जी हाँ, मैं लेखिका हूँ - 16 - अंतिम भाग

कहानी -16-

’’ वो एक वामा हैं ’’

मोबाइल फोन की घंटी बजी। मैं उठ कर नम्बर देखती हूँ। यह नम्बर चन्दा चाची का है। आज लम्बे अरसे बाद उनका फोन आया है। मैं उत्सुकतावश तीव्र गति से फोन रिसीव करती हूँ। मेरे ’हैलो’ कहने के पश्चात् उधर से चन्दा चाची की आवाज आती है, ’’हलौ,....हलो......स्मृति बेटा ? ’’ हाँ, मैं स्मृति बोल रही हूँ। नमस्ते चाची।’’

प्रत्युत्तर में चाची कहती हैं ’’खुश रहो बेटा।’’

मे पुनः पूछती हूँ ’‘ कैसी हैं चाची ! सब ठीक तो है ?

’’ हाँ...हाँ....बेटा! यहाँ सब कुशल मंगल है।’’ चंदा चाची के इन शब्दों से अत्यन्त प्रसन्नता का आभास हो रहा था।बहुत दिनों बाद चाची से बात हो रही थी। चाची से बात करने की मेरी उत्सुकता और बढ़ जाती है। सब कुछ जान लेने की उत्सुकता !

मैं चाची के बच्चों का नाम ले कर पूछती हूँ ’’ चाची !राहुल, कामना, कविता, आकाश सब अच्छे तो हैं। ’’

’’ हाँ, बेटा सब अच्छे हैं। तुम बहुत दिनों से घर नही आयी। तुम्हारा फोन भी इधर नही आया। तुम ठीक हो बेटा ?’’

’’ हाँ, चाची मैं ठीक हूँ।’’ मैने कहा।’’ मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई, जब चाची ने मुझसे कहा कि ’’ बेटा, तुम्हे अपने पूरे परिवार के साथ आना है। राहुल का व्याह है। मैने तुम्हे कार्ड भी भेज दिया है।हो सकता है कार्ड कुछ देर -सवेर मिले, इसलिए मैं दिन व तारिख बता देती हूँ। तुम अपना घर समझ कर दो -चार दिनों पूर्व ही छुट्टी ले कर आ जाना। बच्चों व दामाद जी को भी साथ में लाना। ’’

चाची का स्वर खुशियों से ओत-प्रोत था। ऐसे खुशियों भरे क्षण चाची के जीवन में कम ही आये हैंे। यह बात मुझे भली प्रकार ज्ञात थी।

मैंने चाची को अपने सपरिवार आने का आश्वासन दिया। फोन रखने के उपरान्त मेरी स्मृतियों में बीस वर्ष पूर्व के वे दिन आ गये जब चाची नई- नई व्याह कर आयी थीं...........

.........मेरा जन्म एक छोटे-से शहर के सम्पन्न परिवार में हुआ था। मेरे दादा जी की अपनी कृषि योग्य जमीनें तथा बाग थे। दादा जी स्वयं भी सरकारी मिडिल स्कूल में प्रधानाध्यापक थे। घर में सम्पन्नता तथा शिक्षा योग्य वातावरण होने के कारण मेरी दो बुआ, ताऊ जी व पिता जी सभी उच्च शिक्षित थे। मेरी दोनो बुआ स्नातक थीं। उस छोटे-से शहर में स्नातक होना उस समय बहुत सम्मान की बात होती थी। दोनो बुआ का व्याह पास के शहर में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। मेरे ताऊ जी सरकारी महकमे में उच्च पद पर कार्यरत होने के साथ दादा जी के साथ कृषि व बागवानी का कार्य भी देखते थे। मेरे पिता जी एम0बी0बी0एस0 करने के पश्चात् उसी शहर में सरकारी चिकित्सक के रूप में कार्यरत थे।

ताई जी के दो बच्चे थे, एक बेटा और एक बेटी। उस समय मेरी उम्र पाँच वर्ष की रही होगी, जब एक दिन ताई जी की तवीयत अचानक बिगड़ी और वह चल बसीं। ताऊ जी के दोनों बच्चों का माँ के लिए रो-रो कर बुरा हाल था। उस समय ताऊ जी के दोनों बच्चों में बडे़ भैया की उम्र बारह वर्ष तथा दीदी की उम्र लगभग दस वर्ष की रही होगी।

हमारा संयुक्त परिवार था। दादा जी, दादी जी, ताऊ जी व मेरे पिता जी का परिवार एक साथ एक बडे़ से घर में रहते थे। जिसमें कमरों के अतिरिक्त गोदाम, बड़ा बरामदा व दालान था। अतिथि कक्ष मुख्य घर से अलग बना था।

