Yugantar - 36 in Hindi Moral Stories by Dr. Dilbag Singh Virk books and stories PDF | युगांतर - भाग 36

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युगांतर - भाग 36

जब जीने का कोई मकसद हो, तब जीना बड़ा आसान हो जाता। कोई मुसीबत फिर आपको रोक नहीं सकती। बेटे की मौत के बाद यादवेंद्र बिल्कुल टूट गया था। उसकी पत्नी रमन ने उसे तसल्ली दी, नशे के दानव को समाज से मार भगाने के लिए बेटी का साथ देने के लिए प्रेरित किया। बेटी का लॉ का अंतिम वर्ष था। उसने वकालत की पढ़ाई शुरू ही इसलिए की थी कि वकील बनकर वह नशे के व्यापारियों को सलाखों के पीछे पहुँचा सके, क्योंकि उसने अपने भाई को तड़पते देखा था और जब भी वह घर आती, भाई की दशा देखकर अपनी पढ़ाई पर और मेहनत करती, ताकि वह योग्य वकील बन सके। भाई की मृत्यु पर एक बार वह भी टूट गई थी, लेकिन माँ ने उसे सहारा दिया। यादवेंद्र अब इंतजार कर रहा था कि बेटी की डिग्री पूरी हो और वे नशे के खिलाफ जंग में उतर सकें।
यादवेंद्र पहले पोस्त-अफीम बेचता था। यह उसे कहाँ से उपलब्ध करवाया जाता था और वह आगे कहाँ भेजता था, इसकी उसे जानकारी थी, लेकिन जब वह स्मैक बेचने के धंधे में आया, तब उसे नहीं बताया गया था कि स्मैक आ कहाँ से रही है। हाँ, जिन-जिन लोगों तक इसे पहुँचाया जाता था, उसकी उसे जानकारी थी। बेटी जब छुट्टियों में घर आई तो उसने इसके लिए रणनीति तैयार की। बेटी को जब पता चला कि पिता जी भी इस कालिख भरे कार्य का हिस्सा रहे हैं, तो उसे झटका लगा, लेकिन पिता जी का यह कहना कि वह सज़ा भुगतने को भी तैयार है और इस काम में शामिल लोगों को सज़ा दिलवाने के लिए भी तैयार है, तो बेटी को उन पर गर्व भी महसूस हुआ। आखिर गलती कौन नहीं करता, जो गलती को सुधारने को तत्पर हो जाएँ, उनको सराहा ही जाना चाहिए। यादवेंद्र सिर्फ गलती नहीं सुधार रहा, अपितु उस मुहिम का भी अंग बन रहा है, जिससे समाज में फैल रहे जहर को और फैलने से रोका जा सके।
बेटी के कहे अनुसार यादवेंद्र ने आज तक जिन-जिन से नशे की खरीद-फरोख्त की, जिन-जिन की मदद ली, जिन-जिन को रिश्वत दी, उन सबके नाम व पते नोट करने शुरू कर दिए। रश्मि के कहने पर उसने उन युवाओं का भी पता लगाया, जिनकी मृत्यु नशे के कारण हुई। उनके मोबाइल न. लिए ताकि ज़रूरत पड़ने पर उनसे संपर्क किया जा सके। इसके अतिरिक्त जो-जो सबूत उससे एकत्र हो सकते थे, वे उसने एकत्र किए। लड़ाई के मैदान में उतरने से पूर्व जिस प्रकार सेना पूरी तैयारी करती है, उसी प्रकार की तैयारी यादवेंद्र द्वारा चल रही थी।
उधर रश्मि भी इस विषय पर अलग से तैयारी का रही थी कि उसे कैसे कार्यवाही को अंजाम देना है। उसने अपने अध्यापकों से भी जानकारी हासिल की। आखिर वह दिन भी आ गया जब उसे डिग्री मिल गई।परिणाम के साथ उसने वकालत करने हेतु अप्लाई कर दिया और वकालत करने का प्रमाण पत्र मिलते ही उसने सबसे पहले नशे के कारण मरने वाले युवकों की सूची बनाकर इसका दोषी सरकार को मानते हुए हाईकोर्ट में रिट लगाई कि सरकार का कर्त्तव्य है कि वह अपने नागरिकों की रक्षा करे, लेकिन सरकार इसमें असफल रही है। इन युवाओं की मौत की दोषी सरकार है।
अपने पिता जी को साथ लेकर उसने हाईकोर्ट के सामने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें यादवेंद्र ने बताया कि राज्य में नशे का कारोबार बड़े स्तर पर चल रहा है। उस पर भी केस दर्ज है। वह आज सबके सामने अपने गुनाह स्वीकारता है। साथ ही वह उन सबके बारे में भी बताने को तैयार है, जो इस धंधे में शामिल हैं। प्रेस कांफ्रेंस के बाद सभी चैनलों पर यह खबर चलने लगी। यह बताया गया कि नशे का कारोबारी नशे को कारोबार को बंद करवाने हेतु मैदान में उतर आया है और उसका साथ उसकी वकील बेटी दे रही है। बेटी इसके लिए हाईकोर्ट में भी गई है। नशे के व्यापारियों में हड़कंप मच गया। शंभूदीन इस बार 'जन मोर्चा पार्टी' की तरफ से विधायक था, उसने यादवेंद्र को फोन करके पूछा, "यह क्या पागलपन कर रहे हो।"
"नेता जी पागलपन तो पहले कर रहे थे, अब तो होश आया है।"
शंभूदीन को पता था कि यादवेंद्र का बेटा नशे की ज्यादा मात्रा लेने के कारण मरा है और इसी कारण वह राजनीति और धंधे से दूर हो गया है। इस बार उसके चुनाव प्रचार में भी वह नहीं आया था, जबकि उसने उनके घर संदेशा भेज था। जीत के बाद भी उससे बात की थी, लेकिन तब यादवेंद्र सिर्फ इतना कहता था कि मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई। अब मैं जी कर क्या करूँगा, लेकिन यादवेंद्र ऐसा करेगा इसकी उसे उम्मीद नहीं थी। शंभूदीन ने आज उसे समझाने के लिए फोन किया था, वे कह रहे थे, "तू इस धंधे में अपनी मर्जी से आया था और इससे तेरे बेटे की जान चली गई, इसका हमें दुख है, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि तू अपने पुराने साथियों को फँसा दे।"
"नेताजी साथ तो अच्छे कामों का होता है और ऐसे ही साथियों की चिंता की जानी चाहिए। बुरे काम के साथियों को बचाकर मैं और गुनाह नहीं कर सकता।"
"देख ले यादवेंद्र, इसका नतीजा अच्छा नहीं होगा।" - शंभूदीन ने धमकी दी।
"बेटे को खोने के बाद जीना तो मैं वैसे भी नहीं चाहता था, क बार आत्महत्या करने का मन हुआ था, क्योंकि मुझे लगता था कि उसका कातिल मैं हूँ। मेरी पत्नी ने मुझे जीने का मकसद दिया। अब इस मकसद के लिए मरना भी पड़ा तो क्या दुख। यह आत्महत्या से कहीं बेहतर है, इसलिए नेता जी अब जो होगा देखा जाएगा, मैंने जो कदम उठाया है, उससे मैं पीछे नहीं हटूँगा। - यादवेंद्र ने दृढ़ता से उत्तर दिया और फोन रख दिया।

क्रमशः