Dor to Dor Campaign - 1 in Hindi Children Stories by Prabodh Kumar Govil books and stories PDF | डोर टू डोर कैंपेन - 1

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डोर टू डोर कैंपेन - 1

( 1 )

दुनिया भर में लोग कुत्ते पालने का शौक़ सबसे ज़्यादा रखते हैं। हज़ारों नस्लों के छोटे - बड़े डॉगी इंसानों के पसंदीदा मित्र बन कर उनके पालतू के रूप में उनके साथ रहते थे। इन कुत्तों में हर रंग, हर आकार, हर कौशल के एक से बढ़कर एक श्वान होते जो आदमियों के साथ उनके घर में एक फ़ैमिली मेंबर की तरह ही रहते।
मज़े की बात ये थी कि बाक़ी जानवरों को तो लोग किसी न किसी काम या सेवा के लिए पालते पर कुत्ते बिना किसी स्वार्थ के उनके दोस्त बन कर ही रहते थे। जैसे गाय भैंस को लोग दूध के लिए पालते, घोड़े को सवारी के लिए, पर कुत्ते को यूंही पालते। इन कुत्तों की पहुंच साहब की गाड़ी से लेकर मेमसाब के बेडरूम तक रहती। कहीं कोई रोकटोक नहीं। जो साहब लोग खाते, वही डॉगी को भी मिलता। बल्कि कभी कभी तो उससे ज़्यादा मिलता। साहब की कुकीज़ तो किसी भी शॉप से आ जाती पर कुत्ते के लिए ख़ास दुकान या ख़ास बाज़ार जाना होता।
कुछ लोग कहते थे कि कुत्ते भी घर की रखवाली करते हैं इसलिए वो भी उपयोगी जानवर की श्रेणी में आते हैं। मगर कुछ डॉगी तो ऐसे होते कि उनकी रक्षा या रखवाली ख़ुद उनके मालिक को करनी पड़ती। फ़िर भी वे पाले जाते थे।
इस बात से कुत्तों का कॉन्फिडेंस ज़बरदस्त ढंग से बढ़ गया। कई बार पार्कों या दूसरी सार्वजनिक जगहों पर वो अपने - अपने मालिकों के साथ बड़ी संख्या में आते तो उनका एक दूसरे से परिचय भी हो जाता जिससे उनका आत्म विश्वास और बढ़ जाता।
आख़िर कुछ ओवर कॉन्फिडेंट डॉगीज़ के दिमाग़ में अपने स्टेटस को लेकर एक अजीब तरह का रुआब पैदा हो गया। वो अपने को बाक़ी सब जानवरों की तुलना में कुछ विशिष्ट समझने लगे।

कुत्तों में अपनी इस मानव - प्रियता ने आख़िर अपना रंग दिखाना शुरू किया। कुछ दबंग, ऊंची नस्ल के कुत्ते एक सुनहरे भविष्य के सपने देखने लगे। जब वो सड़क पर या किसी पार्क में अपने हम - ख़्याल श्वानों से मिलते तो आपस में बात करते, कहते- हम सब को एक होकर कुछ बड़ा करना चाहिए। हम पशु हैं तो क्या, मानव बस्तियों में हमारी अच्छी पकड़ है। आदमी हमें मानता है।


- अब वो दिन नहीं रहे जब शहर आदमियों के लिए होते थे और जंगल जानवरों के लिए। एक डॉबरमैन ने कहा। उसका समर्थन पास ही खड़े जर्मनशेफर्ड और हंटर ने भी किया।
- तो क्या हुआ, हम भी जंगल छोड़ कर शहरों में आ तो गए। गाड़ियों में घूमते हैं, और क्या चाहिए? एक बेहद संतोषी छोटे से कुत्ते ने कहा।
- नहीं - नहीं! ये ठीक नहीं। हमें अपनी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता का कोई बड़ा लाभ उठाना ही चाहिए। एक खूंखार अल्सेशियन ने कुछ गुर्राते हुए कहा।
छोटे कुत्ते सहम गए।
तब एक बेहद ऊंचे शिकारी कुत्ते ने कहा- हम शहरों में आ गए तो क्या? आज भी हमें दूसरे चौपायों की तरह जानवर ही समझा जाता है। जंगल का राजा शेर ही हमारा भी राजा है। आख़िर हमारे संपर्कों का फ़ायदा ही क्या, जब हमारे मालिक इंसान और हम जानवर कहलाएं?
- तो क्या आप भी अब अपने को इंसान ही कहलाना चाहते हैं? क्या हम अब दो पैरों वाले बन जाएं? एक छोटे से पिल्ले ने डरते - डरते कहा।
सब हंस पड़े। पार्क में घूमते लोगों ने कुत्तों को हंसते देखा तो वो भी सहम गए। उन्होंने अपने इन मित्रों को हमेशा भौंकते और गुर्राते हुए ही सुना था, कभी हंसते हुए नहीं देखा था।
वे अपने- अपने डॉगी की ज़ंज़ीर खींचते हुए अपने घरों को लौट चले।
लेकिन आज की बातचीत से सब कुत्तों की आंखों में नए सपने तैरने लगे।

- लेकिन क्या करें? कुछ झबरीले नाज़ुकदिल कुत्तों ने कहा।