मोतीबाई--(एक तवायफ़ माँ की कहानी)--भाग(७) in Hindi Women Focused by Saroj Verma books and stories Free | मोतीबाई--(एक तवायफ़ माँ की कहानी)--भाग(७)

मोतीबाई--(एक तवायफ़ माँ की कहानी)--भाग(७)

जमींदार प्रभातसिंह की बात सुनकर अजीजन बोली....
काश,आपकी तरह दुनिया का हर मर्द  हम औरतों की इज्जत करता होता तो दुनिया में औरतों की ये दशा ना होती,जमींदार साहब!
इस पुरूषसत्तात्मक दुनिया में ये सदियों से चला आ रहा है लेकिन औरतों का हौसला आज भी कायम है,जो एक जीव को धरती पर ला सकती है वो कुछ भी कर सकती है,बस करना नहीं चाहती क्योंकि उसकी ममता और उसके भीतर जो दया का भाव है वो उसे गलत काम करने से रोकता है,अगर औरत जैसी दया और ममता मर्दों में एक प्रतिशत भी आ जाए तो उस दिन ये दुनिया बदल जाएगी,जमींदार प्रभातसिंह बोलें।।
शायद सही कहते हैं आप,अजीजन बोली।।
चलिए फिर अब मैं चलता हूँ,बच्चे इन्तज़ार करते होगें,प्रभातसिंह बोले।।
जी,अच्छा!मोतीबाई बोली।।
ठीक है तो मोहतरमा!जब आप अपने नये ठिकाने पर पहुँच जाएं तो हमें ख़त लिखकर बता दीजिएगा,सगी बहन ना सही आप मेरे लिए लेकिन मैने तो आपको सगी से भी ज्यादा माना है,कभी कभी अपने इस भाई को याद फरमाइएगा,प्रभातसिंह बोले।।
और इतना सुनते ही महुआ ने उनके चरण स्पर्श करते हुए कहा....
आपने तो मेरा साथ सगें भाई से भी बढ़कर दिया है,मेरे मुश्किल हालात में आप हमेशा मेरे साथ खड़े रहें,आप हमेशा मेरे संरक्षक बनकर आएं,आपके चरण तो स्पर्श कर ही सकती हूँ,भाईसाहब!
तो ये वादा करो कि हर रक्षाबंधन पर मुझे राखी भेजोगी,प्रभातसिंह बोले।।
जी! हमेशा ! मरते दम तक,महुआ बोली।।
आप दोनों का ये भाई बहन का प्यार हमेशा कायम रहें मैं दुआँ करती हूँ,अजीजनबाई बोली।।

और इस तरह उस दिन प्रभातसिंह अजीजनबाई के कोठे से चले आए,जल्द ही अजीजनबाई ने घर और जमीन के नये कागजात बनवा दिए और महुआ ने सामान सहित अपना मकान बेंच दिया जिससे उसको उस मकान और सामान के अच्छे दाम मिले ,उन पैसों को उसने प्रभातसिंह की मदद से बैंक में जमा करवा दिया,उसने अपने सारे पुराने जेवर भी बेंच दिए सिवाय उन जड़ाऊ कंगनों के जो उसे उपेन्द्र ने दिए थे,वो कंगन उसने अपनी बहु के लिए रख लिए और पुराने जेवरों के जो दाम मिले उसने उन्हें अपनी दोनों बेटियों मे आधे आधे बाँटकर उनसे उन दोनों का बैंक में खाता खुलवा दिया लेकिन उसने अपनी मोटर नहीं बेंची।।
      ये सारे काम निपटाकर वो अपनी मोटर में बैठकर निकल पड़ी सोनपुर गाँव की ओर ,उसे उस गाँव में छोड़ने अजीजनबाई भी गई,फिर एक दो दिन ठहर कर अजीजनबाई वापस आ गई।।
  अब मोतीबाई उस अन्जाने से गाँव में और अन्जाने लोगों के बीच पहुँचकर कुछ असहज सा महसूस कर रही थी,लेकिन अब उसने धीरें धीरें अपने आस पड़ोस वाले से व्यवहार बना लिया और गाँव में उसने लोगों से अपनी जिन्द़गी के बारें में कुछ नहीं छुपाया,उसकी बात सुनकर गाँव के कुछ लोंगों ने तो उससे दूरियाँ बना लीं लेकिन अभी कुछ परिवार उससे हमदर्दी रखते थे।।
