Giraft in Hindi Adventure Stories by GAYATRI THAKUR books and stories PDF | गिरफ्त

गिरफ्त


गिरफ्त

"यह मंदिर अपने आप में बहुत अद्भुत है.. यहां हर मनोकामना पूरी होती है"; मंदिर जाने के रास्ते में चलते हुए रागनी की सास ने उंगली से मंदिर की ओर इशारा करते हुए कहा.

यह कहते हुए उनकी आंखों में अपार श्रद्धा का भाव सहज ही उतर आया था.

"मां जी! मुझे ऐसी बातों में... " रागिनी थोड़ी सी हिचकते हुए बोली.

"यहां साक्षात दुर्गा मां विराजमान है.. और इस मंदिर का निर्माण भूतों के द्वारा हुआ था... " रागिनी की बात को बीच में ही काटते हुए पंडित बोल पड़ता है.

"क्या मतलब! ... रागिनी की आंखों में उत्सुकता के फफोले उभर आए थे.

"सब ऊपर वाले की लीला है"; पंडित आकाश की ओर देखते हुए बोल पड़ता है, और फिर धीरे से बड़े ही रहस्यमय अंदाज में बोलता है, " यहां रात के अंधेरे में एक औरत की आत्मा भटकती है, कई बार तो लोगों ने उसे सफेद साड़ी में भी देखा है, सूरज ढलने के बाद यहां कोई नहीं आता... "

पंडित को मंदिर में पूजा अर्चना आदि की विधि के लिए रागिनी की पति ने पहले ही बुक करा ली थी जो कि अब उनके साथ साथ चल रहा था.

थोड़ी दूर चलने पर रास्ते के किनारे एक जगह पर कुछ लोगों की भीड़ जुटी हुई थी, एक पेड़ के नीचे छोटी सी मूर्ति रखी हुई थी जिस पर सभी चढ़ावा चढ़ा रहे थे और लाल रंग के धागे से उस पेड़ के डाल को को बांध रहे थे, उसी पेड़ के नीचे एक पुजारी बैठा हुआ था जो सभी आने जाने वाले लोगों पर जल छिड़क कर मनोकामना पूरी हो जैसी आशीर्वाद भी देता जा रहा था तथा साथ में बैर विनाशिनी देवी की जय हो ! जैसी जयकारा भी लगा रहा था.

रागिनी के पति सूरज ने रागिनी की हाथ को धीरे से खींचते हुए एवं अपनी हंसी को नियंत्रित करते हुए रागिनी से बोलता है, '' तुम्हें पता है आज से ठीक पाच साल पहले जब मैं यहां आया था तो ऐसा कुछ भी नहीं था..

"मजे की बात बताऊं! " सूरज की आंखों से हंसी छलक रही थी.

"कौन सी बात? " रागिनी उत्सुकता पूर्वक पूछती है.

"पांच साल पहले जब मैं मां के साथ यहां इस मंदिर में आया था तब इस बेर के पेड़ की डाल नीचे की ओर झुके हुए थे जिसकी वजह से इसके कांटे हर आने जाने वालों को चुभ रही थी. अतः मैंने चढ़ावे के जो लाल कपड़े थे उससे इसके डाल को बांध दिए थे ताकि किसी आने जाने वालों को इसके कांटे चुभें नहीं. मुझे क्या पता था कि उसके बाद यह पेड़ मनोकामना पूर्ति की वृक्ष बन जाएगी."

"मुझे तो इन बेचारों पर तरस आ रहा है", रागिनी ने सूरज की ओर देखते हुए कहा. फिर शिकायत भरे स्वर में बोल पड़ती है, " मैं तो वैसे भी इन ढकोसलो में विश्वास नहीं करती. बस माँ जी की जिद की वजह से आना पड़ा"...

तभी पीछे से आवाज आती है, " हां हां.. क्यों नहीं तुम पढ़ी लिखी हो तुम्हें इन चीजों पर विश्वास कैसे होगा... " रागिनी की सास के स्वर में शिकायत छुपी होती है.

