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वेलेंटाइन डे उर्फ़ ओ बी आर उर्फ़ लाल गुलाब से डर लगता है

[ नीलम कुलश्रेष्ठ ]

मैं ग़लत थी -----मेरी धारणाये ग़लत थीं. उस वेलेन्टाइन डे यानि 14 फरवरी 2012 को उनके ही परखच्चे उड़ गए. कभी भी किसी से नारीवाद पर बहस होती मैं कह देती थी, बहुत हो गया नारीवाद, अब सब दस ग्यारह वर्ष में डिब्बे में बंद होने वाला है. बीसवीं सदी में स्त्रियों ने पुरुष सत्ता की ताकत, उसकी पकड़ देखी है वह उस सदी के अंत में राग अलापने लगीं थी कि अभी बराबरी की बात जाने दीजिये, कम से कम हमारे लिए अपनी मांनसिकता तो बदलिये. मेरे अपने अनुभव भी हैं कि मीडिया किस तरह इसे कुचलने में लगा है. मेरे ऐसे लेखों की लम्बी फेहरिस्त है खासकर गुजरात महिला समाख्या की नारी अदालत पर लिखा दस वर्ष पूर्व का सर्वे व दस वर्ष बाद का सर्वे कि किस तरह चार तालुका में चलने वाली नारी अदालत आज ग्यारह तालुका में चल रही है, ग्रामीण स्त्रियों को इनसे मुफ्त में या बहुत कम पैसे में न्याय मिल रहा है. मैं इस लेख से सारे देश को बताना चाहती थी कि गुजरात की ये नारी अदालतें एक रोल मॉडल है. गुजरात सरकार ने भी इसमें रूचि लेनी आरंभ कर दी है. सच मानिये मेरा कहाँ कहाँ घूमता ये लेख अप्रकाशित ही रह गया है, अब मैंने अपनी पुस्तक "परत दर परत स्त्री " में ले लिया है. 

अनुभव तो औरों के भी बहुत हैं लेकिन अहमदाबाद की तीस वर्ष पुरानी स्त्रियाँ के लिए काम करने वाली संस्था "आवाज़ की इला पाठक की अपने अनुभवों पर आधारित तीन गुजराती पुस्तकों का विमोचन था. जान पहचान के रिपोर्ट्स के कारण दो चार समाचार पत्रों में ये ख़बर आ गई थी वरना किसी को ये जानने की उत्सुकता नहीं थी कि एक अंग्रेज़ी की व्याख्याता ने अपनी नौकरी छोड़कर महिलाओं के लिए तीस वर्ष काम किया है तो उनके अनुभवों से क्या सीखा जा सकता है?

दिल्ली की कमला भसीन हों या दूर दराज की नारीवादी महिलायें जो समझ रहीं थीं, समझा रही थीं कि बाज़ार में ब्यूटी प्रॉडक्टस की भरमार व आज के बाजारवाद ने स्त्रियों से उनके सपने छीनने की साज़िश रची है. लगभग हर लड़की व स्त्री को ब्यूटी पार्लर से निकलती देख मैं भी यही समझ रही थी. प्रकृति का कितना अनूठा परम सत्य है कि जिस चीज को जितना दबाया जाता है बाद में वह बुरी तरह उछलती है. यहाँ तो उछली नहीं है नारीवाद पूरे धूमधूमधड़ाके के साथ वेलेन्टाइन डे यानि 14 फरवरी 2013 को विस्फ़ोट कर बैठा है, कहाँ तक आप कान बंद करेंगे ?

इसको आरम्भ करने वालीं थीं न्यूयोर्क की ईव एंसेल जिनका नाटक ‘द वेजाइना मोनोलॉग्स'सन १९९६ में अभिनीत किया गया, तब से ही चर्चा में रहा, लोकप्रिय हुआ था। इन्होने अमेरिका की दो सौ महिलाओं के इंटरव्यु लेकर इसे लिखा था कि वे पुरुषों से अपने रिश्ते व सेक्स के विषय में क्या सोचतीं हैं। उन्होंने अपना बयान भी दिया था, "मैं स्त्रियों से दुर्व्यवहार, उनके उत्पीड़न, उनके रेप के विषय में सोचकर बहुत कष्ट अनुभव करतीं हूँ। ये सब कुछ हमारी वेजाइना से सीधे ही जुड़ा हुआ है "

