सुहाग, सिन्दूर और प्रेम - भाग(२) in Hindi Love Stories by Saroj Verma books and stories Free | सुहाग, सिन्दूर और प्रेम - भाग(२)

सुहाग, सिन्दूर और प्रेम - भाग(२)

सरगम अपने माँ के मामाजी रघुवरदयाल जी के साथ उनके घर पहुँची तो उसको देखते  उनकी पत्नी संतोषी का मुँह बन गया  और वो रघुवरदयाल जी से बोलीं.....
    बड़ी मुश्किलों से तो अनाथ माँ से पीछा छूटा था,अब उसकी अनाथ बेटी को भी उठा लाए,तुमने क्या अनाथों को पालने का ठेका ले रखा है...
  चुप रहो!कुछ तो सोच समझकर बोला करो,किसके भरोसे अनाथ लड़की को छोड़ देता,कुछ भी हो चाहे दूर की ही सही,है तो अपने रिश्तेदार ही की बेटी,ऊपर से कन्या  और फिर इन्सानियत के नाते ही कुछ सोच लिया करो,भगवान को क्या मुँह दिखाओगी अगर इतना पाप करोगी तो? रघुवरदयाल जी बोले।।
    जिन्द़गी भर माँ को रखा और अब बेटी को भी खिलाएं,पढ़ाएँ और फिर ब्याह का भी खर्चा उठाएं,संतोषी बोली।।
  तुम्हारा नाम संतोषी किसने रखा क्योंकि तुम्हारे नाम के अनुसार तुम्हारी प्रकृति नहीं है,कभी किसी की भलाई के बारें मे भी सोच लिया करो,कुछ तो संतोष रखा करो,जब मरोगी तो क्या ये धन दौलत सिर पर लाद कर ले जाओगी? कुछ नहीं जाता संग ,सब यही का यही धरा रह जाता है,रघुवरदयाल जी बोले।।
   तो तुम क्या चाहते हो? सब कुछ दान कर दूँ और सड़क पर भीख माँगने लगूँ,संतोषी बोली।।
  मैने ऐसा तो नहीं कहा,रघुवरदयाल जी बोले।।
  तुम्हारे कहने का मतलब तो यही था,संतोषी बोली।।
  तुम्हें समझाना बहुत मुश्किल है,मैं हार चुका हूँ तुमसे,ना जाने कब पीछा छूटेगा तुमसे,रघुवरदयाल जी बोले।।
  तो मार क्यों नहीं डालते मुझे? रोज रोज की झंझट ही खतम हो जाएगी,संतोषी बोली।।
  यही तो कर नहीं सकता,मुझे अपने कर्म नहीं बिगाड़ने,रघुवरदयाल जी बोले।।
तो तुम अपनी जिद़ नहीं छोड़ोगें,संतोषी बोली।।
   कभी नहीं,ये बच्ची मेरे घर में ही रहेंगी,रघुवरदयाल जी बोले।।
तो तुम भी कान खोलकर सुन लो,मैं इसे बना बनाकर नहीं खिलाऊँगी,संतोषी बोली।।
ठीक है तो मत खिलाओ,मैं इसे लेकर खेत वाली कोठरी पर पड़ा रहूँगा,मैं इसे बनाकर खिलाऊँगा,रघुवरदयाल जी बोले।।
  तुम्हें शरम नहीं आती,जब मेरी तीनों बेटियाँ इस घर में रहतीं थीं तो इसकी माँ उनका हिस्सा बँटा लेती थी ,अब ये मेरी पोती का हिस्सा बँटाने आ गई,संतोषी बोली।।
कोई किसी का हिस्सा नहीं बँटाता सब अपने अपने भाग्य का खाते हैं,रघुवरदयाल जी बोले।।
  तुम्हें जो दिखे सो करो  और इतना कहकर संतोषी भीतर चली गई और रघुवरदयाल जी सरगम को लेकर खेत वाली कच्ची कोठरिया में रहने चले गए।।
     संतोषी भीतर पहुँची तो उसका बड़बड़ाना चालू रहा,उसका बड़बड़ाना देखकर उसकी बहु कनकलता ने पूछा....
   अम्मा! क्या बात है? किस पर इतना गुस्सा हो रही हो?
