Mere Ghar aana Jindagi - 15 in Hindi Fiction Stories by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | मेरे घर आना ज़िंदगी - 15

मेरे घर आना ज़िंदगी - 15


(15)

समीर स्कूल जाने के लिए तैयार होकर अपने कमरे से बाहर आया। वह बहुत नर्वस था। अमृता ने उसे सीने से लगाकर कहा,
"बेटा डरने की ज़रूरत नहीं है। मैंने कहा है ना कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। कुछ भी हो उसका सामना करना। डरना नहीं। अगर कोई कुछ गलत करने की कोशिश करे तो उसकी शिकायत करना।"
अमृता ने उसका टिफिन लाकर दिया। स्कूल बस आने का वक्त हो गया था। वह उसे खुद बस में बैठाने के लिए नीचे गई।
समीर को बस में बैठाकर वह लौट रही थी तो उसकी मुलाकात नंदिता से हुई। नंदिता उसे देखकर उसकी तरफ बढ़ी। वह वहीं रुक गई। इधर उसे नंदिता में कुछ बदलाव नज़र आ रहे थे।‌ अपने खुद के अनुभव से उसे आभास तो हो रहा था। लेकिन वह पूछने की हिम्मत नहीं कर पाई थी। नंदिता के आने पर उसने कहा,
"कैसी हो नंदिता ?"
"ठीक हूँ। लगता है कि समीर को स्कूल बस में बैठाकर आई हैं।"
"हाँ....उस सबके बाद उसे संभलने में वक्त लग गया। अगर मनोचिकित्सक से उसकी काउंसलिंग ना कराई होती तो शायद जीते जी उसे खो देती। पर भगवान की दया रही कि अब सबकुछ ठीक है। डॉक्टर ने कहा कि अब पहले की तरह स्कूल जाएगा। लोगों से मिले जुलेगा तो ही उसका आत्मविश्वास दोबारा लौटेगा। आज बहुत दिनों के बाद स्कूल गया है। देखो क्या होता है।"
"सब अच्छा होगा। भगवान पर भरोसा रखिए।"
अमृता ने देखा कि वह तैयार होकर कहीं जा रही थी। उसने पूछा,
"इतनी जल्दी ऑफिस तो नहीं जा रही होगी। कहाँ जा रही हो ?"
"आज शर्मा अंकल का ऑपरेशन है। उनसे मिलने जा रही थी। उन्हें अच्छा लगेगा।"
ऑपरेशन वाली बात सुनकर अमृता को आश्चर्य हुआ। उसे योगेश के बारे में कुछ भी पता नहीं था। उसने कहा,
"योगेश अंकल की बात कर रही हो तुम। उन्हें क्या हुआ ?"
नंदिता ने उसे सारी बात बताई। सुनकर अमृता बोली,
"हम एक ही बिल्डिंग में रहते हैं। फिर भी मुझे कुछ पता नहीं था। सचमुच उन पर तो जैसे मुसीबत आ गई है।"
"आप इतनी परेशान थीं कि मैंने आपको कुछ नहीं बताया। ऊपरवाले की इच्छा के आगे हम कर भी क्या सकते हैं। अब बस उनका ऑपरेशन सही से हो जाए। ठीक होकर वह फिर से आंटी के साथ रहने लगें।
अमृता ने भी यही इच्छा जताई। नंदिता ने कहा,
"अब चलती हूँ। अस्पताल से ऑफिस के लिए निकल जाऊँगी।"
नंदिता जाने लगी तो अमृता ने उसे रोककर कहा,
"तुमसे कुछ पूछना था।"
"क्या ?"
अमृता ने अपने मन की बात कही। सुनकर नंदिता ने कहा,
"सही समझ रही हैं आप। तीन महीने होने वाले हैं।"
अमृता यह सुनकर खुश हुई। उसने कहा,
"मुबारक हो। अपना खयाल रखा करो। मुझसे किसी भी तरह की मदद चाहिए हो तो बताने में संकोच मत करना।"
नंदिता ने मुस्कुरा कर कहा,
"बिल्कुल बताऊँगी....."
यह कहकर वह अपनी स्कूटी की तरफ बढ़ गई। अमृता कुछ देर तक योगेश के बारे में सोचती रही। फिर अपने घर चली गई।

