अतीत के चलचित्र (10) अन्तिम भाग in Hindi Social Stories by Asha Saraswat books and stories Free | अतीत के चलचित्र (10) अन्तिम भाग

अतीत के चलचित्र (10) अन्तिम भाग


              अतीत के चलचित्र (10)  अंतिम भाग 

       पूरी रात कुलदीप दर्द से कराहता रहा और मैं भी उसके पास बैठ कर सुबह होने का इंतज़ार कर रही थी।

        सुबह की दिनचर्या के बाद वह तैयार होकर स्कूल चला गया।स्कूल से आने के बाद अल्पाहार के बाद कुछ देर में खेलने चला गया ,फिर आकर स्कूल से मिला हुआ गृहकार्य पूरा कर लिया था।जब गृहकार्य पूरा हो गया तो कहने लगा— मॉं मैं डिस्कवरी चैनल पर प्रोग्राम देख लूँ ? मैंने हॉं में जबाब दिया तो वह ख़ुश होकर प्रोग्राम देखने बैठ गया और मैं अपने रसोई घर के कार्यों में व्यस्त हो गई ।

    सुबह सबको जाना होता इसलिए रसोई घर के काम रात को ही कर लेती ,सुबह नियत समय पर सब निकल जाते।
सुबह सबके लिए अल्पाहार बनाने में कठिनाई नहीं होती थी।

       मैं काम पूरे कर रही थी तभी धीरे-धीरे सुबकने की आवाज़ आ रही थी लेकिन मुझे लगा कि भाई-बहनों में लड़ाई हुई है जिससे कोई एक रो रहा है ।

      रोने की आवाज़ लगातार आ रही थी,मैंने जल्दी से काम पूरा करने के बाद जाकर देखा।सभी अपने बिस्तर पर थे कुलदीप कुर्सी पर बैठे हुए गाल पर हाथ रखे हुए रो रहा था ।

     मैंने कुलदीप के पिताजी को देखा वह थके होने के कारण सो गये थे ।
     मैंने लौंग का तेल निकाल कर रुई में लगाकर कुलदीप की दर्द वाली दाड़ पर रखा,कुछ देर तो उसे आराम मिला लेकिन थोड़ी देर बाद ही फिर वह रोने लगा ।रो-रो कर कुलदीप का बहुत बुरा हाल हो रहा था ।मैं उसके पास ही बैठे हुए अनेक प्रयास करती रही,कुछ आराम न मिलने से वह बहुत परेशान हो रहा था ।रोने की आवाज़ सुनकर कुलदीप के पिताजी भी कमरे में आ गये रात्रि के दो बज गये।

   पिताजी ने डाक्टर साहब को फ़ोन मिलाया तो उन्होंने कुछ हिदायत देकर सुबह मिलने का समय दे दिया ।

         कुलदीप के पिताजी तो जाकर सो गये मैं कुलदीप के पास ही बैठे हुए सुबह होने का इंतज़ार करने लगी ।दर्द कम नहीं हो रहा था तो वह बहुत परेशान हो कर रो रहा था।जब उसका रोना बंद नहीं हुआ तो मैंने कहा— रोने से क्या होगा,तुम चुप हो जाओ ।

       कुलदीप के दर्द बहुत था वह झल्लाहट में बोला— आप को दर्द हो तो आपको पता लगेगा, आपको दांत में दर्द नहीं होता जब होगा तो आपको पता लगेगा ।

       मैंने कहा— मुझे तुम्हारे दर्द का अहसास है ।तुम सही कह रहे हो , मेरे कभी दर्द नहीं हुआ ।

     मुझे अपनी  बचपन की एक घटना याद आ गई और मैं उसका सिर अपनी गोद में रखकर सुनाने लगी।
                   मैं लगभग तुम्हारी ही उम्र की थी मेरे बड़े भाईसाहब के बेग में पेस्ट और दांतों का ब्रुश रखा रहता,क्योंकि उनका काम बाहर दूसरे शहरों में जाने का था ।जब वह बाहर जाने के लिए तैयार होते तो अन्य सामान के साथ ब्रुश -पेस्ट ज़रूर ले जाते थे ।

    एक बार मेरे मन में जिज्ञासा हुई कि मैं भी कर के देखूँ,मैंने निकाल कर शुरू कर दिया ।तभी भाईसाहब आ गये, मैंने जल्दी से धोकर रख दिया ।भाईसाहब ने बेग खोल कर देखा तो वह ब्रुश गीला था ।

    भाईसाहब ने दोनों चीजें तोड़ कर फेंक दी , हमें बहुत बुरा लगा फेंकने की क्या ज़रूरत थी ? हमें ही दे देते ।हमारे मित्र सभी घरों में पेस्ट इस्तेमाल करते थे,हमारा भी मन करता ।

       हमारे घर पर हर महीने घर पर ही मंजन बना करता , उसी से हम सब लोग दांतों को साफ़ किया करते थे ।जब भी कोई खाने के लिए बादाम तोड़ता उनके छिलके मॉं एक डिब्बे में इकट्ठे कर लिया करती ।जब बहुत से हो जाते तो उन्हें एक कढ़ाई में कोयलें जलाकर रख देती ।पूरी तरह जलने के बाद कोयले अलग कर , जले हुए छिलके अलग कर उनको पीसकर महीन चूर्ण बना लेती ।उसमें पॉंच तरह के नमक,फिटकिरी मिला कर एक चुटकी तूतिया मिलाकर 
तैयार कर लेती ।हम सभी उसी से दोनों समय सुबह और शाम मंजन किया करते ।कभी-कभी चूल्हे की मिट्टी और कभी नमक-तेल मिला कर भी कर लिया करते ।हम गुड़ की बनी हुई चीजें भी खूब खाया करते । स्कूल के मित्र बताया करते कि पेस्ट से दांतों में चमक आ जाती है ।एक दिन हमने मॉं को भी बताया लेकिन उन्होंने कोई ध्यान ही नहीं दिया ।जब कभी गंगा नदी में नहाने का अवसर मिलता तो वहाँ बालू से ही साफ़ कर लिया करते ।हमारे दांतों में कोई परेशानी नहीं हुई ।

        कुलदीप से बातें करते सुबह हो गई,बातें सुनने में दर्द का अहसास कुछ कम हुआ ।डाक्टर के दिये समय पर जब मैं गई तो डॉक्टर ने देखकर एक्स-रे किया और बताया कि दाड़ खोखली हो गई है,पूरी निकालनी पड़ेगी ।कुलदीप से कहा— अब आप मीठा नहीं खाना वरना अन्य दांतों में भी परेशानी हो सकती हैं ।

         मैं आते हुए सोच रही थी कि आज बच्चों के लिए अनेक सुविधाएँ है ,साफ़ सफ़ाई भी है लेकिन कहॉं हमसे चूक हो रही है ।जब कभी मॉं नीम की दातुन हमें देती तो बहुत बुरा लगता उसका कड़वा स्वाद होने की वजह से,मॉं से नज़र बचा कर फेंक दिया करते ।हम जितने प्राकृतिक चीजों से दूर जा रहे हैं उतने ही हम सभी परेशान हैं ।

   अंतिम भाग 

        आशा सारस्वत 🙏

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