Raj-Throne--Part(16) in Hindi Classic Stories by Saroj Verma books and stories PDF | राज-सिंहासन--भाग(१६)

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राज-सिंहासन--भाग(१६)

सहस्त्रबाहु के समीप पहुँचकर सोनमयी ने पूछा....
भ्राता! हम सब यहाँ किस कारण उपस्थित हुए हैं,आपके मस्तिष्क में कोई योजना तो नहीं चल रही है...
हाँ! सोनमयी! ऐसा ही कुछ है,मेरे मस्तिष्क में योजना तो चल रही है,सहस्त्रबाहु बोला।।
किन्तु ! वो योजना क्या है? वीरप्रताप ने पूछा।।
वो ये कि मैं अपने मात-पिता का रहस्य किस प्रकार ज्ञात करूँ? मैं ये ज्ञात करना चाहता हूँ कि सुकेतुबाली ने उन्हें किस स्थान पर बंदी बनाकर रखा है,इतना तो ज्ञात है कि उन्हें किसी समुद्रतल की गहराई में बंदी बनाकर रखा है किन्तु कहाँ ? मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ,मैं ने ये भेद कितने बार ज्ञात करने का प्रयास किया किन्तु मैं सफल नहीं हो सका,सहस्त्रबाहु बोला।।
यदि! आपको कोई आपत्ति ना हो तो मैं एक प्रयास करके देखूँ,ज्ञानश्रुति बोला।।
ये तो अच्छा विचार है,वैसे भी ज्ञानश्रुति पर तो सुकेतुबाली की प्रेमभरी दृष्टि सदैव रहती है,उसने तो कन्या वेष में रहकर सुकेतुबाली के हृदय में अपना एक स्थान बना लिया है,सुकेतुबाली भी कादम्बरी बने ज्ञानश्रुति से मिलने के लिए किसी ना किसी बहाने कक्ष में आ ही जाता है,वीरप्रताप बोला।।
ये तो सत्य है,ये कार्य तो ज्ञानश्रुति ही कर सकता है,सहस्त्रबाहु बोला।।
मैं वही कहने का प्रयास तो कर रहा था,ज्ञानश्रुति बोला।।
तो आज रात्रि ही कादम्बरी ये कार्य प्रारम्भ करेगी,सोनमयी बोली।।
किन्तु वो किस प्रकार सम्भव होगा,इसके लिए तो कोई युक्ति निकालनी होगी,सोनमयी बोली।।
मेरे पास एक युक्ति है,वीरप्रताप बोला।।
वो क्या है?शीघ्र ही कहो,सहस्त्रबाहु बोला।।
अभी निपुणिका के बंदीगृह से स्वतन्त्र हो जाने पर सुकेतुबाली तनिक विक्षिप्त सा है,उसे गहरा मानसिक आघात पहुंँचा एवं वो ऐसा सोच रहा होगा कि ऐसा कौन वीर योद्धा एवं तंत्रविद्या में कुशल आ पहुंँचा,जिसने सभी बाधाओं को तोड़कर निपुणिका को छुड़ा लिया,अभी उसे इस समय ऐसे काँधे की आवश्यकता है जिस पर वो अपना सिर रखकर अपने दुख के भावों को व्यक्त कर सकें एवं हम सभी को इस समय का लाभ उठाना चाहिए,इसलिए रात्रि के समय हमें अपना कार्य प्रारम्भ करना होगा,वीरप्रताप बोला।।
कैसा कार्य? क्या चल रहा है तुम्हारे मस्तिष्क में तनिक खुलकर बताओ,सहस्त्रबाहु बोला।।
जी! तो सभी सुनिए कि मेरी क्या योजना है? रात्रि के समय ज्ञानश्रुति कादम्बरी के वेष में सुकेतुबाली के कक्ष में प्रवेश करेगा और उसे मदिरापान कराएगा,इसके उपरान्त जब सुकेतुबाली मदिरा पीकर कुछ अचेत सी अवस्था में चला जाएं तो कादम्बरी उससे प्रेमभरे वार्तालाप से उसका मन मोह लें,जिससे उसके भीतर के रहस्य एक एक करके बाहर निकलवाने में सरलता रहेगी,बस कुछ सावधानी बरतने की आवश्यकता है,वीरप्रताप बोला।।
किन्तु! इसमें ज्ञानश्रुति के प्राणों को संकट भी हो सकता है,सोनमयी बोली।।
हाँ!ये तो है,ज्ञानश्रुति को अत्यधिक सावधान रहने की आवश्यकता होगी,सहस्त्रबाहु बोला।।
सर्वप्रथम ज्ञानश्रुति से पूछो कि क्या वो ये कार्य करना चाहता है? वीरप्रताप बोला।।
