सुहाग, सिन्दूर और प्रेम - भाग(८) in Hindi Love Stories by Saroj Verma books and stories Free | सुहाग, सिन्दूर और प्रेम - भाग(८)

सुहाग, सिन्दूर और प्रेम - भाग(८)

कमलेश्वर उन सबके पीछे चल रहा था सरगम ने गौर तो किया लेकिन उस अन्जान शख्स को टोका नहीं,उसने सोचा वैसे भी बड़ी मुश्किल से खुद को सम्भाल पा रही हूँ फिर से एक नया बखेड़ा खड़ा हो जाएगा....
   कमलेश्वर ने उन सबका घर तक पीछा किया और जब घर देख लिया तो चुपचाप अपने घर की ओर बढ़ गया,लेकिन उसने सरगम का चेहरा ठीक से देख लिया था,उसके बचपन वाली सरगम और इस वाली सरगम में उसे काफी अन्तर दिखाई दे रहा था,फिर उसने मन में सोचा कि हो सकता है समय के साथ साथ इन्सान के नैंन-नक्श और हाव-भाव बदल जाते हैं,शायद सरगम के भी बदल गए हों।।
    वो चुपचाप अपने कमरें आ गया,कमरा ही कहेंगें क्योंकि अभी वहाँ ना कोई सामान था और ना ही कोई गृहस्थी,कुछ देर बिस्तर पर बैठा।
    उसने अभी तक नाश्ता भी तो नहीं किया था,इसलिए उसे भूख महसूस हुई तो बाहर चला गया नाश्ता करने,नाश्ता करके आया तो वो फिर से मन्दिर वाली सरगम के बारें में सोचने लगा और उसके बारें में सोचते वो कब सो गया उसे पता ही नहीं चला।।
    जब तक वो उठा तो शाम हो चुकी थी,उसे अब चाय पीने की इच्छा हो रही थी लेकिन घर पर तो सामान ही नहीं,इसलिए वो बिस्तर पर लेटा ही रहा और कुछ  सोचता रहा,फिर उसे याद आया कि उसने अभी तक  बाबूजी को चिट्ठी भी नहीं लिखी है कि वो सकुशल पहुँच गया,फिर उसने सोचा कि चलो फुरसत बैठा हूँ तो लिख ही देता हूँ और कल आँफिस जाते वक्त पोस्ट कर दूँगा।।
    चिट्ठी लिखते लिखते अँधेरा घिर आया तो कमलेश्वर ने सोचा कि खाना ही खा आता हूँ और वो खाना खाने  बाहर चला गया,संडे का दिन था तो बाहर काफी रौनक थी,उसे चाट की दुकान दिखी तो  गोलगप्पे  खाने का मन हो आया,वो दुकान पर पहुँचा तो उसे सरगम दिखी वो भी बच्चों और बुआ को लेकर बाहर निकली थी,बच्चे आलू टिक्की खाने की जिद़ कर रहे थे आज,
   उसने दोनों बच्चों के लिए आलू टिक्की ले ली और बुआ से भी पूछा कि आप क्या खाएंगीं?
  बुआ बोली...
