eklavy - 12 in Hindi Novel Episodes by ramgopal bhavuk books and stories PDF | एकलव्य 12

एकलव्य 12

12एकलव्य का राज्याभिषेक

एक दिन हंसी हंसी में महारानी ने निषादराज हिरण्यधनु से कहा, “स्वामी कुछ दिनों से आपकी दाढ़ी में भी श्वेत बाल दृष्टि गोचर होने लगे है।”

महारानी की यह बात सुनकर वे सोचने लगे, “अयोध्या के राजा दशरथ ने तो दर्पण में श्वेत बालों को देखकर राम का राज्याभिषेक करने का निश्चय कर लिया था। कहीं महारानी सलिला इसी बात का संकेत तो नहीं दे रहीं हैं।’

यह सोचकर बोले, “हम समझ गये महारानी का संकेत किस ओर है?”

“मैं समझी नहीं किस ओर संकेत ?”

“यही महारानी, हमें एकलव्य का राज्याभिषेक कर देना चाहिये।”

’स्वामी मेरा संकेत इस ओर नहीं हैं।”

“इसका अर्थ है देवी, आप अपने दायित्व से च्युत हो रही हैं।”

“कैसे ?”

“ आयु के अनुसार उत्तरदायित्व का बोध न करा कर।”

‘आप कहां का अर्थ कहां लगा लेते हैं ? मैने तो श्वेत बालों का संकेत विनोद में किया है।’

“महारानी आपको याद होगा अयोध्या के महाराजा दशरथ ने दर्पण में अपने श्वेत बालों को देखकर राम का राज्याभिषेक करने का निश्चय किया था, हमारा भी यही दायित्व है।

महारानी सोचने लगीं, “निषादराज परम्परा से राम भक्त हैं। यदि वे ही इस परम्परा का पालन नहीं करेंगे तब कौन करेगा ?”

महारानी को सोचते हुये देखकर भावों को समझते हुये बोले, ‘‘हम चाहते हैं अपने पुरम के

वरिश्ठजनों से इस विशय पर परामर्श कर देखें कि वे हमें क्या पथ सुझाते हैं।’’

महारानी ने उत्तर दिया, ‘‘स्वामी जैसा उचित समझें।’’

दूसरे दिन राजप्रासाद के विशाल कक्ष में सभा आरम्भ हुई।

निष्णादराज हिरण्यधनु ने सभा के समक्ष अपना मन्तव्य प्रकट किया, ‘‘बन्धुओं, आज हमारे समक्ष हमारे श्वेत हो रहे बालों का प्रसंग आकर खड़ा हो गया है। हम राम भक्ति परम्परा के हैं। महाराज दशरथ ने अपने श्वेत बाल देखकर श्रीराम का राज्याभिषेक करने का निर्णय लिया था। श्रीराम पितृ भक्त के रूप में हमारे सामने हैं। हमारे युवराज एकलव्य का भी श्री राम जैसा ही आचरण है। उसने गुरूभक्त के रूप में समाज के समक्ष अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस समय राज्यारोहण के सम्बन्ध में हम आपके विचारों से अवगत होना चाहते हैं।’’

श्रीराम के राज्याभिशेक के प्रश्न पर सभा में उपस्थित जनों में रामकथा की चर्चा चल पड़ी। कुछ निषादगण अपने पूर्वज निषादगुह के प्रसंग को सुनने के इच्छुक थे , पर वे सब धीमे धीमे बतिया रहे थे बोल न पा रहे थे।

साहस करके निषादराज को प्रणाम कर लोहकर्मी रामबली बोला, ‘‘हम कुछ निर्णय लें इसके पूर्व अपने पूर्वज रामभक्त की कथा अपने वरिश्ठ निषादमुनी जी से सुनना चाहते हैं।’’

एक बोला, ‘‘मुनीजी से क्यों मनोहर काका से क्यों नहीं ?’’