  अब तू ही बता सालों पहले अनाथ प्रतिमा को मैने इस घर में रहने दिया,वो तो मैं जैसे तैसे सह गई,लेकिन अब उसकी अनाथ बेटी को भी तेरे बाबूजी घर उठा लाए,संतोषी बोली।।
  अच्छा !तो ये बात है,कनकलता बोली।।
हाँ! जे ही बात है अब तेरी कालिन्दी सयानी हो रही है उसका ब्याह करना है,कब तक अनाथों को पालते रहेंगें, मैने कह दिया तो मुँह फुलाकर खेत वाली कोठरिया मे रहने चले गए उस लड़की के साथ, संतोषी बोली।।
   लेकिन अम्मा! तुम्ही ही बताओ,अगर बाबूजी खेत वाली कोठरिया में रहेंगें तो चार लोंग क्या कहेगें? अच्छा नहीं लगता,उन्हें बुलवा लो अम्मा! पड़ी रहेगी वो लड़की एक कोने में,इत्ता बड़ा तो घर है उससे काम करवाऐगें ना! मुफ्त में थोड़े ही देगें रोटी,कनकलता बोली।।
   मेरी मोटी बुद्धि में तो ये बात घुसी ही नहीं,बेकार ही जाने दिया तेरे बाबूजी को,संतोषी बोली।।
  कोई बात नहीं अम्मा! ये आए जा रहे हैं तो इनको भेज देना बाबूजी को लाने और कहना कि वो लड़की इस घर में रह सकती है,कनकलता बोली।।
  हाँ! यही सही रहेगा,दिनेश को आ जाने दे,वो ले आएगा तुम्हारे बाबूजी को,संतोषी बोली।।
   लो अम्मा! हो गई ना समस्या हल ,तुम फालतू परेशान हो रहीं थीं,कनकलता बोली।।
  हाँ! बहुरिया! तुम सही कहती हो,संतोषी बोली।।
    और फिर जब दिनेश घर लौटा तो संतोषी ने फौरन ही उसे रघुवरदयाल जी को लाने भेज दिया, रघुवरदयाल जी सरगम के साथ घर आ गए,संतोषी ने कनकलता को समझा दिया कि भला इसे बचा खुचा बासी खाना ही मिले,मिठाइयाँ और घी की तो ये लड़की शकल भी ना देख पाएं,जब ये काम कर ले तभी इसे खाने को दो,महारानी नहीं है कहीं की,
      सास की सभी हिदायतों पर कनकलता ने हाँ की मुहर लगा दी लेकिन वो सास के बताएं हुए रास्तों पर ना चलती,उसे लगता कि जैसे उसके लिए उसकी बेटी कालिन्दी है,वैसे ही ये भी,बेचारी अनाथ है,किसी का क्या बिगाड़ सकती है,बिगड़ तो सबकुछ इसका गया है।।
    लेकिन जब सास सामने होती तो वो उससे मजबूरी में काम करवा लेती और सास के इधर उधर होते ही सारा काम खुद कर लेती,सास की नजरो से बचाकर उसे छुपछुप कर बढ़िया बढ़िया चींजें खिलाती,सरगम भी मामी को चाहने लगी थी,संतोषी से छुपछुपाकर कनकलता कभी कभी सरगम के बालों में तेल लगाती उसके बाल बनाती,उसके सिर पर ममता भरा हाथ फेर देती।।
    लेकिन वो संतोषी के सामने कभी भी जाहिर ना होने देती कि वो सरगम को चाहती है,सरगम के दिनेश मामा भी उसके लिए कपड़े ला देते ,उसकी जरूरत का सामान ला देते।।
    दिनेश ये भी सोचा कि कालिन्दी की तरह सरगम  भी फिर से स्कूल जाना शुरू कर दे लेकिन संतोषी इस बात के लिए कतई राज़ी ना हुई,इसलिए सरगम आठवीं के बाद आगें बढ़ ही नहीं पाई,लेकिन वो कमलेश्वर को तो जैसे भूल सी गई थी।।
     