   ये हर्षित पूरी टिक्की नहीं खा पाएगा,छोड़ देगा तो इसी में से खा लूँगीं और फिर खाना भी तो बन गया,फिर खाना बचा रहेगा,तू खा ले।।
  मेरा भी मन नहीं है,मैं तो इन बच्चों की वजह से बाहर निकल आई नहीं तो संडे के दिन बाहर निकलना तो मुझे झंझट भरा काम लगता है,सरगम बोली।।
   कमलेश्वर पास में खड़े होकर दोनों की बातें सुन रहा था,अब कमलेश्वर उनके सामने आकर सरगम को देखने की फिर से कोशिश करने लगा तो सरगम उसके तरफ अपनी पीठ घुमाकर खड़ी हो गई,कमलेश्वर ने सरगम का ये व्यवहार देखा तो वो चुपचाप जाकर गोलगप्पे खाने लगा।।
    सरगम वहाँ से बच्चों को और बुआ को लेकर वापस आ गई,फिर कमलेश्वर ने भी होटल में जाकर खाना खा लिया और घर आकर आराम करने लगा।।
    दूसरे दिन कमलेश्वर तैयार होकर पहले डाकखाने गया,घर के लिए चिट्ठी पोस्ट की फिर आँफिस आ गया,दोपहर के समय वो खाना खाने आँफिस की कैन्टीन में पहुँचा,उसकी नज़र एकाएक सरगम पर पड़ी वो अपने टिफिन से टेबल पर बैठकर  खाना खा रही थी,कमलेश्वर ने भी कैंटीन के किचन एरिया से अपनी थाली लगवाई और सरगम की टेबल पर आकर बैठ गया,उसे बैठता देखकर सरगम ने अपना खाना अधूरा ही छोड़ दिया टिफिन बंद किया और टेबल से उठकर चली गई।।
    और कमलेश्वर उसे जाता हुइ देखता रहा,उसने सोचा वो जितने बार भी ये जानने की कोशिश करता कि ये वही बचपन वाली सरगम है तो उतने ही बार सरगम उससे मुँह मोड़कर चली जाती।।
      इसी तरह जब भी सरगम ,कमलेश्वर के सामने पड़ती तो वो दूसरी ओर मुँह घुमाकर चल देती और कमलेश्वर बेचारा मन मसोस कर रह जाता,वो बस यही तो जानना चाहता है कि वो सरगम उसके बचपन वाली ही सरगम है या नहीं।।
     इसी तरह काफी दिन बीत गए लेकिन कमलेश्वर ये पता नहीं लगा पाया सरगम के बारें में कि वो कौन सी सरगम है?फिर एक रोज दोपहर के समय सरगम खाना खाने के बाद आँफिस की बाँलकनी में अकेली खड़ी थी और बाहर की ओर देख रही थी,तभी कमलेश्वर भी उसके पास खड़ा हो गया और जैसे ही कमलेश्वर ने कहा जरा सुनिए तो.....
      तो सरगम ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ कमलेश्वर के गाल पर रसीद दिया और वहाँ से चली गई,कमलेश्वर अपना गाल सहलाते हुए सरगम को जाता हुआ देखता रह गया।।
      उस दिन कमलेश्वर का पूरा दिन खराब निकला,अनमने मन से घर पहुँचा,दरवाजे खोलते ही देखा तो एक चिट्ठी नीचे पड़ी थी,शायद पोस्टमैन डाल गया होगा,लेकिन इतनी जल्दी चिट्ठी का जवाब आ गया ,भाई बड़ी फास्ट सर्विस हो गई है डाकखाने की ,अभी सुबह ही तो घर डाक भेजी थी,तब कमलेश्वर ने चिट्ठी उठाकर देखी तो उस पर संयम का नाम लिखा था।।
     उसने अपनी पड़ोसन वसुधा से संयम के बारें में पूछा तो वसुधा बोली....
  हाँ! आप से पहले वो इस घर में रहते थे,उनके गाँव से ये चिट्ठी आई होगी,अब वो तो इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनका परिवार इसी काँलोनी में रहता है,मैं आपको मकान नम्बर बता देती हूँ,आप चिट्ठी उन तक पहुँचा दीजिए,हो सकता है कि चिट्ठी बहुत जरूरी हो,इसलिए आप इसी वक्त चिट्ठी दे आएंगें तो अच्छा होगा और उन लोंगों से कहिएगा कि अपना नया एड्रेस सबको बता दें नहीं तो उनकी  चिट्ठियाँ आपके पते पर ही आतीं रहेंगी।।
   जी! भाभी जी! शायद आप ठीक कहतीं हैं और इतना कहकर कमलेश्वर ने पता पूछा और सही जगह चिट्ठी पहुँचाने चल पड़ा।।
     वसुधा के बताएं हुए पते पर कमलेश्वर पहुँचा तो देखा कि ये तो वही घर है जहाँ उस दिन मन्दिर वाली सरगम भीतर गई थी,इसका मतलब है ये सरगम का घर है,उसने दरवाजे पर पहुँचकर डरते हुए डोरवेल बजाई और अपने दोनों गालों पर हाथ रख लिए कि कहीं फिर से थप्पड़ ना पड़ जाएं ...