दूसरा बोला, ‘‘भैया मुनीजी निषाद गुह की कथा कहने में सम्पूर्ण निषादपुरम में प्रसिद्ध हैं। उनकी कथा इस पुरम में यत्र तत्र होती रहती है। आज राज सभा में ही सुन लें हम ।’’

लोहकर्मी रामबली ने अपने विचार से सभा को अवगत कराया, ‘‘बन्धुओं, मुनीजी से हम सब निषादगुह की कथा सुनने के इच्छुक हैं।’’

यह सुनकर निषादराज हिरण्यधनु बोले, ‘‘निषाद मुनी हमारे पास बिछे आसन पर आकर विराजमान हों और कथा सुनावें।’’

उनका आदेश सुनकर निषाद मुनी फूले न समायें। वे सोचने लगे, ‘‘निषादराज के समक्ष उनकी यह पहली कथा है।’’

वे संकोच करते हुये उठे। निषादराज के पास बिछे आसन पर जाकर बैठ गये और कथा कहना प्रारम्भ की, ‘‘बन्धुओं, मुझे अपने रामभक्त पूर्वज निषादगुह का प्रसंग याद आ रहा है-निषादगुह वीर पुरूश थे। उनकी वीरता की धाक चारों और फैल रही थी। उन्हीं दिनों उन्हें ज्ञात हुआ कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण वन में आ रहे हैं। यह जानकर वे अत्यधिक आनन्दित हो गये। उन्होंने अपने बन्धुओं को बुलाकर कहा, ‘‘श्रीराम सीता और लक्ष्मण हमारे इस घनघोर जंगल में पधार रहे हैं। उनके लिये फल फूल और कन्द लेकर उनसे भेंट करने चलें। आज हमारे हृदय में हर्ष का पारावार नहीं हैं ।

श्रीराम के समक्ष पहुंचने पर निषादगृह ने दण्डवत करके, उनके सामने भेंट की वस्तुयें रख दी और प्रेम से उनकी ओर निहारने लगे।

श्रीराम ने उन्हें प्रेम के वश में जानकर पूछा, ‘‘मित्र निषाद कुशल से तो हो।’’

निषादगुह ने उत्तर दिया, ‘‘हे नाथ आपके दर्शन पाकर सकुशल हो गया हूँ। आज तक मैं नीच जाति में गिना जाता था। लोग मुझे देखकर, मेरी छाया से दूर रहते थे। आज आपके दर्शन पाकर भाग्यवान पुरूषों की श्रेणी में आ गया हूँ। प्रभू इसी तरह विश्व के सम्पूर्ण अछूत, आपके निकट आकर श्रेष्ठ पुरूषों की श्रेणी में क्यों नहीं आ जाते। आपके दर्शन करने के बाद अब कोई हमारा शिक्षा से बहिष्कार नहीं करेगा। अर्थ उपार्जन में हमें कठिनाई नहीं होगी। अब हम सब धन्य हो गये हैं।’’

फिर दोनों मित्रों में राजनीति, अध्यात्म और घरेलू चर्चाऐं होती रहीं ।

दशरथ नंदन राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ कई दिन वहां रूके।

......बन्धुओं, वनवास की मर्यादा के अनुसार श्रीराम जी के वृक्ष के नीचे ठहरने का प्रबन्ध हमारे निषादगुह करने लगे। उनके लिये कोमल पत्तों का सुन्दर बिछोना बिछाया। अपने हाथ से कन्दमूल और फल लेकर आए। उन्होने स्वयं जल का पात्र भर कर रखा। जब उनके सोने का समय हुआ तो वे तरकस बाँधकर बाण चढ़ाकर वीरासन में बैठे श्री लक्ष्मण जी के पास जाकर बैठ गए।

बन्धुओं, श्रीराम और सीता को धरती पर सोते हुये देखकर उनके हृदय में विशाद उत्पन्न हो गया। उनके नेत्रों में प्रेमाश्रु बहने लगे और वे श्री लक्ष्मण जी से अपने मन की व्यथा कहने लगे, ‘‘भैया हमसे यह सब देखा नहीं जा रहा है। क्या ये धरती पर सोने योग्य हैं। कैकयी ने यह अच्छा नहीं किया। राजा ही अपने घर में जब यह व्यवहार करने लगे तब वह अपनी प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करेगा ? वह तो अपने राजपरिवार की उलझनों में उलझ कर रह जायेगा।’’

