Suljhe Ansuljhe - 2 in Hindi Social Stories by Pragati Gupta books and stories PDF | सुलझे...अनसुलझे - 2

सुलझे...अनसुलझे - 2

सुलझे...अनसुलझे

अंधी-दौड़

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मैं उसको पिछले पच्चीस-तीस मिनट से एकटक गुमसुम दीवार की घड़ी को लगातार ताकते हुए देख रही थी। करीब-करीब सत्रह-अठारह वर्ष की उसकी उम्र होगी। उसकी आँखों में मुझे बहुत बेचैनी नज़र आ रही थी। बीच में उसके हाव-भाव देख कर मुझे महसूस हुआ कि शायद उसने अपनी माँ को चलने के लिए बोला क्योंकि उसका उठकर वापस बैठना, इस बात की सूचना दे रहा था। मां के कहने से वह बैठ गया| पर मुझे उसकी मनःस्थिति बार-बार विचलित कर रही थी| मैंने स्टाफ़ को बोलकर किशोर और उसकी मम्मा को अंदर बुलाया|

माँ-बेटे चेम्बर में साथ-साथ अंदर प्रविष्ठ हुए। मैंने दोनो को ही बैठेने को कहा और बच्चे की तरफ घूमकर पूछा...

"क्या नाम है बेटा तुम्हारा ...किस क्लास में पढ़ते हो?"

"मैं गौरव हूँ...ग्यारहवीं स्टैण्डर्ड में पढ़ता हूँ।"

अगला प्रश्न या कोई बात मैं बच्चे से पूछती उससे पहले ही गौरव की मां ने बोलना शुरू कर दिया....

"एक ही बेटा है हमारा मैम|...काफी पूजा-पाठ के बाद इसका जन्म हुआ। मैंने और इसके पापा ने बचपन से लेकर अब तक इसकी परवरिश का पूरा-पूरा ध्यान रखा। गौरव के पापा सरकारी दफ़्तर में काम करते है। सवेरे नौ से छह बजे तक काम करते हैं| फिर घर लौटकर गौरव की पढ़ाई को भी देखते है। हमें अपने बेटे से कभी भी कोई शिकायत नही रही|....

पहली क्लास से ही हमेशा पहले पांच बच्चों में इसका नंबर आता रहा है| पर अब कुछ दिनों से जाने क्यों गुमसुम रहता है। पढ़ने की टेबल पर बैठकर घंटो शून्य में ताकता रहता है। जाने किस सोच में डूबा रहता है। हम इससे बार-बार पूछते है…क्या हुआ है तुमको? किसी ने कुछ कहा क्या? किसी टीचर या बाहर किसी ने भी....पर कुछ बताता ही नही।....

बोलता है....

‘कुछ नही हुआ है| बस आजकल कुछ भी पढ़ता हूँ, तो लगता है याद ही नही है। बार-बार दोहराता हूँ....बार-बार लगता है भूल रहा हूँ सब|’.....कभी-कभी हम इसके माथे को छू कर देखते है तो ठंडा पड़ा होता है| तो कभी इसका माथा पसीने से तर-बतर होता है। हमको तो पहले लगा किसी ने हमारे बेटे पर जादू-टोटका कर दिया है| बहुत से लोगों के कहने पर नज़र भी उतरवाई| पर स्थिति जस की तस है। बड़ी क्लास है मैम| अभी तो गौरव को बहुत कुछ करना है| अब आप ही बताइए क्या करें हम?

माँ तो माँ थी| उसकी चिंताएं भी बहुत स्वाभाविक थी। खैर गौरव की मां को लगातार सुनने के बाद मैंने उनको सब ठीक हो जाने का आश्वासन दिया| साथ ही उनसे थोड़ी देर के लिए बाहर बैठने का आग्रह किया| मैंने गौरव को मेरे पास ठहरने को बोला| मैं गौरव की मां के बाहर जाने तक चुप रही।

फिर मैंने गौरव से बात करना शुरू किया....

“गौरव क्या-क्या होबिज़ है बेटा तुम्हारी? अब तक स्कूल की किन-किन एक्टिविटीज में तुमने भाग लिया है? खाने में क्या-क्या पसंद है आपको? किचन में या घर के कामों में कोई मदद करते हो या नही? पापा के साथ पढ़ाई के अलावा किन-किन विषयों पर तुम्हारी बातें होती हैं? सब विस्तृत रूप में बताओगे तो मुझे तुम्हारा शेयर करना बहुत अच्छा लगेगा।

इतने सारे बगैर पढ़ाई से जुड़े हुए प्रश्नों को सुनकर गौरव के चेहरे पर अनायास ही मुस्कुराहट फैल गई| मुझे उसकी मासूमित बहुत अच्छी लगी।

“मैं टी.टी.राज्य स्तर पर खेल चुका हूं आंटी..बाकी स्कूल में डिबेट और कल्चरल एक्टिविटीज में भी भाग लेता रहा हूँ। मां के हाथ का बनाया सब खाना पसंद करता हूँ| पर मां की कोई मदद रसोई में नही करवा पता हूँ क्योंकि माँ कभी नही चाहती कि मैं अपना समय बर्बाद करूँ|....पापा के साथ पढ़ाई के अलावा कोई बात नही होती।.....”