हाँ! भ्राता! क्यों नहीं?जब आप सबने मेरी सहायता की है तो मैं भी आप सबकी अवश्य सहायता करूँगा,मुझे आप सबकी सहायता करने में अत्यधिक प्रसन्नता होगी,ज्ञानश्रुति बोला।।
मुझे ज्ञात कि तुम हमारी सहायता अवश्य करोगें,सहस्त्रबाहु बोला।।
तो योजना को यहीं विराम देकर हम सब को शीघ्र ही राजमहल की ओर प्रस्थान करना होगा,हम सबको राजमहल में ना पाकर कहीं सुकेतुबाली को संदेह ना हो जाएं,वीरप्रताप बोला।।
हाँ! वीर!कदाचित तुम सत्य कह रहे हो,सहस्त्रबाहु बोला।।
तो ज्ञानश्रुति एवं सोनमयी को पहले प्रस्थान करना चाहिए,सहस्त्र भ्राता और मैं कुछ समय के उपरान्त आते हैं,वीरप्रताप बोला।।
हाँ! यही उचित रहेगा,ज्ञानश्रुति बोला।।
तो राजकुमार ज्ञानश्रुति चलिए,ना...ना...भूल हो गई,मेरी प्रिय सखी कादम्बरी चलिए हम दोनों राजमहल की ओर प्रस्थान करते हैं,सोनमयी बोली।।
सोनमयी की बात सुनकर सब हँसने लगें एवं सबकी हँसी देखकर ज्ञानश्रुति का मुँख कुछ मलिन सा हो गया और वो बोला.....
सच! में कादम्बरी का वेष धरना किसी दण्ड से कम नहीं,राजमहल का हर सैनिक ,राजमहल का हर कर्मचारी ऐसी कुदृष्टि से देखता है कि स्वयं पर लज्जा आने लगती हैं एवं अत्यधिक क्रोध तो तब आता है जब वो पाखण्डी सुकेतुबाली मुझे आतुर दृष्टि से निहारता है तो मन करता है कि कहाँ चला जाऊँ,ना जाने कन्याएँ एवं स्त्रियाँ स्वयं को सुकेतुबाली की कुदृष्टि से कैसें बचातीं होगीं?ज्ञानश्रुति बोला।।
मैं तुम्हारे मन की ब्यथा समझ सकता हूँ राजकुमार! किन्तु क्या करूँ ? मैं भी विवश हूँ,सहस्त्रबाहु बोला।।
जी! सहस्त्र भ्राता! मैं आपके हृदय की पीड़ा भलीभाँति समझ सकता हूँ,आपके मस्तिष्क में जो विचारों का आवागमन चल रहा है उससे आपका मन अत्यधिक विचलित है,आप शीघ्र ही अपने माता-पिता की दशा ज्ञात करना चाहतें हैं,इतने वर्ष ब्यतीत हो गए,ना जाने सुकेतुबाली ने उन्हें किस स्थान पर बन्दी बना रखा है,ये समस्या जब तक हल नहीं हो जाती तो तब तक आपका मन इसी प्रकार विचलित रहेगा,जब मेरी बहन निपुणनिका भी सुकेतुबाली के बंदीगृह में बंदी थी,तब मेरा मन भी आपकी भाँति ही विचलित रहता था,यदि आप सब ना होते तो ये कठिन कार्य कदापि पूर्ण ना हो पाता और मेरी बहन निपुणनिका सदैव के लिए सुकेतुबाली के बंदीगृह में बंद रहती,ज्ञानश्रुति बोला।।
मित्र! ज्ञानश्रुति ! ये तो हम सबका कर्तव्य था,वीरप्रताप बोला।।
तो अब ये मेरा भी कर्तव्य बनता है कि मैं सहस्त्र भ्राता के माता-पिता की पूर्ण जानकारी ज्ञात कर सकूँ कि वें कहाँ हैं एवं कदाचित इस कार्य को मैं आज रात्रि ही पूर्ण कर लूँ,ज्ञानश्रुति बोला।।
इसमें तनिक भी संदेह नहीं,मुझे पूर्ण विश्वास है कि राजकुमार इस कार्य में अवश्य सफल होगें,मैं इस कार्य के पूर्ण होने की प्रतीक्षा करूँगी,सोनमयी बोली।।
मैं आपकी आशा को निराशा में परिवर्तित नहीं होने दूँगा,ज्ञानश्रुति बोला।।
मुझे ज्ञात है,सोनमयी बोली।।
अब बिलम्ब करना उचित ना होगा,हम सभी को शीघ्र ही राजमहल प्रस्थान करना चाहिए,वीरप्रताप बोला।।
चलिए देवी सोनमयी! मुझे तो आपके ही संग जाना है क्योंकि मैं और आप तो सखियाँ हैं,ज्ञानश्रुति बोली।।
हाँ! मेरी प्रिय सखी कादम्बरी!चलिए राजमहल की ओर प्रस्थान करते हैं,सोनमयी बोली।।
सोनमयी की बात सुनकर सभी हँस पड़े और ज्ञानश्रुति बोला....