कहाँ तक आप 'वन बिलिअन राइज़िंग' यानि 184 देशों में नाचती थिरकती इस व्यवस्था के प्रति स्त्री शोषण के लिए अपना विरोध प्रगट करती इन स्त्रियों को नजरअंदाज करेंगे ? विश्व में एक जलजला उठ खड़ा हुआ है, एक बवंडर आ गया है -----ऎसा तूफान कि जिसे रोकना अब मुमकिन नहीं है. वो भी उस दिन जिस दिन पुरुष फूल, ग्रीटिंग्स कार्ड, चॉकलेट्स या फ्रेंडशिप बैंड्स देकर अपने प्यार का इज़हार करतें हैं. लेकिन क्या किसी युग में स्त्री पुरुष के बीच के रिश्ते की स्थायी सुरक्षा या सुकून रहा है ? अमेरिका के आँकड़ों के अनुसार हर पांच मिनट में किसी स्त्री का रेप होता है। अपने देश में क्यों लड़कियाँ ससुराल में जला दीं जाती या वे क्यों आत्महत्या करतीं या उनका रेप कर दिया जाता या उन्हें क्यों दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता या उन्हें लाल गुलाब देने के बाद क्यों उनका पति या प्रेमी औरों को भी लाल गुलाब बाँटता फिरता है ? स्त्री हत्या, आत्महत्या या बलात्कार के अपने से या किसी परिचित महिला से जुड़े मामलों को देखकर स्त्रियाँ हमेशा एक भयग्रस्त रहतीं हैं शायर बशीर बद्र जी के शब्दों में कहें तो ;

"ऎसा लगता है कोई साँप छुपा बैठा है

फूल से हाथ मिलाते हुए डर लगता है "

वन बिलिअन राइज़िंग के कार्यक्रम 'अहमदाबाद राइज़िंग 'का यों तो पद्मविभूषण डॉ. मल्लिका साराभाई ने एक डेढ़ माह पहले से इस इवेंट की तैयारी करनी आरंभ कर दी थी. इस माह के आरंभ में मल्लिका जी स्कूल कोलेज़ेज़ में जाकर 1000 लोगो के हस्ताक्षर ले चुकीं थीं जिनमें सभी प्रोफेशनल्स शामिल थे. 

शहर के मुद्रा कम्युनिकेशंस कॉलेज, एन आई डी. एच एल कॉलेज, आनंद निकेतन, सिटी हॉस्पिटल, एच. के. आर्ट्स कॉलेज, स्वामीनारायण कॉलेज, व अस्मिता, बहुभाषी महिला साहित्यिक मंच. अहमदाबाद [ संस्थापिका-नीलम कुलश्रेष्ठ ] व अन्य संस्थान इस जाग्रति अभियान को सपोर्ट कर रहें थे. इस अभियान के विषय में वे बतातीं हैं, "पिछले पन्द्रह बीस वर्षों में भारत में वेलेंटाइन डे बहुत लोकप्रिय हो गया है. मैंने ये दिन इसलिए भी चुना है कि स्त्री पर हुई हिंसा का 70 प्रतिशत पुरुष ही जिम्मेदार है जो कि उसे 'आई लवयु 'कहता है चाहे वह् उसकी माँ हो., पत्‍‌नी हो या बहिन या बेटी हो तो ये कैसा मजाक है ? वेलेंटाइन डे के दिन ही हम इस प्यार के सही अर्थ के लिए लोगों को जागरूक करना चाहतें हैं. "

ये जिम्मा शहर के पश्चिमी छेत्र में सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ.. मल्लिका साराभाई ने लिया हुआ है, पूर्वी छेत्र में इला पाठक 'आवाज़ 'के माध्यम से कार्यक्रम कर रहीं हैं

