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अनूठा प्रेम

वाजिद हुसैन की कहानी -मार्मिक

रश्मि प्रोजेक्ट वर्क पूरा कर रही थी और मधु पूरे कमरे का चक्कर काटती रही। कभी चीज़ें उलटती-पुलटती तो कभी दरवाज़ा खोल कर अंदर झांकती। साफ दिख रहा था कि वह कुछ कहना चाहती है, पर दीदी के आगे हिम्मत नहीं जुटा पा रही। अंत में मधु सीधे दीदी के सामने आकर बोली, 'जानती हो नवीन ने मुझे क्या बताया?'
'होगी कोई ऐसी ही बात, बच्चे ...।, 'रश्मि ने कहा। 'दीदी, मैं अब बच्ची नहीं रही, मेरी शादी होने जा रही है।' 'क्या बोल रही हो? मेरी समझ में कुछ नहीं आया।' तुम्हें याद है, वैलेंटाइन डे वाला दिन। नवीन के घर हम सब दोस्त जमा हुए थे। वैसे, क्या ही याद होगा तुम्हें, किताबों से फुर्सत मिले, तब न?'
'अच्छा कुछ बताओगी या ताना ही देती रहोगी मधु?' 'दीदी, तुम जानती हो न कि तुम्हें बताएं बिना मेरे पेट में दर्द हो जाएगा। तो सुनो ...पार्टी में सब अपने वैलेंटाइन के साथ डांस कर रहे थे। बस शेखर अकेला था और मैं भी। याद नहीं, हम कैसे डांस फ्लोर तक पहुंचे, पर बड़ी अपनाईयत के साथ जुदा हुए। ... आज सुबह नवीन ने मुझे बताया, शेखर ने अपने मम्मी-पापा से बात की। वह रिश्ता लेकर हमारे घर आएंगे। पर एक ज़रुरी बात रह गई, मैं कामदार सूट या सिल्क की साड़ी पहनूं।
'अरे तुम भी मधु ... ज़रा सोचने तो दो।'
'दीदी मैं बहुत उत्साहित हूं। मैं शेखर से प्यार करती हूं, और मां-बाप भी राज़ी हैं तो फिर शादी तो होनी ही है।
'पर तुम, उसे बिना जाने- समझे शादी करने जा रही हो?'
'हम कई बार मिले हैं दीदी, जिस दिन वह नहीं आता, जी करता आत्महत्या कर लूं।' मधु बोली। पर रश्मि का पीला- उदास सा चेहरा देख चुप हो गई।
'हां, यह सच है कोई प्रेम करता है तो शादी भी करेगा ही। पर प्रेम करना भी कई बार मुश्किल होता है।' दीदी ने दर्द भरे लहजे में कहा।
'दीदी प्रेम तो बस हो जाता है। हां, अगर कोई तुम्हारी तरह माथे पर बल डाले, किताबों में घुसा रहे और जवानी में ही दार्शनिक बन जाए तो उससे भला कौन प्रेम करेगा?' दीदी की चुप्पी देख मधु फिर बोली, 'अरे मैं यूं ही बोल बैठी हूं। मैं तो कह रही थी कि कितना अच्छा हो, अगर हम दोनों बहनों की शादी एक ही मंडप में हो जाए तो?'
'तब तो तुम्हें बुढ़ापे तक इंतिज़ार करना पड़ेगा।'
'बिल्कुल नहीं, शेखर इतना सुंदर है, उसका कोई न कोई भाई तो होगा ही ...जो आपके लिए अच्छा रहेगा...'
