रवि, बातें बाद में कर लेंगे, एक बार तुम रेणुका को देख लो।’

‘चलो।’

प्रह्लाद के साथ रवि को डॉक्टर के रूप में आते देखकर मंजरी को प्रसन्नता भी हुई और आश्चर्य भी, किन्तु उसने सहज भाव से रवि को ‘नमस्ते डॉ. साहब कहा’। नमस्ते का प्रत्युत्तर देकर डॉ. रवि ने पूछा - ‘कैसी हो दीदी? बच्चे...?’

‘ईश्वर की कृपा से सब कुशल है। हमें तो पता ही नहीं था कि आप यहाँ हैं। बड़ा अच्छा लग रहा है। अब मुझे रेणुका की तरफ़ से कोई चिंता नहीं रही।’

डॉ. रवि ने रेणुका का चैकअप किया और कहा - ‘दीदी, घबराने की कोई बात नहीं है। कई बार पेन्स स्टार्ट होकर धीमे पड़ जाते हैं। यही रेणुका के साथ हो रहा है। मैं इंजेक्शन लगवा देती हूँ। तीन-चार घंटे भी लग सकते हैं। मैं आप लोगों के लिये एक रूम की व्यवस्था करवा देती हूँ। रेणुका को हम अपनी निगरानी में रखेंगे।’

रूम की व्यवस्था होने के थोड़े समय पश्चात् डॉ. रवि रूम में आयी और उसने पूछा - ‘आप लोगों ने लंच किया कि नहीं?’

उत्तर मंजरी ने दिया - ‘डॉ. रवि, मैंने और श्यामल ने तो डॉ. लता की कैंटीन में खा लिया था। प्रह्लाद ने अभी खाना है।’

डॉ. रवि - ‘दीदी, आप अकेले में मुझे डॉ. रवि की बजाय ‘रवि’ बुलाओ तो मुझे अच्छा लगेगा। ...... प्रह्लाद, आप मेरे साथ चलो, मैंने भी अभी लंच करना है।’

मंजरी - ‘प्रह्लाद, तुम रवि के साथ लंच कर आओ, हम यहाँ बैठे हैं।’

डॉ. रवि के साथ जाते हुए प्रह्लाद को देखकर मंजरी सोचने लगी - काश कि दोनों की राहें जुदा न होतीं, कितनी अच्छी जोड़ी लग रही है! ....फिर विचार आया कि जो हुआ, अच्छा ही हुआ। पता नहीं, यदि विवाह हो जाता तो प्रह्लाद, एक सिम्पल ग्रेजूएट और रवि, एक डॉक्टर, दोनों की निभ भी पाती कि नहीं। रेणुका भाभी भी किसी सूरत में कम नहीं है। हाँ, इतना ज़रूर है कि वह घरेलू परिस्थितियों के कारण प्लस टू से आगे पढ़ नहीं पायी, लेकिन घर-बार सम्भालने में पूर्णतः निपुण है।.... रवि का व्यवहार कितना शालीन है, प्रह्लाद को अपना जीवनसाथी न बना पाने पर भी हमारे प्रति उसका पहले जैसा ही लगाव लगता है वरना तो इतने सालों बाद कौन किसी से इतनी आत्मीयता से मिलता है!

क्वार्टर में प्रवेश करते ही प्रह्लाद ने चहकते हुए कहा - ‘रवि, बगीची तो बहुत सुन्दर ढंग से सजायी हुई है।’

‘पप्पी, मुझे तो यहाँ आये हुए अभी छ: महीने ही हुए हैं। मेरे से पहले जो कपल इस क्वार्टर में रहता था, यह सब उन्हीं का किया हुआ है। मैं तो इसे मेनटेन रखने की ही कोशिश करती हूँ।.... डॉक्टर की लाइफ़ और वह भी गायनी की, बहुत ही स्ट्रैस वाली होती है। दिन का नहीं पता, रात का नहीं पता, कब अस्पताल से कॉल आ जाये, यू नेवर नो!’

