Tere Mere Darmiyan yah rishta anjaana - 23 in Hindi Fiction Stories by Priya Maurya books and stories PDF | तेरे मेरे दरमियां यह रिश्ता अंजाना - (भाग-23) सार्थक- पंखुडी की नो

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तेरे मेरे दरमियां यह रिश्ता अंजाना - (भाग-23) सार्थक- पंखुडी की नो








अस्मिता जब वापस घर मे आती है तो पाती है कि आदित्य बैड पर आकर सो गया था। अस्मिता मन में -" हे भगवान यह फिर सो गये ।"
अस्मिता के दिमाग मे एक खुरापात चल रही होती है वो आदित्य के पास जाकर उसके कानों मे अपने बालों को धीरे धीरे डालते हुये मुहं बंद कर हसने लगती है और इधर आदित्य को गुदगुदी हो रही थी । आदित्य अपना कान तकिये से ढकते हुये -" अस्मि क्यो रही हो आप सोने दो ना।"
अस्मिता -" इतनी सुबह हो गयी है धूप तक निकल आई और आप सो रहें हैं और यह अस्मि क्या है हमारा नाम अस्मिता है।"
आदित्य सोते हुये मुस्कुराकर -" यह हमने रखा है आपका नाम मेरी अस्मि ।"
अस्मिता - " हाँ हो गया ना अब चलिये उठिए।"
आदित्य -" ना"
अस्मिता उसकी आँखो को हाथ से जबर्दस्ती खोलते हुये -" देखीये इस हसीन दुनिया को कितनी सुंदर हैं ।"
आदित्य मुह बनाकर उठते हुये -" यार ऐसा कौन है पूरी आंख ही निकाल दोगी क्या,,,,,,,,,,,।"
इतना बोल ही उसकी आवाज धीरे हो जाती है क्योकि उसकी नजर सामने अस्मिता पर पड़ती है जो सिर पर दुपट्टा डाले कानो मे छोटी छोटी झुमके डाली मुस्कुरा रही थी।

आदित्य तो उसकी आँखो मे ही खो जता है फिर धीरे से बुदबुदाते हुये -" सही बोला सामने की दुनिया तो बहुत हसीन है।"
अस्मिता -" क्या,,,?
आदित्य उसका हाथ पकड़ खूद की तरफ खिंच कर धीरे से -" स्स्स्स्स्स ,,, बिल्कुल चुप रहो।"
इतना बोल अस्मिता को चेहरे को देखने लगता है और अस्मिता उसकी नजरे सीधे अपने ऊपर महसूस कर अपनी आँखे इधर उधर फेरने लगती है।
उनके घर का दरवाजा बंद नही था इसलिये वाणी अंदर घुसते हुये आती है और जो से बोलते हुये -"अस्मिता , वो मै तुम,,,,,, को,,,,,,।" सामने का नजारा देख उसकी आवाज सुख जाती है।
वाणी जल्दी से अपने आंख बंद करते हुये -" तुम लोग चालू रहो मै जा रही ,,,।"
अस्मिता आदित्य उसे जल्दी से दूर हो जाते हैं । आदित्य उठकर बाहर चला आता है। अस्मिता जल्दी से वाणी के पास आते हुये -" क्या हुआ वाणी?"
वाणी अपने आँखे पर रखे हाथ की उँगलियो को हल्का से खोल देखते हुये -" वो राधिका दीदी की काकी बुला रहीं है तुमको।"
अस्मिता उसका हाथ हटाते हुये -" किस लिये ,।"
वाणी चाहकते हुये -" राधिका दीदी की शादी है ना तो हल्दी के लिये ,,, दो घण्टे मे आ जाना और जीजू को भी ले आना ,,, वैसे तुम दोनो मस्त लग रहे थे साथ मे।"
इतना बोल वाणी आँखे मारते हुये वहाँ से भाग जाती है और बेचारी अस्मिता टमाटर सा मुँह ले वही शर्माने लगती है।
आदित्य लगभग आधे घंटे बाद बाहर से नहा धुल कर वापस आता है। सफेद शर्ट मे किसी राजकुमार से कीमी नही लग रहा था। वो बाहर दरवाजे पर ही एक हाथ रख अंदर देख रहा था।