मुझे गौरव का आंटी कहकर पुकारना बहुत अच्छा लगा| उसका चहकते हुए बोलना भी मुझे बहुत अच्छा लग रहा था| गौरव ने अपनी बात जारी रखी....

“माँ और पापा कभी भी कुछ नही कहते| पर मैं उनके उठने-बैठने और दूसरे क्रिया-कलापों को देखता हूँ तो मुझे अच्छे से समझ आता है कि वे दोनों वही करते है, जो मेरी पढ़ाई में सहायक हो।....

उनका मेरे साथ-साथ देर रातों को जागना, कहीं भी आने-जाने को टालना ,मेरे ऊपर एक अनजाने से दबाब को आरोपित करता है| आंटी मुझे हमेशा लगता है समय बहुत कम है ख़ुद को साबित करने के लिए। आजकल अगर मैं थोड़ी-सी भी मस्ती करता हूँ तो मुझे दोनों की आंखों में अपने लिए अपराधबोध दिखता है कि मैं समय बर्बाद कर रहा हूँ|....

पढ़ने बैठता हूँ तो किसी न किसी बहाने, दोनों का कमरे में आना, मुझे देखना, भयभीत करता है| कहीं मुझे इन दोनों के हिसाब से अपेक्षित सफलता नही मिली तो दोनों को बुरा लगेगा। कुछ ऐसे ही ख़याल बार-बार मुझे रिक्तता देते है और पढ़ना मुश्किल होने लगता है। दोनों की अच्छाइयां मुझे उनसे कुछ बोलने नही देती| सोचता हूँ कही आहत न हो जाये|”

इतना सब कुछ बोलकर गौरव ने चुप होकर कुछ देर मेरी तरफ देखा फिर घड़ी को देखकर अनायास ही बोला-

“आज तो काफी समय चला गया आंटी….अब हमें चलना चाहिए|”

उसको उठता हुआ देख मैंने कहा...

“दस मिनट और बैठो....फिर चले जाना| कल से तुमको बस पंद्रह मिनट के लिए ही कुछ दिन आना है| मैं सबसे पहले तुमको अपने पास बुलाऊंगी| फिर तुम्हें आने की जरूरत नही पड़ेगी। बस अपनी पढ़ाई में जुटना। तुम जैसे समझदार बच्चे को बहुत अच्छे से समझ चुकी हूं| तुम इम्तिहान में अच्छा ही करोगे| हमेशा ध्यान रखना बेटा….जो बच्चा इतना संस्कारित व सब समझने वाला हो....वो बड़ा आदमी जरूर बनेगा क्योंकि बड़ा आदमी बनने के लिए नम्बरों की जरूरत नही होती|”

मेरी बातें सुनकर गौरव को एक आत्मविश्वास का अनुभव हुआ| जिसे मैं उसकी आँखों में साक्षात देख पा रही थी| मैं यही आत्मविश्वास उसमें जगाना चाहती भी थी| उसके सर पर अपना हाथ रखकर मैंने उसे हमेशा खुश रहने का आशीर्वाद दिया| उसको बाहर जाने का बोल उसकी मां को अंदर भेजने को कहा| साथ ही गौरव से उसकी माँ का नाम पूछ लिया| गौरव ने अपनी माँ का नाम केतकी बताया।

केतकी जी ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया मैंने उनको बैठने के लिए कहा और बोला-

“आज मैं आपको रुकने को नही कहूंगी क्योंकि गौरव को पढ़ना भी होगा| पर कल से सिर्फ दो या तीन दिन गौरव के आने की जरूरत है। आपका बेटा बिल्कुल स्वस्थ्य है।उसकी थोड़ा-सी दिनचर्या नियमित करने से सब ठीक होने की उम्मीद है। वह इम्तहान में बहुत अच्छा करेगा| आप निश्चिंत रहे| पर दो तीन दिन के बाद आपको तो आना ही है| हो सके तो आपके पति भी लेकर आये तो अच्छा रहेगा।

अगले ही दिन गौरव को अपने सामने पाकर मुझे अत्यंत ही प्रसन्नता हुई। अच्छा संस्कारी बच्चा होने के कारण वह माँ-पापा के भयों से परेशान होकर अपनी एकाग्रता खो रहा था। मेरा दो-तीन दिन तक गौरव को हर तरह से प्रोसाहित करना....उसमे असीम आत्मविश्वास जगा गया। जब मैंने उसको बोला-

“तुम कभी भी विचलन महसूस करो तो बेहिचक कभी भी फ़ोन कर लेना बेटा| हमेशा अपनी मदद के लिए मुझे प्रस्तुत पाओगे|”