रागिनी ने पीछे पलट कर देखा तो उसकी सास नाराजगी दिखाते हुए आगे भी कहना जारी रखती है, " चार वर्ष हो गए तुम लोगों की शादी के अब तक एक भी संतान नहीं हुए मैं तो बिना पोते पोतियो के मुंह देखे ही स्वर्ग सिधार जाऊंगी...ऐसा लगता है".

"लेकिन उसके लिए डॉक्टरी इलाज तो हम करा रहे हैं ना! ", और वैसे भी कई बार वक्त लग जाता है", रागिनी ने अपनी सास को समझाने के अंदाज में कहा.

"मां आप भी अपनी जगह सही है, सूरज धीरे से अपनी मां के कंधे पर हाथ रखते हुए कहता है, परंतु रागिनी का कहना भी सही है”, सूरज मां के गुस्से को शांत करने के अंदाज में कहता है.

"हां तू तो अपनी बीवी की तरफदारी तो करेगा ही", मां ने सूरज का हाथ अपने कंधे से झिड़कते हुए नाराजगी के लहजे में कहा.

"अरे... अरे.... हट ..हट, तू फिर आ गई...! पंडित जी किसी को धिक्कार रहे थे, " तुझे कितनी बार समझाया हमने पर तू तो मानने को तैयार ही नहीं है.., चल हट पगली कहीं की".

पंडित जी सीढ़ी पर खड़ी एक पागल जैसी औरत को हटा रहे थे.

सूरज ने नजदीक से देखा, अजीब सी शक्ल थी उस औरत की रूखे बाल मिट्टी में सने हुए थे जो उस के मैले से मुख पर लहरा रहे थे, काले रंग की छिटेदार साड़ी जो कि बीच-बीच से फटे हुए थे उसनें बड़े ही बेढब तरीके से लपेट रखे थे, देखने पर ऐसा जान पड़ता था जैसे काफी दिनों से उसने नहाया नहीं था पर उसकी गोल- गोल आखों में एक अजीब तरह का रहस्य छिपा पड़ा था.

"इसका बेटा काफी साल हुए इस मंदिर में कहीं खो गया आज तक नहीं मिल सका, बेचारी उसी के गम में पागल हो गई है, " पंडित जी थोड़ा दया दिखाते हुए बोलते हैं.

"लेकिन ऐसे कैसे खो गया! ", सूरज की आंखों में आश्चर्य के भाव थे.

"इस मंदिर में भूत का साया... " पंडित जी हकलाने लगते हैं.

"क्या कहा भूत का साया" सूरज बीच में ही पूछ बैठता है.

पंडित जी अपने शब्दों को चुभ लाते हुए बोले, "हां सूर्यास्त के बाद यहां भूत घूमते हैं, कई बार कई लोगों ने उसे सफेद साड़ी में देखा है जो भी यहां सूर्यास्त के बाद रुका है वह गायब हो गया है, इस के बेटे के साथ भी यही हुआ है कई वर्ष बीत गए , इसका बेटा आज तक नहीं मिला.. ".

"लोगों ने पुलिस को सूचित नहीं किया", सूरज ने आश्चर्य जताते हुए पूछा.

"पुलिस... पुलिस इसमें क्या करेगी! यह धार्मिक मामला है..! पंडित जी झल्ला उठे.

दोपहर होने को था और अभी भी मंदिर तक पहुंचने में कई और सीढ़ियां चढने बाकी थे, रागिनी ने अपनी सास की ओर देखा उनके चेहरे पर किसी तरह की कोई थकान नहीं थे, वे भक्ति भाव में मग्न पूरे उत्साह से एक-एक करके सीढ़ियां चढ़ती जा रही थी, उसे अपनी सास से थोड़ी ईर्ष्या सी होती है, वह मन ही मन सोचती है,

"इन्हें इस उम्र में जरा सी थकान नहीं है और मुझसे तो अब चल पाना भी मुश्किल है.

रागिनी सीढ़ी के एक कोने को हाथ से साफ करके थोड़ी देर सुस्ताने के लिए बैठ जाती है परंतु उसे ऐसा करते देख पंडित टोकते हुए बोलते है, " शाम ढलने से पहले पहले पूजा समाप्त कर सभी को लौट जाना होगा."