योगेश गुमसुम से बैठे थे। उनके मन में बहुत कुछ चल रहा था। बार बार उनके मन में आ रहा था कि यह उनके जीवन का अंतिम दिन है। ऑपरेशन थिएटर से वह जीवित वापस नहीं आएंगे। फिर कभी उर्मिला से नहीं मिल पाएंगे। उन्होंने पास बैठे सुदर्शन से कहा,
"तुम्हें याद है ना तुमने कहा था कि उर्मिला को अकेला नहीं छोड़ोगे। अपना वादा याद रखना। मैंने उर्मिला की व्यवस्था कर दी है। तुम बस समय समय पर उसे जाकर मिलते रहना।"
"मुझे अपना वादा याद है अंकल जी। आप निश्चिंत रहिए। अपने मन में विश्वास रखिए कि आप ठीक हो जाएंगे।"
"पता नहीं दिल बहुत घबरा रहा है। जा सकता तो एकबार उर्मिला को देखकर आता। अब पता नहीं उससे मिलना होगा कि नहीं।"
योगेश रोने लगे। उसी समय नर्स आ गई। उसके साथ नंदिता भी थी। नर्स ने कहा,
"मिस्टर शर्मा आपको कहा था ना कि गॉड पर भरोसा रखिए। आपका ऑपरेशन ठीक होगा। देखिए आपसे मिलने कौन आया है।"
नंदिता ने आगे आकर कहा,
"गुड मॉर्निंग अंकल...."
नंदिता को देखकर योगेश के मायूस चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई। सुदर्शन स्टूल से उठकर खड़ा हो गया। उसने नंदिता को बैठने का इशारा किया। नंदिता योगेश के पास बैठते हुए बोली,
"अंकल आज आपका ऑपरेशन हो जाएगा। उसके कुछ दिन बाद आप अपने घर आ जाएंगे। फिर से आंटी को टहलाने के लिए नीचे पार्क में जाया करेंगे। तब मैं आपसे बातें किया करूँगी।"
"पता नहीं बेटा उर्मिला को देख भी पाऊँगा या नहीं।"
नंदिता ने अपने बैग से एक फोटो फ्रेम निकालते हुए कहा,
"यह आपके लिए लाई हूँ। जब आप आंटी के साथ घर जाएंगे तब आप दोनों की एक फोटो क्लिक करूँगी। उसका प्रिंट निकलवा कर इस फ्रेम में लगाऊँगी। तब आपको दूँगी। अभी तो इसलिए लाई थी कि आपको बता सकूँ कि फ्रेम के लिए आपको फोटो खिंचवानी है।"
नंदिता की इस बात से योगेश को सुकून मिला था। उनके चेहरे पर अब खुली हुई मुस्कान थी।

