Mere Ghar aana Jindagi - 24 in Hindi Fiction Stories by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | मेरे घर आना ज़िंदगी - 24

मेरे घर आना ज़िंदगी - 24


(24)

मकरंद और नंदिता अपने फ्लैट में लौट आए थे पर यह तय हो गया था कि दोनों अब नंदिता के मम्मी पापा के साथ ही रहेंगे। मकरंद ने अपने मकान मालिक को बता दिया था कि इस महीने के अंत में वह फ्लैट खाली कर देगा। दोनों मिलकर थोड़ा थोड़ा सामान नंदिता के मम्मी पापा के घर पहुँचाने भी लगे थे।
नंदिता कुछ कपड़े दो बैग में भरकर अपनी मम्मी के घर रखने जा रही थी। साथ में मकरंद भी था। जब दोनों फ्लैट का दरवाज़ा बंद कर रहे थे तब अमृता भी अपने फ्लैट से बाहर निकल रही थी। उसने नंदिता से कहा,
"कहीं बाहर जा रहे हो तुम लोग ?"
नंदिता ने कहा,
"नहीं....दरअसल मैं और मकरंद मेरे मम्मी पापा के साथ रहने वाले हैं। इस महीने के अंत तक फ्लैट खाली कर देंगे। इसलिए थोड़ा थोड़ा सामान पहुँचा रहे हैं। बाकी बाद में ले जाएंगे।"
"यह तो बड़ी अच्छी बात है कि तुम लोग अपने मम्मी पापा के साथ रहोगे। पर मुझे तुम्हारे जैसे अच्छे पड़ोसी छूटने का दुख होगा।"
उसकी बात सुनकर नंदिता हंसकर बोली,
"रहेंगे तो हम दोनों इसी शहर में। मिलने आती रहूँगी। आप भी आइएगा।"
"बिल्कुल...."
कहकर अमृता आगे बढ़ गई। मकरंद और नंदिता भी उसके पीछे लिपट की तरफ बढ़ गए।

समीर ने कई बार चेक किया था पर उसके ईमेल का कोई जवाब नहीं आया था। उसने बड़ी उम्मीद के साथ ईमेल भेजा था। उसे उम्मीद थी कि शोभा मंडल उसकी मदद करने को तैयार होंगी। लेकिन उधर से तो कोई जवाब ही नहीं मिला था। उस दिन के बाद से अमृता और उसके बीच भी बहुत कम बातचीत हो रही थी। इस सबसे समीर बहुत परेशान था। उसे लग रहा था कि जैसे उसकी मदद करने वाला इस दुनिया में कोई नहीं है।
उसका मन किसी भी चीज़ में नहीं लग रहा था। कभी वह कोई किताब पढ़ने बैठता था। पर दो चार पन्ने पलट कर ऐसे ही रख देता था। फिर अपना मन लैपटॉप पर गेम खेलने में लगाने की कोशिश करता था या इंटरनेट पर कुछ पढ़ने की। पर कुछ ही देर में लैपटॉप बंद कर देता था। उसका मन अजित से बात करने का भी नहीं हो रहा था। उसके लिए बड़ा कठिन समय था। वह समझ नहीं पा रहा था कि आगे उसके जीवन की दिशा क्या होने वाली है।
समीर वॉशरूम में नहाने गया था। आइने के सामने खड़ा खुद को देख रहा था। उसके शरीर में बहुत से ऐसे बदलाव आए थे जो वह नहीं चाहता था। आवाज़ पहले से मोटी हो गई थी। चेहरा भरा हुआ सा लगता था। चेहरे पर दिखने वाली काली रेखाएं और गहरी हो गई थीं। उसे लग रहा था कि जैसे कुदरत उसके साथ कोई खेल खेल रही है। उसे शरीर कोई और दिया है और भावनाएं कुछ और। इस बेमेल से वह बहुत परेशान हो रहा था।
बिना नहाए वह आकर अपने बिस्तर पर लेट गया। वह सोच रहा था कि क्या जो है, वह उसकी सोच का फर्क है। क्या यह उसकी गलती है जो वह सामंजस्य नहीं बिठा पा रहा है। लेकिन उसके मन से जवाब आता कि ऐसा नहीं है। उसने खुद ऐसे लोगों के बारे में पढ़ा है जो उसकी तरह ही अपने वजूद को लेकर परेशान हैं। वह गलत नहीं है। जो है उस पर उसका कोई बस नहीं है। वह सोच रहा था कि दुनिया ऐसी क्यों है ? वह क्यों किसी के दर्द को समझने की जगह उसे और अधिक तकलीफ देती है। क्यों सबको एक सांचे में फिट करना चाहती है ? थोड़ी सी भी भिन्नता बर्दाश्त नहीं कर पाती है ?
जो सवाल वह कर रहा था उसके जवाब उसके पास नहीं थे।