14 फरवरी 2013 -------गुजरात विध्यापीथ के स्पोर्ट ग्राउंड की तरफ़ मैं चली जा रहीं हूँ सोचते हुए दुनियाँ के हर देश अमेरिका हो या जापान हो या अफ़्रीका या देहरादून या जयपुर या कोई छोटा शहर किस तरह आज स्त्रियाँ समूह बनाकर न्रत्य कर रहीं है, नाटक कर ये बता रहीं हैं कि हम अपने शरीर पर अत्याचार अब और सहन नहीं करेंगे व रैली निकाल कर बता रहीं हैं कि स्त्रियों ! लड़कियों ! उठो, जागो व अपने आस् पास की स्त्रियों की चेतना को जगाओ कि हम अब स्त्री पुरुष के बीच के भेद भाव को अब और नहीं सहेंगे. दुनियाँ भर के स्त्रियों के दिलों में उबलते हुए लावे को आज ब्लॉग्स, ट्विटर व नेट एकजुट कर दिया है. आज ना माँग है राजनीतिक प्रतिष्ठा की, ना पैसे की. बस माँग है हमारा शरीर किसी भी तरह की हिंसा से मुक्त हो. 

भारत की बात करें तो घरेलू हिंसा अधिनियम -2005 कोई हल नहीं खोज पाया हैं जोधपुर के जज. श्री असीम कुलश्रेष्ठ  के अनुसार केन्द्रीय सरकार ने 1100 फास्ट त्रेक कोर्ट की स्थापना की थी जिसमे से आधे कुछ समय के बाद बंद कर दिए गए लेकिन. गुज्ररात जैसे सम्रद्ध राज्यों ने उन्हें बंद ना करके उनकी ज़िम्मेदारी ले ली थी. नयी दिल्ली के दामिनी केस के बाद केन्द्रीय सरकार ने फिर और फास्ट ट्रैक कोर्ट खोलने के आदेश दिये हैं तो प्रादेशिक सरकारो ने अपने पहले बंद किए कोर्ट को ही पुनर्जीवित कर लिया है". समाचार पत्र आज भी उस वीभत्स कांड के बाद रेप कारनामो से रंगे रहते है तो गुस्सा तो लावा बनकर फूटना ही है.. 

मुख्य सड़क से ग्राउंड तक जाने वाली सड़क पर स्कूल बसों की लाइनें हैं, कारें हैं, दोपहिये हैं, पैदल जाते स्त्री पुरुष हैं, आदिवासी स्त्रियाँ हैं और मुस्तैद पुलिस व्यवस्था है. बड़े ग्राउंड में एक बड़े मंच के पीछॆ बड़ा बैनर लगा है ' अहमदाबाद राइज़िंग '. विरोध न्रत्य प्रदर्शन से होना है इसलिए दिल्ली से आया त्रिथा सिन्हा का' स्पेस 'बैंड है मैदान में दूर दूर तक लोग फैले हुए हैं, ये बात अलग है कि स्त्रिया अधिक हैं. ऊँचे स्टैण्डस पर कैमरे लगे हैं. मल्लिका प्रेस को साक्षात्कार देती इधर उधर  जामुनी टॉप में छोटे घेर का लहंगा पहने, कानों में सुनहरे झाले पहने घूम रहीं हैं. कुछ रबारी [दूध बेचने वाली जाती की महिलायें ] आत्मविश्वास से आगे खड़ी हैं. चित्रकार प्रवीण मिश्रा एक मेज पर उंचाई पर खड़े कैनवास पर चित्र बना रहे हैं, विषय है -"ब्रेक योर बॉण्ड "[अपने बंधन तोडो]. अच्छा खासा माहौल विरोध का. लोगों के चेहरे पर एक उत्सुकता भरी मुस्कान है कि देखे 'वन बिलिअन राइज़िंग ' 'होता क्या है ? बच्चे व किशोर जो ये पाठ पद्नने आये हैं, पत्रकार कैम्ररा लिए उत्साह से ये नज़ारा देखते घूम रहें हैं.. कैमरा क्लिक करते घूम रहे हैं. 

कुछ वॉलंटियर्स बैज लगाए लोगों की मदद कर रहे हैं. एक रिबन बाँट रहा है जिस पर ' वन बिलिअन राइज़िंग साउथ एशिया ' लिखा है व मोनोग्रम है और लिखा है 'बस !औरतों पर हिंसा और नहीं '. इस रिबन को कोई गले में पहन रहा है, कोई सिर पर बाँध रहा है. 