ताई जी के निधन के पश्चात् ताऊ जी घर में बहुत कम आने लगे थे। कदाचित् उसकी वजह घर में यत्र-तत्र ताई जी की बिखरी स्मृतियाँ रहीं होंगीं। ताऊ जी कार्यालय बन्द होने के उपरान्त कभी खेत व कभी बागों की देखभाल करने में समय व्यतीत करने चले जाते थे। देर रात भोजन के समय घर लौटते। ताऊ जी के दोनों बच्चों की देखभाल, शिक्षा-दीक्षा आदि की जिम्मेदारी मेरी माता जी निःस्वार्थ भाव से निभातीं।

धीरे-धीरे हम चार भाई-बहन व ताऊ जी के दो बच्चे हँसते-खेलते बचपन की सारी खुशियों को प्राप्त करते हुए बड़े होने लगे। ताई जी को गुजरे दो वर्ष हो गये थे। ताऊ जी अब कभी-कभी रात में भी घर नही आते। वो बाग में ही बने फार्म हाउस में रूक जाते। समय पल-पल से दिन और रात में परिवर्तित हो कर व्यतीत होने लगा। ताऊ जी के चेहरे से दुःख व विषाद की रेखायें समय रूपी औषधि से धीरे-धीरे कम हो रहीं थीं। सदैव गम्भीर-से रहने वाले ताऊ जी कभी-कभी प्रसन्न भी दिखाई देने लगे व हम बच्चों से पढ़ाई-लिखाई की बातें तथा यदा-कदा हास-परिहास भी कर लेते। ताऊ जी के चेहरे पर धीरे-धीरे पहले जैसी चमक व उमंग परिलक्षित होने लगी थी। लम्बे व गौर वर्ण के ताऊ जी का व्यक्तित्व प्रभावशाली था। सामने वाले व्यक्ति पर प्रथम बार में ही उसका प्रभाव पड़ता था। हमें उनका नाम ’परमेश्वर प्रताप सिंह’ भी उनके व्यक्तित्व की तरह अत्यन्त आर्कषक लगता था।

गर्मियों के दिन खत्म हो रहे थे। आने वाली ऋतु शनैः-शनैः एक खुशनुमा मौसम का सृजन कर रही थी। रात्रि प्रहर में मेरे घर के बड़े लाॅन में लगे नारियल के वृक्षों से झाँकता पूर्णिमा का चाँद जब सम्पूर्ण सृष्टि पर चाँदनी बिखेरता तो मानो हृदय इस प्राकृतिक सौन्दर्य की अनुभूतियों में विलीन हो जाता। मेरा किशोरावस्था की तरफ अग्रसित हृदय प्रकृति के आर्कषक रंगों को देख कर कुछ अधिक ही कौतूहल से भर जाता। मेरे बचपन के दिन परी कथाओं की तरह बेफिक्र हो कर व्यतीत हो रहे थे तथा मैं किसी परी की तरह अल्हड़-सी खुशियों के पंख लगा कर उड़ती चली जा रही थी। पर्वों के दिन प्रारम्भ हो चुके थे। अक्टूबर माह में शरद् कालीन नवरात्रि व दीपावली में मेरे घर मिलने-जुलने वालों का आना-जाना लगा रहता था। छोटे शहर का यह मेल-जोल उस सामाजिक समरसता व आत्मीयता का सृजन करता जो बड़े शहरों में विलुप्तप्राय है। मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत यह परम्परायें ही छोटे शहरों को बड़े शहरों से पृथक करती हैं। घर में सभी अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे। बदलती ऋतुएँ, बदलती कृषि उपजें। कभी गेंहूँ-सरसों तो कभी धान-गन्ना। हम सब बच्चे इन क्रिया-कलापों को कौतूहल से देखते रहते।

दादा जी उन दिनों अत्यधिक प्रसन्नचित्त दिखाई देने लगे थे। पगड़ी बाँधे रौबदार घनी मूछों वाले दादा जी के चेहरे पर प्रसन्नता की लकीरें स्वतः परिलक्षित होतीं थीं। इसका कारण था ताऊ जी का धीरे-धीरे रोजमर्रा के कार्यों के अतिरिक्त कृषि के कार्यों में भी पूर्व की भाँति रूचि लेना। अकेलेपन व उदासी से पूर्ण ताऊ जी के जीवन में सक्रियता बढ़ती चली जाये व ताऊ जी खुश रहें यही दादा जी भी चाहते थे।