दयमंती बुआ ने दरवाजा खोला और पूछा....
  जी कहिए! क्या काम है?
कमलेश्वर ने चिट्ठी दिखाते हुए कहा,
जी! ये शायद आपकी चिट्ठी है,मेरे पते पर आ गई थी,शायद पहले आपलोंग उस घर में रहते थे,कमलेश्वर के इतना कहते ही पीछे से सरगम ने दयमंती है पूछा...
कौन आया है बुआ जी?
तू ही आकर देख लें, दयमंती बोली।।
दयमंती बुआ की बात सुनकर सरगम दरवाजे पर आई और उसने जैसे कमलेश्वर को देखा तो भड़क गई और कमलेश्वर से बोली....
     ये कहाँ की शराफत है?क्यों मेरा पीछा कर रहे हो? आखिर तुम चाहते क्या हो? ये क्या नौटंकी लगा रखी है? अभी आँफिस में कम्पलेन कर दूँगी तो नौकरी से हाथ धो बैठोगे,समझे बच्चू!
जी! मैं तो बस ये चिट्ठी देने आया था,जो मेरे पते पर आ गई थी,शायद आप पहले उसी घर में रहतीं थीं, कमलेश्वर बोला।।
  ठीक है तो लाइए चिट्ठी और मुझे दे दीजिए,सरगम बोली।।
  जी! आपसे कुछ और भी पूछना था,कसम खाकर कहता हूंँ कि अगर मेरे सवाल का जवाब मुझे मिल जाएगा तो आगे से फिर मैं कभी भी आपका पीछा नहीं करूंँगा, कमलेश्वर बोला।।
जी! पूछिए क्या पूछना चाहते हैं? सरगम बोली।।
आप ये निशान पहचानतीं हैं कमलेश्वर ने अपना हाथ आगे करते हुए कहा....
सरगम ने अपने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा....
तुम कमल हो!ये तो बचपन में मैंने ही तुम्हारे हाथ पर दांत गड़ाए थे,ये सबकुछ तुमने पहले क्यों नहीं कहा?ऊपर से आज मुझसे पिट भी गए।।
तो तुम्हें मैं आज भी याद हूँ,मैं तो समझा कि तुम मुझे भूल गईं,कमलेश्वर बोला।।
बचपन के दोस्त आसानी से नहीं भुलाए जाते,सरगम बोली।।
  सरगम! तूने इन पर हाथ उठाया, दयमंती बुआ बोली।।
मुझे लगा कोई लफंगा है जो मेरा पीछा कर रहा है, गुस्सा आ गया तो धर दिया गाल पर झापड़, मुझे क्या मालूम कि ये कमल है,तो ये पहले नहीं बता सकता था,इसके मुंँह में दही जमा था क्या?सरगम बोली।।
अब आ ही गया है तो अंदर बुला लें बेचारे को और कितना हैरान करेगी,आओ बेटा तुम भीतर आओ,खाना तैयार हो रहा है अब खाना खाकर ही जाना,इसे तो अकल ही नहीं है,बताओ तो लड़के को झापड़ जड़ दिया, दयमंती बुआ बोलीं।।
तो और क्या करती? लगातार पीछा करें जा रहा था,पहले बता देता कि मैं कमल हूंँ तो मैं ऐसा क्यों करती भला? मुझे सपना थोड़े ही आ रहा था कि ये कमल है और इसकी तो बचपन से ही आदत थी मुझे परेशान करने की,सरगम बोली।।
तुमने बताने का मौका ही कहाँ दिया,हमेशा मुँह मोड़कर चली जाती थी,मैं परेशान करता था तुम्हें या तुम मुझे परेशान करती थी,झूठी कहीं की,बुआ जी! ये जब देखो तब मुझे मार देती थी,बस लड़ती ही रहती,आपने भी देखा ना मेरे हाथ में इसके काटने का निशान है, कमलेश्वर बोला।।
  अच्छा! दोनों झगड़ों मत,इतने सालों बाद मिले हो तो दो घड़ी ठीक से बात कर लो, दयमंती बुआ बोलीं।।
आप सही कहतीं है बुआ जी,जब देखो तब ये ही मुझसे लड़ती रहती है, कमलेश्वर बोला।।
हां! मुझ में कांटे लगे हैं ना!,सरगम बोली।।
तू सुनती क्यों नहीं है? अभी भी लड़के से बहस किए जा रही है,तू इससे बातें कर,ला खाना मैं बनाए ले रही हूं, दयमंती बुआ बोलीं।।
ना..ना..बुआ जी!आप इससे बातें करो,खाना मैं बनाती हूं,सरगम बोली।।
पहले ये तो बता ,चिट्ठी किसकी है? दयमंती ने पूछा।।
फिर सरगम ने चिट्ठी खोलकर देखी और दयमंती बुआ से बोली...
