अनोखा जुर्म - भाग-5 in Hindi Detective stories by Kumar Rahman books and stories Free | अनोखा जुर्म - भाग-5

अनोखा जुर्म - भाग-5

चपरासी


ऊपर वाले ने सलीम की एक न सुनी और उसे स्काई सैंड सॉफ्टवेयर कंपनी में चपरासी बन कर जाना ही पड़ा। गीतिका उस से एक बार कोठी पर मिल चुकी थी, इसलिए सोहराब ने उसे वहां मेकअप में भेजा था। उस की नाक की दाहिनी तरफ एक बड़ा सा मसा था और उस पर दो बाल उगे हुए थे। इस मसे को लेकर सलीम ने बड़ा हल्ला मचाया था। वह किसी भी तरह इस के लिए राजी नहीं था। उस की भंवें भी कुछ चौड़ी की गई थीं। होठों पर बार्डर लाइन टाइप की पतली मूछें थीं। ग्रे कलर की ड्रेस पर उस ने ग्रे कलर की ही एक टोपी लगा रखी थी।

सलीम कैंटीन के अंदर कॉफी बनाने में बिजी था। कॉफी बन जाने के बाद उस ने उसे केतली में उंडेला और और गीतिका के केबिन की तरफ चल दिया। नॉक करके वह अंदर पहुंचा तो गीतिका सोफे पर शांत बैठी हुई थी। वह किसी सोच में गुम थी। उस ने सलीम की तरफ देखा तक नहीं था। सलीम ने ट्रे से उठा कर कप और केतली कोने की एक छोटी सी मेज पर रखी और कनखियों से गीतिका को देखते हुए बाहर आ गया।


पूरा दिन वह चाय-पानी, कॉफी, स्नैक्स पहुंचाने में बिजी रहा। कब शाम हो गई, उसे इस का पता ही नहीं चला। सब के जाने के बाद छह बजे वह ऑफिस से निकला। वह थक कर चूर हो रहा था। वह मैट्रो पर सवार हो कर कोठी पर पहुंच गया। वहां सब से पहले उस का सामना सोहराब से ही हुआ। सोहराब को देखते ही वह उखड़ गया, “जासूसी की ऐसी की तैसी। मुझसे नहीं होगी ऐसी जासूसी।”

“तुम्हारी मर्जी।” सोहराब ने संक्षिप्त सा जवाब दिया।


सलीम कुछ देर बैठा रहा। उस के बाद अपने बेडरूम की तरफ चला गया। वहां से नहा कर निकला तो भी उस का मेकअप कायम था। वह वापस आ कर सोहराब के पास लॉन में बैठ गया। उसे देखते ही सोहराब ने कहा, “गुड! मेकअप रिमूव नहीं किया है। यानी तुम कल फिर जाओगे।”

“आपका हुक्म है। कैसे मना कर दूं।” सलीम ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा।

“यह हुक्म नहीं है। हमारा काम है।” सोहराब ने कहा। कुछ देर बाद उस ने पूछा, “कैसा रहा दिन?”

“मैं अब भी अपनी बात पर कायम हूं। गीतिका को पर्सनाल्टी डिसऑर्डर है।” सलीम ने कहा।

“बर्खुर्दार! अगर अच्छा जासूस बनना है तो तुंरत ही नतीजे मत निकाला करो। सिर्फ एक दिन में तुम ने यह कैसे तय कर लिया।”

“देखिएगा... इस बार मैं ही सही साबित होऊंगा।” सलीम ने कहा।

तभी सोहराब के पास एक फोन आ गया और वह किसी से बतियाने लगा। सलीम उठ कर अपने बेडरूम में आ गया और पड़ कर सो रहा। आज यकीनन उस ने बहुत मेहनत की थी। वह कुछ देर के लिए डिनर करने उठा था, उस के बाद फिर सो गया।

सलीम को चपरासी बन कर जाते आज तीन दिन हो गए थे। जब वह शाम को लौटा तो सोहराब कोठी पर नहीं था। उस की मुलाकात डिनर पर हुई। सोहराब ने उस से पूछा, “क्या नतीजे निकाले तुम ने इन तीन दिनों में?”