...शेखर शांत रहने वाला युवक था। बिज़नेस, मुलाकातों, दावतों में उसके दिन बीतते थे। शाम का समय मधु के साथ निकलता। ... आईने के सामने अपनी टाई पिन कस रहा था। वह सोचने लगा, 'मधु सुंदर है, जब वह हसंती है तो उसके सुंदर दांत दिखते हैं, मन करता है कि उसके माथे पर बोसा दे दूं। और एक वह है- रश्मि, वह सुंदर है उसकी आंखें बहुत गहरी हैं। काश कि उसका स्वभाव इतना रूखा न होता। कहीं इसका कारण कोई दुखांत प्रेम कहानी तो नहीं? मधु से पूछूंगा...।
एकाएक मधु आ गई। वह मधु से कहता है, 'यह टाई पिन रश्मि ने मेरी बर्थ डे पर दी थी, पर एक बात समझ से परे है, रश्मि इतनी अलग-थलग क्यों रहती है।'
मधु चकित होकर पूछती है, 'क्या दीदी आप की गर्लफ्रेंड रह चुकी हैं?'...'नहीं।' वह मेरी क्लासमेट थी। उससे मिलने दो-चार बार घर भी गया था। फिर उसने पूरा क़िस्सा सुनाया।
... मेरी कंपनी फैशन वियर्स की कवर पेज गर्ल का आयोजन था। इत्तेफाक़ से उस दिन मेरी बर्थडे भी थी। मैंने अपने चुनिंदा क्लासमेट्स को आमंत्रित किया था, जिनमें एक रश्मि भी थी। वह बहुत सुंदर लग रही थी। मैंने मज़ाक- मज़ाक में उससे कहा, 'अगर जनाब प्रतियोगिता में भाग लेती, तो सब लड़कियों की छुट्टी कर देती।' वह बोली, 'सच बोल रहे हो या मुझे झाड़ पर चढ़ा रहे हो?' मैने कहा, 'प्रतियोगिता में भाग लेने की हिम्मत जुटाओ, स्वयं जान जाओगी।' 'ठीक है।' उसने कहा।
मैंने मेकअप आरटिस्ट से उसका परिचय कराया। लंबे इंतिज़ार के बाद, गैस्टस ने रूमानियत और सौंदर्य की उजली आभा का आकर्षित लिबास में रैम्प वाक करते देखा, तो टकटकी बांध कर देखते रहे। हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। फैशन वियर्स में जश्न का माहौल था। सचमुच उसने सब लड़कियों की छुट्टी कर दी थी। मैंने कहा, 'रश्मि मेरी सच्चाई का इनाम तो बनता है।' उसने मुस्कुराते हुए मुझे यह टाई पिन दी, जो मेरी बर्थ डे गिफ्ट के लिए लाई थी।
दूसरे दिन कम्पनी ने रश्मि को पांच लाख का चेक दिया और कन्सैन्ट फॉर्म साइन करने के लिए कहा। उसने न चेक लिया न‌ एग्रीमेंट साइन किया। उसकी दलील थी, 'धन कमाने के लिए ‌छोटे कपड़े पहन कर जिस्म की नुमाइश करना सीता-सावित्री की धरती पर निंदनीय है।' उसके मना करने से कंपनी को कवर पेज गर्ल का आयोजन दोबारा करना पड़ा जिससे लाखों का नुकसान हुआ। इस बात को लेकर हमारी अनबन हो गई।
शाम का धुंधलका फैला था। रश्मि छज्जे पर खड़ी थी। तभी मधु आकर बोली, '... कल रात शेखर तुम्हारे बारे में पूछ रहा था कि तुम अलग-थलग क्यों रहती हो?' शेखर तुम्हें पसंद करता है, पर तुम इतनी रुखाई क्यों दिखाती हो? अच्छा, तुम शाम को हमारे साथ चल रही हो ना?' ‌...'नहीं मेरे सिर में दर्द है, तुम मां के साथ चली जाओ, शेखर तो तुम्हारे साथ जा रहा है न?'
