Vaishya ka Bhai - 2 in Hindi Classic Stories by Saroj Verma books and stories PDF | वेश्या का भाई - भाग(२)

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वेश्या का भाई - भाग(२)

कुछ वक्त के बाद केशर बाई की पालकी नवाबसाहब की हवेली के सामने जाकर रूकी,साथ में बब्बन और जग्गू भी पीछे पीछे आ पहुँचें,केशरबाई जैसे ही पालकी से उतरी और उसके कद़म जैसे ही हवेली के दरवाज़े पर पड़े तो उसने उसी शख्स को वहाँ पर देखा जो कल रात उसके कोठे पर आया था,उसे देखकर केशरबाई कुछ ठिठकी लेकिन कुछ सोचकर उसने आगें कद़म बढ़ा दिए।।
वो अपनी मदहोश़ करने देने वाली अदाओं के साथ महफ़िल में दाखिल हुई,उसकी मस्तानी चाल ग़जब ढ़ा रही थी,उसका अनारकली गहरे हरे रंग का लिब़ास वहाँ मौज़ूद लोगों पर बिजलियाँ गिरा रहा था और वो सबको अनदेखा करते हुए फर्श पर बिछे गद्दे पर मस़नद के सहारे जा बैठी और अपने घुँघरूओं की लाल थैली भी वहीं रख दी,
आ गईं मोहतरमा! आप! ,नवाबसाहब का नौकर आ कर बोला।।
जी! कब की पहुँच हूँ,कोई ख़बर ही नहीं लेता,केशर ने बनावटी गुस्से में जवाब दिया,
गुस्ताख़ी मुवाफ़ मोहतरमा! नवाबसाहब ने मुझे आपकी ख़िदमत में भेजा है,नौकर बोला।।
ठीक है...ठीक है....इतनी इताअत करने की कोई जुरूरत नहीं है,केशरबाई बोली।।
जी! मैं फ़ौरन ही नवाबसाहब को ख़बर करता हूँ कि आप तश़रीफ़ ला चुकीं हैं,इतना कहकर नौकर चला गया।।
केशरबाई गद्दे पर बैठकर कमरें की सजावट बड़े गौर से देख रही थी,सब कुछ बहुत ही आला दर्जे़ का था, वो कभी अपने माथे पर आती लट को पीछे करती तो कभी अपने लिबास़ का पल्लू ठीक करती,आज उसका इरादा अपनी दिलनशीं अदाओ से सबको घायल करने का था,यही हिदायत देकर गुलनार ने उसे यहाँ भेजा था,तभी उस कमरें में वो शख्स दाखि़ल हुआ जो उसे बाहर मिला था,
वो उसे बहुत ही अज़ीब निगाह़ों से देख रहा था,केशर को कुछ अच्छा नहीं लगा और उसने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया,तभी नौकर केशर के पास आकर बोला.....
मोहतरमा! आपको हुजूर ने याद फरमाया है।।
जी! चलिए और इतना कहकर केशर उठी अपने घुँघरूओं की लाल थैली हाथों में पकड़े नौकर के पीछे-पीछे चलने लगी,वो कुछ वक्त में नवाबसाहब के कमरें में दाख़िल हुई,नौकर केशर को कमरें में छोड़कर चला गया,नवाबसाहब ने केशर की तरफ़ प्यासी नज़रो से देखा और बोले....
