Chhal - 12 in Hindi Moral Stories by Sarvesh Saxena books and stories PDF | छल - Story of love and betrayal - 12

Featured Books
  • ते घर अजूनही जागं आहे

    पावसाळ्याची ती रात्र होती.रात्रीचे साडेअकरा वाजले होते. अमोल...

  • मन मस्त मलंग

    भूतकाळातील गडद सावल्या त्यांच्या  आयुष्यावर किती खोल परिणाम...

  • The Anti-Hype Books (Part-1)

    **अस्वीकरण (Disclaimer):**  ही समीक्षा केवळ माहितीपूर्ण आणि...

  • नाते जन्मापलिकडचे - भाग 2

    ती पुन्हा त्याला शोधू लागली. तिची इच्छा होती एकदातरी त्याचे...

  • 50 minutes

    Prologueकाही लोक आयुष्यात येतात सगळं बदलायला आणि मग निघून जा...

Categories
Share

छल - Story of love and betrayal - 12

कॉलेज में जब प्रेरित ने उसी लड़की को देखा तो वो अपने ख़यालों से बाहर निकला और उस लड़की से बोला, "तु.. तुम… यहां…" |

लड़की - "हां… मैं यही पढ़ती हूं, न्यू एडमिशन.. और तुम?

प्रेरित - मैं तो यहां का पुराना स्टूडेंट हूं"

मैं अभी आगे कुछ और कहता तभी आवाज आई |

क्लास शुरू होने वाली है, प्रेरणा… जल्दी आ (प्रेरणा की सहेली ने आवाज दी) |

मैंने आहें भरते हुए कहा, " ओह प्रेरणा.. वाह.. व्हाट ए नाइस नेम " |

मेरे दोस्त उसे देखकर मुझे छेड़ने लगे ।

उस दिन के बाद हम रोज मिलने लगे, एक ही कॉलेज में होने से मिलने में कोई दिक्कत भी नहीं होती थी |

महीनों बीत गये, मैं प्रेरणा से कई बार अपने दिल की बात कहने जाता पर हिम्मत नहीं होती फिर एक दिन मैं हिम्मत जुटाकर उसके पास गया |

मैं कुछ कहता इससे पहले उसकी आंखों में आंसू बहने लगे, मेरे पूछने पर पता चला कि उसके गांव से कोई आया था जिसने बताया उसका घर जो गिरवी था वह समय से पैसे ना देने के कारण बिक गया, मुझको पता था की प्रेरणा का इस दुनिया में कोई नहीं है ।

मैंने प्रेरणा को गले लगा लिया और कहा,

"मैं हूं ना.. फिर क्यों चिंता करती हो, मैंने प्रेरणा से वादा किया हम जल्दी शादी करेंगे"|

प्रेरणा (आंसू पोछते हुए) - "तुम.. तुम ना मिलते तो मुझे कौन इतना प्यार करता प्रेरित" |

प्रेरणा ने यह कह कर मुझे बाहों में भर लिया|

तभी किसी के कदमों की आहट सुनाई पड़ी तो भैरव और प्रेरित लेटे लेटे बाहर की ओर देखने लगे तो ज्ञानेश्वर सिंह पूरे जेल का दौरा कर रहे थे जो अक्सर रात में किया जाता था |

" सब ठीक है.. चलो " यह कहकर वो चले गए |

कुछ दिनों बाद….

" प्रेरित शर्मा, चलो कोई मिलने आया है, रोज रोज ना जाने कौन मिलने आ जाता है" |

हवलदार ने बुदबुदाते हुए कहा और लॉकर का दरवाजा खोल दिया |

प्रेरित मीटिंग रूम में आया तो देखा कुशल मिलने आया था |

कुशल (दया भरी आवाज में) - "कैसे हैं सर" ?

प्रेरित - "ठीक हूं…, तुम कहो "|

कुशल (प्रेरित की तरफ पेन बढ़ाते हुए) - " सर ये कंपनी के सारे डॉक्यूमेंट साइन कर दीजिए" |

प्रेरित ने सभी काग़जों पे साइन कर दिए और बोला, "अपने लिए भी कोई नौकरी ढूंढो, कब तक मेरी गुलामी करते रहोगे"|

कुशल - "अरे सर प्लीज ऐसा मत कहिए, आप ही की वजह से तो मैं यहां तक पहुंचा हूं, मेरी कभी भी जरूरत पड़े तो मुझे जरूर बताइएगा, वैसे तो अब इस शहर मे नौकरी करने का दिल नहीं करता, पर जब भी यहाँ आऊँगा आपसे जरूर मिलने आऊँगा" |

प्रेरित - " हां जरूर, वैसे मेरी मदद करने के लिए थैंक्स, अब जाओ यह सारी जमीन नीलाम करके सब का कर्ज उतार दो "|

कुशल उदास होकर चला गया और प्रेरित फिर जेल के अंदर भैरव के पास आकर बैठ गया और बिना कुछ बोले गहरी सांस लेने लगा |