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आंसुओं का उपहार

वाजिद हुसैन की कहानी-प्रेमकथा

शाम का झुटपुटा होते ही वह लड़की एक बार फिर उस शांत, छोटे पार्के के कोने में आई। वह एक बेंच पर बैठ गई और एक किताब पढ़ने लगी, क्योंकि अभी आधा घंटा और था जिसमें यह किया जा सकता था‌‌। ... उसकी पोशाक भूरी और साधारण थी और उसने एक स्कार्फ से अपने चेहरे को ढक रखा था। उसके पीछे से उसका शांत चेहरा झांक रहा था, जिसकी सुंदरता से वह बेखबर थी। वह यहां इसी समय बीते दिन भी आई थी। और वहां एक व्यक्ति था जो यह जानता था। ... जो युवक यह जानता था, वह पास ही मंडरा रहा था और उसकी क़िस्मत से, एक पन्ना पलटते समय लड़की की किताब उसकी उंगलियों से फिसल गई और बैंच से उछलकर दूरी पर जाकर गिरी। ... उस युवक ने चुस्ती से किताब उठा ली। अरे! यह तो लंदन की गाइड- बुक है, क्या आप लंदन से आई हैं?'
लड़की ने उसे आराम से देखा, उसके ब्रांडेड कपड़ों की ओर देखा और उसके चेहरे-मोहरे को देखा। फिर कहा, 'नहीं, यह बिन बुलाये मेहमान की तरह आ गई।' ... 'आप जितनी सुंदर है बातें भी उतनी ही दिलचस्प करती हैंं।' युवक ने कहा। ... 'तुम चाहो तो बैठ सकते हो।' उसने मंद स्वर में कहा। 'सच मुझे अच्छा लगेगा, अगर तुम ऐसा करोगे। इस ख़राब रौशनी में पढ़ा तो जा नहीं सकता। मैं बात करना ज़्यादा पसंद करूंगी।'
युवक ज़रा झुककंर बोला, 'थैंक यू। 'जानती हो, 'उसने अपनी बात शुरू की, 'तुम जैसी खूबसूरत लड़की मैंने अरसे से नहींं देखी। कल मेरी नज़र तुम पर पड़ी थी। तुम्हें पता नहीं चला कि कोई तुम्हारी इन आंखों का दीवाना हो गया है।'
'तुम चाहे कोई भी हो, 'लड़की ने ठंडे स्वर से कहा, 'तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि मैं एक शरीफ लड़की हूं। मैंने तुमसे बैठने के लिए कहा था: तुमने इसका गलत मतलब निकाल लिया।'
'मैं माफी चाहता हूं, 'युवक ने कहा। 'फलर्ट का उसका अंदाज पछतावे और शिष्टता में बदल गया। 'यह मेरी ही गलती थी, तुम्हें पता है - मेरा मतलब है, पार्कों में ऐसी लड़कियां होती हैं।
'मेहरबानी करके इस विषय को रहने दो। बेशक मुझे पता है। मैं यहां इसलिए बैठने आती हूं, क्योंकि बस एक यही जगह है जहां मैं मानवता के विशाल, आम, धड़कते दिल के नज़दीक हो सकती हूं। मुझे ज़िंदगी में वह माहौल मिला, जहां इसकी धड़कनों को कभी महसूस ही नहीं किया जाता। तुम सोच सकते हो कि मैं तुमसे क्यों बोली, मि. --?'
'रिषभ, 'युवक ने अपना नाम बताया।
'मि. रिषभ, क्योंकि मैं एक बार किसी सहज व्यक्ति से बतियाना चाहती थी -किसी ऐसे व्यक्ति से, जिसे दौलत की घिनौनी चमक और नाम भर के बड़प्पन ने बिगाड़ा न हो। ओह! तुम नहीं जानते हो कितनी ऊब चुकी हूं इससे मैं --पैसा- पैसा- पैसा! और उन आदमियों से जो मेरे इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं, छोटे कठपुतलों की तरह नाचते रहते हैं, सब एक जैसे। मैं ऊब चुकी हूं इस खुशी से, जवाहरात से, घूमने फिरने से, समाज से, हर तरह के ऐश से।'
'मैं तो हमेशा से यही सोचता था, 'युवक ने हिचकते हुए कहा, 'कि पैसा तो बहुत अच्छी चीज़ होती होगी।'
'पर्याप्त पैसा होने की चाहत तो होनी चाहिए। लेकिन जब किसी के पास इतने करोड़ हों!' उसने आगे कहा, 'सैर- सपाटा, दावते, थिएटर, नाच, खाना और उन सब पर दौलत का बेकार मुलम्मा।' उसने बात को निराशा के साथ समाप्त किया।
रिषभ को यह बात बहुत दिलचस्प लगी।' उसने कहा, 'मुझे पैसे वालोंऔर फैशनपरस्त लोगों के बारे में पढ़ना और सुनना हमेशा से अच्छा लगता है। अब देखो, मैंने तो यही राय बनाई हुई थी कि कोल्ड ड्रिंक बोतल में ठंडी की जाती है, गिलास में बर्फ डालकर नहीं।'
लड़की खिलखिला कर हंस दी - एक क़हक़हे वाली हंसी। ...'दिलचस्प बातें करते हो, काम क्या करते हो, मि. रिषभ?' उसने पूछा।
पार्क के बाहर उनके सामने एक साइन बोर्ड चमक रहा था, 'फाइव स्टार होटल'। मैं उसमें असिस्टेंट मैनेजर हूं, हाल ही में चेन्नई से ट्रांसफर होकर आया हूं।' ...'तुम काम पर क्यों नहीं गए?' उसने पूछा। ... 'मैं रात की शिफ्ट कर रहा हूं, युवक ने कहा, 'मेरी पारी शुरू होने में अभी एक घंटा है।'
लड़की ने कहा, 'मैं सोचती हूं कि अगर कभी मैंने किसी से प्यार किया तो वह मिडिल क्लास का होगा। वह काम करता होगा, निखट्टू नहीं होगा। फिर उसने अपनी बाई कलाई पर एक शानदार डिज़ाइन के ब्रेसलेंट में लगी एक छोटी सी घड़ी में समय देखा और जल्दी से उठ गई। किताब को उसने अपनी कमर से लटकते जालीदार थैले में रखा। ... युवक ने कहा, 'क्या मैं फिर तुमसे मिल सकता हूं?'
