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वॉलेट  

अपने बेटे नितिन की शादी के बाद राधा बहुत ही ख़ुश थी, एक बहुत बड़ी जवाबदारी जो निपट गई थी। उसने अपने पति से कहा, "गौरव कितनी प्यारी जोड़ी है ना हमारे नितिन और नेहा की।"

"हाँ राधा तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो, ऊपर वाला बहुत सोच समझकर जोड़ियाँ बनाता है, जैसी हमारी जोड़ी है ।"

"क्या आप भी, आपको तो हर वक़्त मज़ाक ही सूझता रहता है।"

"क्यों, क्या मैं ग़लत कह रहा हूँ, हमारी जोड़ी अच्छी नहीं है?"

"अच्छी है, बहुत अच्छी है पर अभी मैं नेहा और नितिन की बात कर रही हूँ, समझे।"

"हाँ राधा, ऊपरवाला ऐसे दो अनजान लोगों को मिलाता है, जो मिलते ही एक दूसरे से बेइंतहा प्यार करने लगते हैं। अग्नि के सात फेरों में इतनी शक्ति होती है, इतनी सच्चाई होती है कि उनके पूरे होते ही एक ऐसा अनूठा गठबंधन बंध जाता है, जिसकी डोरी बहुत मज़बूत होती है। वह डोरी प्यार के धागों से बुनी होती है जो जीवन भर कभी नहीं खुलती। इसीलिए तो पति पत्नी का प्यार अलग ही होता है।"

"तुम ठीक कह रहे हो, अपना हर राज़, हर तकलीफ़, वे एक दूसरे को बताते हैं और मिलकर उन्हें सुलझाते हैं।"

"हाँ राधा मुझे तो ऐसा लगता है कि दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे प्यारा रिश्ता यही है।"

"कैसी बात कर रहे हो आप? माँ और बच्चे का रिश्ता? पिता और बच्चे का रिश्ता? जो जन्म देते हैं, पाल पोस कर बड़ा करते हैं, वह रिश्ता कम कैसे हो गया गौरव?"

"कम बिल्कुल नहीं होता राधा लेकिन पति-पत्नी का रिश्ता जो एक बार जुड़ जाता है तो अंत तक साथ निभाता है। वृद्धावस्था में जब कोई साथ नहीं होता तब वे दोनों ही साथ होते हैं। वही समय तो होता है जब एक दूसरे के साथ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। अपने को ही ले लो, एक भी दिन मेरे बिना रहती हो क्या? अपने पर्स में मेरी तस्वीर लेकर घूमती हो, मेरे वॉलेट में भी तुम्हारी ही तस्वीर तो होती है।"

तभी नेहा ने आकर कहा, "पापा मम्मी चलिए ना, मैंने चाय और नाश्ता बनाया है, सब साथ में बैठकर खाएंगे।"

ख़ुश होकर राधा ने कहा, "ठीक है बेटा, तुम चलो हम अभी आते हैं।"

डाइनिंग टेबल पर बैठकर, हंसी मज़ाक के साथ सबने नाश्ता किया। घर का वातावरण एकदम खुशनुमा हो रहा था। राधा भी बहुत ख़ुश थी पर उसके मन के किसी कोने में एक छुपा हुआ डर बार-बार आवाज़ लगा रहा था, "क्या मेरा नितिन अब मुझे पहले जैसा प्यार नहीं करेगा? क्या अब सब कुछ नेहा ही हो जाएगी? नहीं, नहीं यह मैं क्या सोच रही हूँ? पत्नी, पत्नी की जगह होती है और माँ, माँ की जगह। माँ का स्थान तो कोई ले ही नहीं सकता।"

इन्हीं विचारों की कशमकश में राधा उलझती ही जा रही थी। वह अपने मन को बार-बार समझाती किंतु मन था कि मानता ही नहीं।

एक दिन राधा ने नितिन से कहा, "बेटा सब्जी वाला बाहर खड़ा है, छुट्टे पैसे नहीं है उसके पास, तुम्हारे पास हैं क्या?"

"हाँ मम्मी अभी देता हूँ" , कहकर नितिन ने जैसे ही वॉलेट खोला, उसमें राधा को अपने स्थान पर नेहा की तस्वीर दिखाई दे गई। राधा यह देख कर दुःखी हो गई। इतनी जल्दी नितिन ने मेरी तस्वीर हटा दी। उसका मन अशांत हो गया, ईर्ष्या उसके ऊपर हावी हो रही थी। वह वहाँ से तुरंत ही वापस जाने लगी।

"अरे, क्या हुआ मम्मी पैसे तो ले जाओ" , नितिन ने राधा के हाथ में पैसे देते हुए कहा।

पैसे लेकर राधा तुरंत ही वहाँ से चली गई। उसकी आँखों में बार-बार वही दृश्य घूम रहा था। नितिन का वॉलेट खोलना और उसमें नेहा का फोटो दिखना। वह परेशान हो रही थी, इसे अपना अपमान समझ कर वह तनाव में थी। गौरव समझ रहा था कि राधा अनमनी-सी लग रही है, क्या हुआ होगा उसे?