    और इधर कमलेश्वर के मन में अभी भी सरगम की यादें जिन्दा थीं,वो उसकी तस्वीर लेकर उसके सामने खड़े होकर घण्टों बात करता,सरगम के जाने के बाद उसने खेलना कूदना काफी कम कर दिया था,जब उसकी माँ कहती या परिवार का कोई सदस्य उसे बाहर जाकर खेलने को कहता तभी वो बाहर जाता,ऐसा लगता था कि जैसे उसका बचपना सरगम के साथ ही चला गया हो,उसे अपनी जिन्द़गी  रूखी सी लगने लगी थी।।
    बस वो जी रहा था,लेकिन पढ़ाई पर वो अब भी ध्यान दे रहा था और स्टेशन पर जाकर घंटों बेंच पर बैठकर रेलगाड़ियों को आता जाता देखता रहता,उसे अब भी आशा थी कि एक ना एक दिन सरगम जरूर लौटेंगीं।।
   
समय यूँ ही बीतता जा रहा था,कालिन्दी ने अब बारहवीं पास कर ली थी और वो अठारह साल की हो चुकी थी,अब संतोषी को कालिन्दी के ब्याह की फिक्र सताने लगी,इधर सरगम कालिन्दी से छोटी थी वो अब सोलहवीं मेँ लग चुकी थी।।
    रघुवरदयाल जी ने अब कालिन्दी के लिए रिश्ता ढूढ़ना शुरू कर दिया और उन्हें एक बहुत अच्छा रिश्ता भी मिल गया,रघुवरदयाल और दिनेश लड़के वालों के घर जाकर सबकुछ देख भी आएं थे,उन्हें लड़का और परिवार दोनों जँच गए।।
    इधर सरगम अभी भी अल्हड़ थी,छोटे बच्चों की तरह हरकतें करती,घर के कामों से फुरसत हो जाती तो पेड़ो पर चढ़कर कहीं आम तोड़ने भाग जाती तो कहीं अमरूद और रोज ना रोज किसी ना किसी से झगड़ा मोल लेकर आती,जब संतोषी को उलाहना मिलता तो वो उसके खून की प्यासी हो जाती और रघुवरदयाल जी से  कहती....
  देखों,मैने कहा था ना! कि इस लड़की को मत रखो,दिनभर आवारा की तरह घूमती है,ना काम की ना काज की,बस मुफ्त का खाने को दे दो।।
     नानी! उसने पहले से मेरे बाल घसीटे थे तो मैने भी गाल पर थप्पड़ धर दिया....सरगम बोली।।
  देखो तो कितना बोलती है,गलती भी की और ऊपर से चिल्ला भी रही है,इतनी बड़ी हो गई है,ऐसा नहीं की घर में रहें,शरीफ़ लड़कियों की तरह, बस दिन भर इससे झगड़ा उससे झगड़ा,इसके सिवाय इसको कुछ नही आता,संतोषी बोली।।
   अच्छा! सरगम बेटा! पूरी बात बताओ,रघुवरदयाल जी ने पूछा।।
नाना जी! उस माधव ने मेरे सारे अमरूद छीन लिए,मैने बड़ी मेहनत से तोड़े थे,मैने उसे मना किया तो उसने मेरे बाल पकड़ कर खीच दिए,तो क्या मैं चुपचाप रहती? सो मैने भी थप्पड़ धर दिया,वो सह नहीं पाया तो मैं क्या करूँ? और वो रोता हुआ अपने घर चला गया,घर जाकर माँ से शिकायत की होगी तो उसकी माँ दनदनाते हुए नानी के पास आ गई उलाहना लेके,सरगम बोली।।
  सरगम की बात सुनकर रघुवरदयाल जी हँस पड़े....
  रघुवरदयाल जी का हँसना देखकर संतोषी चिढ़ते हुए बोली....
  और चढ़ाओ खोपड़ी पर,अगर ऐसी ही हरकतें रही तो कल को ब्याह होना मुश्किल हो जाएगा,फिर जिन्द़गी पर मेरी छाती पर मूँग दलती रह़ेगी।।
  अरी! भाग्यवान ! बच्ची है! आ जाएगी समझ,रघुवरदयाल जी बोले....
   मुझे क्या लेना देना?जब ब्याह नही होगा तो तुम्ही ही कहोगे,इतना कहकर संतोषी भीतर चली गई।।
  तब रघुवरदयाल जी सरगम से बोले....
   जाओ! बिटिया! तुम भी भीतर जाकर जरा अपना हुलिया ठीक कर लो।।
जी! नाना जी! अभी जाती हूँ,ऐसा कहकर सरगम भीतर चली गई।।
      ऐसा अक्सर होता ही रहता था सरगम के साथ,किसी से लड़ाई ,किसी से झगड़ा,किसी से मार-कुटाई,संतोषी आकर रघुवरदयाल जी से शिकायत करती तो वो ज्यादा ध्यान नहीं देते, उन्हें अब इन सबकी आदत जो पड़ चुकी थी।।
      अब कुछ दिनों बाद कालिन्दी को वो परिवार और लड़का देखने आया,कालिन्दी उन सबको पसंद आ गई और दो चार महीनों के बीच में ब्याह भी पक्का हो गया,जेठ मास में ब्याह होना तय हुआ,जोर शोर से सब ब्याह की तैयारियों में लग गए।।
    जब ब्याह के पन्द्रह दिन रह गए तो रिश्तेदार भी आने शुरू हो गए,बहुत सालों बाद घर में ब्याह का अवसर आया था,रघुवरदयाल जी की सबसे छोटी बेटी के ब्याह के बाद ,तो वो किसी भी रिश्तेदार को न्यौता देना ना भूले ,उन्होंने अपने पुराने मित्रों को भी न्यौता दिया।।
   फिर एक रोज़ कालिन्दी दोपहर के समय किसी आम के पेड़ पर चढ़कर आम तोड़ रही थी,उसके हाथ मे दो चार आम थे,तभी उसके हाथ से एक आम छूटकर पेड़ के नीचे से गुजर रहें बुजुर्ग को जा लगा...
     उन्होंने अपना सिर उठाकर ऊपर देखा तो वहाँ सरगम थी उन्होंने कहा.....
  ऐ...लड़की नीचे उतर,
  नहीं आती! क्या कर लोगे? सरगम बोली।।
   बड़ो से ऐसे बात करना सिखाया है तेरे माँ बाप ने,बुजुर्ग बोले।।
   मेरे तो माँ बाप ही नहीं हैं,सरगम बोली।।
   सच कहती हो,बुजुर्ग ने पूछा।।
  जी! बिल्कुल सच! मैं झूठ नहीं बोलती,सरगम बोली।।
  अच्छा! नीचे आ जा बिटिया! मैं कुछ नहीं कहूँगा,बुजुर्ग बोले....
  ठीक है! आती हूँ नीचे,डाँटना मत,सरगम बोली।।
   नहीं डाँटूगा बिटिया,आ तो,बुजुर्ग बोले।।
   और सरगम पेड़ से नीचे उतर आई.....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....


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