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बागी स्त्रियाँ - भाग ग्यारह

रात का घना अन्धकार!रह-रहकर बादल तेज स्वरों में गरज रहे हैं |बिजली भी चमक रही है |कभी आड़ी-तिरछी,कभी सीधी -सरल उज्ज्वल तन्वंगी बिजली!मीता देर से खिड़की के पास खड़ी बिजली की कीड़ा देख रही है |अद्भुत दृश्य !आकाश की कालिमा को चीरती बिजली कभी यहाँ तो कभी वहाँ चमक कर लुप्त हो जाती है |क्षण भर के लिए अन्धेरा कम होता है,फिर वही अन्धेरा!उदास अँधेरा !अकेलेपन को सघन करता अँधेरा !पर इसके पहले कि आकाश निराशा से काला पड़े,फिर बिजली चमक उठती है |यह बिजली कभी हब्शी पिता के सीने पर उत्पात करती नन्ही गोरी बिटिया लगती है,कभी शिव की तीसरी आँख|चंचल बिटिया के रूप में वह मन में उल्लास भरती है,तो विनाशकारी रूप में हताशा ,क्योंकि वह जहाँ और जिस पर गिरती है उसका सत्यानाश हो जाता है |कितना अजीब है कि शीतल जल से निर्मित बिजली में इतनी तड़प है कि वह लास्य और तांडव दोनों कर सकती है |
दिन भर बादल बरसते रहे |रात को भी उनका तारतम्य टूटा नहीं है |रात की बारिश उसे उदास करती है |कोई अभाव मन को मथता है |किसी की कमी खलती है |किसी बहुत अपने की ,जिसके साथ बारिश में भीगने,खेतों की मेड़ों पर फिसलने ,बागों में दौड़ने के सपने बचपन से देखती रही है |कहाँ है वह? कौन है?आया क्यों नहीं अभी तक?क्या उसका कहीं अस्तित्व ही नहीं ?क्या वह पूर्व-जन्म की कोई स्मृति है ?कहीं वह खुद बदकिस्मत हव्वा तो नहीं ,जो अपने आदम के साथ स्वर्ग के बाग में स्वतंत्र विचरण करती थी और बुद्धि का इस्तेमाल करते ही जिसे दण्डित कर दिया गया था ?कहीं वही पुरानी स्मृतियाँ तो उसे परेशान नहीं करती?
पर आदम है कहाँ?कहीं ईश्वर ने स्वर्ग के साथ उसका आदम भी तो नहीं छीन लिया?इतना बड़ा अपराध तो नहीं था उसका?क्या स्त्री द्वारा दिमाग का इस्तेमाल ईश्वर को भी नहीं पसंद?क्या बुद्धि-विवेक से दूर रहकर ही स्त्री पुरूष का प्रेम पा सकती है ?
स्मृति से पर्दा हटाती है तो उसे पवन याद आ जाता है,जिसके प्रेम में चकराई वह उसकी बाहों में जा गिरी थी।उसने उसे अपना आदम समझ लिया था। वह उसके लिए हव्वा नहीं थी या फिर ईश्वरीय आदेश को मानकर वह उससे दूर हो गया था ,पता नहीं । वह उसके लिए विकट समय था ।
उदासी थी कि छंटने का नाम ही नहीं ले रही थी |दिन-भर काम-काज की व्यस्तता में भी वह याद आता रहता था और शाम को घर लौटते ही जैसे उसका अपना अस्तित्व समाप्त हो जाता था|क्या हो गया था उसे ?पूरे तीन वर्ष लगातार यही स्थिति रही..।अवसाद की दवाइयाँ भी बेअसर हो गयी थीं |सिर्फ उसकी आवाज से जिंदा हो पाती थी। वह उसके रक्त के साथ बहने लगा था। हंसी... खुशी सब उसकी मुहताज हो गई थी |भूख-प्यास,नींद सब उसकी गुलाम...ऐसा उसके साथ ही क्यों हुआ..पवन के साथ क्यों नहीं ?