निषादगुह के मुंह से अपने परिवार संबंधी परिचर्चा सुन कर और मर्म पर चोट पहुंचाने वाला प्रश्न सुनकर उस को टालने के लिये, लक्ष्मण ज्ञान की भाषा में बोले, ‘‘हे मित्र कोई किसी को सुख दुःख पहुंचाने वाला नहीं है। सब अपने ही किये हुये कर्मो का फल भोग रहे हैं। संयोग वियोग सब जगत के जंजाल हैं । मन वचन ओर कर्म से श्रीराम के चरणों में प्रेम होना ही परमार्थ है।’’

निषादगुह को लगा, ‘‘ये तो हमें वैराग्य का निराशावादी उपदेश दे रहे हैं। ये भी क्या करें। इस तरह घर से निष्काशित होने के पश्चात् आदमी के हाथ, निराशा ही लगेगी। हमारे जैसा श्रमजीवी इस तरह नहीं सोचता। किन्तु श्री लक्ष्मण जी की मुद्रा से निराशा नहीं आत्मविश्वास झलक रहा है।

......बन्धुओं, यों सोचते हुये उन्होंने अपनी पहली रात्रि उनके साथ व्यतीत की। फिर सुबह हुई और राम ने अपने काका तुल्य मंत्री सुमंत्र को वापस अयोध्या भेजा ।

मंत्री के चले जाने के बाद श्रीराम ने गंगा पार करने के उद्देश्य से गंगा तट पर आकर वहां नाव लेकर खड़े केवट से कहा, ‘‘केवट भैया हमें गंगा पार करा दो।’’

केवट सीधा सच्चा भोला भाला मनुष्य था। वह श्रीराम के मर्म को जानता था कि इनकी चरण रज से पत्थर सी बनी अहिल्या सुन्दर स्त्री का रूप धारण करके अपने पति के घर चली गई। कहीं इनकी चरण रज से मेरी नाव भी सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर गई तो मेरे परिवार का पालन-पोशण कैसे होगा ? अभी तो एक ही पत्नी हे फिर दो स्त्रियों का कैसे भरण पोशण कर पाऊगां !’’

यह सोचकर उसने कहा, ‘‘प्रभू मैं आपको नाव में चढ़ाने से पूर्व आपके चरण प्रक्षालन करना चाहता हूँ। मेैं महाराज दशरथ की सौगंध खाकर कहता हॅूं कि अगर आप पांव धुलवाने तैयार हों तो ही मैं आपको गंगा पार ले जाऊँगा।’’

लक्ष्मण को केवट की ऐसी बातें ज्यादा बड़बोले पन की लगीं, वे तनिक क्रोधित हुए लेकिन श्रीराम उसकी भोली-भाली बातों को सुनकर मुस्कराते हुये बोले- ‘‘केवट भैया, हमें पार जाना ही है इसलिये आपके मन को जैसा भावे, वैसा करें।’’

श्रीराम की बात सुनकर वह उनके चरण प्रक्षालन के लिये कठोता में जल ले आया। उसने अश्रुपूरित नेत्रों से उनके चरण प्रक्षालन किये। अपने पूरे परिवार एवं बन्धु बान्धवों के सहित चरणामृत लिया। तब श्रीराम को नाव में बैठाया और उस पार छोड़ आया ।

निषादराज श्रीराम के साथ ही गंगा पार गये और उन्हें चित्रकूट के गहन वनप्रांतर में विचरण कराया और उस मोहक वन में कामदगिरि पर कुटिया बनवा कर, उसमें निवास करना आरंभ कराके लौटे ।

बन्धुओं, कुछ दिनों बाद जब भरतजी के श्रड्.गवेरपुर आने का समाचार निषादगुह ने सुना तो वे दुःखी होकर विचार करने लगे, ‘‘ये भरत वन में क्यों आ रहे हैं। इनकी चतुरंगनी सेना इनके साथ है। कहीं ये राम को मारकर निष्कंटक राज्य तो नहीं करना चहते।’’