शीघ्र ही मैं ये कादम्बरी का वेष त्यागने वाला हूँ क्योकिं सुकेतुबाली को उसके कर्मों का दण्ड मिलने वाला है,तब कादम्बरी भी स्वतन्त्र हो जाएगी,ज्ञानश्रुति बोली।।
सत्य कहा राजकुमार!सहस्त्रबाहु बोला।।
तो अब बिलम्ब किस बात का राजमहल की ओर प्रस्थान करें, सोनमयी बोली।।
अवश्य! चलिए देवी सोनमयी!ज्ञानश्रुति बोला।।
इसके उपरान्त सभी ने राजमहल की ओर प्रस्थान किया एवं राजमहल पहुँचकर सभी ने योजना के अनुसार अपना अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया,रात्रि के भोजन के उपरान्त सहस्त्र एवं वीर अश्वशाला नहीं गए,वें दोनों राजमहल के भीतर ही रहकर योजना के सफल होने की प्रतीक्षा करने लगें।।
अर्द्धरात्रि के समय कादम्बरी साज-श्रृंगार करके सुकेतुबाली के कक्ष के समीप पहुँची,वों उसके कक्ष के बाहर ही ये दिखाने का प्रयास करने लगी की वो किसी समस्या से ग्रसित है,उसे देखकर सुकेतुबाली के कक्ष के द्वार पर खड़े सैनिकों में से एक ने पूछा.....
देवी! इस समय यहाँ क्या कर रही हैं?कोई समस्या है आपको?
जी! समस्या तो है,कादम्बरी बना ज्ञानश्रुति बोला।।
जी! समस्या कहेंं,ताकि उसका समाधान किया जा सकें,सैनिक बोला।।
जी! मेरी समस्या का समाधान आप नहीं कर पाएंगे,उसका समाधान तो केवल हमारे महाराज ही कर सकतें हैं,कादम्बरी बना ज्ञानश्रुति बोला।।
तो क्या मैं राजा तक आपका संदेश पहुँचा दूँ,सैनिक बोला।।
जी!अत्यधिक कृपा होगी आपकी,कादम्बरी बोली।।
देवी! आपका नाम क्या बताऊँ राजन को? सैनिक ने पूछा।।
जी! आप उनसे कहिए कि कादम्बरी आपसे किसी समस्या का समाधान चाहती है,कादम्बरी बोली।।
कादम्बरी की बात सुनकर एक सैनिक राजा के कक्ष में पहुँचा और कादम्बरी का संदेश उनको देते हुए बोला...
राजन! कोई कादम्बरी नाम की कन्या आपके कक्ष के द्वार पर खड़ी हैं,कदाचित किसी समस्या से ग्रसित हैं एवं वें कहतीं हैं कि उनकी समस्या का समाधान केवल आप ही कर सकते हैं,
ओह...देवी कादम्बरी आईं हैं,उन्हें शीघ्र ही हमारे कक्ष में आने को कहो,सुकेतुबाली बोला।।
जी! राजन! अभी कहता हूँ,इतना कहकर सैनिक बाहर चला गया और कादम्बरी को संदेशा देते हुए बोला....
देवी! राजन ने आपको अपने कक्ष में बुलाया है।।
और इतना सुनकर कादम्बरी कक्ष में पहुँची,कादम्बरी को देखते ही सुकेतुबाली बोला....
देवी कादम्बरी! हमसे इतना संकोच किया आपने अपनी समस्या कहने में,हमें पराया समझतीं हैं आप।।
जी! महाराज ऐसी तो कोई बात नहीं है,तनिक भय सा प्रतीत होता है आपसे,कादम्बरी बोली।।
हमसे कैसा भय?हम कोई अपरिचित नहीं आपसे,सुकेतुबाली बोली।।
किन्तु! भय तो रहता ही है,कादम्बरी बोली।।
आइए आप हमारे समीप आकर बैठिए,आपका सारा भय समाप्त हो जाएगा,सुकेतुबाली बोला।।
पापी कहीं का,स्त्रियों को देखकर सदैव इसकी लार टपकने लगती है,कादम्बरी ने मन में सोचा।।
क्या सोचती हो प्रिए! हमारे समीप आओ ना!सुकेतुबाली बोला।।
तब कादम्बरी कुछ सकुचाई हुई सी सुकेतुबाली के समीप बैठ गई......

क्रमशः.....
सरोज वर्मा.....