मैंने मल्लिका का '600 नॉट आऊट "उंनकी दर्पण एकेदेमी के थियेटर में देखा था जो कि इस शहर के स्थापना के 600 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में था. वे वहाँ 600 वर्ष पुराना माहौल, वैसी अहमदाबाद की पुरानी गलिया बनाने में कामयाब रहीं थी. यहाँ तक की कैफेटेरिया में पुरानी देगो में गर्म होते प्राचीन व्यंजन तक थे. जिनसे उठते धुंये की महक भी छ; सौ साल पुरानी थी. वह् कलात्मक बेमिसाल चितेरी हैं. आज लग रहा है अहमदाबाद की महिला जग्रति का सूर्योदय है मल्लिका साराभाई अपने मुँह के पास हाथ ले जाकर चिल्लाकर घोषणा करतीं हैं, "जागो अहमदाबाद --जागो --अहमदाबाद राइज़िंग --- जागो -----आज दुनियाँ भर की स्त्रियाँ जाग गई हैं---------अहमदाबाद की स्त्रियों इन दो स्क्रीन पर दिखाई जां रही फिल्म को देखकर जागो------जागो अहमदाबाद. ", "

मंच के दोनों ओर लगी दो बड़ी स्क्रीन पर एक फ़िल्म दिखाई जाती है जिसमें हर नस्ल की, हर उमर की स्त्री, लड़की गाकर न्रत्य कर रही है. व गीत से बता रही है वे अब जाग गई है, अपनी देह को किसी भी हिंसा से मुक्त कर लेगी. उसके बाद मंच के माइक से त्रिथा एक गीत प्रस्तुत करतीं है, "जागो मोहन प्यारे -----"जाहिर है ये रिमिक्स है. 

एक युवा लड़की मंच से अपना परिचय देते हुए पूरे विश्व के वन बिलिअन राइज़िंग या इस भीषण क्रांति का जैसे लक्ष्य स्पष्ट कर देती है, मुझे लगता है जो लोग, प्रेस या समर्थन देने वाली संस्थाएँ यहाँ आई हैं, ये शब्द उन्हे उत्तर देते हैं कि उनका यहा आना बेकार नहीं गया. वह् लड़की कहती है, "विश्व में हर छ; मिनट पर एक स्त्री का रेप होता है, विश्व की हर तीसरी औरत को प्रताड़ित किया जाता है. यदि हम सब आज नहीं जागे तो कल हर दूसरी स्त्री को प्रताड़ित किया जायेगा, ---जागो अहमदाबाद -----जागो सारी दुनियाँ की स्त्रियो----अब ऎसा नहीं होना चाहिए. "

काली की स्तुति में एक गीत प्रस्तुत किया जाता है. यहाँ एकत्र हुई स्त्रियो को अह्सास दिलाने कि उनमे भी कितनी शक्ति है. मल्लिका गुजराती में कह्ती, 'हम सब नाचने के लिए इकठ्ठे हुए हैं, सब लोग अपना घेरा बनाकर गरबा शुरू करिये. " कुछ लोग घेरा बनाकर गरबा आरंभ कर देते हैं., मल्लिका भी कुछ साथियों के साथ मंच पर गरबा आरंभ कर देतीं हैं. 

मल्लिका साराभाई बताती हैं, "हम लोग ओ बी आर को अहमदाबाद में लॉन्च करके गुज्रराती अंदाज़ में ' गरबा' व' रास' करके यहाँ लिंगभेद समाप्त करने का आवाहन कर रहे हैं. हमारा अहमदाबाद ऎसा बने कि स्त्री कभी भी, कहीं भी जा सके. ' इस जाग्रति के लिए गुजरात का पारम्परिक गरबा इसलिए चुना है कि इस न्रत्य में कोई लीडर नहीं होता स्त्री व पुरुष समान रुप से गोल घेरे में घूमते हैं. यहा की स्त्री संस्थाये बरसों से ऎसे ही स्त्री पुरुष सम्बन्ध की मांग कर रहीं है -ना कोई आगे ---ना कोइ पीछे. -----जागो अहमदाबाद. "