यही सोचकर निषादगुह ने अपने बन्धु बान्धवों को बुलाया और उन्हें सावधान किया ‘‘सभी नावों को अपने कब्जे में ले लें या फिर उन्हें गंगा के जल में डुबा दें। सब घाटों के रास्ते बन्द कर दें। भरत से युद्ध करने तैयार रहें। मैं भरत से युद्ध के मैदान में लोहा लूंगा। जीते जी उन्हें गंगा पार नहीं करने दूंगा।’’

उनका यह आदेश पाकर निषादवीर युद्ध की तैयारी करने लगे।

बन्धुओं, हमारी जाति के लोग कायर नहीं हैं। वे युद्ध कुशल धनुष बाण, गदा, खड्ग इत्यादि चलाने में निपुण हैं। इसके साथ-साथ जिस कार्य को करते हैं बड़ी ही निपुणता से करते हैं। उस दिन युद्ध के नगाड़े बजने ही वाले थे कि बायीं और छींक हुई। हमारी जाति में बड़े-बड़े

शगुनी भी हैं। वे छींक के सम्बन्ध में विचार करने लगे। एक शगुनी अपने दायें हाथ की अंगुलियों के सहारे अपने दोनों नथनों के स्वरों से अनुमान लगाते हुये बोला- ‘‘हमारी जीत सुनिश्चित है ?’’

एक बूढ़े शगुनी ने विचार कर कहा, ‘‘भरत से मिल लीजिये। उनसे युद्ध नहीं होगा। उनसे मिलकर उनके स्वभाव को पहचानने का प्रयास करें। बैर प्रीति छिपाये नहीं छिपती।’’

दूसरा शगुनी अपना बुद्धिमत्ता पूर्ण विचार रखते हुये बोला, ‘‘देखिये, उनकी भेंट के लिये तीन तरह की साम्रगी सजायी जावे। एक, पुरानी व नयी मछलियाँ। दूसरी, पक्षी और हिरण। तीसरी, कन्द मूल और फल।

किसी ने प्रश्न कर दिया, ‘‘इनसे उनके स्वभाव की पहचान कैसे होगी ?

यह प्रश्न सुनकर उसने उत्तर दिया, ‘‘मछलियों की भेंट ग्रहण करने से उनकी तमोगुणी वृति का पता चलेगा। बैर भाव रखने की प्रकृति का इससे बोध होगा। पक्षी और हिरण रजोगुण के प्रतीक हैं, यदि उनने यह भेंट स्वीकारी तो इससे उनके मन की दूसरे से छीनने की वृति का पता चलेगा। कन्द मूल और फल सतोगुण प्रधान है यदि वे इन्हें स्वीकारते हैं तो ऐसे साधु संत के चरण पकड़ लेना चाहिये।

विविध प्रकार की भेंट सामग्री लेकर वे भरत जी से मिलने निकल पड़े। निषादगुह भरत को देखकर दूर से ही अपना नाम उच्चारते हुए जुहार करके आगे बढ़े। भरतजी को पता लग गया था कि निषादगुह श्रीराम का मित्र है। श्रीराम ने उसे गले लगाया है ।यह सोचकर उनने राम के प्रेम में डूबते हुए आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया। उनने भेंट सामग्री की ओर देखा भी नहीं।

जब निषादगुह ने गुरूदेव वशिष्ठ जी को प्रणाम किया तो उन्होंने उससे दूर से ही हाथ उठाकर आशीर्वाद दे दिया।निषादराज ने समस्त माताओं को प्रणाम किया और अपने नगर में लाकर उनने सब पाहुनों ंका यथा रूचि सत्कार किया ।

अब सभी राम से मिलने आगे बढ़े। पथ प्रदर्शन का कार्य निषादगुह करने लगा।

जब चित्रकूट पहुंचे श्रीराम और लक्ष्मण जिस प्रकार भरत और शत्रुघ्न से मिले ठीक वैसे ही वे निषादगुह से अंक भेंट कर मिले। जब वशिष्ठ जी ने देखा कि राम तो जांति पांति छूत-अछूत और सवर्ण-अवर्ण का भेद भुलाकर अपने भाई की तरह निषादराज गुह से गले लग कर मिल रहे हैं तो उन्हें अपनी गलती महसूस हुई और अचानक ही उन्होंने पीछे पलट कर निषादगुह को अंक में खींचकर आशीर्वाद दिया।