अमृता अपना काम निपटा कर वापस आ गई थी। लंच का समय हो गया था। उसने खाना टेबल पर लगाया। उसके बाद जाकर समीर के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। समीर ने दरवाज़ा खोला। अमृता उसे देखकर बोली,
"जाते समय तुमसे नहाने को कह गई थी। पर तुम तो वैसे ही खड़े हो। नहाने का इरादा नहीं है क्या ?"
समीर ने धीरे से कहा,
"पाँच मिनट दीजिए मैं अभी आता हूंँ।"
कहकर उसने दरवाज़ा बंद कर दिया और नहाने चला गया।
अमृता उसकी प्रतीक्षा करने लगी। वह समीर की परेशानी को समझ रही थी। पर उसे कोई झूठा दिलासा नहीं देना चाहती थी। वह खुद भी बहुत परेशान थी। उसके मन में रस्साकशी का खेल चल रहा था। कभी एक माँ के तौर पर भावनाएं बलवती हो जाती थीं। वह समीर की तरफ खिंचने लगती थी। सोचती थी कि जो भी हो जाए समीर का साथ देगी। पर दूसरे ही क्षण प्रैक्टिकल होकर सोचने लगती थी। तब उसे लगता था कि समीर के साथ जाकर वह उसका अहित करेगी। बार बार इस पाले से उस पाले में जाते हुए वह भी परेशान थी।
कुछ देर में समीर नहाकर बाहर आया। वह जाकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया। अमृता भी उठकर गई। उसने अपने और समीर के लिए प्लेट लगाई। दोनों चुपचाप खाने लगे। अमृता चाहती थी कि समीर से बात करके उसे एकबार फिर समझाए। उसने समीर से कहा,
"फाइनल एग्ज़ाम्स का रिज़ल्ट तो आने वाला होगा।"
समीर ने जवाब दिया,
"अगले हफ्ते आ जाएगा।"
"तुम नाइंथ क्लास में पहुँच जाओगे। आगे आने वाले साल बहुत महत्वपूर्ण हैं। बहुत ज़रूरी है कि इन सालों में मन लगाकर पढ़ाई करो। तभी आगे का रास्ता मिलेगा।"
समीर ने कोई जवाब नहीं दिया। बस खाते हुए धीरे से सर हिला दिया। अमृता ने आगे कहा,
"इसलिए कह रही हूँ कि कुछ भी ऐसा मत करो जो जीवन में बेवजह हलचल पैदा करे। पूरी लगन से आने वाले भविष्य की तैयारी करो।"
समीर ने अपनी चम्मच प्लेट पर रखकर कहा,
"जो भी करना चाहता हूंँ उसका संबंध आने वाले भविष्य से ही है।"
अमृता इस बात से चिढ़कर बोली,
"मैं तुम्हें सही नसीहत दे रही हूँ। पर तुम अपनी ज़िद पर अड़े हो।"
समीर को भी बात बुरी लग गई। उसने कहा,
"मैं बेकार की ज़िद नहीं कर रहा हूंँ। पर आप नहीं समझ पाएंगी। आप भी बाकी सब लोगों की तरह हैं। मुझे अपनी लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ेगी। मैं लड़ लूँगा पर छोड़ूँगा नहीं।"
समीर अपनी कुर्सी से उठ गया। खाना छोड़कर अपने कमरे में चला गया। अमृता आवाक थी। वह चाहती थी कि समीर को समझाए। लेकिन वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था। गुस्से में खाना छोड़कर चला गया था। उसका मन भी खाने से उचट गया था। उसने दोनों प्लेट ढककर रख दीं और अपने कमरे में चली गई।

