बेपनाह - 11 in Hindi Novel Episodes by Seema Saxena books and stories Free | बेपनाह - 11

बेपनाह - 11

11

नाश्ता करके ऋषभ से बात करनी है जल्दी से यह हलवा और पकौड़ी फिनिश कर दूँ ! उसने देखा नाजमा बड़े मजे में आराम से पैर फैलाये जमीन पर बिछी दरी पर बैठी है और सबके साथ गपियाते हुए खा पी रही है ! शुभी को इसकी यह आदत बिलकुल पसंद नहीं है, पता नहीं क्यों मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता । जी करा कि एक बार इसे टोंक दूँ लेकिन फिर मन को समझाया । जाने दो, क्या करना यह उसकी लाइफ है, जीने दो जैसे उसे अच्छा लगे कोई हमारे हिसाब से वो अपना जीवन थोड़े ही न जियेगी । नाश्ता खत्म हो गया था हालांकि अभी ऋषभ से बात करने का मन तो नहीं था लेकिन कर लेती हूँ फोन, नहीं तो वो बैठा इंतजार करता रहेगा। वो ऐसा ही था और अभी भी वैसा ही होगा।

ऋषभ ने फोन पर ही कहा था कि अभी तुम अपना ध्यान प्ले की परफ़ोर्मेंस पर लगाओ फिर बात कर लेना और हाँ सुनो, मैं फिर से बता रहा हूँ कि आ नहीं आऊँगा लेकिन यहीं रुका हुआ हूँ और प्ले खत्म होने के बाद मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊंगा ।“

“अरे अरे, आप कहाँ ले जाएँगे और मैं यहाँ से कैसे जा पाऊँगी, यहाँ सर हैं, हमारा ग्रुप है और सब लोग हैं, मेरा जाना संभव कैसे हो पायेगा ?”

“तुम उसकी चिंता मत करो, मैं सब संभाल लूँगा ।“

“क्या करेगा यह ? कैसे सब संभाल लेगा ? कितने सवाल दिलोदिमाग में उठने लगे ! यह कैसी बातें कर रहा है ? दिल में अंजाना सा डर पैदा हुआ ! अभी सब भूल जाओ शुभी, सिर्फ अपने काम में मन लगाओ ! उसने अपने मन को खुद ही समझाते हुए कहा, जो होगा, सो देखा जाएगा । हमारा प्रेम सच्चा होगा तो ईश्वर हमारे साथ ही रहेगा वो कभी हमें धोखा नहीं दे सकता । कभी हमारा साथ नहीं छोड़ सकता क्योंकि जब हम सच्चे होते हैं तो ईश्वर खुद ही हमारे सामने से झुक जाते हैं ।

समय कम होने से सर ने जल्दी जल्दी रिहर्सल खत्म करा दी थी जिससे बैक स्टेज की होने वाली तैयारियां की जा सके, सेट भी तैयार करना था । महीनों से चली आ रही तैयारियों को आज मंच से रूबरू कराना था, कितने काम होते हैं तब जाकर नाटक दर्शकों के सामने आता है । न कोई रिटेक, न ही कोई बदलाव । जो है, जैसा है, सब एक ही बार में करना होता है । फिल्म जैसा आसान नहीं है थियेटर लेकिन फिल्म जैसा ही सबकुछ होता है बल्कि उससे कई गुना कठिन है फिर भी पैसा बिलकुल नहीं, न कोई अन्य शानो शौकत । हर काम को खुद ही करने की शुरू से आदत डाली जाती है, कोई भी काम हो सबको मिलजुल कर करना होता है । तभी टीम बरकरार रह पाती है, खैर प्ले हुआ, खूब तालियाँ और वाहवाही मिली । प्ले कंपटीशन में सिर्फ एक नंबर से पीछे हो गया, वो भी नाजमा के मंच पर अलग सी चप्पल पहन जाने के कारण। सर ने उसकी बहुत डांट लगाई कि, “तुम्हें इतना भी ध्यान नहीं रहा ड्रेस वाली चप्पल पहननी हैं, तुम इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हो जबकि तुम टीम में सबसे सीनियर मेम्बर हो ?” नाजमा हमेशा की तरह खामोश खड़ी सुनती रही ।