  दिनेश मामा की है,खैर-खब़र पूछी है।।
तो कल ही जवाब दे देना और साथ में नया पता भी बता देना, नहीं तो खामखाँ मेँ कमलेश्वर को फिर परेशानी होगी,दयमंती बुआ बोली।।
हाँ! बुआ जी! कल ही जवाब दे दूँगी,सरगम इतना कहकर फिर से रसोई में चली गई।।
तो अच्छा बेटा! ये बताओ तुम्हारी शादी हो गई, दयमंती ने कमलेश्वर से पूछा।।
ना..बुआ जी! अब तक कोई मिली ना! कमलेश्वर सकुचाते सा बोला।।
ऐसा कैसे कि तुझ जैसे भले लड़के को आज तक कोई लड़की ना मिली, दयमंती बुआ बोलीं।।
बस,बुआ जी नहीं मिली, कमलेश्वर बोला।।
फिर बुआ जी ने सरगम की रामकहानी कमलेश्वर को कह सुनाई,ये सुनकर कमलेश्वर को बहुत दुख हुआ और सरगम की चिन्ता भी हुई।।
   उस रात कमलेश्वर ने सबके संग खाना खाया और बहुत सारी बातें भी कीं,बच्चों के साथ भी खेला,बड़े दिनों बाद आज सरगम के घर पर कोई मेहमान आया था वो भी बिल्कुल अपना सा,जिसे वो बचपन से जानती थी और पूरी तरह से उस पर आँख मूँदकर भरोसा कर सकती थी और उसने किया भी यही....
      कमलेश्वर खाना खाकर अपने कमरें पर चला आया और एक सुकून भरी साँस लीं,आज वो बहुत खुश था,जिसे वो सालों से ढ़ूढ़ रहा था आखिर वो उसे मिल ही गई,इसका मतलब ये था उसकी दुआँ सच्ची थी जिसे ईश्वर ने कुबूल कर लिया था और उसे उसकी मंजिल तक पहुँचा दिया था,कहते हैं ना कि सच्चे दिल से अगर कुछ भी माँगों तो सारी कायनात आपको उसे मिलाने में जुट जाती है,यही कमलेश्वर के साथ हुआ था।।
       वो अपने बिस्तर पर आकर लेट गया और सरगम के बारें में सोचने लगा कि बेचारी ने कितने दुख सहे लेकिन अब वो उसे मिल गई है तो उसे कोई भी कष्ट नहीं होने देगा,उसके सारें दुख सारी तकलीफें वो अपने सिर ले लेगा,यही सोचते सोचते कमलेश्वर को नींद आ गई।।
     उधर बिस्तर पर लेटते ही सरगम भी कमलेश्वर के बारें में सोच रही थी,उसने मन में सोचा कि ये तो जैसा पहले था वैसा अब भी है दब्बू कहीं का,पहले भी मुझसे मार खाता था और अब भी मार खा गया बेचारा! उसी दिन पूछ लेता जिस दिन पहली बार मन्दिर में मिला था तो कम से कम बेचारे को झापड़ तो ना पड़ता और ये सोचकर सरगम खिल खिलाकर हँस पड़ी.....