ताऊ जी कभी-कभी कार्यवश रात्रि में भी फार्म हाउस में रूक जाते। कभी-कभी न आने का यह क्रम बढ़ता ही चला गया। फिर तो ताऊ जी अपने न आने की सूचना नौकरों द्वारा भिजवाने लगे।

एक दिन हमनें घर के सभी लोगों को अत्यन्त गम्भीर व उदास देखा। हम सभी भाई-बहनों को यह आभास तो हो ही गया कि घर में कुछ अप्रत्यशित घट गया है जो बच्चों को बताने योग्य नही है। लेकिन यह बात कब तक छुपती ? ताऊ जी ने दूसरा प्रेम विवाह कर लिया था। धीरे-धीरे यह बात भी पता हो गई कि नई चाची हमारी बिरादरी की न हो कर मारवाड़ी समाज की थीं। लगभग पन्द्रह-बीस दिनों बाद एक सुबह जब मैंने आँखें खोलीं तो नई चाची को घर में पाया।

सौंदर्य व शालीनता की प्रतिमूर्ति नई चाची से यदि ताऊ जी प्रेम कर बैठे तो यह आश्चर्य की बात नही थी। नई चाची के व्यक्तित्व में कुछ विशिष्टता अवश्य थी। हम बच्चे भी नई चाची को छुप-छुप कर देखते। उनका उठना-बैठना, घूँघट की ओट से हम सबको देखना, कुछ पूछ लेना या बातें कर लेना हमें बहुत अच्छा लगता। चाची के चेहरे पर डर व संकोच के भाव हमें स्पष्ट दिखाई देते। तीन-चार दिनों के पश्चात् हमें पता चला कि नई चाची का नाम चन्दा है। चाची के अप्रतिम सौन्दर्य व व्यवहार कुशलता ने हम सबका हृदय जीत लिया था।

समय अपनी गति से बढ़ता जा रहा था। कुछ माह पश्चात् घर की सभी महिलायें दादी माँ, नई चाची व घर में काम करने वाली पूरवी, मोहिनी व हम सब बच्चे अपने बागों व खेतों की तरफ भ्रमण करने निकले। खेतों की तरफ भ्रमण का ऐसा कार्यक्रम प्रायः हम सब बना लिया करते थे और भ्रमण के लिये निकल पड़ते। दोनों तरफ खेतों के मध्य कच्ची सड़क पर हमारी जीप आगे बढ़ती चली जा रही थी। मार्ग में एक हवेलीनुमा घर को दिखते हुए नई चाची ने कहा यह उनका घर है जहाँ वह विवाह से पूर्व रहती थी। उनके माता-पिता का घर। हमें यह अनुमान लगाने में क्षणिक भर भी विलम्ब न हुआ कि ताऊ जी क्यों कृषि कार्यों में रूचि लेने लगे थे, क्यों रात्रि में कभी-कभी फार्म हाउस पर रूक जाते। चाची के घर से हमारा फार्म हाउस निकट ही था।

फार्म हाउस के निकट सम्पन्नता का प्रतीक प्रतीत होता यह चाची का हवेलीनुमा घर हमें आकर्षित कर रहा था। दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेत व घने छायादार वृक्षों पर कलरव करते पक्षियों के स्वर अपने अनछुए से

प्राकृतिक सौन्दर्य की तरफ आकर्षित कर रहे थे। मेरा हृदय कल्पनाओं के पंख लगा कर उड़ने लगा तथा यह सोचने लगा कि चाची के कुन्दन के समान दीप्त सौन्दर्य को ताऊ जी ने आते-जाते यहीं कहीं देखा होगा। मानवीय भावनाओं से भरा हृदय इस आकर्षण में बँध गया होगा। ऐसा हो भी क्यों न ?

विवाह के बाद चाची अपनी माँ के घर कभी नही जाती, न ही उनसे कोई मिलने आता। उनके घर वालों व रिश्तेदारों नें उनसे नाता तोड़ लिया था। यह बात तो हम सभी को ज्ञात हो गई थी। नई चाची ने अपने मृदुल व्यवहार से हमे अपना बना लिया था व धीरे-धीरे हमारे घर का हिस्सा बन गईं। समय व्यतीत होने के साथ चाची स्वयं भी दो बच्चों की माँ बन गई। चारों बच्चे चाची के स्नेह की छाँव में पलने लगे।