मोहतरमा!आज तो आपकी जवानी में जो रंगत आई है ना! कि अच्छे अच्छों का कत्ल कर दें।।
ऊपरवाला ख़ैर करें नवाबसाहब! मुझे क्या ये काम करने के लिए बुलाया है आपने?केशर बाई बोली।।
हम झूठ थोड़े ही कह रहे हैं मेरी ज़ान! कात़िल तो आप है,ऐसी कातिलाना अदाएं जो पाईं हैं आपने,नवाबसाहब बोले।।
बस ऊपर वाले का फ़ज़ल है और आपका रह़म है,नहीं तो ये नाचीज़ तो कोई चीज़ ही नहीं है,केशरबाई बोली।।
आप क्या चींज़ हैं ये आपको क्या मालूम? ये तो आप हम जैसे हुस्न के कद़रदानों से पूछिए,नवाबसाहब बोले।।
हुस्न के कद़रदानों को मैं खूब समझती हूँ,बचपन से देखा और सहा है इनको,केशरबाई बोली।।
माँफ कीजिएगा,हम कुछ समझें नहीं,नवाबसाहब बोले।।
आप ना ही समझें तो ही अच्छा होगा आपके लिए,नवाबसाहब बोले।।
ये कैसीं बातें कर रहीं हैं आप!नवाबसाहब बोले।।
गुस्ताख़ी माफ़ हुजूर!कनीज़ से ग़लती हो गई,केशरबाई बोली।।
तभी वो शख्स कमरें में दाखि़ल हुआ जो बाहर था,उसे देखकर केशर फिर से हैरान सी हो गई....
तब नवाबसाहब ने उस शख्स से कहा.....
देख नहीं रहें ,हम यहाँ मोहतरमा से कुछ जुरूरी बात कर रहें हैं तुम बाहर जाओ,हम तुमसे बाद में मिलते हैं।।
जी! हुजूर! गलती हो गई माँफ कर दीजिए और इतना कहकर वो शख्स चला गया।।
उस शख्स के जाते ही केशर बोली....
बड़ा ही बेहूदा इन्सान है,ज़रा भी त़मीज़ नहीं है।।
ऐसा ना कहें मोहतरमा! दिल का बड़ा ही नेक और दरियादिल इन्सान है,बस थोड़ा मोटी अक्ल का है,हमारा दायाँ हाथ है ये,इसके बिना हम कुछ भी नहीं,मंगल नाम है इसका।।
मंगल नाम सुनते ही केशर के खूबसूरत चेहरें पर शिकन आ गई और वो परेशान हो उठी,उसके चेहरें का उड़ा हुआ रंग देखकर नवाबसाहब ने पूछा.....
क्या हुआ मोहतरमा?आप परेशान क्यों हो उठीं?
जी!कुछ नहीं,बस ऐसे ही ,केशर बोली।।
तो फिर चलिए,महफ़िल में लोंग आपका इन्तज़ार कर रहे होंगें,नवाबसाहब बोले।।
जी! आप चलिए,मैं जरा अपना हुलिया ठीक करके और पाँव में घुँघरू बाँधकर आई,केशर बोली।।
ठीक है तो हम चलते हैं,आप जरा जल्दी तशरीफ़ रखिएगा और इतना कहकर नवाबसाहब चले गए।।
तब केशर ने कुछ सोचते सोचते पाँव में घुँघरू बाँधें,आइने में खुद को देखा और चल पड़ी महफ़िल की ओर,वहाँ पहुँची तो सबकी निगाहें उस पर ही टिक गई,
केशर ने जो हुस्न पाया था उसकी तारीफ़ के लिए लफ्ज़ ही नहीं थे किसी शख्स के पास,कमान सी भौहें ,काली आँखें,गुलाब के समान होंठ,पैनी नाक़,मोर सी गरदन और संगमरमर से तराशा बदन,जब उसने नाचना शुरू किया तो महफ़िल में बिजली सी कौंध गई,उसकी आवाज़ का जादू सबके सिर चढ़कर बोलने लगा,बस सबके मुँह से एक ही लफ्ज़ निकल रहा था वो था वाह....वाह....केशरबाई....वाह...वाह....
