Bagi Striyan - 20 in Hindi Fiction Stories by Ranjana Jaiswal books and stories PDF | बागी स्त्रियाँ - भाग बीस

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बागी स्त्रियाँ - भाग बीस

शशांक के चेहरे पर उदासी थी। राखी उसकी शिकायत किए जा रही थी।
--मैम,इसने अपना सारा पैसा अय्याशी में उड़ा दिया।मुझे मिला,तब तक कंगाल हो चुका था।पहले रोज पार्टियाँ देता था।,नानवेज,शराब,सिगरेट ,लड़की इसको रोज चाहिए था। मुझसे मिलने के बाद भी यह अपनी प्रेमिकाओं से मिलता रहता था।जबकि सबने इसको लूटा था।वह तो मैं जाकर सबसे लड़ी,तब उन लोगों ने इसका पीछा छोड़ा।वरना थोड़ा- बहुत जो कमाता है वह भी उन्हें दे आता था।
"अब तो नहीं मिलता किसी से..।" शशांक शर्मिंदा था।
--अब क्या मिलोगे?जेब में कुछ होना भी तो चाहिए।मैं कमाकर घर चला रही हूँ,नहीं तो पता चलता।
राखी उसे कोसे जा रही थी।
"मैं भी कमाऊंगा।कोई काम तो मिले।तुमको तो सब काम दे देते हैं मुझे कोई नहीं देता।"
वह रूआंसा हो उठा था।
तभी राखी के मोबाइल की घंटी बज उठी।राखी फोन लेकर छत पर चली गई।
"उसके एक्स का फोन होगा।जिसने इसको यूज करके छोड़ दिया था,उसी के पीछे पागल है।हमेशा उससे बातें करती है।मना करने पर नहीं मानती।"वह अपूर्वा से बता ही रह था कि राखी आ गई।
राखी ने उसकी यह बात सुन ली थी और गुस्से से भरकर फिर उससे लड़ने लगी--क्यों नहीं करूं फोन!मैंने उससे प्यार किया था।धोखा उसने दिया ,फिर भी उसे दूत्कार नहीं सकती।
"मैम,इसकी इन्हीं सब बातों से मुझे दुःख होता है।हमेशा कहती है तुम मेरा प्यार नहीं हो।तुम्हारे साथ मजबूरी में रह रही हूँ।कई और लड़कों से भी खुलकर बात करती है।"
--क्यों नहीं करूंगी?तुम्हारी गुलाम थोड़े हूँ।और हाँ,मैं तुमसे प्यार नहीं करती-यही सच है।
अब अपूर्वा ने दोनों के बीच दखल दिया --ऐसे कैसे लड़ रहे हो तुम लोग।पहले की सब बात भूलकर एक- दूसरे का साथ दो।शादी करो और इत्मीनान से रहो।
--मैम,अभी यह बालिग नहीं है।इसीलिए अभी विवाह नहीं कर सकते।दो महीने बाद यह दुबई कमाने जाएगा,इसके चाचा भेज रहे।3 साल बाद लौटेगा ,तब शादी करेंगे।आपको हमारा गार्जियन बनना पड़ेगा ।बस और कुछ आपसे नहीं चाहिए ।इसके आने तक मैं भी कुछ पैसे जोड़ लूंगी।ये कमाकर लाएगा ही।शादी धूमधाम से करेंगे और अपना घर बसाएंगे।
-इसके जाने के बाद अकेली रहोगी ?
--मैम ये कह रहा था कि तुम्हें मैम रख लें तो मुझे कोई चिंता नहीं रहेगी।तुम्हारा किराए और खाने -पीने का खर्चा बचेगा तो कुछ पैसा जोड़ लोगी।मैम रखेंगी मुझे....।
'सोचकर बताऊंगी।अपने घरवालों से पूछना पड़ेगा मुझे'
अपूर्वा ने बात टाल दी।
एक दिन अपूर्वा ने बड़े ही संकोच से राखी से पूछा--तुम दोनों साथ रहते हो तो क्या फिजिकली भी..!
राखी ने बिना किसी झिझक के जवाब दिया--'हम सेक्स भी करते हैं।वह तो इसके बिना रह ही नहीं सकता।'
--अगर कोई बच्चा....!
'इतनी नादान थोड़े हूँ।एहतियात बरतती हूँ।'
-मान लो कुछ दिन तुम्हें यूज करके छोड़कर चला जाए तो
--।
'ऐसा नहीं करेगा...करेगा भी तो क्या!मुझे तो कोई भी अपना लेगा।कितने लोग मुझ पर मरते हैं।मुझ -सी इसे कहाँ मिलेगी।'
अपूर्वा समझ गई कि राखी न तो भोली है न मजबूर।वह लड़की होने की ताकत जानती है।लड़की होने को भुनाना जानती है। अपनी उम्र और देह को मर्दों के ऊपर हथियार की तरह इस्तेमाल करना जानती है।यह लड़की उसके लिए भी खतरनाक साबित हो सकती है।अगर उसे अपने घर रख लेगी तो वह बाहर जो-जो करेगी उसका इल्ज़ाम उस पर भी आ सकता है।हो सकता है ये दोनों आपस में ही कट -मरें।दोनों को ही एक -दूसरे पर विश्वास नहीं है।राखी शशांक से ज्यादा तेज़,चतुर और अनुभवी है।उसने अपने अनुभवों से खासी ट्रेनिंग ले ली है।
हो सकता है राखी का पिता उसी पर पुलिस केस कर दे कि वही राखी को बहकाकर अपने लाभ के लिए अपने घर रखी है और गलत काम कराती है।वह भी तो अकेली है परिवार साथ होता तो कोई बात नहीं थी।अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए चुना गया उसका यह कदम उसको भारी पड़ सकता है।
हो सकता है दोनों प्लानिंग करके उसके पास आ रहे हों कि अकेली महिला को बेवकूफ बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेंगे।किसी दिन उसे मारकर उसकी सम्पत्ति भी हथिया लेंगे।आज के समय में यह असम्भव नहीं।उसकी समाजसेवा उस पर भारी पड़ सकती है।
नहीं ..नहीं वह अपने जीवन के सूनेपन को पराई रौनक से नहीं भरेगी।पहले भी कई लड़कियाँ उसे मूर्ख बनाती रही हैं ।वह तो ईश्वर की कृपा से बाल -बाल बचती रही है।
तीन वर्ष पूर्व भी एक लड़की नगमा उसके घर रही थी ।वह अपने अम्मी अब्बू के साथ उसके घर किराएदार के रूप में आई थी। उसने बताया था कि वह अंग्रेजी से एम ए करने शहर आई है।सुरक्षित घर की तलाश है ,फिर वह अकेली ही रहेगी।
उसके माता पिता उस पर उसकी जिम्मेदारी छोड़कर गांव लौट गए थे ।उसने सोचा कि 18 साल की बच्ची से किराया नहीं लेगी।उसकी पढ़ाई में भी पूरा सहयोग करेगी। बाद में पता चला कि पढ़ाई के बहाने वह कुछ और ही करती है।पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ कि धार्मिक माता- पिता की इकलौती यह दुलारी संतान ऐसा भी काम कर सकती है।वे कितने विश्वास से उसे शहर भेजकर पढ़ा रहे थे।इसके लिए उन्हें अपने मजहब के लोगों से कितना कुछ सुनना पड़ता था।रिश्तेदारों में फ़ज़ीहत अलग होती थी।