Tere Mere Darmiyan yah rishta anjaana - 11 in Hindi Fiction Stories by Priya Maurya books and stories PDF | तेरे मेरे दरमियां यह रिश्ता अंजाना - (भाग-11) - अस्मिता के दिल की ब

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तेरे मेरे दरमियां यह रिश्ता अंजाना - (भाग-11) - अस्मिता के दिल की ब

आदित्य को अपने बगल मे देख अस्मिता वहाँ से दौड़ कर भाग गयी क्योकि उसका सामना वह नही करना चाहती थी।

उसको ऐसे भगते देख आदित्य लगभग हंस देता है और अपने बालों मे हाथ फेरते हुये बोलता है -' पागल लड़की।"

तभी तमतमाते हुये रौनक आया और उसकी हालत देख आदित्य जोर जोर से हंसने लगा। उसकी हालत भी तो देखने लायक सारंगी ने बना दिया था।

आदित्य -" रौनक यह क्या हाल बना रखा है तूने पूरे चेहरे बाल सब मे मिट्टी है।"

रौनक गुस्से से -" उस जंगली बंदरिया ने किया है सब।"

आदित्य उसे चिडाते हुये -" तुझ जैसे जंगली बन्दर को जंगली बंदरिया मिल गयी मुझे तो पहले ही विश्वास था की सबकी जोडी भगवान बनाता है।"

रौनक उसके पेट में मारते हुये -" चुप एकदम चुप ,,,,, उस बंदरिया ने मेरे ऊपर मिट्टी फेक दिया।"

आदित्य -" कौन बंदरिया नाम बताओगे।"

रौनक मुह बना कर -" वो अस्मिता जी की दोस्त - सारंगी।"

आदित्य हसते हुये -" मैने तो पहले ही बोला था कि तेरी उसी से जमेगी।"

रौनक -" अब अगर एक लफ्ज भी बोला तो मार के मुंह तोड दूँगा।"

रात का समय --

वीर अपने दोस्त रमेश , राजू और मोहन के साथ बैठा बोतले खाली कर रहा था।
वीर ने अचानक से गुस्से मे कांच की ग्लास को नीचे फेक बोला -" वो लखन का इतना हिम्मत हमपर हमला करवाया वो।

रमेश-" तो भईया जी उसका पैसा काहे नही दे देते।"
तभी नशे मे धुत मोहन बोलता है -" कहाँ से देंगे पैसा इनका बाप तो सारा पैसा आदित्य भईया पर ही लुटा देता है और आगे चलकर हवेली का वारिश भी वही बनेगा ईनको तो इनका बाप फालतू ही समझता है ,,,,,,।"
तभी एक झन्नाटेदार थप्पड उसके गाल पर पड़ता है ।
मोहन अपने गाल पर हाथ रखकर - ईईई ,,,,,, इतना तेज कौन मारता है ,,,,, हम सच बोल रहे है जब ऊ आपका भाई आपके बाप का सारा माल उड़ा ले जायेगा तब हाथ मलते रहना।"

इतना बोल मोहन बडबडाते गिरते पड़ते हुये चला जाता है।

इधर वीर कुछ सोचने लगता है तभी राजू -" भईया जी बात तो बिल्कुल सही है ,,,, अब देखीये सच तो यही है की आपके पिता जी आपको एक नम्बर का निठल्ला समझते है और वईसे भी वो आदित्य बैरेस्ट्री किया है ,,,,, तो आप समझ ही जाईये का होगा आपका।

इतना बोल वो भी निकल जाता है और उसके पीछे पीछे रमेश भी और वीर यहां सोचते सोचते सो जाता है।

अस्मिता का घर --

रात का खाना खाने के बाद अस्मिता घर के बाहर ही टहल रही थी तभी वीर का दोस्त राजू वहाँ से गुजरा।
राजू अस्मिता को अकेला देखकर उसके पास आता है ।
राजू हुक्म देकर बोलता है -" एक लड़की सुन।"
अस्मिता भी वैसे ही बोलती है -" बोल क्या है।"
राजू -" यह कैसे बात कर रही है जानती नही हम राजू सिंह राजपूत है । हम तुम्हारे टोले मे ही आ गये यही बड़ी बात है ,,,,,,।"

अभी वो आगे कुछ बोलता इससे पहले ही अस्मिता -" तो हमने बोला आने को ,,,, ।"

राजू को अस्मिता पर बहुत गुस्सा आ रहा थ लेकिन नशे मे होने की वजह से वो लड़खड़ा रहा था फिर भी बोलता है -" तुझको मै देख लुंगा बाद मे ।"

