DANI KI KAHANI in Hindi Children Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | दानी की कहानी ----आपको सोचना चाहिए न !

दानी की कहानी ----आपको सोचना चाहिए न !

दानी की कहानी ----आपको सोचना चाहिए था न !

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दानी बच्चों के लिए कुछ न कुछ करने को हर समय तत्पर रहतीं |

कभी बच्चों को कहानी सुनातीं ,कभी उनके लिए कोई कविता ही लिख डालतीं |

जो वे कहते ।उनके लिए खाने के लिए भी बना देतीं जबकि मम्मी थकी रहतीं थीं |

छोटा चीनू बड़े पाशोपेश में रहता ,मम्मा तो इतनी यंग हैं फिर भी थक जाती हैं |

दानी इतनी बड़ी हैं ,बुज़ुर्ग हो रही हैं फिर भी हर समय सभी बच्चों के लिए कुछ न कुछ करने को तैयार रहती हैं |

वह कई बार यह बात माँ से कहता तो दानी से भी कह ही डालता |

"दानी ! आप तो मम्मा से इतनी बड़ी हैं पर मम्मा जल्दी थक जाती हैं !आप नहीं थकतीं क्या?"

"बेटा चीनू जी ! मम्मा काम पर भी तो जाती हैं | फिर तुम घर पर उनसे हर समय फरमाइश करते रहते हो !अब बताओ,वे थकेंगी या नहीं ?"

चार साल चीनू अपनी छोटी सी ठोड़ी पर अपनी ऊंगलियाँ रखकर बैठ जाता जैसे दानी की बात पर विचार कर रहा हो |

एक रविवार को घर के सब लोग मॉल जा रहे थे ,वहाँ खरीदारी करके वहीं खाना-पीना करने वाले थे और फिर पिक्चर का प्रोग्राम था |

"माँ!आप भी चलिए न ! आज खाना बनाने महाराज भी नहीं आने वाले ,बाहर ही खाना खा लेंगे | बड़ी मुश्किल से छुट्टी मिलती है |"चीनू की मम्मी ने कहा |

"कोई बात नहीं बेटा ,महाराज नहीं आएँगे तो मैं आज दूध-ब्रेड खा लूँगी | तुम लोग जाओ ,एंजॉय ---" दानी ने शांति से कहा |

दानी को बाहर जाने का कोई शौक भी नहीं था | वे आराम से घर में बैठकर कुछ पढ़तीं या टी.वी पर कोई प्रोग्राम देखतीं |

"क्यों खाएँगी आप दूध-ब्रेड ? आपको भी हमारे साथ चलना होगा --"चीनू को बड़ा खराब लगता था | एक तो ऐसे ही समय न मिलने के कारण कभी ही पूरा परिवार साथ में जा पाता !

"अरे !तो मैं अपने लिए कुछ बना लूँगी --मेरी चिंता मत क्रो चीनू बेटा --"दानी ने बड़े प्यार से कहा |

ये तो चीनू जी थे ,जम ही तो गए --

"आप नहीं जाएँगी तो मैं भी नहीं जाऊँगा --" उसने ज़िद पकड़ ली |

"चलिए न माँ ,वैसे भी आप कहीं नहीं जातीं | ये चीनू नहीं मानेगा |"चीनू के पिता ने अपनी माँ को समझाने के लिए कहा |

बहुत ना-नुकर के बाद दानी तैयार हुईं | चीनू जी अपने बैग में न जाने क्या-क्या लादकर आए और दानी का हाथ पकड़कर कार की ओर चले |

"ये क्या ले आए चीनू बेटा ?" चीनू के पापा ने पूछा |

चीनू जी ने कोई उत्तर नहीं दिया |सब लोग मॉल पहुँचे ,शॉपिंग की गई ,रेस्टौरेंट में खाना भी खा लिया गया | अब आई पिक्चर की बारी |

"बेटा ! अब मैं घर चली जाती हूँ ,ऑटो से चली जाऊँगी | तुम लोग पिक्चर देखकर आना |"

"नहीं ,दानी भी चलेंगी पिक्चर --"चीनू अपने स्वभाव के अनुसार ज़िद पर अड़ गया |

"पर बेटा ,पिक्चर हॉल में ए.सी बहुत ठंडा रहता है | मेरे पैरों में दर्द हो जाएगा ---"दानी ने कहा |

"नहीं ,आप पिक्चर देखेंगी ---"चीनू जी अपनी ज़िद पर अड़े थे |

मम्मी-पापा ने बहुत समझाया ,वैसे भी दानी को पिक्चर का कोई बहुत शौक तो था नहीं | लेकिन चीनू जी को मानना नहीं था तो कैसे मानते ?

ख़ैर,वही हुआ जैसे दानी कह रही थीं | कुछ देर में ही दानी के पैरों में ठंड लगनी शुरू हो गई |

चीनू जी ने अपने पिट्ठू बैग में से एक गरम शॉल निकाली और दानी की टाँगों पर अच्छी तरह से लपेट दी |

"अरे ! चीनू बेटा ! तुम दानी के लिए शॉल भी लाए थे --" मम्मा को अपने बेटे की समझदारी पर बहुत गर्व हुआ |

"हाँ जी,मैं तो लाया हूँ --पर ,यह तो आपको सोचना चाहिए था जो मैंने सोचा --"

चीनू जी ने फिर पापा से पूछा--"बताइए,जब आप छोटे थे तब दानी आपके लिए खाना-पानी ,दूध और गर्म कपड़े लेकर नहीं चलती थीं ?"

चीनू के पापा चुप्पी साध गए ,वे अपनी गलती समझ गए थे और चीनू क्या कहना चाहता था ,वह भी ---!!

डॉ. प्रणव भारती

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