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परिधान



पुरुष व महिलाओं के दो समूहों में जिनमें अधिकांश अधिकारी व बुद्धिजीवी वर्ग के लोग शामिल थे, बहस जोरों पर थी। मुद्दा था 'समाज में बलात्कार की बढ़ती घटनाएं- कारण व निवारण' !
शहर की महिला विकास मंच की अध्यक्षा श्रीमती उर्वशी जी ने कहा, "आज हमारा समाज नैतिक व चारित्रिक पतन की तरफ अग्रसर है। सहज सुलभ इंटरनेट व मोबाइल में उपलब्ध गंदी सामग्रियों ने आज के युवाओं की विकृत मानसिकता को बढ़ावा दिया है और इसी का नतीजा हैं ये आए दिन घटने वाली अपहरण, बलात्कार, व छेड़छाड़ की घटनाओं के साथ ही नृशंष हत्याकांड भी। इनसे बचने के लिए हम महिलाओं के ऊपर भी एक बड़ी जिम्मेदारी है। यह हमारी ही जिम्मेदारी है कि हम अपने बेटों पर कड़ी नजर रखें, उन्हें अच्छी बातें समझाएं, अच्छा साहित्य पढ़ने को दें व उनके चारित्रिक विकास पर पूर्णतया ध्यान देते हुए उन्हें संस्कारी बनाएं। यदि हम इसमें सफल हो पाए तो निश्चित ही हम समाज में घट रही इन शर्मनाक घटनाओं पर अंकुश लगाने में सफल रहेंगे।" तालियों की गड़गड़ाहट ने बता दिया कि सभागार में उपस्थित जनसमुदाय ने उनके वक्तव्य का स्वागत किया है।

तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ही पुरुष वक्ता मदन जी जो कि एक स्थानीय खबरिया चैनल के संपादक व संवाददाता थे, ने कहना शुरू किया, "मैं बहन उर्वशी जी के विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ, लेकिन महिलाओं की जिम्मेदारियों में कुछ और जोड़ना चाहूँगा। बेशक हर महिला को अपने बेटों को अच्छी शिक्षा देनी चाहिए, उनके चरित्र निर्माण पर ध्यान देना चाहिए लेकिन क्या बेटियों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं ? मेरा मानना है कि बेटों पर ध्यान देने के साथ ही बेटियों की सामान्य हरकतों पर भी नजर रखनी चाहिए। अच्छे आचार विचार की शिक्षा देते हुए उनके अच्छे व शालीन परिधान पर भी नजर रखनी चाहिए। हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि लड़कियों के उत्तेजक व बदन दिखाऊ परिधान भी लड़कों के बहक जाने की वजह बनते हैं और घट जाती है समाज में एक और शर्मनाक घटना ...!"

सभागृह में पसरी निस्तब्धता के बीच ही उच्च न्यायालय की अधिवक्ता श्रीमती सुषमा जी तमतमाती हुई बोलीं, "मैं मदन जी के इस वक्तव्य की निंदा करती हूँ। मैं पूछना चाहती हूँ कि क्या हमें ऐसे समाज का निर्माण करना है जिसमें लड़कियों को मनपसंद खाने-पीने, व पहनने की भी आजादी न हो ? क्या अब कपड़े खरीदते समय यह सोचना होगा कि ये कपड़े कहीं लड़कों को आकर्षित तो नहीं कर लेंगे ? मुझे लगता है मदन भाईसाहब जी भूल गए हैं कि अच्छा दिखना, सजना सँवरना हम महिलाओं का प्राकृतिक गुण है। क्या कुछ लोगों की विकृत मानसिकता की वजह से हम अपना यह नैसर्गिक गुण व इच्छाएँ भी त्याग दें ? मैं पूछना चाहती हूँ भाई जी से कि जब तीन से सात आठ साल की मासूम बच्चियों के साथ ये नराधम हैवानियत करते हैं, तब क्या ये बच्चियाँ भी उत्तेजक परिधान पहने उन्हें उत्तेजित कर जाती हैं ? अरे इस देश में तो साठ साल की बुढ़िया भी अब सुरक्षित नहीं, क्या कलकत्ता की बहत्तर वर्षीय नन ने भी उत्तेजक परिधान पहने थे ? मेरा मानना है अश्लीलता कपड़ों में नहीं, बल्कि देखनेवालों के नजरिए में होती है। ये अपने अपने संस्कार व चरित्र होते हैं जो एक ही परिधान को अलग अलग नजरियों से देखते हैं। नजरियों के इस फर्क को दूर करना भी हम सबकी जिम्मेदारी है।"

मदन जी सुषमा जी की बात का जवाब देने ही जा रहे थे कि उनके फोन की घंटी घनघना उठी। लोगों की प्रश्नवाचक निगाहें उनके चेहरे पर गड़ गईं। बात करते हुए उनके चेहरे की रंगत बदलती जा रही थी।
"मैं बस कुछ ही मिनटों में वहाँ पहुँचता हूँ।" कहकर उन्होंने फोन अपनी जेब के हवाले किया और सभागृह में लोगों से मुखातिब होते हुए बोले, " आप सभी से क्षमाप्रार्थी हूँ। एक दुःखद घटना घटित हुई है पड़ोस के मोहल्ले में, इसलिए मुझे तत्काल यहाँ से जाना होगा।"

भीड़ में से किसी की आवाज आई, " लेकिन हुआ क्या है, जो इतनी अच्छी चल रही बहस को बीच में छोड़कर जाना पड़ रहा है ?"

सभागृह से बाहर निकलने के लिए उठते हुए मदन जी बोले, " पड़ोस की झुग्गी बस्ती में रहनेवाली एक छह बरस की बच्ची का बलात्कार !"