“गीतिका की बात में दम है। उस के साथ वाकई वहां रानियों जैसा सुलूक होता है। उस की केतली और चाय का कप ही नहीं, बल्कि वाशरूम भी अलग है। हर कोई उस से बहुत अदब से पेश आता है।” सलीम ने कहा।

“कोई खास घटना?” सोहराब ने पूछा।

“आज बोर्ड रूम में मीटिंग थी। जब गीतिका वहां जाने लगी तो हर कोई किनारे हाथ बांध कर अदब से खड़ा हो गया। यह देख कर गीतिका काफी असहज हो गई थी।” सलीम ने बताया।

“कोई और खास बात?” सोहराब ने पूछा।

“कल एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर कैंटीन में लंच करने आया था। इत्तेफाकन वह अकेला ही था। मैंने बातों-बातों में गीतिका का जिक्र छेड़ दिया। पहले तो वह हिचकिचाता रहा। बाद में कहने लगा कि वह हम सब के लिए स्पेशल हैं। मैंने पूछा ऐसा क्यों है? तो कहने लगा कि ऐसा कोई निर्देश नहीं है, लेकिन उन के साथ जिस तरह का कंपनी का सुलूक है तो हर कोई आटोमेटिकली उनका लिहाज करता है।”

“क्या अब भी कहोगे कि उसे पर्सनाल्टी डिसऑर्डर है?” सोहराब ने मुस्कुराते हुए कहा।

“यह तो वक्त बताएगा।” सलीम ने किसी दार्शनिक के से अंदाज में नजरें घुमाते हुए कहा।

सोहराब ने उस की बात को नजरअंदाज करते हुए कहा, “मैंने गीतिका की बताई सारी बातें चेक कराई हैं। वह सभी बातें सच निकली हैं। जब वह एक साल की थी तो उस के पिता ने उस की मां को तलाक दे दिया था। पिता की अमरीका में प्लेन क्रैश में मौत की बात भी सच है। यह भी सच है कि वह एक साल से स्काई सैंड सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी कर रही है... और हां यह भी पता चल गया है कि उस की मां के अकाउंट में हर महीने एक अज्ञात खाते से बीस हजार रुपये आते थे।”

“उस का पता चल सका, जिस के अकाउंट से उसकी मां के खाते में पैसे आते थे?” सलीम ने पूछा।

“जिस आदमी के खाते से पैसे गीतिका की मां के खाते मे आते थे... वह मर चुका है। उस के परिवार ने बताया कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं पता है।”

“तो अब आप किस नतीजे पर पहुंचे?” सलीम ने पूछा।

“यही कि यह पर्सनाल्टी डिसऑर्डर का मामला नहीं है। बाकी सवालों के जवाब भी जल्द ही सामने आएंगे।” सोहराब ने पुख्ता लहजे में कहा।

लापता


शाम को सलीम काम समेट कर निकलने की तैयारी कर रहा था। आम तौर पर ऑफिस पांच बजे बंद हो जाता था। चपरासी बने सलीम को साफ-सफाई करते-कराते एक घंटा लग जाता था। सलीम तेजी से काम निपटाने की कोशिश कर रहा था। पूरा ऑफिस खाली हो चुका था। वह और कुछ और लोग ही बचे थे।

सलीम के मोबाइल पर एक छोटी सी मिस कॉल आई। उस ने मोबाइल निकाल कर देखा तो सोहराब की कॉल थी। मिस कॉल देखते ही सलीम वाशरूम की तरफ चला गया। वहां पहुंच कर उस ने फोन मिलाया। दूसरी तरफ से सोहराब ने पूछा, “गीतिका कितने पहले ऑफिस से निकली है?”

