Gagan - 8 books and stories free download online pdf in Hindi

गगन--तुम ही तुम हो मेरे जीवन मे - 8

और आखिर बरात। 24 जून 1973 को खान भांकरी पहुंच गई थी।
यह स्टेशन दौसा से पहले आता था जब यह सेक्शन मीटर गेज था।आमान परिवर्तन यानी बड़ी लाइन हो जाने पर इस स्टेशन को खत्म कर दिया गया।अब खण्डर शेष है उस क्वाटर के भी जिससे शादी हुई थी और शादी के बाद पत्नी के साथ कई बार गया था।खण्डर भी न जाने कब तक शेष रहेंगे।लेकिन यह स्टेशन चाहे भौतिक रूप से न रहे।मेरी यादों में तो हमेशा बसा रहेगा।भूल भी कैसे सकता हूँ।
उस स्टेशन पर बिजली नही थी।लेकिन जेनरेटर की व्यस्था की गई थी।बरात को क्वाटरों में ठहराया गया था।उस समय शादी में फोटो ग्राफर का विशेष प्रचलन नही था।फिर भी शादी की फोटो के लिए फोटोग्राफर किया गया था।और रश्म के अनुसार बारात की अगवानी हुई थी।
और फिर बारात निकाली थी।एक रस्म अदायगी थी क्योंकि ज्यादा जगह नही थी।एक क्वाटर से दूसरे क्वाटर तक जानी थी।उन दिनों में आज की तरह न तो औरते बारात में जाती थी।न ही आज की तरह बराती नाचते थे।आजकल तो नाच में घण्टो बीत जाते है और अगर बरात में औरते भी गयी हो तो फिर डांस का क्या कहना।एक घण्टे की दूरी दो घण्टे में पूरी होती है।स्टेज पर वरमाला का प्रचलन भी नही हुआ था।दरवाजे पर ही वरमाला होती थी। और बरात कुछ ही देर में लड़की के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गयी।और तभी कुछ औरते दुल्हन को लेकर आई और उसने आते ही रस्म के अनुसार हाथ मे ली हल्दी इतनी फुर्ती से फेंकी थी कि हमे सोचने का मौका ही नही मिला।और मैने नजरे उठाकर देखा तो देखता ही रह गया।नारंगी रंग की साड़ी में वह स्वर्ग से उतरी अप्सरा सी लग रही थी।उसका वह मनमोहक रूप दिल मे ऐसा बसा की शादी के पचास साल होने पर भी वो ही छवि मेरे दिल मे बसी है।और हमेशा बसी रहेगी।
और फिर दरवाजे पर ही वरमाला की रस्म अदायगी हुई थी।फेरे रात के ही थे।छोटा सा स्टेशन जहाँ पर बिजली नही थी।स्टेशन और क्वाटर में रात को लेम्प जलते थे।उस दिन जेनरेटर की वजह से बिजली के बल्बों की रोशनी में जगमगा रहा था।
फेरे ज्यादातर रात के ही होते है।हमारे फेरे भी रात के ही थे।फेरो के समय बहुत ही झिंनी चुनरी या मामा चोला पहन कर बैठी थी,होने वाली बहु या पत्नी।फेरो के समय बीच बीच मे वह तिरक्षी नजरो से मेरी तरफ देखती मेरी उससे नजरे मिलती तो वह अपनी नजरे फेर लेती।और देर रात तक फेरो का कार्यक्रम चला था।हंसी मजाक मै भी सुन रहा था।काफी देर तक यह कार्यक्रम चला और अग्नि के फेरे लिए थे।हमारे हिन्दू धर्म मे सात फेरों का विशेष महत्व है और इसके द्वारा ही औरत आदमी पवित्र बंधन में बंधते है।
और रात में आगरा से आये मेरे स्टाफ के साथी लौट गए थे।बाराती भी कुछ चले गए थे।काफी देर तक बाते करने के बाद हम सो गए थे।
खान भांकरी से दोपहर में 12 बजे ट्रेन थी।जिससे बारात विदा होकर वापस लौटनी थी।बारातियों को नाश्ता दिया जा रहा था।और कुंवर कलेवे की रस्म भी पूरी होनी थी।जिसके लिए मुझे बुलाया गया था