Ishq a Bismil - 19 in Hindi Fiction Stories by Tasneem Kauser books and stories PDF | इश्क़ ए बिस्मिल - 19

इश्क़ ए बिस्मिल - 19

यह उसके घर के पेपर्स थे, वह घर जिसमें वह रहता था, वह घर जो उसके नाम था, और अब ज़मान ख़ान चाहते थे कि वह यह घर अरीज के नाम कर दे। आख़िर क्यों? उसे समझ नहीं आ रहा था, लेकिन अब वह कुछ कर नहीं सकता था, निकाह हो चुका था और अब आज या कल हर हाल में उसे अरीज को उसका हक़ देना था इसलिए उसने अपने दिमाग़ में उठ रहे कईं सवालों को पीछे छोड़ पेपर्स साइन कर दिया था और गुस्से से अरीज के सामने टेबल पर उन पेपर्स को पटक दिया था, सब उसकी इस हरकत से हैरान हुए थे मगर उमैर को अपने गुस्से के आगे किसी और की परवाह नहीं थी, वह तन-फन करता लम्बे लम्बे डिग भरता कमरे से निकल गया था। थोड़ी देर पहले सबके चेहरों पर फैली ख़ुशी अचानक से गायब हो गई थी। ज़मान ख़ान सब के सामने काफ़ी शर्मिंदा हो गये थे और खासकर अरीज के सामने जिसकी नज़र टेबल पर पड़े पेपर्स पर टिकी थी।


ज़मान ख़ान अरीज और अज़ीन को लेकर घर पहुंचे थे। रात काफ़ी हो चुकी थी इसलिए पूरा घर सन्नाटों में घिरा हुआ था। अरीज इतना शानदार घर अपनी ज़िंदगी में पहली बार देख रही थी, ऐसा घर उसने सिर्फ टीवी पर देखा था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह अब इस घर में रहने वाली है। ज़मान ख़ान अरीज और अज़ीन को लेकर सीधा उमैर के कमरे में गये थे लेकिन वहां उमैर मौजूद नहीं था। वह उन दोनों बहनों को वहीं बैठाकर आसीफ़ा बेगम के पास गए थे। अरीज ने ज़मान ख़ान की ग़ैर मौजूदगी में नज़र उठाकर पूरे कमरे का जायज़ा लिया, वह एक luxury रूम था, उस कमरे की एक एक चीज़ उस कमरे में रहने वाले की बेमिसाल चोइस का आइना था। जाने क्यों अरीज का दिल घबराने लगा उसने अपने सर को नहीं में झटका और अज़ीन को देखने लगी जो बड़ी हैरानी और शौक से एक एक चीज़ को नीहार रही थी। तभी अचानक से उस कमरे में दनदनाती हुई, गुस्से से बेहाल एक औरत पहूंची और आते ही उसका बाज़ू पकड़ कर बड़ी बेदर्दी से उसे सोफ़े पर से खड़ा किया था।

उसे इस अचानक से हमले का अंदाज़ा नहीं था इसलिए वह गिरने को थी मगर ज़मान ख़ान ने उसे सम्भाल लिया और एक कड़कदार आवाज़ में कहा “आसिफ़ा !”

“मैं नहीं मानती ये निकाह, निकालो इस लड़की को इसी वक़्त मेरे घर से।“ आसिफ़ा बेगम की आंखों में आग बरस रहा था। वह किसी घायल शेरनी की तरह दहाड़ी थी। अरीज को उसी पल एहसास हो गया था ज़िंदगी अब यही ‘बस’ नहीं करेगी आगे और भी इम्तिहान बाकी है।

“ख़बरदार जो तुमने उसे आइंदा कभी हाथ भी लगाया तो, और इस घर से अरीज तो बिल्कुल नहीं जाएगी क्योंकि यह घर हक़ देन मेहर के तौर पर उमैर ने अरीज ज़हूर बिन्ते इब्राहिम ख़ान के नाम कर दिया है।“ ज़मान ख़ान ने शोले बरसाती हुई नज़रों के साथ एक एक लफ्ज़ को जताते हुए कहा था।

पैरों तले जमीन खिसकना किसे कहते हैं? आसमान सर पर गिरना किसे कहते हैं? पहाड़ सर पर टूटना किसे कहते हैं? यह सब आसिफ़ा बेगम को आज ही पता चला था। उनकी आंखें फटी की फटी रह गई थी तो दूसरी तरफ अरीज भी हैरानी के समन्दर में गोते खा रही थी, उस पर अभी यह बात खुली थी कि उसे जो जायदाद हक़ मेहर के तौर पर मिली थी वह यही शानदार घर था।

“यह आप क्या कह रहे हैं, होश में तो है आप?” आसिफ़ा बेगम भपरी हुई शेरनी बन गई थी बड़ी फुर्ती से उसने ज़मान ख़ान का गिरेबान को पकड़ कर कहा था। अरीज बड़ी हैरानी से उन्हें देख रही थी, इतने बड़े घर में रहने वाली औरत, दिखने में तालीम याफ़्ता होकर भी वह अन्दर से इतनी जाहिल थी।