“तकरीबन एक घंटा पहले।” सलीम ने बताया।

“वह अब तक घर नहीं पहुंची है।” सोहराब ने कहा, “तुम गीतिका का घर देखते हुए आना।”

“ओके।” सलीम ने कहा। उस के बाद उस ने फोन काट दिया और ऑफिस से बाहर आ गया। उस ने मेट्रो पकड़ी और गीतिका के घर के पास वाले स्टेशन पर उतर गया।

वहां से निकल कर सार्जेंट सलीम चायखाने में जा कर बैठ गया।

हालफिलहाल ऐसा पहली बार हुआ है कि गीतिका ऑफिस से सीधे घर नहीं पहुंची है। वह 20 से 25 मिनट में घर पहुंच जाती थी। आखिर वह कहां जा सकती है? सलीम ने मन ही मन सोचा।

सलीम काफी देर तक गीतिका के घर के बाहर बैठा रहा, लेकिन वह नहीं लौटी। रात तकरीबन दस बजे जब चायखाना बंद होने लगा तो सलीम उठ खड़ा हुआ और कोठी की तरफ रवाना हो गया।

कोठी पर सोहराब नहीं था। सलीम से उस की मुलाकात डिनर पर ही हो सकी।

"क्या मालूम हुआ?" सोहराब ने पूछा।

"वह घर नहीं लौटी दस बजे तक।" सलीम ने कहा।

"ओके।" सोहराब ने कहा।

“क्या उस की निगरानी बंद कर दी गई थी?” सलीम ने पूछा।

“ऑफिस में तुम निगरानी कर रहे थे और मेरा एक आदमी घर की निगरानी कर रहा था। दफ्तर से घर तक की निगरानी नहीं हो रही थी।” सोहराब ने कहा।

सुबह एक नई खबर ने सोहराब की बेचैनी बढ़ा दी। गीतिका पूरी रात अपने घर नहीं आई थी। वह बेचैनी से लॉन में टहल रहा था। उसका दिमाग बहुत तेज चल रहा था। बहुत अजीब बात थी। एक लड़की ऑफिस से तो निकलती है, लेकिन घर नहीं पहुंचती। घर पर कोई रहता भी नहीं, जिस को उसकी परवाह हो।

कुछ देर बाद डायनिंग रूम में नाश्ते पर सोहराब ने सलीम को यह बात बताई तो वह भी उलझन में पड़ गया। उस ने कहा, “फिर मैं ऑफिस नहीं जाता हूं?”

“नहीं ऑफिस जाओ। देखो कि गीतिका के दफ्तर से गायब रहने पर वहां लोगों का रियेक्शन क्या होता है।”

सलीम निश्चित समय पर ऑफिस पहुंच गया। वहां पहुंच कर वह अपने काम में लग गया। कुछ देर बाद वह कॉफी देने जब हाल में पहुंचा तो उसे गीतिका आते हुए नजर आ गई। वह कुछ दुबली नजर आ रही थी। उसकी चाल में भी थोड़ा सा फर्क था।

गीतिका सीधे अपने केबिन में जाकर बैठ गई।

सलीम वापस कैंटीन आ गया। उस ने गीतिका के ऑफिस आ जाने पर सोहराब को एक मैसेज भेजा। फिर गीतिका के लिए कॉफी बनाने लगा। गीतिका को उसके हाथ की कॉफी बहुत पसंद आई थी। उस ने खुश हो कर चपरासी बने सलीम को पांच सौ रुपये भी दिए थे।

सलीम जब कॉफी ले कर अंदर पहुंचा तो गीतिका कंप्यूटर पर बैठी काम कर रही थी। सलीम को थोड़ा ताज्जुब हुआ। गीतिका आते ही कभी काम पर नहीं लगती थी। वह कुछ देर सोफे पर बैठ कर आराम करती थी, उस के बाद काम शुरू करती थी। पिछले कुछ दिनों से सलीम यही देखता आ रहा था। सलीम ने टेबल पर कॉफी रख दी और बाहर आ गया।

*** * ***


आखिर गीतिका पूरी रात कहां गायब थी?
सलीम ने गीतिका के दफ्तर से क्या नया राज हासिल किया?

इन सवालों का जवाब जानने के लिए पढ़िए कुमार रहमान का जासूसी उपन्यास ‘अनोखा जुर्म’ का अगला भाग...

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