बेपनाह - 10 in Hindi Novel Episodes by Seema Saxena books and stories Free | बेपनाह - 10

बेपनाह - 10

10

छोटा सा घर था उसकी चौखट पर ही बैठ कर वो बड़बड़ा रहा था और रोता जा रहा था । शुभी को लगा शायद इसकी पत्नी इसकी ज्यादती से तंग आकर इसे छोड़ कर चली गई है लेकिन उसका यह सोचना गलत निकला । एक औरत अंदर से पानी का भरा गिलास लेकर आई और उसके पास आकर बोली, लो पहले पानी पी लो ! वही रात वाली आवाज ! यही तो रात रो रही थी और यह चीख रहा था और अभी यह चीख तो नहीं रही पर वो पुरुष रो रहा था । अरे इतनी जल्दी तस्वीर का रुख कैसे बदल गया ? अब इन लोगो से बात कैसे करे ? खासतौर से उस महिला से जो पानी का गिलास हाथ में लिए खड़ी है और उसके चेहरे पर बड़ी करुणा झलक रही है !

“अभी तो यहाँ से चलते हैं नाजमा फिर शाम के समय या किसी समय फिर से आकर देख लेंगे ।“

“क्या देख लेंगे ?”

“सब बताती हूँ अभी ठहरो तो जरा ।”

“मुझे तेरी कोई बात समझ नहीं आ रही ।”

“आ जाएगी बहन, सब समझ आ जाएगा ! इस समय यहाँ से चलो क्यों बेकार में रुकना।”

“ओफफो ! तू और तेरी बातें ।“ नाजमा ने बुरा सा मुंह बनाया ।

“इन लोगों की तो रोज की कहानी है, न यह आदमी सुधरेगा और न ही इसकी औरत इसे छोड़ेगी, लड़ेंगे झगड़ेंगे और रोते पीटते रहेंगे । क्या करना हम लोगों को इनके फटे में अपनी टांग अड़ाने का ?” वही पास में खड़ी एक औरत ने दूसरी औरत से कहा ।

शुभी का मन किया कि इनसे कुछ पूंछे लेकिन नए और अंजान लोगों से यूं ही बात करने की हिम्मत नहीं हुई ।

“यहाँ नई आई लगती हो ?” उन दो औरतों में से एक खुद ही बोल पड़ी ।

“हाँ, यहाँ हम अपना प्ले करने आए हैं ।“ नाजमा ने जवाब दिया ।

“प्ले, मतलब नाटक ! हम यही इस बिल्डिंग में रुके हैं।” शुभी ने उस महिला को समझाते हुए कहा।

“अच्छा अच्छा !” वे दोनों एक साथ बोल पड़ी ।

“आप लोग आना शाम को हमारा प्ले देखने को।”

“हाँ आते हैं । क्या तुम यहाँ इन लोगों की लड़ाई झगड़ा सुनकर इन्हें देखने चली आई हो?”

“कल रात सुना था, औरत का रोना और आदमी का डपटना लेकिन अभी तो यह आदमी रो रहा है और औरत उसे संभाल रही है ! क्या चक्कर है ?” शुभी ने सवाल किया ।

“इन लोगों का रोज का झगड़ा तांता है, हम लोग अब नहीं पड़ते इन लोगों के बीच में, आखिर कब तक समझाएँ ?” एक बोली ।

“बात क्या है, कुछ बताओ न ?”

“वोई औरत का चक्कर, यह आदमी सही नहीं है । पहले लव मैरिज करी फिर ना जाने कितने लव कर डाले अबकी कोई जबर औरत फांसी है जो इसके काबू में नाय आय रही है ।” दूसरी औरत जल्दी जल्दी बताने लगी ।

“ओफफो यह बात है ! इनकी उम्र अच्छी ख़ासी लग रही है फिर भी यह सब करता है यह आदमी ?” शुभी भौचक्की होकर बोली ।

“तुझे कुछ पता भी है दुनियादारी या दुनिया के बारे में ?” नाजमा ने उसे झिड़का ।

शुभी उसकी डांट पर मुस्कुराई ।

“अब मैं समझी तू इसकी औरत को समझाने और इसका दर्द बाँटने आई होगी ।“

शुभी कुछ नहीं बोली और चुपचाप उस कमरे में आ गयी जहां रिहर्सल होनी थी । सब लोग आ गए थे और बैठकर चाय पी रहे थे ।

“तुम दोनों ने चाय पी ली ?” सर ने उनको देखते हुए टोंका ।

“सर अभी नहा धो कर सीधे यहाँ ही आ रहे हैं ।” नाजमा ने बात संभाली ।

“तो जाओ जल्दी से चाय ले आओ, जहां कल रात खाना खाया था न, वहीं पर नाश्ता भी लगा हुआ है ।” सर ने समझाया ।

“जी सर, ठीक है ।”

नाश्ते में आलू प्याज हरी मिर्च की पकौड़ी और सूजी का हलवा था । नाजमा ने जल्दी से एक प्लेट उठाई और उसमें खूब सारी पकौड़ी रख ली साथ ही हलवे को दो कटोरी में डाल कर पकौड़ी के ऊपर रखते हुए कहा, “शुभी तू चाय ले कर आ मैं कमरे में जा रही हूँ ।”

