Bepanaah - 5 in Hindi Fiction Stories by Seema Saxena books and stories PDF | बेपनाह - 5

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बेपनाह - 5

5

अगले दिन प्ले था अतः सर ने सब लोगों कों कहा, :चलो पहले अपने होटल चलकर आराम करते हैं फिर कल प्ले करने के बाद दो दिन घूमने में लगा देंगे।“

शुभी बहुत खुश थी कि मजे करेंगे लेकिन ऋषभ के कारण अब उसका मन सिर्फ उसमें ही अटक गया था ।

सभी लोगों के रुकने की जगह कोई ज्यादा ख़ास नहीं थी एक बड़ा सा रूम, अटैच वाथरूम । इसमें पाँच लड़कियों को एक साथ रहना था, लड़कों के लिए भी ऐसा ही एक कमरा था और वे छह लोग थे। खूब बड़ा सा होटल करीब 100 कमरों वाला उसके अलावा लौबी रिशेप्शन आदि लेकिन सभी कमरे लगभग फुल, ऐसा लग रहा था पूरे भारत के रंग कर्मी एक ही स्थान पर इकट्ठे हो गए हैं । गाना बजाना और खूब शोर शराबा ! हालांकि शुभी को इस शोर से कोई तकलीफ नहीं थी लेकिन उसका दिल सकूँ के पल चाह रहा था ! एकांत या शांति जो उसके भीतर के भयंकर हाहाकार को शांत कर सके ! आखिर वो लौट के क्यों आया ? वो तो बिना किसी खबर के मुझे छोड़ गया था और इतने समय तक भूला रहा फिर अचानक से आ गया ।

“तुम सब लोग फ्रेश होकर नीचे आ जाओ, पहले चाय आदि पी लें तो थकान उतर जायेगी !” सर ने सबसे कहा ।

शुभी ने अपना सिर हिलाकर हाँ कहा ।

चाय पीकर वे सब आपस में बात करते हुए होटल के पार्क में टहलने लगे और वो सबसे अलग थलग जबकि हमेशा वो ही सबसे ज्यादा बोलती थी।

शुभी पेड़ के नीचे खड़ी थी तभी न जाने कहाँ से ऋषभ अवतरित हो गया। उसने गौर से उसे देखा, लंबी बढ़ी हुई दाड़ी, बेतरतीब बाल और उतरा हुआ उदास चेहरा। स्टेशन पर तो ध्यान ही नहीं दिया था।

शुभी कुछ कहती उससे पहले ही वो बोल पड़ा, “मुझे पता है तुम मुझसे नाराज हो, नाराज होने की बात भी है लेकिन मैं मजबूर था।“

“मजबूर, ऐसी क्या मजबूरी, जो तुम मुझसे शेयर नहीं कर सकते थे, मैं तुमसे अलग नहीं थी और न ही कभी हमारे बीच कोई दुराव छिपाव था।” शुभी एकदम से गुस्से में भर कर बोली।

“हाँ यही एक गलती हुई कि मैंने तुमसे छुपाया और उसी छुपाने की वजह से मुझे तुमसे दूर जाना पड़ा।“

“क्या वजह ?”

“मैं डिप्रेशन में आ गया था और मुझे इसके लिए लगातार डाक्टर की निगरानी में रहना था।”

“तो मुझे क्यों नहीं बताया?”

“मुझे लगता था कि इस बीमारी की वजह से तुम मुझसे और प्यार करने लगोगी और करीब आ जाओगी जबकि मैं तुमसे दूर होकर तुम्हें खुशहाल जिंदगी मे जीते हुए देखना चाहता था क्योंकि मुझे लगता था कि अब मैं कभी सही नहीं होऊँगा,, बस इसलिए ही, मुझे माफ कर दो शुभी, मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ ।” वो हाथ जोड़कर जमीन में बैठ गया था।

“तुमको कैसे लगा कि मैं तुमसे दूर जाकर खुश रह पाऊँगी ? तुम जैसे भी थे सिर्फ मेरे थे और मुझे हर हाल में स्वीकार थे लेकिन ऋषभ,,,

वो उससे कुछ पूछती उससे पहले ही ऋषभ बोल पड़ा, “मैं बहुत चाहता हूँ तुम्हें, हद से ज्यादा।“

“ये कैसी चाहत है जो तुमने मुझे दुख से भर दिया।“

“मैं तुम्हें दुख देकर खुद भी बहुत दुखी हुआ हूँ लेकिन मैं प्रायश्चित करना चाहता था ! खुद को दुनिया से दूर करना चाहता था ! यकीन मानों शुभी मैं तुमसे दूर जाकर भी पल भर को भी दूर नहीं था।“

शुभी जानती थी कि वो सच्चा है, ईमानदार है, उससे अनजाने में गलती हुई थी।

अगर तुम मुझे बता देते तो शायद मुझे अच्छा लगता कि तुमने मुझे अपना तो समझा।

वो कुछ नहीं बोला था यूं ही जमीन में बैठा रहा सिर झुकाये हुए ! उसकी आँखों से आँसू झर रहे थे !