जब घर के अंदर का नजारा देखता है तो एकदम हैरान रह जाता है और जब उसकी नजर अस्मिता पर पड़ती है तो हसते हसते लोट पोट हो जाता है।
अस्मिता उसकी हसी सुन पीछे मुड़ देखती है तो उसका मुह बन जाता है।
आदित्य अंदर आ अस्मिता के सामने खड़ा हो -" यह क्या कर रही थी ,,,, "
अस्मिता मासूमियत से -" खाना बना रही थी।"
आदित्य टपाक से -" मुझे लगा सब्जियो और आटे से जंग लड़ रही थी।"
अस्मिता चिढ्ते हुये -" क्या करू मुझे नही आता बनाने।"।
आदित्य आश्चर्य से -" क्या तुम्हे खाना नही आता फिर कौन बनाता है ।"
अस्मिता एक छोटे बच्चे के तरह -" बाबा।"
आदित्य -" मतलब तुम्हे कुछ नही बनाने आता।"
अस्मिता -" नही "
आदित्य मन में -"हे भगवान अब तो खाना भी बनाना पड़ेगा शादी के बाद ।"
आदित्य उसके बालों से सब्जियो के छिलके निकलते हुये -" पहले जाओ मुह धुलो और यह सब ठीक करो आप ,,, हम बना रहे है खाना ।"
अस्मिता आश्चर्य से -" आपको खाना बनाना आता है ,,, मतलब की आप लड़के हैं ऊपर से ठाकुर परिवार के ।"
आदित्य हसते हुये -" मैडम जी ,, हम शहर मे रहते है तो खाना तो कोई जादू की परी बनायेगी नही।"
अस्मिता -" तो कोई कामवाली रख लेते आप।"
आदित्य -" मुझे दूसरो का अपनी चीजे छूना पसंद नही सिवाय अम्मा के।"
इसके बाद अस्मिता वही खड़ी हो आदित्य को देख रही थी और मन ही मन बोल सोच रही थी -' वाह अस्मिता वाह अगर तेरे नसीबो में यह रहे तो जिन्दगी स्वर्ग बन जायेगी और मै उस स्वर्ग मे रहूंगी एकदम स्वर्गवासी की तरह ,,,, फिर अपने ही बात पर खूद को मारते हुये -" शुभ शुभ बोल अस्मिता अभी तो तेरी शादी भी नही हुई आदित्य बाबू से इतना जल्दी टाय बोलने की सोच रही है ।"
आदित्य की नजर जब उसपर जाती है जो खूद से ही बाते सोचने मे गुम थी तो अपने सर पर हाथ रख -" भगवान जाने इस पगाल लड़की का क्या होगा।"