अयोध्या की दिशा से श्रृंगवेरपुर से आने वाले लोग वनवासी राम और लक्ष्मण से मिल रहे थे, लेकिन एक अचंभा सब देख रहे थे कि अयोध्या की दिशा से संग संग आये गुरू वशिष्ठ और निषादराज गुह जो बहुत देर पहले आपस में मिल चुके हैं यहां परस्पर बड़े स्नेह से फिर फिर गले मिल रहे हैं ।

लोग सझ नहीं पा रहे थे कि, ‘‘गुरूदेव वशिश्ठ जी निषादगुह के साथ साथ श्रड्गवेरपुर से आये हैं उन्हें मिलना था तो राम से मिलते लक्ष्मण से मिलते, अचानक अब ऐसा क्या हो गया जो यहाँ आकर अपने सहयात्री निषादराज गुह से इस तरह भेंट कर रहे हैं।’’

केवल निषादगुह समझ पाया, ‘‘गुरूदेव ने श्रृंगवेरपुर में पहले मुझे दूर से ही आशीर्वाद दिया था। यहाँ चित्रकूट में उन्होंने श्रीराम को मुझे गले लगाकर भेंट करते हुये देख लिया,तो जान गये कि मैं श्रीराम का मित्र हूँ और उनने मुझे छू लिया अर्थात मैं संसार में सबसे ज्यादा पवित्र हो चुका हूँ। इसीलिये गुरूदेव भी मुझे अब गले लगाकर आशीर्वाद दे रहे हैं।’’

इन भावों में आत्मविभोर होते हुये निषादराज हिरण्यधनु बोले, ‘‘श्रीराम की हमारे वंश पर असीम कृपा रही है। हमारी भील जाति में शबरी नाम की महान तपस्वनी हो गई है। वे मतंग ऋषि की शिश्या थीं। जब श्रीराम जी वन में आगे बढ़े तो उनकी मुलाकात शबरी से हुई। शबरी ने चख-चख कर रखे मीठे मीठे बेर श्रीराम को खिलाये। यों भेदभाव की खाई को श्रीराम ने पूरी तरह पाट दिया। आज हमारी समझ में यह नहीं आता कि लोग श्रीराम के आचरण से कुछ भी नहीं सीख पाये। ऐसे भेदभाव को नष्ट करने वाले श्रीराम हमारे इष्ट हैं।’’

महारानी सलिला गर्व से खड़े होते हुये बोली- ‘‘बन्धुओं, हमारे निषादराज ने श्रीराम के राज्याभिषेक की परम्परा के कारण ही युवराज एकलव्य का राज्याभिशेक करने का निर्णय लिया है।’’

निषादराज ने अपना अन्तिम निर्णय सुनाया, हम वृद्ध हो चले हैं, इसका अनुमान इसी बात से लग जाता है कि पौत्र पारस इस समय दस वर्ष का और विजय आठ वर्ष का हैं हम कौरव और पाण्डवों में से नहीं हैं। धृतराष्ट्र अन्धे होकर भी सत्ता से चिपके हुये हैं। इसी का परिणाम है चेतना लुप्त होती जा रही है।’’

अब वृद्ध मनोहर निर्णय देने के लिये खड़े हुए और बोले, ‘‘हम सभी निषाद राम भक्त हैं। श्रीराम के जीवन से इस प्रसंग का जुड़ना मात्र संयोग नहीं है। इसे हम श्रीराम का आदेश मान कर चलें।‘‘

इस निर्णय के बाद एकलव्य के राज्याभिषेक की तैयारी शुरू हो गई।

अन्ततः वह दिन भी आ पहुंचा ।

प्रातः से ही महारानी बारम्बार इसी कल्पना में डूब जाती हैं, “मेरे वत्स एकलव्य का राज्याभिषेक हो रहा हैं। पुत्रवधू वेणु राज्य की महारानी बन जावेगी। महारानी की गद्दी पर बैठकर कितनी सुन्दर लगेगी पुत्रवधू ?”