“प्ले हो गया, अब तो हमें घूमने जाना है काजल, मैं बोर हो रही हूँ । काजल तू मेरे पापा से कह दे न ।“ हिना ने अपने पापा से यानि सर से कहने के लिए काजल को कहा ।

“न जाने क्यों सर ले आए इसको ? न कोई काम करती है और न ही किसी तरह से हेल्प करती, इसका तो रोल भी नहीं था फिर क्यों लाये हैं ?” काजल आज बड़े गुस्से से बोली जबकि उसकी तो हिना से खूब पट्ती है लगता है आज यह दोनों किसी बात पर झगड़ चुकी हैं ।

शायद काजल की यह बात हिना ने सुन ली थी तो गुस्सा होकर एक किनारे पड़ी कुर्सी पर जाकर बैठ गयी ।

“लो अब मनाओं माता रानी को ! अब यह घंटों यूं ही बैठी रहेगी ।” नाजमा ने काजल को डांटते हुए कहा था ।

“हुंह होने दो नाराज मैं क्यों मनाऊँ ? मेरा क्या जाता है । मैं हमेशा वो सब कैसे कहूँ जो यह चाहती है, मेरी कोई बात ही नहीं सुनती, मैं हर बार सुनती हूँ और इसके चक्कर में सर से डांट भी खाती हूँ लेकिन अब नहीं, अब तो प्ले भी हो गया और सर की डांट का भी कोई डर नहीं ! इसे इसके पापा ने अपने सिर पर चढ़ा रखा है तो मैं भी अपने पापा की लाड़ली हूँ ।“

“किस बात पर इतना भड़क रही हो काजल ? सारे दिनों की भड़ास क्या आज ही निकाल दोगी ?”

“सर सिर्फ इसे ही प्यार करते हैं क्योंकि यह उनकी बेटी है ! मुझे क्यों करेंगे मैं उनकी बेटी तो नहीं हूँ न ।”

“नहीं काजल, ऐसे मत कहो सर सभी को समान रूप से चाहते हैं, ख्याल रखते हैं, किसी को शिकायत का मौका नहीं देते और यह बात सच है कि हिना उनकी इकलौती बेटी है इसलिए उसके प्रति ज्यादा लगाव या स्नेह होना स्वाभाविक है न काजल ? नाजमा ने बड़े प्यार से समझाया । यह कैसे हर बात को इतने कूल तरीके से हैंडल कर लेती है ।

“चल काजल, हम दोनों सर से कह कर आते हैं ! हम लोंगों का भी घूमना हो जायेगा, नाजमा काजल का हाथ पकड़ कर ले गयी, अब हिना के चेहरे पर मुस्कान लौट आई थी मानों वो जीत गयी हो बिना कोई लड़ाई लड़े ही ।

सर ने तुरंत सहमति दे दी थी ! “हाँ चलना तो है ही अगर यहाँ आकर भी कहीं घूमने नहीं गए तो मेरा मन खुद से ही नाखुश हो जायेगा ।” जैसे सर ने हम सबके चेहरे को पढ़ लिया हो कि हम जाना चाहते हैं । शुभी और नाजमा तो बहुत खुश हो गए थे लेकिन काजल के चेहरे से अभी भी नाराजगी झलक रही थी ।

“काजल क्या तुम जाना नहीं चाहती हो ?” आखिर शुभी से रहा नहीं गया तो उससे पूछ लिया ।

“नहीं ऐसा तो नहीं है, मैं जाना चाहती हूँ लेकिन मैं नहीं चाहती कि हर बार हिना की बात को ही प्राथमिकता दी जाये और उसकी हर बात मानी जाये जबकि वो तो सिर्फ सर की बेटी है कोई कलाकार नहीं है ।”