"क्यों मैं थोड़ी देर यहां बैठ नहीं सकती.. थकान के कारण मुझसे और नहीं चला जा रहा".

रागिनी सीढ़ी से लगे एक कोने में बैठ जाती है.

"अच्छा अच्छा ठीक है, ऐसा करें आप लोग आगे बढ़े मैं इसके साथ थोड़ी देर रुकता हूं." सूरज बीच में ही बोल पड़ता है, और रागिनी के बगल में ही थोड़ी सी जगह बना कर बैठ जाता है.

पंडित रागिनी की सास के साथ आगे की ओर चल पड़ते हैं.

मंदिर अभी भी कुछ दूरी पर था लेकिन सीढ़ी से मंदिर स्पष्ट नजर आ रहा था, आसमान में काले बादल मंडरा रहे थे जैसे वर्षा होने वाली हो, बादलों से आकाश घिर रही थी और बीच-बीच में बिजली भी चमक पड़ती थी, पानी की एक छोटी सी बूंद रागिनी के गालों पर टपकती है.

"लगता है बारिश होने वाली है", रागिनी अपनी साड़ी के पल्लू से अपने गालो पर टपके पानी के बूंद को पोछते हुए कहती है.

"हां, हमें अब चलना चाहिए", सूरज आसमान की ओर देखते हुए कहता है, और एकदम से उठकर खड़ा हो जाता है , " और हाँ, अगर देरी हो गई तो भूतों के साथ पिकनिक मनानी पड़ेगी", रागिनी खिलखिला कर हंसने लगती है.

और फिर दोनों साथ-साथ मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगते हैं.

मंदिर के द्वार पर काफी भीड़ थी, मंदिर के चबूतरे में पूजा अर्चना कराने हेतु एक अन्य पुजारी थे जिन्होंने सारे कर्मकांड कराएं परंतु अंदर दर्शन के लिए जाते हुए थोड़ी परेशानी हो रही थी, तभी रागनी ने देखा एक बेहद कम उम्र का पंडित सभी से अपने पैर छुआ रहा था और साथ में दिर्घायु हो, सदा सौभाग्यवती रहो,जैसे आशीर्वाद देता जाता और फिर बदले में लोग उसको पैसे भी थमाते जाते थे. पैर छूने वालों में काफी तो उस से कई गुणा बड़ी उम्र के भी थे, उसे बेहद आश्चर्य होता है कि यह कैसी परंपरा है , कैसी अंधभक्ति है.

मंदिर के मुख्य द्वार के अंदर जाते वक्त काफी भीड़ थी और सूर्यास्त से पहले पहले निकलने की हड़बड़ी में थोड़ी धक्का-मुक्की जैसा माहौल होता जा रहा था, रागिनी अपनी सास और पति के साथ किसी तरह देवी के दर्शन हेतु सीढ़ियों से नीचे उतरती हुई मुख्य गृह की ओर बढ़ रही थी जो कि बिल्कुल नीचे तहखाने की तरह था अचानक उसका हाथ एक विशाल पत्थर की मूर्ति जो दीवार से लगी हुई थी को स्पर्श करती है

तभी एक महंत जो दीवार के साथ ही सट कर खड़ा था उस पर चिल्ला पड़ता है और उसे धक्का देते हुए बोल पड़ता है, " मूर्ख औरत तुम इस मूर्ति को हाथ नहीं लगा सकती दूर हटो". रागिनी अभी संभल पाती उससे पहले ही ऊपर से आते भीड़ के दबाव के कारण किसी लकड़ी जैसे दरवाजे से जोर से टकराती है और नीचे की ओर लुढकती चली जाती है. उसकी आंखों के आगे बस अंधेरा ही अंधेरा होता है जैसे वह किसी सुरंग में आ गई हो.

"रागिनी... रागिनी! "... सूरज अपने आसपास उसे नही देख कर एकदम से चिल्ला पड़ता है.