शुभी कशमकश में थी ! उसका प्यार उसके कदमों में था तो वो इतना निष्ठुर कैसे हो सकती थी !

“ऋषभ !” उस के मुँह से निकला !

ऋषभ ने उसकी तरफ मुँह उठा कर देखा ! उसका पूरा चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था ! उस ने अपने दोनों हाथ उसकी तरफ फैला दिये वो उठा और शुभी की बाहों में सिमट गया और शुभी के मुँह को अपने चुंबनों की बौछार से भर दिया ! मुझे माफ कर दो शुभी प्लीज, मुझे माफ कर दो, मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ ! आई लव यू ! मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं जी सकता ! न जाने क्या क्या बोलता जा रहा था किसी मासूम बच्चे की तरह और वो अपना आंसुओं से भरा चेहरा ऊपर उठाए एकटक सूर्य की तरफ देख रही थी जो अस्ताचल में समाने की तैयारी कर रहा था,

सुर्ख लाल सूर्य,,, उसके मुँह से अचानक यह पंक्तियाँ निकल गयी !

क्यों ये आँख झरती है

क्यों ये दर्द होता है

हैं क्यों इतनी बेचैनियां

क्यों मन उदास होता है ॥

“जब हम बात करते हैं न, तो कितना हल्का हल्का सा हो जाता है मन,,,हैं न ?”

“हाँ तुम सही कह रही हो ....एकदम फूल की तरह से हल्का और खुश,,,,,जब मैंने तुमसे अपने मन की बात कर ली तो वाकई मुझे बहुत ही अच्छा लग रहा है ।”

“लेकिन मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता कि दुनिया में ऐसा क्यों होता है ?”

“ऐसा मतलब कैसा ?”

“हाँ ऐसा ही, जैसे कि हम जिससे बहुत ज्यादा प्यार करते हैं वो बेवफा क्यों हो जाता है ? क्यों वो उसे दुख देता है जिसने अपनी पूरी जान सौप दी, पूरी जिंदगी उसके नाम कर दी ! क्या उसका दिल नहीं कसकता ? क्या उसे ये नहीं अहसास होता कि वो तो पल पल में उसे जी रही है और वो किसी और को अपने अहसास दे रहा है, शब्द दे रहा है ...क्या ये स्वार्थ नहीं है ?”

“,,, ”

“तुम चुप क्यों हो ? बोलो न ? क्या प्रेम प्रसाद है  जो थोड़ा थोड़ा बाँटते रहो ....आखिर इंसान ऐसा कर कैसे पाता है ?”

“नहीं ऐसा नहीं होता है कभी कभी परिस्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं कि इंसान मजबूर हो जाता है ।”

“अच्छा सुनो, कोई कई साल से अपना अहसास, अपना प्यार, अपना समर्पण, अपना विश्वास सब कुछ उस शख्स को दे रही है वो उसे कैसे भूल जाता है ?”

“नहीं, कभी नहीं भूलता ...कहा न मजबूरी ।”

“इतनी मजबूरी कि कोई घूंट घूंट दर्द पी रही है, बिना कहे, बिना सुने,,, उसके आँसू उसे क्यों नहीं दिखते क्योंकि वो छुप छुप कर रोती है और सामना होने पर अपने आँसू छुपा लेती है ताकि उसके प्रिय को कोई दुख न हो ! क्या वो उसकी कमजोरी समझता है इसलिए ऐसा करता है ?”

“समझ नहीं आ रहा, मैं क्या कहूँ ?”

“कहो न कुछ, उसके दर्द को समझो जो कह नहीं पाता ।”

“तो उसे कह देना चाहिए क्योंकि प्रेम तो उसे भी है न ! जब हम प्रेम करते हैं तो फिर यह क्यों सोचते हैं कि वह न कहे बस सामने वाला कहे ॥”

“अरे एक ही तो बात है चाहें कोई कह दे ।”

“लेकिन अगर एक ही बराबर कहता रहे और दूसरा कभी पहल न करे तो ?”

“तो भी कोई बात नहीं है, क्या तुम प्रेम का अर्थ समझती ही नहीं हो ?”

मुझे पता था कि चाहे ऋषभ से कितनी भी बहस क्यों न कर ले जीतेगा वही और वो हार जाएगी, यह तो उसकी पुरानी आदत है लेकिन अब उसको चुप नहीं रहना था, वो चुप रहने की बहुत बड़ी सजा भुगत चुकी थी ।

“सुनो ऋषभ, यह डिप्रेशन इतनी बड़ी बात तो नहीं थी न, फिर क्यों इसकी वजह से तुम दूर हो गए, क्या तुमने यह सोचा भी नहीं कि तुम किसी की जान हो और तुम्हारे बिना उसका क्या हाल हो जाएगा ?”

“मैं शर्मिंदा हूँ शुभी ।”

“प्लीज ऋषभ, ऐसा मत कहो, बिलकुल मत कहो ! मैं तुम्हें झुका हुआ नहीं देख सकती ।” शुभी की आँखों में आँसू भर आये थे ।