‘रवि, ऑय एम प्राउड ऑफ यू। तुम समाज की बहुत अच्छी सेवा कर रही हो। चाहे तुम्हें छ: महीने ही हुए हैं यहाँ आये हुए, फिर भी शहर में तुम्हारा नाम है।’

ये बातें करते हुए दोनों ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया।

डॉ. रवि - ‘पप्पी, तुम बैठो, मैं फ्रैश होकर आयी।’ बाथरूम में जाते हुए बहादुर को आदेश दिया - ‘वासु, साहब को पानी पिलाओ।’

खाना खाने के पश्चात् प्रह्लाद ने कहा - ‘रवि, मैं चलता हूँ। जब नर्स कहेगी, तुम्हें बुला लेंगे। तब तक तुम आराम कर लो, पता नहीं रात को भी नींद पूरी कर पायी थी कि नहीं।’

‘रात को दो बजे कॉल आयी थी, तब से जाग रही हूँ।’

‘अब थोड़ा सुस्ता लो। मैं चलता हूँ।’

रवि ने फिर कुछ नहीं कहा और प्रह्लाद रूम में आ गया।

प्रह्लाद - ‘दीदी, श्यामल को तो घर जाने दो। मेरा ख़याल है, अब उसकी यहाँ कोई ज़रूरत नहीं है।’

मंजरी - ‘ठीक है। डॉ. रवि के यहाँ होने पर तो कोई ज़रूरत पड़ेगी भी नहीं।’

श्यामल के जाने के बाद प्रह्लाद ने मंजरी को भी आराम करने के लिये कहा और स्वयं डॉ. रवि के घर से लाया समाचार-पत्र पढ़ने की कोशिश करने लगा, किन्तु दृष्टि ख़बरों पर टिकने की बजाय अन्तर्मुखी हो गयी।

........

दृष्टि अन्तर्मुखी हुई तो कॉलेज के प्रारम्भिक दिनों की घटना सचेत हो उठी। तीसरा पीरियड चल रहा था, प्रोफ़ेसर शर्मा पढ़ा रहे थे। विद्यार्थी तल्लीन होकर सुन रहे थे। एकाएक दरवाज़े पर दस्तक हुई। प्रोफ़ेसर शर्मा बोलते-बोलते चुप होकर आगन्तुक की ओर सवालिया नज़रों से देखने लगे। सभी विद्यार्थियों का ध्यान भी प्रवेश-द्वार की ओर हो गया।

आगन्तुक ख़ाकी वर्दी पहने डाकिया था। वह बोला - ‘सर, माफ़ कीजिए। एक रजिस्टर्ड लेटर देना था।’

प्रोफ़ेसर शर्मा - ‘किसका है?’

‘सर, प्रह्लाद नाम के लड़के का है।’

अपना नाम सुनते ही प्रह्लाद अपनी सीट पर खड़ा हो गया।

‘प्रह्लाद, जल्दी से अपना पत्र ले लो और अभी मत खोलना। लेक्चर पूरा होने के बाद ही इसे देखना।’

‘ठीक है सर।’ कहकर प्रह्लाद डाकिये के पास गया। हस्ताक्षर करके रजिस्ट्री ली और अपनी सीट पर आकर बैठ गया। प्रोफ़ेसर शर्मा ने अपना लेक्चर पुनः प्रारम्भ किया। प्रोफ़ेसर की मनाही के बावजूद प्रह्लाद अपनी उत्सुकता को दबा नहीं पाया। उसने डेस्क के नीचे करके भेजने वाले का नाम-पता देखा। प्रेषक का नाम था रवि और पत्र आया था भिवानी से। नाम देखकर उसका मन प्रफुल्लित हो उठा। अब उसका ध्यान उचट चुका था। चाहे शारीरिक रूप से वह क्लास में उपस्थित था और प्रोफ़ेसर शर्मा को सुन रहा था, किन्तु प्रोफ़ेसर शर्मा क्या पढ़ा रहे थे, उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। वह तो उत्सुक था कि कब घंटी बजे और कब वह देखे कि रवि ने रजिस्टर्ड लेटर क्यों भेजा है और क्या लिखा है।

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