गौरव ने आख़िर पूछ ही लिया, "राधा तुम्हें क्या हो गया है, इतनी उदास क्यों लग रही हो?"

राधा ने बात को टालते हुए कहा, "कुछ भी तो नहीं, बस सर में दर्द है।"

"तुम्हारे सर में दर्द होता है तब कभी तुम उदास नहीं होतीं राधा? सीधे-सीधे कह देती हो, गौरव आज सर दर्द हो रहा है, खाना बाहर से मंगवा लेंगे। मैं जानता हूँ बात कुछ और ही है बता दो, तुम्हारे हर दर्द की दवा है मेरे पास।"

राधा ने सोचा बता ही देती हूँ, "गौरव सुनो नितिन ने अपने वॉलेट से मेरा फोटो हटाकर नेहा का फोटो लगा लिया है। इतनी जल्दी अभी तो 15 दिन भी नहीं हुए और..."

"इसमें नई बात क्या है राधा? सभी लोग ऐसा ही करते हैं, वह उसकी पत्नी है राधा। तुम नाहक ही ग़लत रास्ते पर चली गई हो।"

"नहीं गौरव जब से मैंने उसे वॉलेट गिफ़्ट में दिया था, तब से उसके वॉलेट में मेरा फोटो था पर आज..."

"राधा आज से तीस साल पहले की बात याद करो। मुझे समझ नहीं आता लोग भूतकाल को कैसे भूल जाते हैं। यही घर था, यही हम थे, ऐसा ही वॉलेट था। तब भी ऐसा ही एक त्रिकोण बना था लेकिन उस त्रिकोण में कहीं कोई रिक्त स्थान माँ ने बनने नहीं दिया था, जिसे फिर से जोड़ने की ज़रूरत पड़े। आज भी वैसा ही एक त्रिकोण बन गया है राधा, तुम तीनों के बीच। यदि तुम चाहोगी तो यह त्रिकोण हमेशा इसी तरह सुंदर आकृति में बना रहेगा वरना मिटाने या बिगाड़ने में वक़्त कहाँ लगता है। याद करो मेरे वॉलेट में भी माँ की ही तस्वीर थी। तुम्हारे ही सामने मैंने माँ की तस्वीर निकाल कर तुम्हारी तस्वीर लगाई थी। तब तुम बहुत खुश हुई थीं। माँ को भी मालूम था पर वह बिल्कुल दुःखी नहीं हुई थीं। वह समझती थीं, नई-नई शादी है, नया-नया प्यार है लेकिन तुम्हारा मन इतना छोटा है, मैं सोच भी नहीं सकता था।"

राधा की आँखों में वही पुराने पल दृष्टिगोचर हो गए, जिनकी याद आज गौरव ने उसे दिलाई। वह यह भी याद कर रही थी कि वॉलेट में फोटो बदल देने से इस घर में माँ का स्थान कभी नहीं बदला। गौरव हमेशा उन्हें उतना ही प्यार और इज़्ज़त करते रहे।

राधा ने कहा, "गौरव मुझे माफ़ कर दो, मुझे क्या हो गया था ? मेरी सोच इतनी छोटी कैसे हो गई थी ? मुझे अपने ऊपर शर्म आ रही है। मैं सच में ग़लत रास्ते पर जा रही थी किंतु तुमने मेरा हाथ पकड़ कर सही राह पर मेरे कदमों को खींच लिया। यदि तुम्हारे जैसा पति हो जो अपनी पत्नी को इस तरह ग़लती करने से पहले ही रोक ले तो सच में किसी परिवार में फूट पड़ने की नौबत ही ना आए।"

गौरव ने कहा, "पत्नी भी तो तुम्हारे जैसी होनी चाहिए जो पति के समझाने से एक बार में समझ जाए। मुझे तुम पर गर्व है राधा तुमने कितनी आसानी से अपनी ग़लती स्वीकार कर ली। अपने परिवार की ख़ुशियों को इसी तरह हमेशा संभाल कर रखना, एक माँ की ही ज़िम्मेदारी होती है। मुझे विश्वास है मेरी माँ की ही तरह तुम भी इस त्रिकोण में कभी कोई रिक्त स्थान नहीं होने दोगी।"

राधा गौरव के गले से लग गई और कहा, "थैंक यू गौरव।"



रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)

स्वरचित और मौलिक