    गाँव में कुछ पढ़े लिखें लड़के थे जिनके पास नौकरियांँ नहीं थी,तब महुआ ने सोचा क्यों ना खेतों के कुछ भाग को स्कूल में परिवर्तित कर दिया जाए,जिससे बच्चे पढ़ भी सकेंगें और ये लड़के जिनके पास नौकरियांँ नहीं है वे भी फालतू नहीं बैठेगें और उसने अपना विचार गाँव के लोगों को बताया,कुछ लोगों को तो महुआ का सुझाव पसंद आया लेकिन कुछ ने उसका विरोध किया।।
   कुछ लोगों के विरोध के कारण महुआ अपने खेतों की जमीन पर स्कूल ना खुलवा सकीं,इसलिए मजदूर लगवा कर उस जमीन पर खेतीबाड़ी शुरू कर दी क्योंकि यही तो उसके पति उपेन्द्र का सपना था,इतना गेहूँ चना हो जाता कि उसे बेचना पड़ता और उन पैसों से उसने गाँव में एक प्याऊ बनवा दी,फिर एक धर्मशाला भी बनवायी धीरे धीरे उसने उस गाँव में एक विवाह घर भी बनवा दिया जहाँ उसने पानी के लिए दो कुँए भी खुदवा दिए,महुआ के इस काम को देखकर अब लोगों का मन महुआ की ओर से कुछ साफ हुआ।।
     अब महुआ से मिलने उसकी बेटियाँ और बेटे घर आने लगें थें,जब भी सबकी छुट्टियाँ होतीं तो सारा परिवार हँसी खुशी एक साथ समय बिताता,अब महुआ को अपनी ये सुकून भरी जिंदगी भाने लगी थी,कभी कभी वो सोचती कि कैसे कैसे हालातों को पार करके वो जिन्द़गी के इस मुकाम तक पहुँची है,इस जिन्द़गी के सपने उसने कितनी बार देखें लेकिन हर बार टूटे,अब जाकर उसका ये सपना सच हो रहा है।।
    इधर उसके बच्चे भी अब बड़े और समझदार होते जा रहे थे वें भी अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझने लगें थे,वो जब भी घर आते तो अपनी माँ का पूरा ख्याल रखतें,बच्चों के बड़े होने से महुआ को बहुत आराम हो गया था,क्योंकि उसके बच्चे उसे बहुत अच्छी तरह समझने लगें थे।।
    इधर प्रभातसिंह के दोनों  बच्चों की भी पढ़ाई खतम हो चुकी थी,बेटी एक स्कूल में अध्यापिका हो गई थी,प्रभातसिंह ने एक अच्छा सा वकील लड़का देखकर उसकी शादी कर दी,इधर उसका बेटा भी विलायत से डाक्टरी पढ़कर आ गया था,उसने भी एक सभ्य परिवार की पढ़ी लिखी लड़की देखकर प्रभातसिंह की रजामंदी से विवाह कर लिया,
      लेकिन महुआ,प्रभातसिंह की दोनों बच्चों की शादी में ना गई उसने प्रभातसिंह से ये कहा कि  वो शादी में आई और अगर किसी ने उसे पहचानकर उसके अतीत को कुरेदा तो उसे ये अच्छा नहीं लगेगा फिर आपके यहाँ भी चार रिश्तेदार जुड़ेगें,कुछ ऊँच नीच हो गई तो मैं अपने आपको जिन्द़गी भर माँफ नहीं कर पाऊँगीं,लेकिन उसने अपने बच्चों को शादी में जरूर भेजा।।
  बेटी ब्याहकर अपने ससुराल चली गई थी और डाक्टर बेटे की पोस्टिंग बैंगलोर के किसी अस्पताल में हो गई थी इसलिए प्रभातसिंह का बेटा अपनी पत्नी के संग बैंगलोर चला गया,अब इतनी बड़ी हवेली में अकेले प्रभातसिंह का जी घबराता था,इसलिए उसने सोचा कि मैं उस शहर चला जाता हूँ जहाँ पलाश बोर्डिंग स्कूल के बाद अपनी आगें की पढ़ाई काँलेज में कर रहा है और इसने इस बात के लिए महुआ से पूछा....