"तुम्हारे साथ ही तो थी न... कहां जा सकती है वह... " रागिनी के सास के स्वर से चिंता और घबराहट एक साथ अभिव्यक्त होते हैं.

भीड़ इतनी थी कि दोनों मां-बेटे एक दूसरे का हाथ बड़ी मुश्किल से थामे चारों तरफ नजर घुमाते धीरे-धीरे एक-एक कर सीढ़ी पर से रास्ता बनाते हुए रागिनी को खोजते चले जाते थे परंतु भीड़ में हर एक को अपनी पड़ी हुई थी कि कैसे जल्द से जल्द दर्शन पूरी कर मंदिर के परिसर से बाहर निकली जाए शाम होते ही वहां सन्नाटा छा जाता. अतः हर कोई जल्दी में था.

सूरज के साथ जो पंडित आया था वह तो कब का दक्षिणा का पैसा लेकर जा चुका था.

सूरज किसी तरह अपनी मां को मंदिर के उस मुख्य गृह से बाहर लाता है और एक चबूतरे पर बैठता है और वापस अंदर एक बार जाकर रागिनी को तलाशने की सोचता है तभी घोषणा होती है कि मंदिर का मुख्य गृह अब बंद हो गया है, सूर्यास्त हो चुकी है अतः सभी वापस लौट जाएं मंदिर परिसर को खाली करने की घोषणा के साथ ही मंदिर का मुख्य द्वार भी बंद हो जाता है.

मंदिर के बाहर आकर वह मंदिर के चारों तरफ रागिनी को आवाज लगाते हुए खोजता है परंतु अब अंधेरा घिर आने को था और हल्की बारिश भी शुरू हो गई थी और ऐसे में उसे अपनी मां की भी चिंता थी अतः मजबूरी और बेबसी में मां के साथ वह वापस लौट जाता है .

वापस आकर वह अपनी पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाने में दर्ज कराने के लिए जाता है.

"देखो हमें जैसे ही कोई जानकारी मिलेगी हम तुम्हें सूचित कर देंगे तुम अपनी पत्नी की एक तस्वीर यहां जमा करा दो", थाने के उस दरोगा ने बड़ी बेफिक्री के अंदाज में जब सूरज से यह बात कही तो सूरज थोड़ा चिढ़ सा गया था.

पर वह अपने गुस्से को नियंत्रित करते हुए बोलता है," नहीं आप हमारे साथ अभी के अभी चलिए".

"देखो हम तुम्हारी बीवी को ढूंढ लेंगे लेकिन अभी कम से कम चौबीस घंटा तो बीत जाने दो, इससे पहले तो रिपोर्ट भी दर्ज नहीं होता".

"जाओ कल आना, बड़े ही बेरुखी भरे अंदाज में दरोगा ने कहा, " तुम नए हो क्या ! इस मंदिर के विषय में तुम्हें कुछ मालूम नहीं शायद... रात के समय उस मंदिर में कोई भी नहीं जाता". दरोगा ने अकड़ दिखाई .

सारी रात चिंता के कारण सूरज करवटें बदलता रहा, थकान के कारण उसके पूरे बदन में भयंकर दर्द हो रहा था, दर्द से वह मरा जा रहा था परंतु मां को अभी अभी नींद आई थी इस वजह से वह ठीक से कराह भी नहीं पा रहा था, धीरे से एक बार उठने की कोशिश करता है परंतु वापस से बिस्तर पर गिर जाता है . पता नहीं रागिनी किस हाल में होगी , ... कहां होगी.. इसी चिंता में वह घुला जा रहा था..,

उसके कानों में रह रह कर मंदिर की घंटियां सुनाई पड़ती है... वह एक पत्थर के चट्टान पर खड़ा है... ,

चट्टान नीचे धंस रहा है...., वह भागना चाहता है, पर उसके पैर नीचे बहुत नीचे की ओर धसे जा रहे हैं.., वह लंबी लंबी छलांग लगा रहा है, परंतु पैर किसी एक जगह अटक गए हैं, पसीने पसीने होकर मदद के लिए चिल्ला रहा है..., उसके कानों में मंदिर की घंटी तेज..तेज .. और तेज होती जा रही है..., अचानक उसकी नींद खुल जाती है सामने अपनी मां को खड़ा देख उठ बैठता है.

