Khaam Raat - 8 in Hindi Classic Stories by Prabodh Kumar Govil books and stories PDF | ख़ाम रात - 8

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ख़ाम रात - 8

अचानक मैडम को जैसे कुछ याद आया। वो बोलीं- ज़रा मुझे थोड़ी मोहलत देंगे, मैं अभी दस मिनट में वापस आती हूं। जाइएगा नहीं। अभी तो आपसे परिचय भी नहीं हुआ। मुझे ये भी मालूम नहीं कि आप किस कमरे में ठहरे हैं और आपका नाम क्या! गुम गए तो किसी से पूछ भी नहीं पाऊंगी।
कुछ रुक कर वो बोलीं- मेरा दवा का समय हो गया है। कमरे में जाकर आना होगा।
जैसे ही धीरे- धीरे चलती हुई मैडम घास के मैदान से मुख्य बिल्डिंग की ओर बढ़ीं, संयोग से वही मलेशियन लड़का मेरे पास चला आया। उसने टूटी- फूटी अंग्रेज़ी में पूछा- क्या हम लोग कुछ और लेंगे?
मेरे असमंजस को भांप कर लड़के ने कहा- मैडम इस समय नीबू पानी लेती हैं।
मुझे लगा कि वो तो यहां से उठ कर चली गई हैं फ़िर भी ये उनके नाम पर ऑर्डर लेने आया है, इसका मतलब है कि या तो इसे मालूम है कि वो वापस आने वाली हैं या फिर वो कई दिनों से यहां ठहरी हुई हैं जिससे लड़का उनका रूटीन जानता है।
मैंने लड़के से पूछा- मैडम किस कमरे में हैं?
उसने बताया- ज़ीरो जेड विंग में ओ - ओ टू रूम में।
मैं थोड़ा असहज हुआ क्योंकि सुबह ही रिसेप्शनिस्ट ने मुझे बताया था कि वहां हनीमून कपल्स के लिए ही स्पेशल कमरे बने हुए हैं।
मैं अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाया। मैंने लड़के से पूछा- उनके साथ और कौन है?
- एक साहब है। नाम नहीं जानता।
- साहब कहां है?
- नहीं मालूम। ख़ाली रात को ही आता है।
- कितने दिन से हैं?
- नहीं मालूम।
- कैसा है?
लड़का हंसा। वही चिर परिचित हंसी। प्रसन्नता की मुखमुद्रा।
- साहब मैडम का कौन?
- नहीं मालूम।
कौन सा लैंग्वेज बोलता? मैडम जैसा? ओर लोकल।
- नहीं मालूम, शायद लोकल।
- साहब का एज?
- नहीं मालूम।
- मैडम क्या पहनता, रूम में?
लड़का फ़िर हंसा। पर कुछ बोला नहीं।
- साथ में सोता?
अबकी बार लड़के का हल्का गुलाबी रंग गहरा लाल ही हो गया। हंसते हुए ख़ुशी से उसकी आंखें ऐसे मिचीं जैसे लड़का गदगद हो गया हो।
फ़िर कुछ रुक कर बोला- सेम रूम, सेम बेड।
- तुमने देखा?
- क्या?
- साहब खाना कहां खाता?
- खाकर आता।
- मैडम?
- कैफेटेरिया में।
- वो हनीमून रूम?
- या... यस।
लड़का मेरी बात चाहे समझा हो या न समझा हो पर मुझे ये तो समझा ही गया कि दाल में कुछ काला है।
मैं कुछ और सोच पाता इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी क्योंकि सामने से चलती हुई मैडम आती हुई दिखाई दीं। वही मंथर गति, वही शालीनता।
लेकिन इस बार इस शालीनता में मुझे कुछ छद्म छिपा हुआ दिखाई दे रहा था। मेरे मन में उनके प्रति आदर एकाएक कम हो गया था।
देखो तो। इस उम्र में ये छलावा? वाह! रॉयल फ़ैमिली?
वहां अपने देश में देवी की भांति अपने सेवक और प्रजा के बीच सेवा में समय बिताने वालों के यहां परदेस में ये तेवर?
मैंने मन ही मन ठान लिया कि मैं उनसे उस पुरुष के बारे में जान कर ही रहूंगा जिसके साथ वो अपने भरे पूरे परिवार को छोड़ कर मौज - मस्ती में समय गुजार रही हैं।
उनके प्रति मेरा अनादर शायद मेरे चेहरे पर भी झलक गया हो। वो मेरे प्रति अत्यंत विनम्र बनी रहीं, जबकि मैं इस बार उनके लौट कर आने के बाद उनके सम्मान में कुर्सी से तनिक उठा भी नहीं।
कुछ भी हो, मुझसे तो बड़ी ही रही होंगी उम्र में। दिखाने को यहां से फ़ोन करके अपने बच्चों की चिंता में घुली जा रही हैं और यहां हनीमून जैसी रंगत में दिन गुज़र रहे हैं।
मैं नहीं जानता कि मैं कैसा दिख रहा था। मन का कलुष चेहरे पर कैसी छाप छोड़ता है?