Mout Ka Khel - 4 in Hindi Detective stories by Kumar Rahman books and stories PDF | मौत का खेल - भाग-4

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मौत का खेल - भाग-4

रक्स शरकी और ठरकी

रक्स शर्की अपने दूने टाइम तक चला था। दरअसल उसे दस बजे शुरू हो जाने के बाद साढ़े ग्यारह बजे तक खत्म हो जाना था। उसके बाद न्यू इयर सेलिब्रेशन का प्रोग्राम था। रक्स शरकी साढ़े ग्यारह बजे खत्म भी हो गया। इसके बाद न्यू इयर सेलिब्रेशन के तौर पर कई छोटे-छोटे प्रोग्राम हुए और ठीक 12 बजे एक बहुत बड़ा सा केक काटा गया। कुछ लोगों ने शैंपेन भी खोली थी।

न्यू इयर सेलिब्रेशन के बाद लोगों की मांग पर रक्स शरकी को दोबारा शुरू किया गया। यह सवा बारह बजे शुरू हुआ तो रात दो बजे ही खत्म हो सका। इस दौरान लोगों ने जम कर शराब पी थी। कुछ नौजवान तो स्टेज पर चढ़कर भोंडे तरीके से नाचने भी लगे थे।

इस दौरान सार्जेंट सलीम भी अपनी सीट पर जमा रहा था। उसके साथ शनाया भी मौजूद थी। डांस खत्म होने से कुछ पहले सलीम सीट से उठ गया। दरअसल वह भीड़ से पहले ही यहां से निकल जाना चाहता था।

बाहर जबरदस्त कोहरा पड़ रहा था। नजदीक की चीजें भी नजर नहीं आ रही थीं। कोहरा देखकर शनाया डर गई। उसने कहा, “अरे अब मैं घर कैसे जाऊंगी!”

“मैं छोड़ देता हूं आपको घर तक।” सार्जेंट सलीम ने कहा।

“और मेरी कार…?” शनाया ने बात अधूरी छोड़ दी। वह कोहरे को गौर से देख रही थी।

“चाहो तो होटल के मैनेजर को कार की चाबी दे दो। वह सुबह आप की कार घर तक भिजावा देगा। वरना दिन में आ कर खुद ले जाना।” सलीम ने तजवीज पेश की।

“मैं खुद आ कर ले जाऊंगी। पार्किंग में ही खड़ी रहने देती हूं।”

सलीम पार्किंग की तरफ बढ़ गया। वह यहां फैंटम से आया था। शनाया बाहर उसका इंतजार कर रही थी। उसने शनाया के पास ले जा कर कार रोक दी। शनाया अगली सीट पर बैठ गई। उसने सलीम की तरफ ध्यान से देखते हुए कहा, “तुम तो बहुत अमीर आदमी हो।”

“भला वह कैसे?” सलीम ने विंड स्क्रीन पर नजरें जमाए हुए ही पूछा। वह बहुत एहतियात से और काफी धीमी रफ्तार से कार चला रहा था। सामने दो मीटर से आगे देख पाना भी मुहाल हो रहा था।

“इतनी महंगी कार गरीब आदमी थोड़ी न इस्तेमाल करता है।” शनाया ने कार के डैशबोर्ड की तरफ ध्यान से देखते हुए कहा।

“अरे यह तो मेरे मालिक की है।” सलीम ने हंसते हुए कहा।

“मालिक... मतलब!” शनाया ने ताज्जुब से पूछा।

“अरे भाई, मैं जिनके अंडर में उदासी पर रिसर्च कर रहा हूं। यह कार उन्हीं प्रोफेसर साहब की है।” सलीम ने बात बनाते हुए कहा।

“उन्होंने तुमको चलाने को दे दी, इतनी महंगी कार।” शनाया की आवाज में आश्चर्य था।

“हां भाई, इनसान-इनसान के काम आता है।” सलीम ने गंभीरता से कहा।

कुछ देर खामोशी रही उसके बाद सलीम ने टोकते हुए कहा, “अपना पता बता दीजिए... वरना हम पूरी रात यूं ही सड़कों पर भटकते रहेंगे। यहां कुछ नजर नहीं आ रहा है कि किधर जाना है और किधर मुड़ना है।”

शनाया ने सार्जेंट सलीम को पता समझा दिया।

सलीम कार को धीरे-धीरे ड्राइव कर रहा था। इस रास्ते को वह बखूबी जानता था। गाड़ी तेज चलाना चाहता था, लेकिन डर यह था कि सामने कोई दूसरी गाड़ी न हो। उससे टक्कर होने का खतरा था।

“कल मुलाकात होगी?” सलीम ने पूछा।

“नहीं कल मेरा ब्वायफ्रैंड से झगड़े का दिन है।” शनाया ने कहा।

“इट्स ओके।” सलीम ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

इसके बाद दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद शनाया का घर आ गया। सलीम ने कार रोक दी। शनाया ने कार से उतरते हुए कहा, “रात बहुत ज्यादा हो गई है। मैं कॉफी के लिए नहीं कहूंगी।”

“गुड नाइट।” सलीम ने जवाब में कहा और कार तेजी से आगे बढ़ गई।

लौटते वक्त कार की रफ्तार जरा तेज थी। गुलमोहर विला पहुंच कर उसने कार को पार्किंग की जगह लॉन में ही छोड़ दिया। इसके बाद वह सीधे अपने कमरे में पहुंचा और बिना कपड़े-जूते उतारे कंबल के अंदर घुस गया। कुछ देर बाद उसके खर्राटे सुनाई देने लगे।


मौत का खेल

पार्टी में आए लोगों को मुखातिब करते हुए मेजर विश्वजीत ने कहा, “अभी रात का तिहाई हिस्सा बाकी है। क्यों न हम सब ‘मौत का खेल’ खेलें।”

कुछ मेहमानों को यह पता नहीं था कि ‘मौत का खेल’ क्या है और कैसे खेला जाता है? डॉ. दिनांक ठुकराल ने दिलचस्पी दिखाते हुए पूछा, “मेजर विश्वजीत! यह तो पता चले कि यह खेल कैसे खेलना है?”

मेजर विश्वजीत ने समझाते हुए कहा, “सभी मेहमानों की एक-एक पर्ची बनाई जाएगी। एक पर्ची पर ‘कातिल’ लिखा होगा और दूसरी पर्ची पर ‘जासूस’। बाकी सारी पर्चियां सादी होंगी। खेल शुरू करने से पहले सभी एक-एक पर्ची उठा लेंगे। जिस भी शख्स को ‘कातिल’ की पर्ची मिलेगी उसे ‘कातिल’ का रोल निभाना होगा।”

“इंट्रेस्टिंग!” एक मेहमान ने कहा।

मेजर विश्वजीत ने आगे कहा, “सभी अपनी पर्ची एक-दूसरे से पोशीदा रखेंगे। खेल में कोठी और फार्म हाउस भी शामिल माना जाएगा। पर्चियां बंट जाने के बाद लाइट ऑफ कर दी जाएगी और सारे लोग कोठी और फार्म हाउस में छुप जाएंगे। इसके बाद ‘कालित’ अपने शिकार की तलाश में निकल पड़ेगा। खास बात यह है कि ‘क़ातिल’ और ‘जासूस’ को अपना किरदार पूरी तरह से पोशीदा यानी छुपा कर रखना होगा।”

रायना ने दिलचस्पी दिखाते हुए पूछा, “‘कातिल’ के रोल के बारे में डिटेल में समझाइए?”

मेजर विश्वजीत ने समझाते हुए कहा, “अंधेरे में ‘कातिल’ को अपने ‘शिकार’ की तलाश करनी है। वह जिसे भी चाहे अपना ‘शिकार’ बना सकता है, इसलिए सभी को उससे खुद को बचाना होगा। ‘कातिल’ जिसे भी पकड़ पाएगा, उसे झूठमूठ मारने की कोशिश करेगा। ‘कातिल’ जिस पर ‘हमला’ करेगा उसे चीख-चीख कर सबको बताना होगा कि ‘कालित’ अपना काम कर चुका है। इसके कुछ देर बाद लाइट जला दी जाएगी।”

“मजेदार खेल है।” रायना ने कहा।

“आगे का हिस्सा भी समझ लीजिए।” मेजर विश्वजीत ने कहा, “लाइट ऑन होने पर कत्ल होने वाला मरने का अभिनय करते हुए जमीन पर खामोशी से पड़ा रहेगा। उसे यह जाहिर नहीं करना है कि ‘कालित’ कौन है? उसके बाद ‘जासूस’ का काम शुरू होगा। उसे अपनी सूझबूझ से ‘कातिल’ का पता लगाना होगा।”

“और अगर ‘जासूस’ ही ‘कातिल’ का शिकार बन गया तो...?” रायना ने पूछा।

“लानत है ऐसे ‘जासूस’ पर, जो ‘कातिल’ से खुद को न बचा सके।” डॉ. दिनांक ठुकराल ने हंसते हुए कहा।

दिनांक ठुकराल था तो अंतरिक्ष वैज्ञानिक, लेकिन काफी खुशमिजाज और यारबाश आदमी था। महफिल में उसके होने भर से मस्ती बहने लगती थी। हालांकि आज वह रंग में नहीं था।

खेल के नियम-कायदे सब की समझ में आ गए थे। रायना ने सभी मेहमानों की संख्या के हिसाब से पर्चियां बना लीं। इनमें से एक पर्ची पर ‘कातिल’ और दूसरी पर ‘जासूस’ लिखा था। बाकी सारी पर्चियां खाली थीं। उसने सारी पर्चियों को एक हैट में मिक्स कर दिया। उसके बाद सभी से एक-एक पर्ची उठाने के लिए कहा। आखिर में हैट में दो पर्चियां बची रह गईं। एक पर्ची रायना ने उठा ली। दूसरी पर्ची उठाने वाले शख्स ने खेल में शामिल होने से क्षमा मांग ली। उसने कहा कि उसकी तबियत कुछ ठीक नहीं है। वह आराम करना चाहता है। इसके बाद वह उठ कर एक कमरे में चला गया।