इधर दादा जी का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। हमें ज्ञात हुआ कि खराब स्वास्थ्य के कारण दादा जी ने सम्पत्ति का बँटवारा कर दिया। ताऊ जी व मेरे पिता जी के बीच संपत्ति बाँट दी गई। धीरे-धीरे रसोई भी अलग हो गई। अलग होने के उपरान्त भी हम सब भाई- बहन साथ-साथ पढ़ने जाते, साथ-साथ खेलते व आपस में घुल-मिल कर रहते। चाची हम सबसे अपने बच्चों की तरह ही स्नेह करतीं थीं। चाची की सबसे छोटी बेटी छः या सात वर्ष की रही होगी कि एक दिन ताऊ जी का हृदयाघात से निधन हो गया। अचानक आयी इस दुखद घटना से पूरा परिवार शोक में डूब गया। चाची पर तो दुःखों का पहाड़ टूट गया। अब शुरू हुआ चाची के जीवन में सामाजिक बहिष्कार के साथ संघर्ष का अनवरत सिलसिला। मैं मायके जाती तो चाची से अवश्य मिलती। हमारे संपन्न परिवार में यूँ तो चाची को किसी प्रकार की आर्थिक कठिनाई न थी लेकिन ताऊ जी की कमी से उपजा शून्य भला कोई भर सकता था? उदासी उनकी आँखों से हो कर हृदय में उतर गयी थी। चाची गुमसुम रहतीं व घर के कार्यों को करतीं रहतीं।

ताऊ जी के निधन के दो वर्ष उपरान्त मैं मायके गई तो चाची का नया रूप देख कर हैरान रह गई। चाची ने बच्चों की परवरिश व घर की देख-रेख के साथ-साथ ताऊ जी का व्यवसाय, कृषि व बागवानी का बखूबी सम्हाल लिया था। नौकरों-चाकरों को साथ ले कर घर व बाहर का कार्य करतीं थीं। ताऊ जी के निधन के उपरान्त आयी आर्थिक कठिनाई का सामना भी चाची ने दृढ़ता से किया। चाची का नया सबल रूप देख कर हमें अत्यधिक प्रसन्नता होती। सुकोमल, छुई मुई-सी दिखने वाली चाची बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने व आत्मनिभर्र बनाने के लिए प्रयासरत् रहने लगीं। दो अपने बच्चों व दो सौतेले बच्चों में कभी भी फर्क न करके अपनी विशाल हृदयता का अनुकरणीय उदाहरण मेरे परिवार व अपनी जाति-बिरादरी के समक्ष प्रस्तुत किया। अन्र्तजातीय विवाह कर के चाची ने रूढि़वादी समाज के सामने एक आदर्श उदाहरण पहले ही प्रस्तुत कर दिया था।

राहुल जो कि दुनिया की दृष्टि में चाची का सौतेला बेटा है, चाची के अथक परिश्रम व उनके प्रोत्साहन के फल स्वरूप सिविल सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण हो कर आयकर कमिश्नर के पद पर चयनित हुआ। वह अपने विद्यार्थी जीवन की सहपाठी महिला मित्र के साथ विवाह करने का इच्छुक था। उसने चाची के समक्ष अपनी इच्छा प्रकट की। चाची ने उसका समर्थन किया।समाज के विकास व समरसता को अवरोधित करने वाले रूढि़यों को तोड़ कर चाची आज राहुल का व्याह करने जा रहीं हैं। मैंनें दृढ़ निश्चय कर लिया कि मुझे इस अवसर पर अवश्य जाना है।

घर- गृहस्थी व नौकरी की व्यस्तता के कारण मैं विवाह के पूर्व न पहुँच कर ठीक विवाह के दिन ही पहुँच पायी। सौंदर्य व सादगी की प्रतिमूर्ति- सी लग रही चाची शादी के कार्यों में व्यस्त थीं। आने वाले प्रत्येक अतिथि का स्नेह पूर्वक स्वागत करना व उनके रहने, खाने-पीने की व्यवस्था चाची अत्यन्त कुशलता से कर रहीं थीं। मैं किंकत्र्तव्य विमूढ़ तब हो गई जब मैंने चाची के मातृ-पक्ष के रिश्तेदारों माता-पिता, भाई-बहन आदि को विवाह के अवसर पर देखा। जीवन भर चाची का तिरस्कार करने वाले लोग आज चाची के साथ खड़े थे। कम पढ़ी-लिखी चाची ने अपनी कर्मशीलता, शालीनता व सूझ-बूझ से समाज के समक्ष ऐसा अनुुुकरणीय उदाहरण प्रस्तंुत किया है कि हमें चाची पर गर्व है। चाची सही मायनों में प्रगतिशील हैं। वह एक सच्ची आदर्श वामा हैं।

नीरजा हेमेन्द्र

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