"मैं कब से तुम्हें उठाने की कोशिश कर रही हूं", मां ने आरती की थाल उसके सामने बढ़ाते हुए कहा,..

उसकी नजर थाल में पड़े उस छोटी सी घंटी पर अटक जाती है और वह हड़बड़ा कर उठ खड़ा होता है.

"मां तुम्हें याद है मंदिर का वह बड़ा घंटा जिसे छूने से पुजारी मना कर रहे थे.. ", सूरज के स्वर में बेचैनी थी.

"हां पर. .., लेकिन क्या.. . ? ", मां कुछ भी समझ नहीं पाती हैं और उलझा हुआ सा सवाल पूछ बैठती है.

"वहीं पर तो रागिनी का हाथ मेरे हाथ से भीड़ में छूट गया था, और मैं कुछ आगे की ओर निकल गया था".. और. .. और. .. उसी के बाद वह हमें नहीं दिखी..., और फिर अपनी बात बीच में ही छोड़कर सूरज दरवाजे से बाहर निकल पड़ता है.

मां पीछे से आवाज लगाने लगती है लेकिन उसे कुछ सुनाई नहीं पड़ता और वह मंदिर के लिए वापस निकल पड़ता है.

रास्ते में चलते हुए वह अपने पैन्ट के पैकेट में कुछ टटोल के देखता है और फिर एक टैक्सी को आवाज देकर मंदिर चलने के लिए कहता है, मोबाइल में मंदिर के कुछ दृश्य थे जो उसने अपने पत्नी के साथ लिए थे उन्हें बड़े ध्यान से एक-एक कर देखता है.

मंदिर के रास्ते में उतर कर वह मंदिर की ओर जल्दी जल्दी बढ़ता है आज भी कल की ही तरह भीड़ थी.

अचानक सूरज उसी सीढ़ी पर बैठ जाता है जहां कल वह अपनी पत्नी के साथ बैठा था. वह मन ही मन कुछ सोच विचार करने लगता है, और फिर कल वाले पंडित को फोन कॉल करता है, परंतु उस पंडित का फोन भी नॉट रिचएबल आता है.

और फिर अचानक ही सूरज अपनी पत्नी के मोबाइल पर कॉल करता है परंतु कल की तरह ही फोन आज भी नॉट रिचएवल आता है.

अचानक वह उठता है और फिर वापस मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगता है वह जल्द से जल्द पहुंच कर खुद ही रागिनी की तलाश करना चाहता है.

जल्दी ही सूरज मंदिर के उसी बड़े से घंटे के पास होता है, परंतु वहां पर कल वाले उस पुजारी की जगह कोई और पुजारी खड़ा होता है.

"आपने इसे कहीं देखा है? , सूरज अपने मोबाइल से रागिनी की तस्वीर दिखाते हुए पूछता है.

"यहां सैकड़ों लोग रोज आते हैं मुझे हर किसी का चेहरा याद रहता है क्या! " उस मोटे तगड़े पुजारी ने गुर्रा कर सूरज की ओर देखा और फिर उससे उस दीवार में लगी पत्थर की मूर्ति और उस बड़े घंटे से दूर रहने के लिए कहता है.

सूरज थोड़ी दूर पर कुछ देर तक खड़े रहकर हर आने जाने वालों को देखता रहता है और फिर अचानक ही बाहर निकल कर पत्थर के चबूतरे पर जा बैठता हैं, और वहां बैठे-बैठे किसी गहरी सोच विचार में डूब जाता है.

चबूतरे पर बैठे हुए काफी समय बीत जाता है और धीरे-धीरे फिर शाम होने लगती है कि अचानक उसकी नजर दूर खड़ी उस औरत पर टिक जाती है वह औरत कुछ दूरी पर एक महंत से कुछ बातें कर रही थी बातें तो स्पष्ट सुनाई नहीं पड़ रही थी लेकिन हाव-भाव से ऐसा लग रहा था जैसे उनके बीच किसी बात पर बहस या झगड़ा हो रहा था.