लेकिन कोने में खड़ा मंगल ये तमाशा़ अब और ना देख पाया,फिर वो कुछ सोचकर बाहर चला गया,इधर केशर का थिरकना बंद हुआ उधर महफ़िल में एक ख़ामोशी सी छा गई,केशरबाई को नवाबसाहब ने पोटली भर सोने की अशर्फियों से नवाज़ा,केशरबाई खुश हुई और मेहमान-खा़ने में जाकर सुस्ताने लगी।।
तभी मेहमान-ख़ाने में मंगल दाखिल हुआ,उसे देखकर केशरबाई कुछ चौंकीं और हिम्मत करके उससे पूछा.....
तुम! तुम यहाँ क्या कर रहे हो?तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की?
जी! मैं आपसे कुछ कहने आया था,मंगल बोला।।
हाँ! तो जल्दी कहो जो कहना चाहते हो,केशर बोली।।
आपका यूँ महफ़िलों में नाचना-गाना ठीक नहीं,मंगल बोला।
बक़वास बंद करों और निकल जाओ यहाँ से ,तुम कौन होते हो मुझे सलाह देने वाले?केशर के ऐसा कहते ही वो कमरें से चला गया और फिर केशर ने अपने घुँघरू उतारें और चल पड़ी बाहर की ओर,पालकी में बैठी ,पालकी वालों से कहा...
पालकी कोठे की तरफ़ लेलो।।
इधर नवाबसाहब ,केशर को ढूढ़ते रह गए और उधर केशर कोठे की तरफ़ चली गई ,नवाबसाहब ने मंगल से पूछा तो मंगल ने जवाब दिया कि.....
वें तो बिना कुछ कहें ही चलीं गईं।।
और नवाबसाहब ,मंगल का मुँह ताकते रह गए।।
उधर केशर आगबबूला होकर कोठे में दाख़िल हुई और फिर गुलनार खाल़ा ने केशर से पूछा.....
क्या नज़राना पेश़ किया है नवाबसाहब ने?
मेरा स़र ! मैं उस गुस्त़ाख़ का मुँह तोड़ दूँगी,केशर बोली।।
किसका? नवाबसाहब का,गुलनार ने पूछा।।
ना....ख़ालाजान! उस मंगल का,केशर बोली।।
किस मंगल का अमंगल करने वाली है आप! गुलनार ने पूछा...
खाल़ाज़ान! नवाबसाहब के यहाँ था एक स़रफ़िरा,केशर बोली।।
तो क्या उसने आपको छेड़ा?गुलनार ने पूछा।।
जी! नहीं ,केशर बोली।।
तो फिर आप उस पर इतना क्यों बिगड़तीं हैं? गुलनार बोली।।
वो बोला कि इस तरह से मेरा महफ़िलों में नाचना गाना अच्छा नहीं,केशर बोली।।
अच्छा! उसकी इतनी हिम्मत,गुलनार बोली।।
वही तो ख़ाला !मुझे भी इसी बात पर गुस्सा आ रहा है,केशर बोली।।
आप! गुस्सा थूक दें और इस भारी लिबास़ को बदलकर कुछ खा-पीकर आराम करें ,सुबह बात करते हैं,गुलनार बोली।।
हाँ! बड़ी भूख़ लगी है,नवाबसाहब के यहाँ कुछ खा ही नहीं पाई,केशर बोली।।
हाँ! जाइए! मैं तब तक वहीदा से आपके लिए खाना लगाने को कहती हूँ और इतना कहकर गुलनार चली गई।।
फिर केशर ने भारी-भरकर लिब़ास को खुद़ से दरकिनार किया और खाने बैठ गई,खा-पीकर जब वो अपने बिस्तर पर लैटी तो वो शख्स उसके ज़ेहन में घूमने लगा और उसने मन में सोचा....
मंगल....ये नाम तो जाना-पहचाना सा लगता है,कहीं ये वही मंगल तो नहीं,लेकिन ये कैसे हो सकता है? फिर उसे कुछ समझ नहीं आया तो वो गज़लों की क़िताब उठाकर पढ़ने लगी,किताब पढ़ते-पढ़ते वो कब सो गई उसे पता ही नहीं चला....

क्रमशः....
सरोज वर्मा......