“कैसी बातें करती है तू, कोई ऐसे भी कहता है ? सुनो काजल हमें आपस में नहीं लड़ना है, हिना भी हमारे जैसी है और वो भी प्ले में कोई न कोई काम करती है ! इस बात को तुम समझो ।” शुभी ने उसे समझाया ।

“हाँ मैं सब समझती हूँ बहन लेकिन आज मुझे गुस्सा आ गया था, हर बार में मुझे आगे कर देती है और खुद पीछे खड़े हो कर तमाशा देखती है क्या तुमने कभी नहीं देखा कि उसके कारण मुझे कितनी डांट खानी पड़ती है ?”

“अरे चल छोड़ अब इस बात को ।“ शुभी ने उससे कहा ।

“हमारा प्ले अच्छा गया, हमारा रोल भी अच्छा हुआ और कल हम घूमने जा रहे हैं बस और क्या चाहिए जिंदगी से, चल खुश हो जा ।” शुभी मुस्कुराई तो काजल भी हंस दी ।

“यार आज मुझे सच गुस्सा आ गया था ।“ उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान तैर रही थीं।

“हाँ गलत बात पर सभी को गुस्सा आता है लेकिन हमें थोड़ा समझदार होना चाहिये ! हम कलाकार है और कलाकार को हमेशा अच्छा इंसान होना चाहिए बल्कि सभी लोगों को होना चाहिए।”

“सही कहा।”

“आपको गोलगप्पे खाने चलना है ?” तभी हिना वहाँ आकर बोली ।

“कहाँ पर जाना है ?” शुभी के मुंह से एकदम से निकला ।

“यही पास में ही है ।” वो खुशी से किसी बच्चे के समान चंहकी ।

“पहले सर से पूछकर आओ फिर हम सब लोग चलेंगे !” काजल ने उससे कहा ।

“नहीं बहन, पापा से तुम ही बात करो !” उसके चेहरे के भाव बदल गए थे ।

“तू अपने पापा से इतना डरती क्यों है जबकि तू तो उनकी अकेली बेटी है और पता है वे तुझे कितना प्यार करते हैं ?”

“हाँ बहुत प्यार करते हैं इसलिए मैं कभी उनका दिल नहीं दुखाना चाहती, मैं कभी कोई ऐसी वैसी बात कहकर डांट भी नहीं खाना चाहती ।“ वो बड़े प्यार और भोलेपन से बोली ।

“लेकिन बहन तेरे पापा तुझे सही गलत बात को समझ कर डांट भी देते है तो बुरा क्या मानना आखिर वो तेरे पापा हैं और बहुत बड़े भी ।”

वो इस बात पर कुछ नहीं बोली, एकदम चुप रही ।

“आओ, गोलगप्पे खाने चले ?” शुभी उसे शांत देखकर बोली ।

“लेकिन पापा से बिना बताए कैसे चलोगी ?” हिना ने चिंतित स्वर में कहा ।

“बता देंगे तुम आओ तो ।”

शुभी, काजल, नज़मा और हिना ! वे चारों एक दूसरे का हाथ पकड़े बोलते बतियाते बाहर आ गए ! पास में ही गोलगप्पे वाला खड़ा था ! यहाँ से ही खा लेते हैं आगे कहाँ जाएँगे / काजल बोली ।

बहुत स्वाद था उन गोलगप्पों में । उसके पास तीखा, मीठा और सादा तीनों ही तरह के गोलगप्पे के अर्क थे । सबने मिलकर करीब 100 रुपये के गोलगप्पे खा लिए और पैसे हिना ने दिये । उसने किसी को देने ही नहीं दिये । बड़ी दिलदार है हिना ! सर की लाड़ली बेटी और बहुत प्यारी भी है लेकिन कभी कभी मूर्खता दिखाती है ! न जाने क्या हो जाता है उसे ?