महुआ ने ख़त लिखकर कहा कि इससे अच्छा और क्या हो सकता है जो आप मेरे पलाश के संरक्षक बनकर उस शहर में रहकर उसके ऊपर निगरानी रख सकतें हैं और प्रभातसिंह ने महुआ की बात मान ली,वें जल्दी से पलाश के शहर में आकर रहने लगें।।
     सबका जीवन ऐसे ही बीत रहा था,महुआ के तीनों बच्चे भी उसके पास नहीं थे तभी गाँव में हैजा फैला,एक एक दिन में परिवार के लगभग दो तीन सदस्य जाने लगें,महुआ जी जान से गाँव के लोगों की सेवा में जुट गई,उसने अपने ही घर के पास अपने ही पैसों से सभी गाँव वालों के लिए खाने की ब्यवस्था करवाई,
          जहाँ खाना बनाने के लिए उसने दो तीन महाराज और दो तीन महिलाओं को लगवा दिया,गाँव के बीमार घरों में वो दोनों समय का खाना बँटवाती,उसने शहर से हैजे की दवाइयां भी मँगवाई और हर दो दिन में शहर के डाक्टर को अपनी मोटर भिजवाकर गाँव के बीमार लोगों के इलाज के लिए बुलवा लेती,
उसकी इस हिम्मत से प्रभावित होकर गाँव के और लोंग भी उसका साथ देने लगें,उसके अच्छे कामों को लोगों ने अपना लिया और उसके बुरे अतीत को लोगों ने भुलाकर उसे इज्जत बख्शी ,जैसा कि वो चाहती थी ।।
     अब गाँव में लोंग उसे सम्मान की नजरों से देखते,अब उन सबकी नजरों में वो एक महान ममतामयी और दयालु महिला थी,अब महुआ को सबलोग पसंद करने लगें थे।
    इधर एक दिन महुआ के पास ख़बर आई कि अजीजनबाई सीढ़ियाँ चढ़ रही थीं,बुढ़ापे का शरीर सम्भाल ना पाई और सीढ़ियों से गिर पड़ी,अस्पताल ले जाते वक्त उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया,ये सुनकर महुआ को कुछ सदमा सा लगा,उसे लगा कि जैसे माँ का हाथ उसके सिर से उठ गया हो,उसने सोचा अभी पिछले महीने ही तो मिलने गई थी उससे,कितनी ममता से उसने सिर पर हाथ फेरा था और कुछ गहनें देते हुए बोली थी कि....