'नहीं, उसके क्लब में डायरेक्टरों की मीटिंग है। मैं तो मम्मी के साथ जा रही हूं।' ...अब रश्मि अकेली ड्राइंग रूम में कुर्सी पर बैठी थी। अचानक उसने शेखर को आते देखा तो घबराकर बोली, मां और मधु तो गए हुए हैं।' ... शेखर बोला, 'मीटिंग में ज़्यादा लोग थे नहीं तो जल्दी निकल कर यहां आ गया। तुम साथ में नहीं गई?' ... 'आप जानते हैं, मुझे घूमना- फिरना नहीं किताबें पसंद है।' ... ' ज़्यादा पढ़ने से कहीं आखें न ख़राब हो जाएं तुम्हारी?' ... 'मेरी आंखें अच्छी भली है।' रश्मि ने हंसकर कहा। ... 'और सुंदर भी।'शेखर ने सोचा।' दोनों में बातें शुरू हो गई। कुछ ही देर में उसे यह शाम, वह लड़की और कमरा... सब परिचित लगने लगे थे। ऐसा लग रहा था, मानो वह इस दिन का लंबे समय से इंतिज़ार कर रहा था। जब शेखर विदा के लिए उठा, तो एक साथ ख़ुश व रुआंसा था। वह मधु और अपने भविष्य की दिशा नहीं तय कर पा रहा था।
तीन महीने बीतने को थे और मधु शादी को लगातार टाल रही थी। ...मधु अब गंभीर होती जा रही थी। शेखर भी सीरियस दिखता। रश्मि के हाथ कांपते। रात में इधर-उधर भटकती रहती। मधु कई बार देखती कि रश्मि अपने कमरे में अकेली रोती रहती।
एक शाम शेखर मधु से मिलने आया। मधु उसे छत के कमरे में बिठाकर आई और विनम्रता से बोली, 'मेरा एक काम करोगी दीदी? प्रोजेक्ट पूरा करना है और शेखर छत पर अकेला बैठा है, ज़रा कुछ देर उसके साथ बैठ लो तो मैं प्रोजेक्ट पूरा कर लूं। मना मत करना।'
रश्मि साहस बटोरती छत पर गई। शेखर ने उसके पीले चेहरे को देखा तो विनम्रता से बोला, 'ओह मैंने क्या कर दिया? तुम जानती हो रश्मि, मैं तुमसे प्रेम करता हूं।' ... 'शेखर ऐसा मत कहो, कहीं मधु ने सुन लिया तो? यह अपनी ही बहन के साथ विश्वासघात होगा।'
'मैं जानता हूं रश्मि, इसलिए यहां से दूर चला जाऊंगा।' तभी मधु ने आकर पूछा, 'तुम दोनों की सुलह हुई या नहीं।' ... जवाब में रश्मि हड़बड़ाहट में नीचे उतरने लगी और शेखर भी बदहवास सा बोला, 'मैं जा रहा हूं।' ...मधु को लगा कि मामला बिगड़ रहा है, कुछ करना होगा।
...'मैं शेखर से शादी नहीं करना चाहती।' मधु ने मां के सामने फैसला सुना दिया।
'क्या बात कर रही है लड़की?' मां को गुस्सा आ गया। ... समझ लो कि शेखर मुझ को ख़ुश नहीं रख सकता।' ...'पर मधु शादी टूटी तो दुनिया क्या कहेगी?' ...'मां, लोगों के लिए क्या मैं ख़ुद को दुखी बना दूं?' ...'और मैं शेखर और उसके परिवार से क्या कहूं?' ...'जो तुम्हारे जी में आए, आख़िर मां किस लिए हो?' मेरी बुराई करो, कहना कि मधु बड़ी हठीली है, इसमें तनिक भी ज़िम्मेदारी नहीं है-जबकि मधु की दीदी उतनी ही ज़िम्मेदार और प्यारी है। अच्छा ही है कि बड़ी लड़की की शादी पहले हो जाए। वैसे तो मैं अभी सिर्फ 18 की हूं‌
'बड़ी दुष्ट है मधु तू।' मां ने बेटी को लाड़ से कहा। ... 'अच्छा तो अब यह बुरी खबर शेखर को भी सुना दो।' ... क्या शेखर रश्मि से शादी के लिए राज़ी होगा?' ... 'मांं, असंभव से संभव तो कुछ नहीं।'
मां सोते हुए सोच रही थी,अच्छा ही हुआ, मधु अभी बच्ची ही तो है। उधर मधु सोच रही थी, 'प्रेम की जीत नहीं हुई पर बहन के अनूठे की जीत हो गई।'
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