लगता है सर ने इसे लाड़ प्यार तो दिया है लेकिन अपना विश्वास नहीं दिया और न ही उसका विश्वास किया, तभी यह इस तरह की हरकतें करती है ! अपने मन मेँ यह सोच शुभी मुस्कुराई । इसके दिल मेँ भी तो अपने पापा के लिए बहुत प्यार सम्मान और इज्ज़त है और उनसे डरती भी बहुत है ! बस वो अपने साथ की अन्य लड़कियों की तरह रहना चाहती है जिसके लिए उसे कोई आजादी सर ने नहीं दी है जबकि हम सबको इतना भरोसा देते है जिंदगी से बिना डरे लड़ना सिखाते हैं, किसी दिन मौका लगा तो सर से यह जरूर जानना चाहूंगी । शुभी ने सोचा ।

“क्या सोच रही हो शुभी ?” हिना उसके पास आकर बोली ।

“कुछ नहीं बस यह सोच रही हूँ कि तू हंसते मुसकुराते हुए कितनी प्यारी लगती है” ।

“अच्छा सच मेँ !” वो मुस्कुराई, मुस्कुराने से उसके दायें गाल मेँ छोटा सा डिम्पल पड गया ।

“हाँ बिलकुल सच ।” शुभी ने भी मुस्कुरा कर कहा ।

“अच्छा चल इसी बात पर तुझे आइसक्रीम खिलाती हूँ ।” वो शुभी के गले मेँ बाहें डाल कर बोली ।

“अब रहने दे आज के लिए गोलगप्पे हो गए, कल आइसक्रीम खाते हैं ।”

“नहीं यार, चल न !” बड़ा लाड़ दिखाते हुए हिना ने कहा ।

“अभी तो बाहर से आए हैं फिर जाएँगे तो कहीं सर को गुस्सा न आ जाये ?”

“नहीं न, बिलकुल नहीं आयेगा ।”

“वो कैसे ?”

“क्योंकि हमें कहीं बाहर जाना ही नहीं पड़ेगा ! आइसक्रीम वाला यहाँ अंदर ही खड़ा है ।“ वो बच्चे की तरह ज़ोर से हंसी ।

“चलो फिर ठीक है ।”

वे दोनों जैसे ही आइसक्रीम के ठेले के पास जाकर खड़े हुए तभी सर आ गए साथ मेँ नजमा, काजल आदि भी आ गयी ।

“देखो हमने तुम सब के लिए आइसक्रीम का ठेला ही अंदर बुला लिया, चलो अब जिस को जो सी भी खानी है ले लो, पैसे हम दे देंगे ।” सर ने हम सबसे कहा ।

मुझे सिर्फ बटर स्कॉच आइसक्रीम चाहिए, मुझे कसाटा ! मुझे चॉकलेट ! मुझे टूटी फ्रूटी दे दो ! सबने अपनी पसंद की आइसक्रीम निकलवा ली !

“सर आप भी लीजिये न ! आपको कौन सी लेनी है ?” शुभी बोली ।

“नहीं मैं नहीं खाता आइसक्रीम ।” वे बोले ।

“डैडी आप ऑरेंज बार ले लो न, आपको पसंद भी है ।” हिना बोली ।

“नहीं बेटा, आप लोग खाओ, आज मन नहीं है ।“

कितने सरल और सज्जन हैं सर जी ! न कोई दिखावा न कोई कपट ! अपनी उम्र से कहीं ज्यादा समझदार और गंभीर ।

सर प्लीज आप भी लीजिये न, वरना हम सब भी नहीं खाएँगे ।“

“हाँ हाँ आप भी लीजिये न, सभी एक साथ बोल पड़ी ।”

“लाओ भाई मुझे भी दे दो यह लोग ऐसे नहीं मानेंगी ।” सर के चेहरे पर मुस्कान खेलने लगी ।

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