अचानक ही सूरज चौक जाता है, फिर अपने मन में ही कुछ बुदबुदाते हुए कहता है, नहीं.. नहीं , यह वह औरत नहीं हो सकती वह तो कोई पागल थी हां पंडित जी ने भी तो यही बताया था.

सूरज कुछ सोचते हुए वापस रागिनी के मोबाइल नंबर पर कॉल करता है कि अचानक फोन की घंटी बज पड़ती है वह चौक जाता है,अपने चारों तरफ नजर दौड़ाता है, फोन की घंटी मानो आस-पास ही बज रही थी, सूरज बेचैन होकर यहां वहां नजरे घुमा घुमा कर देखता है. परंतु उसके आसपास कुछ भी नजर नहीं आता..,

दूर खड़ी वह औरत और वह पुजारी भी अब वहां पर नहीं थे तभी उसका ध्यान चबूतरे से लगे पेड़ के ऊपर जाता है.

"बंदर! " वह चौक कर देखने लगता है, " रागिनी का मोबाइल इस बंदर के हाथ में कैसे आया!..

बड़ी मुश्किल से किसी तरह सूरज बंदर के पास से मोबाइल को सुरक्षित छुड़ा पाता है.

मोबाइल अभी भी बजे जा रहा था,

सूरज की आंखों से आसूं छलकने लगते हैं, तभी अचानक सूरज के हाथों से लगकर मोबाइल से वीडियो ऑन हो जाता है, उसकी धड़कने तेज हो जाती हैं.

मंदिर में जाते वक्त रागिनी के हाथ से मोबाइल का वीडियो बटन गलती से ऑन हो गया था, वीडियो में रागिनी सीढ़ियों से लुढ़कती हुई लकड़ी के एक तख्ते से टकराती हुई दिखती है और उसके बाद सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा और कुछ भी नजर नहीं आता है.

रागिनी सुरंग जैसे तहखाने में फिसलती चली जा रही थी, उसकी आंखों के आगे सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा था उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था आखिर उसके साथ यह हो क्या रहा है.

अचानक उसका सिर एक पत्थर से टकराता है, और वह बेहोश हो जाती है.

दूसरे दिन सुबह जब उसे होश आया तो वह उठना चाहती है परंतु वह अपना हाथ और पैर रस्सी से बंधा हुआ पाती है, वह अपने चारों तरफ नजर दौड़ती है, वो एक छोटा सा कमरा था, जिसमें खिड़की की जगह एक छोटा सा रोशनदान लगा हुआ था जिससे होकर बेहद हल्की सी प्रकाश कमरे में आ रही थी. सामने के दीवार में हल्की सी दरार थी. वह खुद को किसी तरह दीवार की दरार वाले उस हिस्से तक ले जाने की कोशिश कर ही रही थी कि तभी उसके कानों में कुछ आवाजें सुनाई पड़ती हैं, वह बेहोशी का नाटक करती हुई अपनी आंखें पूर्ववत बंद कर लेती हैं, ताकि उसके होश में आ जाने का किसी को शक ना हो.

"लगता है इसे अभी तक होश नहीं आया.., इस पर कड़ी निगरानी रखो", रागिनी के कानों को किसी की बौखलाहट भरी आवाज सुनाई पड़ती है.

रागिनी को यह आवाज कुछ जानी पहचानी सी लगती है, . ." अरे! यह तो उसी महंत की आवाज है, जिसने धक्का दिया था... " वह अंदर ही अंदर डर से कांप जाती है .

फिर किसी की वहां से बाहर जाने की पदचाप उसके कानों में सुनाई पड़ती है और फिर वापस से वही सन्नाटा पसर जाता है.. रागिनी आंखें बंद किए हुए सभी कुछ महसूस कर पा रही थी.

उसने सोचा शायद कमरे में अब कोई नहीं है और फिर वह पलकों को धीरे से खोलने की चेष्टा करती है तभी अचानक उसे किसी की आवाज सुनाई पड़ती है और वह अपनी आंखें वापस बंद रखने में ही अपनी भलाई समझती है.