'पता नहीं। लेकिन हो सकता है यह सनक मुझ पर फिर न सवार हो। अब मुझे जल्दी से जाना होगा। डिनर पर जाना है, और फिर क्लब, ओह! वही पुराना राग। शायद यहां आते समय तुमने पार्क के कोने पर एक कार देखी होगी--वही सफेद रंग की।'
'और लाल पहियों वाली?' युवक ने सोच में अपनी भौंहै सिकोड़ते हुए कहा।
'हां, मैं हमेशा उसी से आती हूं। शोफर वहां मेरा इंतिज़ार करता है। वह सोचता है मैं स्कायर के उस तरफ डिपार्टमेंट स्टोर में शॉपिंग कर रही हूं। ज़रा ज़िंदगी के इस बंधन के बारे में सोचो, जिसमें हमें अपने ड्राइवरों तक को धोखा देना पड़ता है। गुड नाइट।'
'लेकिन अब अंधेरा हो रहा है, 'रिषभ ने कहा, 'और पार्क में बदतमीज़ लोग भरे पड़े हैं। क्या मैं साथ चलूं--?'
'अगर तुम मेरी इच्छाओं का ज़रा भी सम्मान करते हो, 'उसने दृढ़ता से कहा, 'तो तुम मेरे जाने के बाद दस मिनट तक इस बेंच से मत हिलना। तुम्हें शायद पता होगा कि गाड़ियों पर आमतौर पर उनके मालिक का नाम लिखा होता है।एक बार फिर गुडनाईट।' और वह बड़ी तेज़ी और शान से धुंधलके में निकल गई। रिषभ उसकी खूबसूरत फिगर को निहारता रहा।
कुछ दिनो बाद एक एन आर आई होटल में मां- बहन के साथ आया और शादी के लिए वेडिंग हॉल बुक कराया। उसे देखकर मैं स्तब्ध रह गया। 'अरे! यह तो, नीरज बंसल है। इसकी शादी तो हुई थी, जब मैं चेन्नई के होटल में बुकिंग क्लर्क था। क्या दोबारा शादी रचा रहा है?
शाम को किताब वाली लड़की दुल्हन बनी अपने परिवार के साथ पहुंची। उसके साथ धोखा होता देख रिषभ से रहा नही गया। उसने उसे सच्चाई बता दी। और समय रहते पुलिस ने नीरज बंसल को अरेस्ट कर लिया।
लड़की सहज हुई तो उसने अपने पापा को रिषभ से मिलाया और सब कुछ बता दिया। ... पापा ने रिषभ का शुक्रिया करते हुए कहा, 'बेटा, तुमने अपनी नौकरी का रिस्क लेकर मेघा का जीवन बर्बाद होने से बचाया, कोई अपना ही यह कर सकता था। मुझे लगता है, तुम मेघा को पसंद करते हो। अगर तुम उससे इसी मंडप में शादी कर लो, वह रुसवाई से बच जाएगी।
रिषभ ने कहा, 'नहीं!' मेघा मुझे असिस्टेंट मैनेजर समझती है, वह मैं नहीं हूं। नेहा अर्श पर उड़ान भरने वाली हंसिनी हैै और मैं फर्श पर विचरण करने वाला कौवा हूं। मुझे पश्चाताप है, ऐसी भोली- भाली, फूल जैसी लड़की से मैने झूठ क्यूं बोला?' नेहा ने मेरी ओर कृतज्ञपूर्ण नज़रों से देखा।
एक छोटी- सी कोठरी में करवट बदलते हुए मुझे नींद नहीं आ रही थी। लोगों की नज़र में इस कोठरी को असिस्टेंट मैनेजर का फ्लैट बना रखा था। यह फ्लैट, जो हमेशा मुझे गहरी नींद में सुला देता था, आज नींद के बजाय आंसुओं का उपहार दे रहा था। फिर भी मेरे मुख पर एक निर्णायक चमक थी।
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