नंदिता के पापा ने उसके और मकरंद के लिए अपने मकान का ऊपर का पूरा फ्लोर दे दिया था। इस फ्लोर में तीन कमरे थे। दो कमरों में अटैच्ड वॉशरूम था। एक लॉबी, मॉड्यूलर किचन, एक स्टोर और बालकनी थी। काफी बड़ा पोर्शन था। एक समय यह पोर्शन किराए पर था। लेकिन खाली होने के बाद नंदिता के पापा ने किराएदार रखने से मना कर दिया। अब वह पोर्शन उन्होंने अपनी बेटी और दामाद को दे दिया था। वह नंदिता और मकरंद के साथ उसी पोर्शन में थे। उन्होंने मकरंद से कहा,
"तुम्हें यह पोर्शन कैसा लगा ?"
मकरंद ने कहा,
"आपने अपना मकान किसी अच्छे आर्कीटेक्ट से बनवाया है। बहुत सुंदर है। ऊपर नीचे दोनों पोर्शन बड़े और हवादार हैं।"
अपने मकान की तारीफ सुनकर नंदिता के पापा खुश हो गए। उन्होंने कहा,
"मकान बनवाना मेरा सपना था। इसलिए जब बनवाया तब बड़े मन से बनवाया।"
"पर हम दोनों को इतना बड़ा पोर्शन देने की क्या ज़रूरत थी। हम दोनों तो नीचे के पोर्शन में आराम से रह लेते। यह पोर्शन किराए पर उठा देते।"
"किराए पर तो उठाना ही नहीं था। बाकी तुम दोनों यहाँ आराम से अपने हिसाब से रहोगे। नीचे रहते तो संकोच होता।"
नंदिता की मम्मी ने कहा,
"अब तय कर लिया है तो महीना खत्म होने का इंतज़ार क्यों कर रहे हो। सामान लेकर यहींं आ जाओ।"
नंदिता के पापा ने भी अपनी पत्नी का समर्थन किया। मकरंद ने कहा,
"कोशिश करते हैं कि अगले हफ्ते तक आ जाएं।"
नंदिता यह सुनकर खुश हो गई। उसके पापा ने कहा,
"हम दोनों नीचे जा रहे हैं। तुम लोग आराम से बैठकर सोचो कि इस पोर्शन को कैसे सजाना है।"
नंदिता की मम्मी ने जाते हुए कहा,
"खाना तैयार हो जाएगा तो आवाज़ दूँगी। आकर खा लेना।"
अपने मम्मी पापा के जाने के बाद नंदिता मकरंद के गले लगकर बोली,
"थैंक्यू मकरंद कि तुम यहाँ शिफ्ट होने के लिए तैयार हो गए। अब आराम से इतने बड़े घर में रहेंगे। फ्लैट का किराया भी बचेगा।"
दोनों लॉबी में खड़े थे। नंदिता ने एक कोने की तरफ इशारा करते हुए कहा,
"मकरंद वहाँ मैं मंदिर बनाऊँगी। अभी कुछ दिन पहले भावना ने अपने घर के लिए मंदिर खरीदा था। बहुत सुंदर था। यहाँ आने के बाद मैं वैसा मंदिर लेकर आऊँगी।"
नंदिता ने कुछ सोचकर कहा,
"जो सबसे बड़ा कमरा है वह हमारा बेडरूम होगा। लॉबी से लगा कमरा ड्राइंग रूम। एक कमरा कभी कोई गेस्ट आया तो उसके लिए।"
नंदिता अपनी रौ में बोलती जा रही थी। उसने कहा,
"हमारे पास इतना ज्यादा फर्नीचर तो है नहीं। लेकिन जो है उससे काम चला लेंगे। मैं तो यह सोचकर खुश हूँ कि हमारा बच्चा इस घर में आएगा।"
नंदिता बोल रही थी पर मकरंद अपने खयालों में था। अचानक उसका मन उदास हो गया था। नीचे से नंदिता की मम्मी ने खाने के लिए आवाज़ लगाई। दोनों खाना खाने चले गए।


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