"अरे यही रखी थी.. कहां चली गई. . अरे हां मिल गई. . ", उसे किसी की आवाज आती है जैसे कोई कुछ ढूंढ रहा हो.

और फिर दूसरी आवाज, "अरे इसकी क्या जरूरत है यह तो वैसे ही बेहोश है".

रागिनी कुछ समझ पाती उसके पहले ही अचानक उसके हाथ में सुई जैसी कोई चीज चुभा दी जाती है.

"चलो अब अगले कुछ घंटे तक इससे छुटकारा तो मिला", कोई धीरे से फुसफुसाते हुए कहता है.

रागिनी के हाथ पैर एकदम से शिथिल हो जाते हैं , वो फिर से बेहोश हो जाती है.

दोपहर तक उसे बिल्कुल होश नहीं आता है. और फिर अचानक किसी के गिड़गिड़ाने की आवाज उसके कानों में पड़ती है तो वह धीरे से अपनी आंखें खोलने की चेष्टा करती है.. आवाज शायद किसी दूसरी तरफ से आ रही थी.

रागिनी उठना चाहती है परंतु उसके हाथ पाव जैसे ठंडे हुए जा रहे थे, उसने जैसे तैसे खुद को दीवार के सहारे टिकाया और फिर उसी दीवार के सहारे धीरे धीरे सरकती हुई सामने के उस दरार वाले दीवार की ओर खुद को ले जाने की कोशिश करती हैं. वह आवाज भी उधर से ही आ रही थी.

रागिनी दीवार के उस दरार से देखने की कोशिश करती है, उस दूसरे कमरे का जो दृश्य था उससे उसके रोंगटे खड़े हो गए, जबरन किसी की ऑपरेशन की तैयारी हो रही थी, रागिनी को समझते देर न लगी कि यह मामला मानव अंग तस्करी का ही है.."; हे भगवान! वह मन ही मन बुदबुदा पड़ती हैं.

तभी अचानक किसी जोरदार हाथों ने उसे पीछे की ओर खींचा और उसे घसीटते हुए कहीं ले जाने लगता है उसकी पैरों की रस्सी रगड़ की वजह से ढीली होकर खुल जाती है पर उसके हाथ बंधे हुए होते हैं.

उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था और काफी अंधेरा होने की वजह से कुछ साफ-साफ दिखाई भी नहीं पड़ रहा था.

उसके पैर कंकरीले सतह से रगड़ खाते जा रहा था असहनीय दर्द के कारण वह अपने आप को उस व्यक्ति की पकड़ से छुड़ाने की कोशिश में पूरी ताकत लगा देती हैं और तभी उसे महसूस होता है कि वह किसी ढलान जैसी जगह पर लुढ़कती चली जा रही है.

"अरे पकड़ो इसे", कोई जोर से चिल्लाते हुए कहता है.

हर तरफ़ अंधकार ही अंधकार, उसे लगता है जैसे वह किसी संकरे गुफा में फिसलती चली जा रही है.

"ढूंढो उसे.. यहीं कहीं आसपास ही होगी", बेहद गुस्से में कोई चिल्ला रहा होता है..

रागिनी सहम सी जाती है, काफी समय तक वह शांत उसी गुफा में एक मृत शरीर के भांति बिना कोई हलचल किए पड़ी रहती है.

काफी समय बीत जाता है, रागिनी को महसूस होता है की उसे खोजने वाले शायद जा चुके हैं. गुफा की दूसरी ओर से चांद की हल्की सी रोशनी आ रही थी, " शायद यहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता हो”, वह मन ही मन सोचती है..

वह किसी तरह अपने हाथ की रस्सी को भी खोलने में कामयाब हो जाती है.

गुफा के रास्ते काफी संकरे थे. वह बहुत ही मुश्किल से आहिस्ते आहिस्ते गुफा की दूसरी ओर, जिधर से चांद की हल्की सी रोशनी आ रही थी की तरफ खुद को सरकाती हुई बढ़ती जा रही थी.