वह इस सत्य को तभी जान गई थी,जब वह तीन वर्ष पहले कुछ दिन के लिए उससे रूठ गया था...पागल हो गई थी वह..नींद की गोलियां भी बेअसर हो गई थीं ।हारकर उसने हथियार डाल दिया।जो –जो वह कहता गया ।वह करती गई ...उसको खो देने की कल्पना से ही उसकी रूह काँपने लगती थी|कभी-कभी उसका आत्मसम्मान जागता था ,तो वह उससे लड़ पड़ती थी।जब वह रूठ जाता ,तब उसे ही रो-रोकर उसे मनाना पड़ता था |वह हार गई थी खुद अपने-आप से ही |वह उसकी ज़िंदगी के लिए इतना जरूरी हो गया था जैसे भोजन ..हवा ..पानी ...|उसे भुलाने की हर कोशिश नाकाम हो गई थी |
और उधर वह अपनी शादी के लिए उत्साहित था और उससे इसकी स्वीकृति चाहता था ...|वह कहता था कि उसमें त्याग नहीं है|उन दोनों में इस बात को लेकर लड़ाइयाँ हुई थीं|वह कैसे इस स्थिति को स्वीकार कर लेती ?कैसे उसे इजाजत दे देती कि वह उसकी जगह किसी दूसरी को दे दे |वह कहता था कि वह हमेशा उसकी पहली पत्नी के स्थान पर रहेगी और उसका उस पर पहला अधिकार होगा |पर समाज के सामने नहीं।क्या ऐसा संभव होता है ?क्या वह जीवन- भर यूं ही उससे अलग रहेगी |उसके साथ का सपना अधूरा रहेगा ...उसकी प्यास अधूरी रहेगी ?वह उसके साथ जीना चाहती थी और वह किसी दूसरी के साथ जीने की इच्छा पाले हुए था |उसने एक-एक तिनका चुनकर प्रेम का सुंदर -सा नीड़ बनाया था |अपना घर बनाते-सजाते समय भी हर पल उसकी छवि आँखों में रही थी |वह सोचती रही थी कि उसे कैसा लगेगा यह घर ? उसकी पोशाक,रहन-सहन और हर कार्य-शैली पर उसकी छाप थी |ये सच था कि उसने कभी उसे इन बातों के लिए नहीं कहा ,पर उसका मन तो हमेशा उसी के रंग में रंगा रहता था |
यह भी सच था कि दोनों की जोड़ी बेमेल थी पर यह सब तो तब भी था,जब उसने उससे प्यार का इजहार किया था|उसे याद है अपनी वह हंसी,जो उसकी बात पर आई थी |वह खिल्ली ,जो उसने उसकी बात पर उड़ाई थी |वह डांट,जो उसके 'आई लव यू' कहने पर लगाई थी |किस तरह रूआँसा और उदास हो उठा था वह|उसने साफ कह दिया था कि वह अपनी उम्र की किसी लड़की से प्यार करे ,तब वह रो पड़ा था और जिद पकड़ ली थी कि उसे वही चाहिए और किसी लड़की में उससे अधिक कुछ नहीं होगा |उसे दुनिया की नहीं सिर्फ अपने दिल की परवाह है और बाद में वही कहने लगा कि दुनिया है ...समाज है ।उनकी जोड़ी कभी स्वीकृत नहीं होगी ...।जब वह उसकी खुशी बन गया तो दूसरी हमउम्र लड़की में खुशी ढूंढने लगा |क्या यह छल नहीं था?उसे पा लेने के बाद वह क्यों किसी नई की तलाश में था?क्या सच ही उसे अपने परिवार या समाज की परवाह थी ?नहीं ...दरअसल वह एक स्वार्थी इंसान था। वह जितने उसके करीब होता गया था,वह उसकी होती गयी थी।वह तो यह कल्पना भी नहीं कर पा रही थी कि उससे अलग होकर कैसे जी सकेगी ?पर जीना तो पड़ा ही।उसको भुलाने के लिए वह कुछ दिन के लिए अपने गाँव चली गई।