जब चाय लेकर शुभी कमरे में पहुंची तो उसने देखा कि सब लोग बड़े आराम से बैठे नाजमा की लाई हुई प्लेट से पकौड़ियाँ खा रहे हैं । शुभी ने अपने हलवे की कटोरी उठाकर अपने हाथ में पकड़ी और दो पकौड़ियाँ प्लेट से उठा ली । एक चाय का कप नाजमा को दिया और दूसरा खुद लेकर एक तरफ बैठ गयी।

“ओय शुभी, तू उधर अकेले क्यों बैठी है ? इधर आकर बैठ न ।” अंकित ने उसे टोंका ।

“नहीं भाई मैं इधर ही ठीक हूँ ।”

“अरे भाई मैं तेरा हलवा नहीं खा लूँगा, तू यहाँ सबके साथ ही आकर बैठ, उधर अकेले अच्छी नहीं लगती । क्या तू हम सबकी प्यारी बहन नहीं है ?” अंकित बड़े प्यार से बोला ।

“अरे मेरे भाई ऐसी बातें क्यों कर रहे हो, चलो मैं उधर ही आती हूँ ।” वो जैसे ही उठकर उधर जाकर बैठी तभी ऋषभ का फोन आ गया ।

“उफ़्फ़ यह तेरा फोन ! पहले देख है किसका ?” मनोज ने बुरा सा मुंह बनाया ।

“देख मनोज, मैं तेरी शिकायत सर से कर दूँगी, अगर तू मुझे परेशान करेगा ।” शुभी को आज उसके ऊपर बहुत तेज गुस्सा आया ।

“अरे तुम बुरा क्यों मानती हो ।”

वैसे भी ऋषभ का फोन देखकर दिल की धड़कन तेज हो गयी थी ऊपर से यह मनोज, इसे चैन नहीं है ।

“हैलो …कहते हुए वो वहाँ से उठकर बाहर आ गयी थी ।

“जी शुभी कैसी हो ?”

“मैं ठीक हूँ और आप ?”

“मैं भी बढ़िया हूँ लेकिन एक प्राबलम है यार !”

“क्या प्राबलम ?”

“मैं तेरा प्ले देखने नहीं आ पाऊँगा, दरअसल मुझे लगता है कि इन लोगों से ज्यादा पहचान नहीं बनानी चाहिए ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि यह लोग फिर मुझे तेरे भाई के रूप में ही जानने लगेंगे न।”

“हाँ यह तो है ! कल जब तुम कह रहे थे तब मुझे अच्छा नहीं लगा था।“

“हाँ यार कल कह तो दिया फिर मुझे भी बहुत बुरा लगा था।”

“ओहह।“

“सुनो, मैं अभी यही देहारादून में ही रुका हुआ हूँ जब प्ले खत्म हो जाये तो बता देना ?”

“ठीक है, मैं बता देती हूँ ।“

“और बताओ, अभी क्या कर रही हो ?” शायद बात को बढ़ाने के उद्देश्य से ऋषभ बोले ।

“मैं नाश्ता कर रही हूँ ।“

“ओके ओके ! तुम पहले नाश्ता कर लो, फिर बात करते हैं ।”

“जी मैं नाश्ता बाद में कर लूँगी ।”

“नहीं जाओ पहले नाश्ता कर लो ! मैं बाद में बात करता हूँ ।”

“जी ठीक, मैं फोन करती हूँ फ्री होकर ।“

“ओके बाय शुभी ! अपना ख्याल रखना ।”

“ओके जी बाइ !” कहकर उसने फोन काट दिया ।

यह ऋषभ भी न,, वो मन ही मन मुस्कुराई, कहाँ तो ऐसे चले गए थे जैसे मुझसे कोई रिश्ता ही नहीं रहा और अब ऐसे प्यार दिखा रहे हैं कि बस ...! कितना अच्छा लग रहा है यूं ऋषभ का लौटना ! कहते हैं कोई आपसे प्यार करे तो वो तमाम उम्र भूल नहीं सकता और अगर भूल जाये तो समझो उसने कभी आपसे प्यार किया ही नहीं ! सच में ऋषभ उसे प्यार करता था और सच्चा प्यार करता है ! दिल कोई राग गुनगुना उठा और मानों मन मुस्कुराने लगा ।

“बड़ा मुस्कुरा रही हो, किसका फोन था ?” हिना ने उसे बड़ी गहरी नजरों से देखते हुए टोंका ।

“किसी का नहीं बस यूं ही ।” उसके टोंकने से कोई फर्क नहीं पड़ा और शुभी के होंठों पर अभी भी मुस्कान थी । क्यों करूँ मैं किसी की परवाह, जब मुझे मुस्कुराने का मौका ईश्वर ने दिया है तो क्या मैं मुस्कुराऊँ भी न, हे ईश्वर ! बड़ी मुश्किल से मेरे होठों पर यह मुस्कान आई है इसे यूं ही बने रहने देना !

हे ईश्वर ! बड़े दिनों बाद खुशी की लहर आई है मेरे जीवन में, इसे कभी कम न होने देना और यह जो प्यार छलकाता हुआ सागर जो मेरे मन में उमड़ने घुमड़ने लगा है इसे कभी किसी की नजर मत लगने देना ! उसने अपनी आँखें बंद करके मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की ।

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Sushma Singh

Sushma Singh 4 months ago