सूरज मंदिर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगता है चांद की रोशनी हर जगह बिखरी हुई थी, मंदिर परिसर के चारों ओर का चहल-पहल अब धीरे-धीरे शांत हो चुका था, लोग जा चुके थे.

सूरज मंदिर से कुछ दूरी पर किसी चबूतरे जैसी स्थान स्थान पर निराश होकर खड़ा था कि अचानक वह ठिठक जाता है उसे एक पेड़ के सामने चांद की रोशनी में एक काली परछाई नजर आती है उसे ऐसा प्रतीत होता है कि वह परछाई जैसे इशारे से उसे अपने पास बुला रहा है. वह घबराहट में पलटता ही है कि पेड़ की ओट में उसे रागिनी नजर आती है.

" रागिनी! उसके स्वर में कंपन था.

रागिनी इशारे से उसे चुप रहने के लिए कहती है. सूरज को समझते देर नहीं लगती कि रागिनी किसी संकटपूर्ण स्थिति से बचकर आई है.

रागिनी को ऐसी स्थिति में देख कर सूरज का मन विचलित हो उठता है उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं.

रात हो चुकी थी परंतु चांद की रोशनी सभी जगह फैली हुई थी वे दोनों चुपचाप जंगल के रास्ते बाहर निकलने की कोशिश करते हैं चांदनी रात होने के कारण जंगल का रास्ता पार करने में उन्हें कोई खास मुश्किल नहीं हो रही थी.

इस वक्त तो उन्हें जहरीले सांप और खूंखार जानवरों का भी भय नहीं हो रहा था, क्योंकि अभी अभी रागिनी जिस स्थिति से बाहर निकल कर आई थी उसके सामने इन जंगली जानवरों का खौफ तो कुछ भी नहीं था.

जितना विष, जितना वहशीपना धर्म की आड़ में एक मनुष्य फैला सकता है या दिखा सकता है उसके सामने इन जंगली जानवरों की भला क्या मिसाल! जब तक मानव समाज धर्म के नाम पर अंधविश्वास और पाखंड के चंगुल में फंसा रहेगा, जब तक उसकी गिरफ्त में जकड़ा रहेगा तब तक उसकी आड़ में ऐसे घिनौने कृत्य भी होते ही रहेंगे.

दोनों अब सड़क के किनारे सुरक्षित खड़े थे. सड़क पर गाड़ियों का आना जाना लगा हुआ था. सूरज एक टैक्सी वाले को आवाज देता है और उसे पुलिस चौकी चलने के लिए कहता है.

पुलिस चौकी पहुंचकर रागिनी रिपोर्ट दर्ज कराती है तथा सबूत के तौर पर सूरज उन्हें वह वीडियो दिखाता है.


पुलिस की एक टीम तुरंत ही मंदिर के लिए रवाना होती है.


अगली सुबह…


" बहू आज थोड़ा जल्दी तैयार हो जाना रागिनी के सास रागिनी को आवाज देती है. "क्यों मां जी किसलिए!” रागिनी आश्चर्य से पूछती है.


"आज मैंने एक बहुत ही अच्छे डॉक्टर से तुम्हारे लिए अपॉइंटमेंट ले रखा है", रागिनी की सास मुस्कुराते हुए कहती है.


"क्यों ! संतान प्राप्ति के लिए कोई और पूजा कोई और मन्नत या फिर किसी मंदिर में नहीं जाना है", सूरज अपनी मां को चिढ़ाने के अंदाज में कहता है.

और फिर सभी हंसने लगते हैं..


सूरज चाय की प्याली होठों से लगाते हुए अखबार उठाता है कि अखबार में छपी एक खबर पर उसकी निगाहें टिक जाती हैं.


लिखा था.. मंदिर के तहखाने में मानव अंग तस्करी.. मानव तस्करी का खेल.. मंदिर का महंत और पुजारी गिरफ्तार.. पूछताछ में बहुत से चौकानेवाले मामले नजर आए....

-- गायत्री ठाकुर

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