गरबा गीत पर गरबा तो आरम्भ होता है लेकिन मुझे लग रहा है कि लोगों को गरबा करने से अधिक सुनने की उत्सुकता है. फिर एक स्त्री मंच से नौ लोगों द्वारा अपने रेप की कथा सुना रही है. बिना किसी लोक लाज के. कुछ संस्थाओ के प्रतिनिधि पुरुष माइक से बोलकर इस कार्यक्रम को समर्थन दे रहे है. एक ख़ास बात ये कि ये गरबा स्त्री जाग्रति गीत यहाँ के सुप्रसिद्ध कवियो ने ही लिखे हैं. एक वकील महिला मंच पर आकर बताती है उसने पति से पिटने के कारण तलाक ले लिया था. वह् अकेली बच्चों को पाल रही है व सुखी है. पचास वर्ष की महिला बताती हैं कि वे अपनी ही पहचान के डॉक्टर द्वारा बाइस बार रेप की गई. 

एक लड़का भीड़ में एक बैनर लिए घूम रहा है जैसे उन वहशी पुरुषों के क्रत्यो का प्रायश्चित प्रा कर रहा है, उसके बैनर पर लिखा है '-आई राइज़ बिकोज़ अ वूमन गेव बर्थ टु मी. '

इस सारे प्रदर्शन के एक मुद्दे से मेरा बहुत बड़ा मतभेद है क्योंकि एक लड़की मंच पर आकर कह्ती है, "यदि मैंने किसी बात के लिए 'ना' कर दी तो इसका मतलब 'नो' तो 'नो ' '. सारे विश्व में ये ओ बी आर का एक ज़रूरी मुद्दा है. लेकिन पुरुष हो या स्त्री किसी बात के लिए 'ना' पर अटल रह्कर कभी ज़िंदगी गुज़र सकती है ? इन आंदोलनों का जो नेत्रत्व कर रहीं हैं उन पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि आगे ऐसी समझदारी से काम लें कि स्त्री पुरुष के बीच विरोध ना उभर कर सामंजस्य के अंकुर फूटें. 

विश्व में कुछ ऎसे देश भी हैं जहाँ नारीवद किस चिड़िया का नाम है, ये बात वहाँ पता ही नहीं है. उनमें से एक है साउथ कोरिया व नीदर लैंड जहाँ की हिन्दी विदुषी पुष्पिता अवस्थी फोन पर बताती हैं, "यहा ओ बी आर की ज़रूरत क्या है ? सुबह स्त्रियां व शाम का पुरुष खाना बनाते हैं यदि किसी महिला को कोई पुरुष पसंद आ जाता हॅ तो वे उसे उसके पास जाने की अनुमति दे देता है. इन देशों में बच्चे भी वही सम्भालते है. '

इस फूलों वाले दिन ही स्त्रियाँ एक स्थान पर एकत्र होकर, मंच पर खड़ी होकर बद चढ़ कर बता रही थी कि बचपन में उनका कितने लोगों ने यौन शोषण किया था या कितनी बार उनका बलात्कार हुआ या पति ने कितना पीटा. ये मैं विदेशों की बात नहीं कर रही आंखों देखी भारत की बात कर रह रहीं हूँ जहाँ स्त्रियाँ माइक पर ज़ोर ज़ोर से इस निर्मम सच को बता रहीं थीं, बिना किसी लज्जा के. 

दूसरे शहरों के संक्षिप्त में समाचार है कि पंडित रविशंकर की बेटी ने माना कि उनके पिता के मित्र ने ही उनका यौन शोषण किया था, दिल्ली की समाज सेवी कमला भसीन ने माना किस तरह चार से आठ वर्ष की उम्र के बीच उन्हें तेरह पुरुषों ने ग़लत तरह से छूने की कोशिश की थी. वैसे तो रिंकी भट्टाचार्य, पकिस्तान की तहमीना दुर्रानी बरसों पूर्व पुस्तक लिखकर बता चुकी हैं कि किस तरह वे पति से पिटती थी लेकिन पूजा भट्ट ने लेख लिखकर इस बात का खुलासा किया है. कि उनके पति शराब के नशे में उन्हें पीट डालते थे. इस बात की उन्हें शादी से पहले कल्पना भी नहीं थी. 

इस वन बिलिअन राइज़िंग की ये सफ़लता रही है कि जो स्त्रियां नारीवाद को नहीं समझती, ना कोई कानून जानती, ना अपने अधिकारों से परिचित है, वह् संस्थाओ के प्रोत्साहन पर खुलकर बोली हैं -विश्व के इस कोने से उस तक बोली है. मुझे लगता है महिलाओ ने पहली बार एकजुट होकर एलान किया है वह् भी बोलना जानती है. एक खौफ़ पुरुषों के मन में अवश्य बैठा होगा कि शोषित महिला आज नहीं तो बीस वर्ष बाद भी उसके कुकर्म का खुलासा कर सकती है क्योंकि महिलाओं ने मंचों से वर्षों पहले हुए उनके रेप के विषय में नाम लेकर भी बताया है. मुझे याद आ रही हैं मिजोरम की शर्मिला इरोज़ जो बगावत की तपस्या कर रही हैं, वस्त्रहीन हो. आज दुनियाँ भर की स्त्री की ज़ुबान वस्त्रहीनहोकर उन औरतों को हौसला दे रही है कि आओ तुम भी अपने ग़म उजागर करो, शब्दों को इतना वस्त्रहीन कर दो कि तुम्हें वस्त्रहीन करने के लिए बड़े हाथ काँप जाएँ. इस व्यवस्था का सिर शर्मसार हो जाए.. 

मल्लिका जी का कहना है कि वे भविष्य में भी इस जागृति अभियान को ज़ारी रखेगी. उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे ऎसे विज्ञापन का विरोध करें जिनमें स्त्री शरीर की आवश्यकता नहीं है, स्त्री अपने ऊपर हुए अत्याचार के विषय में खुलकर बोले नहीं तो स्त्री संस्थाओं का 'ब्रेक द साइलेंस "नारा बेकार जायेगा. लड़कियाँ वीडिओ बनाकर, ब्लॉग बनाकर अपना विरोध प्रगट कर सकती हैं. उनका मानना है आज के किशोर, आज के युवा ये बदलाव लायेंगे. जिस तरह निर्भया या दामिनी ने सारे देश को एक जुट कर दिया था आइए हम प्रार्थना करें कि इस वर्ष का 'अहमदाबाद राइज़िंग 'अगले वर्ष का ' इंडिया राइज़िंग ' बन जाए. 

14 फरवरी के बाद तक मैं 'कन्फ़्यूज़्ड 'थी ओबी आर को लेकर. अपने विचलित मन के कारण सम्पादक नमिता सिंह जी को फोन किया. दो कलमकारों ने आज की स्त्री[लड़कियों ] पर. लम्बी बात की. वे भी कह रही थीं, "मैं इस नई लड़की को देखकर ' कन्फ़्यूज़्ड ' हूँ'. 'बाद में ये लेख लिखने बैठी तो चिंतन किया, नेट पर इसे समझा. ये विश्वव्यापी आँधी भरा मुहिम है कि अगर अभी नहीं बोले तो पुरुषों की इतनी हिम्मत ना बढ़ जाए कि कहीं तीसरी स्त्री के स्थान पर हर दूसरी स्त्री प्रताड़ित होने लगे, रेप और होने लगे. 

लता शर्मा की किताब "खिड़की के पास वाली जगह " मुझे बहुत याद आ रही है जिसमें उन्होंने अपनी एम. एससी' रिश्ते की दो बहिनों का वर्णन किया है जो ससुराल प्रताड़ना के कारण मृत्यु तक पहुँचाई गई थी व एक के पिता की मृत्यु भी इसी कारण हुई थी. उनका सुझाव है कि लड़कियों को स्त्री संबन्धी अधिकारों को शिक्षा का एक हिस्सा बनाना चाहिए. ओ बी आर की चर्चा करते हुए अगली जाग्रति दिवस पर [जरूरी नहीं है वह् एक वर्ष बाद ही आए] मेरा अपना सुझाव है ये बात भी इन आंदोलनों का हिस्सा बने. मैंने भी सन् 2002 में अपनी पुस्तक"'जीवन की तनी डोर ;ये स्त्रियाँ ' में लिखा था कि ये नारीवाद ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है, कभी भी विस्फ़ोट हो सकता है. क्या इस वर्ष का वेलेंटाइन डे उसी ज्वालामुखी का पहला विस्फ़ोट तो नहीं है जो सारे विश्वं में इतनी शिद्दत से मनाया गया है ? पहले मैं समझती थी कि नारीवाद नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनता जा रहा है लेकिन दिल्ली की दामिनी केस से विचलित हुए उठ खड़े सारे देश की आवाज़ से नक्कारखाने की आवाज़ भी थर्रा कर रुँध गयी है. केंद्रीय सरकार ने एक हज़ार करोड़ का 'निर्भया फंड 'स्त्री सुरक्षा के नाम कर दिया है. तो सोचिये 184 देशों में गूँजी आवाज़ पुरुष सोच को कुछ तो बदलेगी. 

और शहरों का तो पता नहीं लेकिन अहमदाबाद में दर्पन द्वारा लगाए "अहमदाबाद राइज़िंग 'के पोस्टर इस वेलेंटाइन डे को भुलने नहीं दे रहे. सन २०१२ से प्रतिवर्ष वेलेन्टाइन डे पर अनेक देशों में ओ बीआर मनाया जाता है। कुछ शहरों में ये इस दिन से पहले वाले इतवार को मनाते हैं जिससे नौकरीपेशा महिलायें भी इसमें भाग ले सकें। जब कोई जन्म लेता है तो स्त्रियों के विकास के रास्ते भी बनने लगतें हैं. मेरा ये अनुभव स्त्री संस्थाओं के लिए भी है कि जब कोई समाज सेविका स्त्रियों के लिए सलाहकारी केंद्र खोलती है तो उनकी दयनीय स्थिति देखकर वह उन्हें व्यवसाय सिखाने के लिए मजबूर हो जाती है। यही इस आंदोलन के साथ हो रहा है। बँगला देश में ऐसी महिलाओं को घरेलु सहायक के तौर पर नौकरी दिलवाई जा रही है। क्रोएशिया में इनके लिए टेक्सटाइल फ़ैक्टरी आरम्भ की गई है। मेक्सिको में गर्ल्स ट्रैफ़िकिंग के विरोध में जगह जगह महिलाओं को सोप ओपेरा करते देखा जा सकता है। सुप्रसिद्ध समाजसेविका स्वर्गीय कमला भसीन, साउथ एशिया ओ बी आर रीज़नल कोओर्डिनेटर मनोनीत की गईं हैं, रांची से ८०० किलो मीटर दूर लोहारडागा में सन २०१८ में २८०० सौ स्त्री पुरुषों के साथ ये दिन मनाकर चेतना जाग्रत की।

कोरोनाकाल यानि सन 2020 -2021 में सब घर में बंद थे तो ओ बी आर की संस्थापकों ने नारा दिया कि अपने घरों में बंद हम अपनी सब्ज़ियाँ उगा सकते हैं, आस पास छोटे बाग़ बगीचे लगाकर पृथ्वी के वातावरण को कुछ बेहतर बना सकते हैं। आज के दिन यानि १४ फ़रवरी २०२२ के ओ बी आर की थीम है -'राइज़ फ़ॉर द बॉडीज़ ऑफ़ ऑल वीमन, गर्ल्स एंड अर्थ 'जी हाँ पृथ्वी के शरीर यानि पर्यावरण को संरक्षित करने की ज़िम्मेदारी भी हमारी है। विश्व में इस दिन पर क्या कार्यक्रम हुए ये तो बाद में पता लगेगा।

शर्मनाक हैं ये स्थतियाँ कि स्त्री प्रताड़ना, रेप बंद नहीं हो रहे हैं या कहें मीडिया के कारण ही ये प्रकाश में आ रहें हैं।विश्व भर में दृढ़प्रतिज्ञ हैं ओ बी आर में काम करतीं महिलायें जो पुरुष को सिखाने में लगीं हैं -'पॉवर ऑफ़ लव, नॉट लव ऑफ़ पॉवर '. हम जैसी स्त्री विमर्शकारों ने इसके बहुत ऊँचे परचम लहराए हैं लेकिन आज भी हमारी दकियानूसी सोच अपने परिवार की लड़कियों को बीच रात अकेले निकलने नहीं देगी लेकिन ओ बी आर की कार्यक्रताओं ने बड़े बड़े बोर्ड बनाकर परचम लहरा दिए हैं ----'रात भी हमारी, दिन भी हमारा '.

 

नीलम कुलश्रेष्ठ

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