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दुसरी तरफ पंखुडी रोते हुये जल्दी-जल्दी दौड इमली के उसी बागीचे में आ गयी और उसके पीछे सार्थक भी ।
पंखुडी रोते हुये एक पेड के नीचे बैठ गयी सार्थक उसको रोते हुये देख उसके सामने आकर वहीं नीचे बैठ जाता है।
सार्थक को समझ नही आ रहा था की एक लड़की को कैसे शान्त करायें फिर उसे याद आता है की कैसे उसकी राधा भाभी अपने छोटे से बेटे को चुप कराती हैं। वो पंखुडी के चेहरे को दोनो हाथो से पकड लेता है और बेचारी पंखुडी यही पिघलने लगती है लेकिन तभी कुछ ऐसा होता है की पंखुडी का चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है।
सार्थक उसका चेहरा पकड कर -" आआ ,, चुप हो जा मेरा बच्चा।"
इधर जो बागीचे मे रखवाले थे वो भी मुँह बंद कर हंसने लगते हैं ।
पंखुडी उसका हाथ जोर से झटकते हुये चिल्लाती है -" मै कोई छोटी सी बच्ची हू क्या ?"
सार्थक उसको चिल्लाता देख कान बंद कर लेता है।
पंखुडी उठ कर एक पैर को घिस कर जाते हुये -" पगाल इन्सान ,,,,,,, देखो आप अब मेरे पीछे मत आना समझे ।"
सार्थक को इस बार न जाने क्यू बहुत बुरा लग रहा था क्योकि वो चाहता था की पंखुडी उससे लड़ ले झगड ले या परेशान ही कर ले लेकिन ऐसे उससे गुस्सा ना हो।
आज सार्थक को बहुत अजीब लग रहा था साथ ही गुस्सा भी आ रहा था । वह अपनी मुठियां भिजते हुये उअथ कर जाता सीधे पखुडी के पास जाता है।
पखुडी कुछ समझ पाती उससे पहले ही सार्थक उसे बिना भाव से अपनी गोद मे उठा लेता है और बेचारी पंखुडी उसका चेहरा ही देखते रह जाती है और सार्थक बिना उसे देखे सामने देखते हुये पंखुडी को पेड के नीचे बिठाकर उसके पाँव को देखने के लिये अपना हाथ बढाता है लेकिन पंखुडी पाव पीछे कर लेती है।
सार्थक गुस्से से -" चुप,,,, एकदम शान्ति से बैठो ,,, और हिलना डूलना तो बिल्कुल नही ।"
पखुडी उसके गुस्से को देख शान्त हो जाती है और सार्थक एक रखवाले से कुछ मलहम और पानी मँगवाता है। सार्थक पानी से पहले चोट को धूलता है फिर उसपर मलहम लगाने लगता है ।
इधर पखुडी भला कब तक चुप रहती वो धीरे धीरे बड़बड़ाते हुये -" पहले चोट दो फिर उसपर मलहम लगाओ।"
सार्थक उसकी बात सुनकर -" ताना मार रही हो।"
पखुडी मन मे -" कौए का कान है क्या इतना धीरे भी सुन लिया।
सार्थक मुस्कुराते हुये -" हाथी का ।"
पंखुडी -" यह इन्शान ही न है मन की बात भी सुन लिया।"
सार्थक -" नही भूत ।"
अभी पंखुडी कुछ बोलती तभी शायद थोडा तेजी से उँगलियो से छूने की वजह से चोट दर्द कर जाती है।
पंखुडी -" आआ ह्ह्ह्ह ,,,,।"
सार्थक जल्दी से जल्दी फुक मारते हुये -" माफी ,,, अब नही दर्द करेगा।"
पखुडी तो पूरा लड़ने के मूड मे थी -" जब आता नही है तो लगाने क्यूं आये।"
सार्थक इस बार गुस्से से चोट को सच मे दबा देता है जिससे पखुडी उछल कर खड़ी हो जाती है।
सार्थक -" तो अब जाओ खूद ही लगा लो और निकलो बागीचे से ,,, अब कभी आई तो फिर देख लेना।"
पखुडी भी गुस्से से -" आऊंगी आऊंगी आऊंगी ,,, देखती हू क्या बिगाड़ लेते हो मेरा। "
पखुडी इतना बोल धीरे धीरे वहाँ से चली जाती है और इधर सार्थक गुस्से को शान्त कर मन में -" अजीब लड़की है ऐसे लडती है मानो बीवी हो,,,,, और यह मुझे क्या हो गया था आज।"
सार्थक अगले पल खूद के चेहरे पर सख्त भाव लाकर वहाँ से चला जाता है लेकिन अब यह अजीब लड़की सार्थक बाबू के दिल के किसी न किसी कोने में जगह तो बना ही चुकी थी।


क्रमश: