swanatra saksena ki kavitayen - 5 in Hindi Poems by बेदराम प्रजापति "मनमस्त" books and stories PDF | स्‍वतंत्र सक्‍सेना की कविताएं - 5

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स्‍वतंत्र सक्‍सेना की कविताएं - 5

स्‍वतंत्र सक्‍सेना की कविताएं

काव्‍य संग्रह

सरल नहीं था यह काम

स्‍वतंत्र कुमार सक्‍सेना

सवित्री सेवा आश्रम तहसील रोड़

डबरा (जिला-ग्‍वालियर) मध्‍यप्रदेश

9617392373

सम्‍पादकीय

स्वतंत्र कुमार की कविताओं को पढ़ते हुये

वेदराम प्रजापति ‘मनमस्त’

कविता स्मृति की पोटली होती है| जो कुछ घट चुका है उसमें से काम की बातें छाँटने का सिलसिला कवि के मन में निरंतर चलता रहता है| सार-तत्व को ग्रहण कर और थोथे को उड़ाते हुए सजग कवि अपनी स्मृतियों को अद्यतन करता रहता है, प्रासंगिक बनाता रहता है |

स्वतंत्र ने समाज को अपने तरीके से समझा है| वे अपने आसपास पसरे यथार्थ को अपनी कविताओं के लिए चुनते हैं| समाज व्यवस्था, राज व्यवस्था और अर्थव्यवस्था की विद्रूपताओं को सामने लाने में स्वतंत्र सन्नद्ध होते हैं|

अपने कवि की सीमाओं की खुद ही पहचान करते हुए स्वतंत्र कुमार लेखनकार्य में निरंतर लगे रहें, हमारी यही कामना है| सम्‍पादक

26 बात कहने में

बात कहने में ये थोड़ा डर लगें

बोल तेरे मुझको तो मंतर लगे

स्‍वप्‍न से सुन्‍दर थे उनके घर लगे

रहने वाले थे मगर बेघर लगे

खौफ ने जब ओठ पर ताले जड़े

बोलती ऑंखों में सच के स्‍वर जगे

देश में है शोर उन्‍नति का बहुत

दिन पर दिन हालात क्‍यों बदतर लगे

राम का है शोर भारी देश में

जो मिले रावण का ही अनुचर लगे

सज गये दिल्‍ली में उन सबके महल

राम अपने घर में ही बेघर लगे

कड़वे सच भी रोक न पाये उड़ान

कल्‍पनाओं की जो मेरे पर लगे

जुर्म ने थे जिनके चेहरे रंग दिये

उनके सर सुरखाब के अब पर लगें

27 बात कहते में सरल नहीं था यह काम

बात कहते में सरल नहीं था यह काम

उन ज्ञान वानों

बुद्धिमानों सयानों कें लिये

उन्‍हें एक योग्‍य समर्पित

प्रतिमा चाहिए थी

सरल नहीं था यह काम

देश का सवाल था धर्म का जाल था जाति का जंजाल था

महंतों के आशीर्वाद थे

पूंजीपतियों की थैली थी सब जगह शंकाए फैली थीं

कुछ कुछ ही दाग नहीं थे

सारी चादर ही मैली थी

इसे साफ नहीं करना था

साफ बताना था

किसी तरह मामला सुलझाना था

उन्‍होंने अपनी अनुभवी आंखों को खोला

वातावरण को टटोला

आपस में किए इशारे

एक दूसरे को तौला

कोई कुछ भी नहीं बोला

खोज रंग लाई

मछली जाल में आई

उन्‍होंने ढूंढी एक प्रतिमा

समर्पण की मूर्ति

उसमें नजर आई अपने सपनों की पूर्ति

ओर उसे प्रशंसा की सूली पर

चढ़ा दिया ठोक दी उसके पैरों में

चापलूसी की कीलें सर पर रख दिया

श्रेष्‍ठता का ताज चेहरे पर पोत दिया

सत्‍ता का रंग जैसे कोई मेनका कर दे

विश्‍वामित्र की तपस्‍या भंग

आडम्‍बरी विनम्रता से दृष्टि कर दी कुंद

सारे शत्रु बन बैठे उसके बंधु

उन्‍होंने उसे बलिदान कर दिया

शोर उठा कि उसने जीवन दान कर दिया

उन्‍होंने उसे अब भी नहीं छोड़ा है

उसकी महानता की गाथाएं

मधुर स्‍मृतियों की पताकाएं

वे अब भी फहराते हैं

उपलब्धियें की मशाल जलाते हैं।

उसके बलिदान का जश्‍न मनाते हैं।

सावधान वे ढूंढ़ रहे हैं। नया मसीहा

माना उनका काम कठिन है

पर लक्ष्‍य है। बहुत सरल और सीधा

28 गीता का ज्ञान

संतों ने सुना है यही गीता का ज्ञान है।

अहले नजर कहते हैं कलामें कुरआन है।

रहता है तू जहॉं पर वह तेरा नहीं है दोस्‍त

कुछ दिन के लिये तू यहॉं पर मेहमान है

29 जब मैं जहॉं में निकला अपनो की तलाश में

जब मैं जहॉं में निकला अपनों की तलाश में

मुझको मिले पराए अपनों के लिबास में

उम्‍मीदों के बीहड़ में अकेला नहीं था मैं

कुछ और भी मिले थे अपनों की तलाश में

रिश्‍ता क्‍या कहूँ उससे मगर उसने वह दिया

तरसा था जिसके वास्‍ते अपनों के पास मैं

जब वह मिला तो उसको मैं पहिचान न पाया

कितना रहा बेचैन था जिसकी तलाश में

मैंने बहुत तलाशा पर मिला न आज तक

अब तक लगा हुआ है मैं अपनी तलाश में

कुछ ऐसे भी सपने किसी ने देखे ऐ स्‍वतंत्र

आंखें करोड़ों आज तक जिनकी तलाश में

30 रिजर्वेश्‍न

रिजर्वेशन था वेटिंग का सीट कोई मिल नहीं पाई

खुशी पाई बहुत मैंने मगर पूरी नहीं पाई

आना थी शाम को ट्रेन होने काे सुबह आई

अभी पिछला ही स्‍टेशन क्रॉस वह कर नहीं पाई

करे ऐलान माइक कब से आने को अभी आई

घड़ी के बढ़ गये कांटे मेरी आंखें भी पथराई

मैं पहुंचा टाइम से पहिले पर टिकिट की लाइन लम्‍बी थी

टिकिट तो मिल गया मुझको ट्रेन पर मिल नहीं पाई

न जाने क्‍यों मुझे लगता है मुझसे वैर ट्रेनों का

कि जब मैं देर से पहुंचा तभी वह टाइम पर आई

बहुत सी ट्रेन निकली है धड़ाधड़ रात भर सारी

मगर जिससे मुझे जाना था अब तक वह नहीं आई

पहिले से जो बैठे हैं किए हैं बन्‍द दरवाजे

रूकी तो थी यहॉं गाड़ी सवारी चढ़ नहीं पाई

सवालों की ये कब से ट्रेन आउटर पर ठहरी है

जबावों की हरी झंडी की मंजूरी नहीं आई

उम्‍मीदों का मैं टांगे बैग घूमूं प्‍लेटफार्म पर

राहत की किसी भी ट्रेन ने आमद न दर्शाई

चिपट बैठा वह उसने तोड़ डाले सारे बंधन जब

फिर उसके बीच में कोई भी मजबूरी नहीं आई

खुराना सबको मुस्‍कानों का सिग्‍नल ग्रीन देते हैं

कभी भी लाल बतती अपनी आंखों से न झलकाई

जहां मुझको उतरना था ठिकाना भूल बैठा हूं।

निकल गई मेरी स्‍टेशन अभी तक या नहीं आई

नई सरकार बनने का न जाने कब से हल्‍ला है

तरक्‍की की कोई भी ट्रेन डबरा तक नहीं आई