Suljhe Ansuljhe - 19 in Hindi Social Stories by Pragati Gupta books and stories PDF | सुलझे...अनसुलझे - 19

सुलझे...अनसुलझे - 19

सुलझे...अनसुलझे

भावों की दुनिया

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कहते है जब बुढ़ापा आता है तो व्यवहार बच्चों जैसा हो जाता है। कुछ हद्द तक यह कथन सच जान पड़ता है क्योंकि बुढ़ापे की ज़िद्द कुछ-कुछ बच्चों जैसी हो जाती है। जिसकी वज़ह से कई बार व्यवहार बच्चों जैसा प्रतीत होता है। बढ़ती उम्र के बच्चे शरीर और मस्तिष्क से सबल हो रहे होते है मगर बुजुर्ग इन दोनों ही दृष्टि से निर्बल। इसलिए उन दोनों के व्यवहार में सिर्फ कुछ प्रतिशत ही एक-सा होना माना जा सकता है।

जिस तरह बच्चे ज़िद करते हुए कभी अच्छे लगते है तो कभी परेशान करते है| उसी तरह बुजुर्गों का व्यवहार भी हो जाता है| पर क्या हम अपने बुजुर्गों को बच्चों की ही तरह सोच पाते है? जिस दिन हम ऐसा करना शुरू करेंगे बच्चों के जैसे बुजुर्ग भी प्यारे लगने शुरू हो जाएंगे| साथ ही इस तरह बुढ़ापे से जुड़ी समस्याओं के हल भी स्वतः ही निकलने शुरू हो जायेंगे... सोचकर देखिये तो।

मैं आज सुबह-सुबह घर के कामों से जल्दी ही फ़ारिग हो गई थी| तो मन में विचार आया कि आज क्लीनिक दस बजे की बजाय आठ बजे ही पहुंचा जाए| समय से पहले पहुँचकर मैं देखना चाहती थी कि स्टाफ मेरे क्लिनिक पहुँचने से पहले क्या करता है? इसलिए बग़ैर फ़ोन किये मैं क्लिनिक पहुँच गई।

स्टाफ अपनी-अपनी ड्यूटीज के मुताबिक़ अपनी तैयारियों में लगा था। कुछ मरीज़ अपनी जांचों के लिए सैंपल दे चुके थे और कुछ अपनी बारी आने के राह देख रहे थे। स्टाफ को अपने-अपने कामों में लगा देख मन को अच्छा लगा और मुस्कुरा कर मैंने उनका अभिवादन स्वीकार किया। फिर पूजा करके अपने चेम्बर की कुर्सी पर बैठी ही थी कि मेरा स्टाफ चाय बनाकर ले आया| चाय पीते-पीते मैंने गत दिनों में आये मरीज़ो की रिपोर्ट्स को देखना शुरू किया ही था कि एक बहुत ही बुजुर्ग मरीज़ पर अनायास ही मेरी नज़र पड़ी। जो सेंटर की सीढ़ियों पर चढ़ रहे थे|

मुझे उनकी उम्र करीब-क़रीब सत्तर-पिचहत्तर के आस-पास लग रही थी। उन्होंने हाथ में कसकर छड़ी पकड़ी हुई थी| छड़ी संबल लेकर उनका वृद्ध शरीर चढ़ता हुआ दिखा। क्लिनिक की पहली सीढ़ी पर ही पैर जमाने में जब मुझे उनका संतुलन बिगड़ते हुए दिखा तो मैं झटके से अपनी टेबल से उठकर उनके पास जा पहुँची।

मैं इस काम के लिए स्टाफ को भी आवाज़ लगा सकती थी| पर इन सबके बीच उनका गिरना मुमकिन भी था। मैंने जैसे ही उस वृद्ध मरीज़ को संभाला और उनको अंदर लेकर आ गई| रिसेप्शन पर पड़ी कुर्सी पर उनको बैठाया|

वह संतुलन बिगड़ने की वज़ह से बहुत घबरा गए थे। मैंने उनको संयत करने के लिए उनके मन को विमुख करने को उनसे नाम पूछा। मेरे नाम पूछते ही उनकी आंखों में उतर आया पानी, मेरी आँखों से अछूता नहीं रह पाया।

"बेटा! दीनदयाल नाम है मेरा।...शुगर की जांच के लिए आया था भूखे पेट वाली.और बी. पी. भी नापना था| कुछ दिन पहले ही सब टेस्ट करवाये थे पर कल रात बहुत बैचैनी थी तो सोचा आज जांच करवा ही लेता हूँ। अब इस बुढ़ापे में पता नहीं चलता कि कब शरीर धोखा दे जाए|"

मैंने स्टाफ को ब्लड लेने को बोलकर उनका बी. पी. चेक करवाया। उनका बी. पी.काफी बढ़ा हुआ देखकर मैंने उनसे यूँ ही पूछ लिया-

"अकेले आये है आप? आपके बच्चे या कोई और रिश्तेदार आपके साथ नही आया?

मेरे अचानक से पूछे गए प्रश्न को सुनकर अपनी सूनी आँखों को मेरी आँखों में डाल कर बोले –

"आजकल समय कहाँ है बेटा! किसी के पास। सभी की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं है बेटा। इतनी ज़िन्दगी निकल गई है, बाक़ी भी जैसे-तैसे निकल ही जाएगी। अब आदत हो गई है सब अकेले करने की।...बेटा पैसे की कमी नहीं है मेरे पास| बस हाथ पकड़कर सहारा देने वाले नही है। जिस भाव के तहद तुम मुझे सीढ़ियों से गिरने से बचा कर अंदर लेकर आई ,वो भाव अब मुझे इंसानों की आँखों में नज़र नही आते बेटा।...

बहुत मज़बूत होकर तुम्हारे क्लिनिक में घुसा था| पर तुम्हारा हाथ पकड़ना मुझे बहुत कमजोर कर गया| मुझे तुम्हारा सहारा देने का भाव ही रुला गया बेटा... बहुत खुश रहो हमेशा ..ईश्वर तुम्हें खुशियां दे|”.....

उनकी बातें मेरे अंदर स्वतः ही उतरती गई और मैं निःशब्द सोचने पर मजबूर होती गई...क्यों कोई भी निशक्त बुजुर्ग तबियत ख़राब होने पर डॉक्टर के पास या अपनी जांचों के लिए अकेला जाता है?

बेशक़ हम सभी के बच्चे या रिश्तेदार हो| पर अगर इनमें से कोई भी आने में असमर्थ है या आना नही चाहता तो क्या हमारे भावों की दुनियां इतनी मृत हो गई है कि हम उस वृद्ध के लिए पड़ोसी होकर भी नहीं सोच सकते हैं। सोचिए जरूर।

हम सभी किसी न किसी के पड़ोसी है। तो फिर ऐसी स्थिति क्यों आये किसी बुजुर्ग के लिए। अगर हम सबल होकर किसी का सहारा नही बन सकते तो हमसे दुर्बल कोई भी नही है| किसी भी निर्बल का इलाज़ न हो पाना सिर्फ हमारे भाव-विहीन होने का परिचायक है। अपने इंसान होने की परिभाषा को मत बदलने दीजिये। भाव है तो ही हम इंसान हैं। यही है इस सच की सबलता ..सोच कर देखिये तो ...

प्रगति गुप्ता