    क्यों हँस रही है बिना बात के? उसकी हँसी सुनकर दयमंती ने पूछा।।
  कुछ नहीं बुआ! कमल के बारें में सोचकर हँस रही थी कि बचपन में भी मुझसे मार खाता था और अब भी झापड़ खा गया लेकिन उसने कभी मुझ पर हाथ नहीं उठाया,मुझसे उम्र में एक ही साल तो बड़ा है चाहता तो मेरे बाल खींच लेता,चाहता तो झापड़ मार देता  लेकिन उसने कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया,मार भी खा जाता था गलती मेरी होती और मैं ही रूठ जाती तो मनाने भी वही आता था,बहुत अच्छा दोस्त था मेरा,सरगम बोली।।
   अच्छा! ठीक है अब सो जा! सुबह आँफिस भी तो जाना है,दयमंती बुआ बोली।।
  हाँ! बुआ ! अब मैं सो जाती हूँ,सरगम बोली।।
  और इतना कहकर सरगम सोने की कोशिश करने लगी,बुआ ने भी करवट ले ली और सोचने लगी...
  आज कितने अरसे बाद सरगम के चेहरे पर हँसी आई है ,नहीं तो कितनी बुझी बुझी सी रहती थी वो,अभी उम्र ही क्या है बेचारी की? इतनी सी उम्र में इतना बड़ा दुख मिल गया उसे,ना जाने ऊपरवाले की क्या मर्जी है ? बेचारी बच्ची को इतने कष्ट उठाने पड़े,कितना अच्छा हो अगर कोई उसका हाथ थाम ले,उसके बच्चों को सहारा दे दे,लेकिन ऐसे इन्सान दुनिया में कहाँ मिलते हैं?अगर कमलेश्वर ही उसकी जिन्दगी उसके सुख दुख का साथी बनकर आ जाएं तो कितना अच्छा हो?कितना अच्छा बच्चा है वो ,मुझे तो उसमें अपने संयम की झलक दिखाई देती है,स्वाभाव का भी वैसा ही है उदार और शिष्ट है,काश की वो ही मेरी सरगम का साथी बन जाएं तो मैं धन्य हो जाऊँगी,लेकिन क्या वो एक विधवा से ब्याह करेगा?
     पहाड़ सी जिन्दगी पड़ी है आगें,ना जाने कैसे काटेगी बेचारी? मैं जानती हूँ कि विधवा का जीवन कैसा होता है?पल पल मरकर जीना पड़ता है औरों की खुशी के लिए,हे! ईश्वर बच्ची की मदद करो,उसे उसकी मंजिल की ओर ले जाओ और उसकी मंजिल कमलेश्वर ही हो।।
   मन ही मन दयमंती बुआ सरगम के लिए दुआएँ माँगने लगी,वो सरगम को कभी भी दुखी नहीं देखना चाहती थी ,वो जानती थी कि इस जालिम समाज में अकेली नारी का रहना कितना मुश्किल होता है,तरह तरह की गंदी निगाहों से लोंग उसकी ओर देखने लगते हैं,अकेली औरत को कहीं भी ठौर नहीं मिलता।।
      और मैं ये कभी नहीं चाहती कि मेरी सरगम के साथ ऐसा हो,मेरे ऊपर तो सदा मेरे बाबूजी का हाथ रहा तो मेरी जवानी को दाग नहीं लगा लेकिन सरगम के ऊपर कोई भी ऐसा हाथ नहीं है जो उसे छत्रछाया दे सकें और दयमंती यही सोचते सोचते कब सो गई उसे पता ही नहीं चला।।
     अब कमलेश्वर एक दो दिन बाद शाम के वक्त सरगम के घर आ ही जाता,साथ में जो  सब्जी उसे खानी होती तो लेता आता,कभी बच्चों के लिए मिठाईयांँ ले आता तो कभी फल,उसका घर आना बच्चों को भी भाने लगा था,वे कमल अंकल....कमल अंकल कहकर उसकी गोद में चढ़ जाते और कमल भी उन्हें प्यार से गले लगा लेता।।
    ये सब दयमंती देखती तो खुश हो जाती,कभी कभी पूरा परिवार कमल के साथ  घूमने बाहर भी चला जाता,सरगम का कमलेश्वर से मेलजोल माधुरी को बिलकुल भी ना सोहाता था,वो काँलोनी में घूम घूमकर दोनों की दोस्ती को लेकर कींचड़ उछालने लगी,माधुरी ने आग लगाई तो काँलोनी वालों को भी उनकी दोस्ती खटकने लगी।।
   जब ये बात वसुधा तक पहुँची तो उसने माधुरी को डाँटा भी, कि किसी पर बिना सुबूत के इल्जाम लगाना अच्छी बात नहीं,जब तुम आँखों से देख लो तब कुछ कहना,मैं सरगम को बहुत अच्छी तरह जानती हूँ और बहुत पहले से जानती हूंँ,अगर मैने सरगम के बारें में आज के बाद कुछ भी उल्टा सीधा सुन लिया तो मुझसे बुरा कोई ना होगा,
      वसुधा की बात सुनकर माधुरी को मिर्चें लग गई और सड़ा सा मुँह बनाकर वो वहाँ से चली गई
     ये बात उड़ते उड़ते सरगम तक भी पहुँची,उसे ये बात वसुधा दीदी ने बताई,लेकिन सरगम बोली....
दीदी! वो मेरे बचपन का दोस्त हैं इसके अलावा कुछ नहीं,वो एक दोस्त के नाते मेरी कभी कभी मदद कर देता है,उसके परिवार का मेरे परिवार से बहुत ही गहरा नाता था उसी नाते को निभाने चला आता है बस....
   अच्छा! ये सब छोड़ ,माधुरी तो गंदे दिमाग़ की औरत है इसलिए उसके दिमाग़ में ये सब चलता रहता है,तुझे एक खुशखबरी सुनाती हूँ,तू तो जानती है कि अवन्तिका स्कूल में नौकरी करती है,तेरे साथ ही तो पढ़ी,लेकिन तेरी शादी तो कच्ची उम्र में हो गई थी,तुझे पता है अवंतिका ने अपने लिए एक लड़का चुन लिया है और अगले हफ्ते ही उसकी शादी,हम लोंग जा रहे हैं उसकी शादी पर ।।
   ये बहुत अच्छी खबर सुनाई आपने ,तो शादी कहांँ से होगी? सरगम ने पूछा।।
  वहीं से जिस शहर में वसुधा नौकरी करती है लड़का भी वहीं का है,वसुधा बोली।।
  यहाँ से होती तो मैं भी शामिल हो लेती,सरगम बोली।।
   तू भी चल ना हमारे साथ,वसुधा बोली।।
   दीदी! यहाँ से होती तो शामिल हो जाती,रहने दीजिए बच्चों को भी ले जाना पड़ेगा और बुआ को भी और बुआ को लेना जाना ठीक नहीं रहेगा,मुझे पता है वो नहीं जाएंगी,सरगम बोली।।
  अच्छा! ठीक है लेकिन मेरी शाँपिंग तो करवा सकती है,सबके लिए साड़ियाँ लेनी है,अवंतिका के लिए भी कुछ ना कुछ लेना पड़ेगा।।
   सरगम बोली....
दीदी! मैं जरूर शाँपिंग पर चलूँगी आपके साथ,आपका ये काम तो मैं करवा ही दूँगी,सरगम बोली।।
  और फिर सरगम से वसुधा के लिए एक दो दिन की छुट्टी लेकर उसकी शाँपिंग करवाई,खुशी खुशी वसुधा अवन्तिका की शादी में चली गई।।
     और वसुधा के कालोनी से  बाहर जाने का फायदा माधुरी ने आखिर उठा ही लिया....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....

    

    

   


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