इसी समय प्रहरी ने अवगत कराया, “महारानी राजसभा में सभी परिजन उपस्थित हो गये हैं। देश के दूर दूर के भील राजा भी आ चुके। आपको सभा में शीघ्र पहुंचना चाहिये।

महारानी सलिला राजसभा में पहुंचने के लिये चल दीं।

जब वे वहां पहुंची, रघुवंश की परम्परा के अनुसार एकलव्य को तीर्थों के जल से स्नान कराया गया। निषादमुनि के निर्देशन में अभिषेक की परम्पराओं का पालन किया जा रहा था। परम्पराओं के पालन में सम्पूर्ण दिवस व्यतीत हो गया। सांझ समय एकलव्य को सिंहासन पर बैठाया गया और वेणु को महारानी के पद पर। निषादराज ने स्वयं अपना मुकुट एकलव्य को पहनाया। महारानी सलिला ने एकलव्य और वेणु के तिलक कर आशीर्वाद दिया, ‘‘युगों युगों से चली आ रही निषाद वंश की परम्पराओं के अनुसार प्रजाजनों का पालन करते रहें।’’

इस प्रकार युवराज एकलव्य निषादराज बन गये और वेणु महारानी।

श्री हिरण्यधनु एकलव्य का राज्याभिषेक करने के कुछ दिनों पश्चात् पत्नी के साथ एकान्तवास करने वन चले गये।

इधर निषादराज एकलव्य ने भीलजाति के वीरों को एकत्रित करने के उद्देश्य से अपने मंत्री शंखधर से कहा ‘‘ मंत्रीवर, हमारा बचपन से ही यह लक्ष्य रहा है कि हम निषादपुरम् के वीर योद्धाओं के साथ आर्यावर्त के समस्त भील योद्धाओं को धनुर्विद्या एवं गदा संचालन में प्रवीण करें । ’’

‘‘ निषादराज इस वृहद योजना को कार्य रुप में कैसे परिणित करेंगें ।’’

‘‘मंत्रीवर, हम सोचते हैं कि इन्द्रन नदी के दक्षिण मे जो पर्वत है उसकी तलहटी में एक शिविर की व्यवस्था करें । आर्यावर्त के भीलअधिपतियों के पास इसकी सूचना भेज दी जावे । ’’

‘‘ निषादराज का यह निर्णय उचित है ।’’ यह कहकर मंत्री चले गये थे ।

कुछ ही दिनों में वीर योद्धाओं के झुण्ड के झुण्ड निषादपुरम् आने लगे ।

एकलव्य ने उन्हें इन्द्रन नदी के दक्षिण में पहाडी तलहटी में ठहराना शुरु कर दिया । शीघ्र ही वह एक बडी वस्ती का रुप धारण कर गया । उस वस्ती के पूर्व में अखाडे बन गये, जिनमें मल्लयुद्ध का प्रशिक्षण शुरु हो गया । पश्चिम में गदा युद्ध की टंकार सुनाई पडने लगी । उस वस्ती के दक्षिण में धनुर्विद्या के अभ्यास के लिये स्थल बन गया । ........ और उत्तर की ओर खड्ग, भाला और बरछी आदि के साथ अस्त्र संचालन का अभ्यास चलने लगा ।

एकलव्य राजप्रासाद से भोर से निकलते । उनके साथ निषादपुरम् के वीर योद्धा भी मौजूद होते । महारानी वेणु धनुर्विद्या के अभ्यास के लिये राजप्रासाद की व्यवस्था कर निकल पाती ।

जब निषादराज अखाडे में पहुँचते योद्धाओं से उनके दो दो हाथ होते । निश्चित समय पर वे गदा संचालन के लिये पहुॅंच जाते । धनुर्विद्या का कार्य महारानी वेणु सम्हाले रहती । अस्त्रों के संचालन का कार्य निषादराज के दोनो पुत्र युवराज पारस और विजय ने सम्हाल लिया था ।

इस तरह देखते देखते कुछ की समय में अट्ठासी हजार योद्धा युद्ध के लिये तैयार रहने लगे ।

यह समाचार सम्पूर्ण आर्यावर्त में आकाश में वायु की तरह फैल गया ।