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पहली मुहब्बत

वाजिद हुसैन की कहानी -प्रेम कथा

सिचाई विभग में मेरी नियुक्ति को तीन दिन ही हुए थे, गैस्ट हाउस इंचार्ज ने मुझसे कहा, 'चीफ साहब नाइट स्टे करेंगे, आपको गैस्ट हाउस ख़ाली करना होगा।' ... मेरे चेहरे का रंग झक सफेद पड़ गया, जिसे देखकर उन्होंने पूछा, 'लगता है, किराये का घर नहीं मिला?' 'जी, रियाज़ साहब। सुबह से शाम तक ऑफिस वर्क में बिज़ी रहता हूं। रात में मकान मालिक घर दिखाने से मना कर देते हैं, सनडे को ही मिल‌ पाएगा।' ... उन्होंने हमदर्दी के लहजे मे कहा, 'स्टाफ क्वार्टर में शिफ्ट होने से पहले, मैं जिस कमरे में रहता था, वह ख़ाली है, उसमें आपको ठहरा देता हूं।' ...'शुक्रिया बहुत एहसान होगा।' मैने कंधे पर बैग टांगते हुए कहा और उनकी मोटरसाइकिल पर बैठ गया। घर‌ में पहुंचकर उन्होंने पूछा, 'यह जगह तुम्हारे लिए काफी होगी।' ...' काफी क्या,बहुत है, बड़ी मेहरबानी बड़ा एहसान है आपका।' मैंने कहा। ... 'दोस्तों का हिसाब दिल में रखते हैं।' उन्होंने कहा और मोटरसाइकिल स्टार्ट करने लगे। पड़ोस के घर में बुर्क़ा ओढ़े ख़ूबसूरत लड़की दाख़िल होती देख मज़ाक़िया लहजे में बोले, 'इलाक़ा भी साफ- सुतरा है, पड़ोस भी अच्छा है।'
मैंने सड़क पर लिफाफा पड़ा देखकर, उठाया ही था, तभी उस लड़की ने कहा, 'सुनिए जी, मैं यहां हूं पर्दे के पीछे, यह लिफाफा मेरा है, शायद हाथ से गिर गया।' ... 'जी, मैं माफी चाहता हूं, लीजिये।' ...'बहुत -बहुत शुक्रिया।'
रात में सोने लेटा ही था। उसके गाने के कुछ बोल सुने, सोचने लगा, 'कितना दर्द छिपा है, आवाज़ में?' फिर कमरे में उसकी आवाज़ गूंजी , 'सुनिए! आप सुन रहे हैं! ... रौशनदान मे खिला चांद देखकर बस बोल पाया, 'फरमाईये।' ... 'आपसे कोई जान पहचान तो नहीं है। सूरत से आप शरीफ आदमी लगते है इसलिए आपसे मुख़ातिब हो रही हूं। कोई मुलाज़िम तो रखा है, आपने?' ... 'जी, मैं अभी थोड़ी देर पहले आया हूं।'...'जी, पता है।' ... 'जमादार है घर में, चला गया!' ... 'आपको अगर कोई काम है तो-।' ... 'जी, मेरे वालिद साहब को फालिज है। मैं अकेली होती हूं उनके पास, पर्दा करती हूं। इस वक्त रात में मेरा बाहर जाना बहुत मुश्किल है, एक दवा लाना थी कैमिस्ट से, तकलीफ कर सकेंगे?' ...'जी, क्यूं नहीं, मैं अभी आपके दरवाज़े पर आता हूं। आप मुझे नुस्खा दे दीजिए मैं ले आऊंगा, कैमिस्ट की दुकान पास ही में है।' ...'जी, गली के मोड़ पर।' ... 'शुक्रिया।' ... 'बस मैं आता हूं, हाज़िर हुआ।' ... 'आ गए आप, यह लीजिए, नुस्ख़ा देती हूं।' ...दवाई लेकर आया, दरवाज़े पर दस्तक दी ... 'इतनी जल्दी आ गए आप।' ... 'जी फासला ही कितना है।' ... 'जी, आपने बड़ा एहसान किया है।' ... ' चंद गोलियां लाने में एहसान कैसा?'... 'जी, मैं गोलियों की बात नहीं कर रही। एक अजनबी के लिए अपना आराम छोड़ना और यहां आने का एक वज़न होता है। आपने एहसान किया है, इसलिए वज़न को महसूस नहीं करते। शबनम ने एहसान लिया है इसलिए गर्दन इसके बोझ से झुक रही है। बहुत-बहुत शुक्रिया।'
आफिस में मेरी अजब सी कैफियत देखकर रियाज़ साहब बोले, 'मुझसे कुछ छुपा रहे हो, छुपाओगे तो नुकसान उठाओगे।' और मुझे उन्हें पूरा किस्सा सुनाना पड़ा। ... 'बड़े छुपे रुस्तम निकले यार तुम, एक ही दिन में इतनी क़ुर्बत हासिल कर ली। सुना है, बुर्के वाली किसी को लिफ्ट नहीं देती।'
मैंने रियाज़ साहब से पूछा, 'एक अजीब बात है, मेरे घर का और साथ वालों का रोशनदान एक ही है। उनके घर का दरवाज़ा भी मेरे घर में खुलता है।' उन्होंने कहा, 'यह घर एक ही था, बटवारे के बाद दो घर हो गए।' मैंने पूछा, 'कौन लोग हैं?' ... 'शेख साहब किसी स्कूल से रिटायर हुए हैं, आजकल कोई जनरल स्टोर वगैरह चला रहे हैं। उन्हें फालिज हो गया है।'
कुछ दिनो में मेरी और शबनम की नज़दीकी बढ़ती गई। एक दिन मैंने उसके दरवाज़े पर दस्तक दी, 'मैं हनीफ, आपका पड़ोसी, दरअसल अब्बा की तबियत कैसी है, पूछने के लिए आया हूं।'
एक पड़ोसी ने गुस्से में कहा, 'यह शरीफों का मुहल्ला है, आप शेख जी के घर में क्यूं आते-जाते हैं?' उसी समय रियाज़ साहब आ गऐ। उन्होंने उसे उसी के अंदाज में जवाब दिया, 'जब अपने मुंह मोड़ लेते हैं तो गैरों का सहारा लेना पड़ता है। शेख साहब को फालिज हो गया है, किसी ने मदद की, कोई मदद कर रहा है तो उसे करने नहीं देते?'