समीर को स्कूल जाते हुए चार दिन हो गए थे। इन दिनों में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जो उसे परेशान करता। वह क्लास में जाता था और चुपचाप अपनी जगह पर बैठ जाता था। कोई उससे कुछ नहीं बोलता था। टीचर्स भी उससे तभी कुछ बोलते थे जब उसकी तरफ से कोई सवाल किया जाता था। पहले समीर ऐसा ही चाहता था। पर दीपक कुमार के साथ हुए काउंसिलिंग सेशन्स के बाद उसके मन में इच्छा जागी थी कि वह भी दूसरों के साथ घुले मिले। उनसे दोस्ती करे। लेकिन अपनी तरफ से पहल करने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी।
कल उसकी अपने सोशल मीडिया के दोस्त अजित से टेक्सटिंग हुई थी। उसने अपने मन की बात उसके सामने रखी थी। अजित ने सलाह दी थी कि वह अपनी तरफ से पहल करे। लोगों को स्माइल दे। उनकी तरफ वेव करे। हो सकता है कि इससे उसके क्लासमेट्स उससे दोस्ती करने के लिए आगे आएं।‌
आज समीर इसी इरादे के साथ स्कूल पहुँचा था कि वह अपनी तरफ से पहल करेगा। उसके क्लास में श्रेयस नाम का एक लड़का था। उससे कभी दोस्ती तो नहीं रही थी पर उसका व्यवहार पहले औरों से अलग था। वह ज़रूरत पड़ने पर समीर से बात कर लेता था। एकबार उसने एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में समीर की कुछ मदद भी की थी। समीर ने सोचा था कि उसके साथ ही पहल करेगा।
श्रेयस उसके बगल वाली रो में उससे एक सीट आगे बैठता था। पहली क्लास शुरू होने से पहले जब सब टीचर का इंतज़ार कर रहे थे तब समीर उसकी तरफ देख रहा था। श्रेयस की नज़र जब उस पर पड़ी तो समीर मुस्कुरा दिया। उसे पूरी उम्मीद थी कि श्रेयस भी उत्तर में मुस्कुराएगा। लेकिन श्रेयस ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। शुरुआत अच्छी नहीं हुई थी। लेकिन समीर ने अपने मन को समझाया कि वह रीसेस में एकबार फिर कोशिश करेगा।
रीसेस में सब अपने अपने ग्रुप के साथ टिफिन लेकर बाहर जा रहे थे। श्रेयस भी अपना टिफिन निकाल कर बाहर जा रहा था तभी समीर ने आवाज़ देकर रोक लिया। श्रेयस रुक गया। समीर ने उसके पास जाकर अपना हाथ बढ़ाया। श्रेयस ने उसकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया। समीर को दूसरा धक्का लगा। उसने अपना हाथ पीछे कर लिया। पर अब एकदम से पीछे हट जाना उसे ठीक नहीं लगा। उसने कहा,
"क्यों ना एकसाथ खाएं।"
श्रेयस ने उसे अजीब नज़रों से देखा। चेहरे पर एक तंज़ भरी मुस्कान लाकर बोला,
"मेरा एक ग्रुप है। तुम उसमें फिट नहीं हो पाओगे।"
श्रेयस क्लास से बाहर निकल गया। समीर ने इतने दिनों में जो आत्मविश्वास संजोया था वह बिखर गया।

अमृता ऑफिस से लौटकर आई तो उसे कुछ ठीक नहीं लगा। पिछले कुछ दिनों से समीर उसके लौटने पर उसका दिन कैसा रहा पूछता था। जब वह फ्रेश होकर आती थी तो उसे चाय बनाकर पिलाता था। आज उसने दरवाज़ा खोला। एक हल्की सी मुस्कान दी और अपने कमरे में चला गया। अमृता फ्रेश होने के बाद उसके कमरे में गई। उसने पूछा,
"क्या हुआ समीर ? तबीयत ठीक नहीं है।"
समीर अपनी नोटबुक में कुछ लिख रहा था। उसने सर उठाकर अमृता की तरफ देखा। वह बोला,
"तबीयत ठीक है। आप तो जानती हैं कि स्कूल ना जाने के कारण बहुत सारा कोर्स छूट गया है। अब कवर करना है। कुछ नोट्स पूरे कर रहा था।"
अमृता ने उसके सर पर हाथ रखकर कहा,
"गुड....स्कूल में सब ठीक रहा ना।"
समीर ने अपना चेहरा नोटबुक पर झुकाकर कहा,
"सब ठीक है मम्मी.....डोंट वरी।"
समीर ने जिस तरह से जवाब दिया था उससे अमृता को संतोष नहीं हुआ। उसने कहा,
"कुछ भी हो बताने में संकोच मत करना।"
समीर अमृता की चिंता समझ गया था। खुद को सामान्य दिखाने के लिए बोला,
"चलिए मैं आपके लिए चाय बना दूँ।"
अमृता ने कहा,
"तुम अपना काम करो। मैं बना लूँगी। तुम्हें कुछ चाहिए ?"
"नहीं...."
अमृता समीर के कमरे से बाहर चली गई। समीर नोट्स बनाने में मन‌ लगाने लगा। पर श्रेयस के व्यवहार ने जो चोट पहुँचाई थी वह उससे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। श्रेयस की तंज़ करती मुस्कान उसके सामने तैर रही थी। जो उसे दर्द दे रही थी। उसके कानों में गूंज रहा था,
"मेरा एक ग्रुप है। तुम उसमें फिट नहीं हो पाओगे।"
समीर ने नोटबुक बंद कर दी। टेबल पर सर रखकर रोने लगा।



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