“मैं बिल्कुल होश में हूं और अब तुम भी होश में आ जाओ तो बेहतर होगा।“ ज़मान ख़ान ने उन्हें धमकी दी थी।

“आप ऐसा नहीं कर सकते? क्यूं किया आप ने ऐसा?” आसिफ़ा बेगम हरगिज़ मानने को तैयार नहीं थी, ना यह निकाह और ना ही अरीज का वजूद।

“मैं कर चुका हूं आसिफ़ा और तुम जितनी जल्दी हो सके इस सच्चाई को accept कर लो, वरना तुम्हारा ही नुकसान होगा और बेहतर होगा कि तुम अब इस कमरे से चली जाओ।“ ज़मान ख़ान ने उन्हें दरवाज़े का रास्ता दिखाया था। आसिफ़ा बेगम को और ज़्यादा आग लग गई थी मगर वह अपने शौहर को भी जानती थी, उनके शौहर यूं तो बड़े ठंडे दिमाग के थे लेकिन अगर कभी उन्हें गुस्सा आ जाता तो अच्छे अच्छों को भी हिला कर रख देते। उन्होंने पहले ज़मान ख़ान को और फिर अरीज को गुस्सेल नज़रों से देखा था, फिर उनकी नज़र अरीज के लिपटी हुई अज़ीन पर रूकी थी जो उन्हें ही बड़ी सहमी आंखों से देख रही थी।

उन्होंने बड़ी हिकारत और नफ़रत से दोनों को देख कर तेज़ क़दमों से रूम से बाहर निकल गई थी।

उनके जाते ही ज़मान ख़ान अरीज के पास आए थे और उसके सर पर अपना शफ़क़त भरा हाथ रखा था। अरीज की आंखें आंसुओ से भर गई थी, उसने भर्राई हुई आवाज़ में उनसे पूछा था “जब ऐसी बात थी तो फिर आप ने ऐसा क्यों किया? आपको मेरा निकाह नहीं करवाना चाहिए था।“ अरीज कहते कहते ज़ोर ज़ोर से रोने लगी थी। ज़मान ख़ान ने उसे सोफे पर बैठा दिया था।

“आपका निकाह करवा कर मैंने आप पर नहीं बल्कि खुद पर एहसान किया है। आप नहीं जानती मैं आपके और अज़ीन के क़र्ज़ तले दबा था। आपकी मां का मुझ पर बहुत बड़ा एहसान है कि उन्होंने जाते जाते इस घर के पते पर एक चिट्ठी लिख दी वरना मैं आप तक कभी नहीं पहुंच पाता।“ ज़मान ख़ान की आंखें खुद भीग गई थी उन्होंने अपने हाथ से अपनी आंखें साफ़ की। अरीज उन्हें नासमझी से देख रही थी।

“उमैर इस वक़्त घर पर होता है, मगर वह मुझ से ख़फ़ा है इसलिए घर नहीं लौटा, वैसे वह मुझसे बहुत मुहब्बत करता है अपनी मां से भी ज़्यादा।“ यह बात कह कर वह हंस पड़े थे लेकिन अरीज हंस नहीं सकी थी, उसे आने वाले कल की फ़िक्र सता रही थी। मां ने इतना हंगामा किया अब उनका बेटा क्या सलूक करेगा उसके साथ।

“इस तरह अचानक की शादी से किसी का भी वही reaction होता जो उमैर का हुआ है, मैं उसे हरगिज़ ग़लत नहीं कह रहा वह अपनी जगह बिल्कुल सही है लेकिन मैं मजबूर था मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था, मुझे हर हाल में आपकी शादी उमैर से करवानी थी, उसकी मर्ज़ी होती तो भी और अगर ना होती तब भी। अगर मैं आपको पहले घर ले आता और बाद में निकाह करवाता तो आसिफ़ा कभी यह होने नहीं देती, बल्कि वह आपको इस घर में भी बर्दाश्त नहीं कर पाती, इसलिए मैंने उसके लिए कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा। अब वह कुछ नहीं कर सकती।“ वह बड़े आराम से कह रहे थे लेकिन अरीज जान गई थी कि उसकी ज़िन्दगी इतनी आसान और नार्मल नहीं होने वाली।

“उमैर बहुत अच्छा और मुहब्बत करने वाला लड़का है, इस निकाह की वजह से वह जिस situation में है उस से आप किसी भी तरह की तल्ख़ियां expect कर सकती हैं, मगर आपको उसकी हर तल्ख़ियों का जवाब सब्र और मुहब्बत से देना होगा फिर देखिएगा इन्शा अल्लाह एक बार जब वह आपको दिल से अपना लेगा फिर चाहे पूरी दुनिया आपके खिलाफ क्यों ना खड़ा हो जाए वह आपका साथ कभी नहीं छोड़ेगा।“

ज़मान ख़ान उसे समझा रहे थे लेकिन अगर वह उस से यह सब नहीं भी कहते तब भी अरीज खुद भी यही सब करती चाहे वह कभी उमैर का दिल जीत पाती या नहीं।

“अब आप आराम करो बेटा, बहुत थक गई होंगी।“ ज़मान ख़ान इतना कह कर कमरे से चले गए थे मगर अरीज आराम कैसे करती उसका चैन सुकून सब लुट गया था।

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