अस्मिता भी एकदम परेशान हो गयी थी अब उसने भी बोल दिया -" पहले भाग यहां से तो तेरी सकल ही देख कर उल्टी आ रही ।"

राजू लड़खड़ाते हुये -" का बोली हमारी सकल को।"
अस्मिता गुस्से से चप्पल निकालते हुये-" यह चप्पल देख रहा है मारून्गी ना तो नानी याद आ जायेंगी भाग यहां से।"

राजू भी नशे मे था इसलिये चला जाता है लेकिन उसे गुस्सा बराबर आ रहा था फिर भी वो वहाँ से चला जाता है।

अस्मिता भी बड़बड़ाते हुये टहलने लगी तभी एक हवा का झोका आया और उसके पूरे शरीर मे सिहरन ही दौड गयी और वही जाना पहचाना सा अहसास जो अक्सर उसके आदित्य बाबू के आने से होता था होने लगा और उस रात की तरह वही परछाई उसके कानों के पास आई। उसके सांसो से उसके कानो मे गुदगुदी होने लगी।

उसके कानो मे आदित्य की आवाज सुनाई दी --

सबसे यू लड़ लेती है यू बातें कर लेती हैं

सबसे यू नजरे भी मिला लेतीं हैं

फिर हमसे क्यू घबराती हैं यूं नजरे चुराती हैं।

अस्मिता आवाज से तो पहचान गयी की यह कौन है लेकिन वो फिर पलट कर उसको देखना चाहती थी लेकिन तब तक वो जा चुका था।

अस्मिता ने एक गहरी सांस ली और अपने घर मे आ गयी।
अस्मिता अपने कमरे में खिडकी के बाहर चांद देख बोलती है --

"उनकी आवाज ही काफी है यह दिल धडकाने के लिये
उनको ख्यालों मे सोचना ही काफी है इस दिल मे बसाने के लिये

उनका अंजाना सा स्पर्श ही मन को बेकरार कर देता हैं
उनके सामने जाऊ कैसे मेरा यूं घबराना ही मेरे इश्क़ का इजहार कर देता है

आजतक चेहरा नही देखा है ध्यान से उनका क्योकि
डरती हूं यह निगाहे मिलते ही प्यार को मुकरार कर देतीं हैं

हे ईश्वर मै तो देखती भी नही उनकी तरफ क्या करू
यह नजरे ही मेरी मोहब्बत का इकरार कर देती हैं

उनकी मुस्कान में भी अजीब सा आकर्षण है
जिसे देख मेरी कम्बख्त लबो पर भी मुस्कराहट तैर जाती है

उनसे चार लफ्ज़ बात भी करुँ तो कैसे
यह धड़कनों की रफ्तार ही खूद ब खूद तेज हो जाती है

नीला रंग उनपर गजब भाता है
पर जब बात वो किसी और से करें तो मेरा दिल भी जल जाता है
क्या करुँ ऐ खुदा यह दिल उनसे मोहब्बत भी तो बेशुमार करता है
सोचती हुं कभी कभी कि उनसे अपनी मोहब्बत का इजहार कर दूं

फिर डर जाती हूँ की मानेंगे भी या नही क्योकि नासमझ मै भी नही
कि इतना न समझ सकूं कि समाज की यह बन्दिसें
हमारे प्यार को मुकम्मल होने देंगी कभी नही।

मेरा दिल तो क्या रूह भी कापं जाती हैं
उनसे दूर जाने के बारे मे सोचकर ही
पर यह भी सच ही है मुझे एक दिन छोड वो जायेंगे ही
क्योकि ताड़पती तो मैं हुं यहां
और यह भी जानतीं हूँ की मेरे नसीबों मे वो कहाँ, वो कहाँ 💔💔 "


इतना बोल वो खूद अपने दोनो हाथो मे मुह छिपा लेती है आँखो मे आंशु भी थे।
अस्मिता को अचानक होश आता है वो क्या बोल रही है यह सब । क्या सच मे वो आदित्य से प्यार करने लगी है? क्या बस 2 - 3 मुलाकात मे ही प्यार हो सकता है ? उसने कब ध्यान से देखा आदित्य नीले रंग के कपड़े पहनता है और उसपर यह अच्छा भी लगता है शायद उसकी आँखे भी अपने ठाकुर साहब की ही तलबदार थी ,,,,,,,, आदित्य क्यू आया था यहाँ? क्या वो भी उससे प्यार करता है ? ऐसे ही हजारो सवाल उसके जहन मे दौड़ रहे थे।
लेकिन इस पगली को यह नही पता की आदित्य बाबू को तो उससे पहली मुलाकात मे ही मोहब्बत हो गयी थी।

क्रमश :