उसके जाने के बाद ही किसी ने मेन स्विच ऑफ कर दिया और पूरी कोठी पर अंधेरे का राज कायम हो गया। लोग तेजी से सुरक्षित जगह की तलाश में इधर-उधर जाने लगे। कुछेक लोग कोठी से बाहर निकल कर फार्म हाउस में छिपने के लिए चले गए।

कोठी के बाहर दूर तक सिर्फ और सिर्फ कोहरा था। कोहरे भरी रातों में अंधेरा कुछ ज्यादा ही घना होता है। हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था। जो लोग बाहर गए थे, उनके लिए यह कोहरा एक ढाल बन गया था। उन्हें तलाश कर पाना मुश्किल था। अलबत्ता उन्हें सर्दी का कहर झेलना था। तकरीबन हर किसी ने वाइन पी रखी थी और गर्म कपड़े पहन रखे थे तो किसी को सर्दी की ज्यादा फिक्र भी नहीं थी।

पांच मिनट बाद ऐसा लग रहा था कि कोठी पूरी तरह से खाली पड़ी है। यहां कोई भी नहीं रहता है। हर तरफ सन्नाटा और खामोशी थी। ‘कातिल’ का काम शुरू हो गया था। वह ‘शिकार’ की तलाश में घूम रहा था। उसके कदमों की आवाज अंधेरे में बहुत रहस्यमयी लग रही थी।

हर कोई पूरी गंभीरता से इस खेल में शामिल था। अभी भी लोग दबे कदमों से चलते हुए सुरक्षित जगह की तलाश में लगे हुए थे। जाहिर बात है कोई भी ‘कातिल’ के हत्थे नहीं चढ़ना चाहता था।

अचानक चर्ररर की आवाज के साथ हाल का मेन गेट खुल गया और कोई बाहर निकल गया। दरवाजे की आवाज किसी भुतही फिल्म की तरह मालूम हो रही थी।

रहस्यमय आदमी

खेल में शामिल न होने वाला इकलौता शख्स कमरे में चला गया था। दिलचस्प बात यह थी कि न तो उसे किसी ने खेल में शामिल होने के लिए कहा था और न ही किसी ने उसका हाल ही पूछा था। बस मेजबान राजेश शरबतिया उसे उसके कमरे तक छोड़ने जरूर गया था।

खेल में शामिल न होने वाले शख्स ने कमरे में जाने के बाद दरवाजा भेड़ दिया। उसने कहा था कि उसकी तबयत कुछ ठीक नहीं है.... लेकिन कमरे में पहुंचकर उसने जरा भी आराम नहीं किया। वह किसी चिंता में डूबा बैठा सिगार पी रहा था। उसके कमरे में भी पूरी तरह से अंधेरा था। जब वह सिगार के कश लेता तो थोड़ी देर के लिए कमरे में हलका सा उजाला हो जाता था। हालांकि कमरा जिस कदर बड़ा था, उस लिहाज से यह रोशनी जुगनू की चमक जैसी नाकाफी ही थी।

सिगार खत्म हो गई थी। उसने उठ कर उसे ऐश ट्रे में बुझा दिया। इस अंधेरे में भी जैसे उसे सब नजर आ रहा था। वह बड़े आराम से मेज तक गया और उसने ठीक ऐश ट्रे में ही सिगार बुझाई थी। उसका हाथ जरा भी दाएं-बाएं नहीं खिसका था।

यह आराम कुर्सी थी और बेड से जरा हट कर रखी हुई थी। वह कुर्सी की पुश्त से टेकर लगा कर शांत बैठा हुआ था। उसमें जरा भी जुंबिश नहीं हो रही थी। ऐसा लगता था, जैसे पत्थर का बन गया हो। उसने आंखें खोल रखी थीं। रात काफी गुजर गई थी, लेकिन उसकी आंखों में नींद का नामोनिशान तक नहीं था।

अचानक उसके कमरे का दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया। कोई दबे पांव कमरे में दाखिल हुआ। उसने दरवाजे को आहिस्ता से फिर से भेड़ दिया। वह दबे पांव चलते हुए बेड तक पहुंचा और फिर चुपचाप लेट गया। उसकी सांसें थोड़ा तेज चल रही थीं। ऐसा लगता था जैसे काफी चल कर आया हो। अजीब बात यह थी कि कमरे में पहले से बैठे हुए शख्स पर इस गतिविधि का कोई असर नहीं हुआ। वह वैसे ही शांत बैठा हुआ था। न ही उसने नजरें उठा कर आने वाली की तरफ देखा ही था।
*** * ***

‘मौत का खेल’ का अंत क्या हुआ?
वह रहस्यमय आदमी कौन था?

इन सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़िए कुमार रहमान का जासूसी उपन्यास ‘मौत का खेल’ का अगला भाग...