मेरे ऐसा कहते ही गौरव को जाने क्या सूझा कि उसने उठकर मेरे पैर छु लिए और मेरा अभिवादन कर जाने की अनुमति मांगी। मैंने भी सिर हिलाकर स्वीकृति दी।

गौरव के दो-तीन दिन तक आने के बाद ही, जब मैंने गौरव की मां केतकी को नियत समय पर आते हुए देखा तो उनको अपने चैंबर में आने को कहा।

“आइये केतकी जी अंदर आइये.. बैठिए ..कैसी है आप? पिछले गुजरे दो-तीन दिनों में आपको गौरव में क्या अंतर नज़र आया? आप से जानना चाहती हूँ|” मैंने पूछा|

“मैं अच्छी हूँ मैम ..और मेरा बेटा पहले से ज्यादा पढ़ता हुआ नज़र आता है|.. मैंने कुछ सकारात्मक परिवर्तन उसमें देखे है। आपकी उससे क्या बात हुई मैं नही जानती| पर मेरे मन का भी कुछ करिये|”

“केतकी जी! आप और आपके पति दोनों के ही दिए हुए संस्कार बहुत अच्छे है| नतीजन आपका बेटा एक दिन बहुत अच्छा इंसान जरूर बनेगा। पर मैं आपसे कुछ बातें जरूर कहना चाहूंगी...

“पहली बात अपने बेटे में विश्वास रखिये। आपके दिए हुए संस्कार आपकी हर चाहना के रूप में उसके अंदर है। उसके ऊपर बार-बार नज़र रखकर या आप दोनों की दिनचर्या उसके हिसाब से मत करिए। आप सामान्यतः जैसा रहते थे वैसे ही उसके साथ बातचीत व मस्ती करिये। थोड़े नंबर कम या ज्यादा आने से कुछ फर्क नही पड़ेगा| आप दोनों की अति-चिंता उसके तनाव का सबसे बड़ा कारण है। उसको अपने नंबर से ज्यादा आप दोनों के आहत होने की चिंता है| तभी वह बार-बार समय का आकलन करता है| जिसकी वजह से वह न तो आप दोनों के साथ समय निकाल पाता है और न ही इस चिंता से मुक्त हो पाता है|..

दूसरा सत्रह-अठारह साल का बच्चा जिसकी नींव मजबूत हो, बस मां- बाप की उपस्थिति हौसला बढ़ाने के रूप में चाहता है| उसकी अपेक्षा होती है कि अगर नंबर कम भी आये तो मेरे मां-पापा हर स्थिति में उसके साथ होंगे। आप दोनों को बस हर स्थिति में उसके साथ होने का आश्वासन देना हैं| न कि उसकी चिंता का कारण बनना है| उसको यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसके मां-पापा उसकी वजह से आहत होंगे।....

तीसरा आपका बेटा अब वोटिंग की उम्र में आने वाला है| समझदार है वह| उसको हो सकता है अगले साल ही कहीं और पढ़ने जाना हो। बस भरपूर प्यार करिये। यही प्यार भविष्य में उसका संबल बनेगा|”

मेरी बातें सुनते-सुनते कब केतकी की आँखें नम हो आई| उसने बग़ैर कुछ बोले कब मेरे हाथ पर अपना हाथ रखकर, ख़ुद को बदलने का मुझे आश्वासन दिया| यही मैंने एक माँ की बहुत कुछ बोलती आँखों में पढ़ा।

“केतकी जी! आपसे एक आग्रह करुँगी आप मेरे और गौरव के बीच सिर्फ एक सेतु का काम करिये| जब कभी भी आपको कुछ ऐसा दिखे जो बहुत अज़ीब हो तो ख़ुद कुछ कहने से पहले मुझे विश्वास में लीजिएगा। बहुत सोचने की आवश्यकता नही है। यही मैंने गौरव को भी कहा है कभी भी मन परेशान हो मेरे से बात करें। वैसे किसी को भी जरूरत नही पड़ेगी यह मेरा विश्वास है|”

मेरी बातें खत्म होते ही केतकी ने मेरे को धन्यवाद कहकर मुझ से विदा ली और मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि परिवार के संस्कार अगर सुदृढ़ हो तो छोटी-मोटी समस्याओं के हल स्वतः ही निकल आते है| मां-बाप भी कई बार बग़ैर कुछ कहे बच्चों के लिए तनाव का कारण बनते है।

हमेशा बच्चे ही गलत हो यह जरूरी नही। मां-बाप की अति-सुरक्षा या पढ़ाई को लेकर चिंता उनके पढ़ाई-लिखाई पर बुरा असर डाल सकती है। दोनों को ही सोचने की जरूरत होती है। जितने संवेदनशील मां-बाप होते है बच्चों के लिए ,उतने ही बच्चे भी होते है माँ-बाप के लिए। इसलिए संस्कारों की बुनाई बहुत क़रीने से होनी चाहिए।

संस्कारित इंसान को किसी भी परिस्थिति में हिला पाना आसान नही होता। सोचकर और महसूस करके देखिये जरूर।।।

प्रगति गुप्ता

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