शबनम ने रियाज़ साहब से कहा, 'मैं डर रही थी, वह बदमाश किस तरह हनीफ साहब से पेश आएगा? रियाज़ साहब ने शबनम की आंखों में झांकते हुए कहा, 'मेरे होते हुए आपको किसी से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है।' उनका अपनापन और लहजा देखकर, मैंने अंदाज़ लगा लिया, 'यह इनकी पहली मुहब्बत है, जिससे यह बेख़बर हैं।'
रियाज़ साहब कै जाने के बाद शबनम ने मुझसे कहा, 'मैंने रोशनदान से कई बार आपको बुलाया। ... 'मैं छत पर चला गया था।' ...आपने यह नहीं पूछा, ' किसलिए बुलाना चाह रही थी?' ... 'अरे हां बताइए' ... 'अब्बा जी बेहोश हो गए थे, मैने घबराकर आपको बुलाया। डॉक्टर नसरुद्दीन को बुलाना था, आपको तकलीफ तो होगी।' ... 'जी सड़क पर मैंने उनका बोर्ड देखा है।'
मैंने डॉक्टर से कहा, 'मैं शेख साहब का पड़ोसी हूं। उनकी तबीयत ठीक नहीं है, आपको बुलाया है।' डॉक्टर ने कहा, 'शेख जी के बचने की उम्मीद नहीं है। अकेली उनकी बेटी कैसे ज़िंदगी बसर करेगी? मेरा मशवरा है,' अपनी ज़िन्दगी में बेटी का मुझसे निकाह कर दें तो उसका घर बस जाएगा और जो मेरा दवाईयों का बीस हज़ार से ऊपर उन पर उधार हैं। वह महर में एडजस्ट हो जाएगा। मैने कहा, 'आप तो बीवी बच्चों वाले उम्रदराज़ है!'...' मैं शादी उसे सहारा देने के लिए करना चाहता हूं।' यह भला और जायज़ काम भी है।'
डॉक्टर के जाने के बाद, मैंने शबनम को सब कुछ बताया, जो उन्होंने मुझसे कहा था। फिर कहा, 'मैं तुमसे मुहब्बत करने लगा हूं, पर लाचार हूं, शादी नहीं कर सकता, महर अदा करने की पोज़ीशन में नहीं हूं।' वह ख़ामोश खड़ी रही फिर दो क़दम उठाकर मेरे क़रीब आ गई, कि मुझे अपनी गर्दन पर उसकी सांसें महसूस होने लगी। कुछ पल मेरी ओर देखती रही, फिर आंखें इस तरह बंद कर लीं, जैसे मुझे आंखों में कैद कर लिया। वह चांदी के बुत की तरह मेरे सामने बेजान सी खड़ी थी।
उसी समय मैं रियाज़ साहब के घर गया‌‌। ... 'अरे भई इस वक्त कैसे?' उन्होंने पूछा। 'चांदी के बुत की कहानी सुनाने आया हूं।' मैने कहा। ... 'ऐसी भी क्या जल्दी थी, सुबह आफिस में सुना देते।' रियाज़ साहब ने कहा। एक गिद्ध उसे नोचने-मसलने की फिराक़ में मंडरा रहा है, सवेरे तक देर हो जाती। 'यार तुम्हारी पहेली, दिल की धड़कन बढ़ा रही हैं, जो सुनाना है, जल्द सुनाओ।' मैं उन्हें शबनम की कहानी सुनाने लगा और वह आंखों के आंसू रोकने का असफल प्रयास करने लगे। मैने उनसे कहा, 'शेख जी का दुनिया को अलविदा कहने का वक़्त आ गया है। अगर आपने शादी में देर की, तो शबनम डॉक्टर की दूसरी बीवी बन जाएगी।'
उसी रात रियाज़ साहब का शबनम से निकाह हुआ। शेख़ जी ने महर में मिली रक़म से डाॅक्टर का बिल चुका दिया था। उनके चेहरे पर मुस्कान थी।
रियाज़ साहब और शबनम ने मुझपर प्रश्नों की बौछार कर दी, जब मैंने शबनम को पच्चीस हज़ार रुपये मुंह दिखाई में दिए। मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया, ' मैं जान चुका था, आपकी मुहब्बत पहली मुहब्बत है, जिससे आप बेख़बर हैं। आप के मुझपर इतने एहसान हैं, आपकी मुहब्बत चुराना दिल को गवारा न हुआ।'
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