रख लें इन्हें क्या पता तेरे बच्चों की शादी में ना पाऊँ? तो अपनी नानी की तरफ से ये सब बच्चों को दे देना,मुझे लगेगा कि मैं अभागी नहीं हूँ,मेरी भी बेटी है और नाती-नातिनें भी हैं।।
उसकी ये बातें सुनकर महुआ का दिल भर आया था और आते समय अपने आँसू नहीं रोक पाई,उसे क्या पता था कि वो अजीजन से आखिरी बार मिल रही है,लेकिन क्या करें समय के आगें सब मजबूर हो जाते हैं,इस तरह अजीजनबाई भी एक दिन महुआ को छोडकर चली गई।।
  समय यूँ ही बीतता रहा ,महुआ की दोनों बेटियों की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और उन दोनों को अपनी मेहनत के बलबूते पर नौकरियाँ भी मिल गईं,मिट्ठू को उसी संगीत कला केन्द्र में नौकरी मिल गई,जिसमें वो पढ़ती थी और रिमझिम ने अपनी माँ का सपना पूरा किया उसने गाँव आकर अपनी माँ की जमीन पर ही एक स्कूल खोल लिया,साथ में शाम को वो गाँव की लड़कियों को संगीत सिखाने लगी।।
  
अपने बच्चों को हँसता खेलता और कामयाब देख वो खुशी से फूली ना समाती,सब बच्चे अपनी अपनी जगह स्थिर हो गए थे,तभी एक दिन रिमझिम ने आकर महुआ से कहा कि वो किसी से प्यार करती है और उससे ही शादी करना चाहती है।।
महुआ ने रिमझिम से पूछा कि वो कौन है?
रिमझिम बोली....
उसके साथ ही काँलेज में पढ़ता था,बस अपनी नौकरी लगने का इन्तज़ार कर रहा था,वो अब स्टेशन मास्टर हो गया है इसलिए अब मुझसे शादी करना चाहता है लेकिन माँ वो अनाथ है।।
इतना अच्छा लड़का मिल रहा था महुआ को,भला उसे इस शादी से क्या एतराज़ हो सकता था,लेकिन एक ही अड़चन थी कि अगर रिमझिम शादी करके चली गई तो स्कूल कौन चलाएगा?
लेकिन इस समस्या का समाधान भी जल्द ही हो गया,ये जिम्मेदारी गाँव के पढ़े लिखें कुछ लड़को ने ले ली क्योंकि अब उन सबको महुआ पर भरोसा हो गया था।।
इस तरह गाँव वालों ने महुआ का सहयोग किया,सबने मिलकर रिमझिम की शादी खूब धूमधाम से की,प्रभातसिंह भी मामा का कर्तव्य निभाने आए,उन्होंने ब्याह का सारा काम देखा,उनके आने पर महुआ को बहुत सहारा हो गया था,
अब रिमझिम भी अपने घर चली गई थी,महुआ एक बार फिर से अकेली हो गई,लेकिन उसने मन को फिर काम में लगा लिया और गाँव वालों की सेवा मे लग गई,इस तरह एक दिन प्रभातसिंह का ख़त आया कि उनकी नज़र में एक बहुत अच्छा लड़का है ,काँलेज में प्रोफेसर है अगर हम मिट्ठू का ब्याह उस लड़के से कर दें तो,
           मैं उस लड़के की फोटो भी भेज रहा हूँ,परिवार से मैं मिल चुका हूँ,पढ़ा लिखा परिवार है और मैने तुम्हारे अतीत के बारें में भी उनसे सब बता दिया है,उन्हें बस पढ़ी लिखी लड़की चाहिए और उन्हें किसी बात से कोई मतलब नहीं है,प्रभातसिंह का खत पढ़कर महुआ ने हाँ बोल दी और कुछ ही दिनों में रिश्ता भी पक्का हो गया.....
लेकिन अब तक पलाश को महुआ के अतीत के बारें में कुछ भी पता नहीं था और महुआ ने प्रभातसिंह और दोनों बेटियों से भी ये बात बताने को मना कर रखा था।।
    महुआ ने अपनी ये जिम्मेदारी भी बखूबी निभा दी ,मिट्ठू का ब्याह भी निपट गया और फिर महुआ ने सोचा कि कुछ दिन हरिद्वार में बिताकर आऊँ और महुआ हरिद्वार आ गई,कुछ दिन उसने हरिद्वार में अकेले एकदम शान्ति से बिताएँ फिर गाँव वापस आ गई.....
   उसकी दो जिम्मेदारियाँ निपट चुकीं थीं,अब केवल पलाश बचा था,काँलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद पलाश दो साल के लिए कोई कोर्स करने विलायत चला गया।।

क्रमशः.....
सरोज वर्मा.....
  


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