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प्यार की दास्तां

वाजिद हुसैन की कहानी- प्रेम कथा

उसे शिकार का बड़ा भारी शौक था‌। यहां तक कि वह उसके सामने अपने मां, बाप, भाई- बहन और प्यारे प्राणों को भी कोई चीज़ नहीं समझता था। देश के बटवारे के बाद उसके दादा उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में बस गए थे। उसके फार्म पर आदमियों की कमी नहीं थी। अगर वह चाहता तो शिकार को जाते वक्त एक की जगह कई आदमी ले जा सकता था। लेकिन उसकी आदत कुछ ऐसी पड़ गई थी कि चोर की तरह अकेले जाना ही उसे अच्छा लगता था।
एक दिन की बात सुनिए। गर्मी का मौसम था। पल-पल गर्मी बढ़ती जाती थी और आदमी पानी- पानी चिल्लाकर अपने गले को और भी ज़्यादा सुखाते जाते थे। वह नैनीताल की तराई में शिकार खेलने में व्यस्त था, जब उसे ढूंढते हुुए डी.एफ.ओ आए। उनके मुंह से इस दुर्घटना का समाचार मिला। हरिया एक चरवाहा था, जो अपनी भेड़ों को चराते हुए नेशनल कॉर्बेट पार्क के किनारे घने जंगल में इस दुर्घटना का शिकार हुआ था। शाम को जब उसकी भेड़ उसके बिना गांव में वापस आ गई, तो हरिया के बूढ़े बाप का माथा ठनका। फिर गांव के दस- पंद्रह नवयुवक लाठियां-कुल्हाड़ियों से युक्त होकर हरिया की तलाश में चल दिए। नेशनल कॉर्बेट पार्क की सीमा से सटी एक पहाड़ी के नीचे उन्हें हरिया की लाश मिल गई‌।' डी.एफ.ओ ने फिर प्रार्थना के लहजे में कहा, 'इस समय नेशनल कॉर्बेट पार्क में स्थानीय के साथ विदेशी टूरिस्ट भी आए हुए है‌। यदि कोई हादसा हो जाता है, तो देश की शान में बट्टा लग जाएगा। आप ही देश को दाग़ लगने से बचा सकते है।'
एक तो दिनभर की थकावट, दूसरे कड़ाके की गर्मी, तबीयत उनके साथ जाने को न करती थी, पर डी. एफ.ओ की आंखों में एक खिंचाव था। वह खिंचाव प्रेम का आकर्षण-सा न था, वरन कंपायमान भावी आशंका से भयभीत सैलानियों की आंखों से निकलती हुई मूक याचना का खिंचाव- सा था। उनकी आंखें कह रही थीं, 'सतनाम सिंह, यदि तुम हृदयहीन नहीं हो, तो हमारी रक्षा करो।'
उसने अपने पुरखों से सीखा था, 'देश की आन- बान- शान पर आंच आ रही हो, बिना सोचे-विचारे चल पड़ो।' वही उसने किया। वन-बीहड़ सहचरी बंदूक उठाई। कारतूस जेब में डाले और उनके साथ जीप में बैठ गया। रास्ते में डी.एफ.ओ ने उससे कहा, 'मेरी बड़ी चिंता मंत्री जगजीत मान को लेकर है, वह लेकव्यू रिसोर्ट में अपनी बेटी और उसके मंगेतर के साथ ठहरे हुए हैं। यह रिज़ोर्ट लेक के किनारे स्थित है। हो सकता है, नर भक्षी बाघ इस लेक में पानी पीने पहुंचे।'
सतनाम रिज़ोर्ट के पास की एक पहाड़ी पर बड़ा चौकन्ना बैठा था। पहाड़ की चोटी पर निकलते सूरज की किरण गज़ब ढा रही थी। एक झाड़ी के आस- पास चिड़ियां कुछ विचित्र-रूप से चिड़चिड़ा रही थी। उधर जो देखा, तो हृदय की धड़कन एकदम बढ़ गई। सामने तीन सौ गज़ पर झाड़ी के सहारे बाघ खड़ा हुआ दिग्दर्शन कर रहा था, और चिड़ियािं अपनी शक्ति-भर उस पर विरोध का प्रदर्शन कर रही थी। उसके पास रायफल न थी, बंदूक़ थी। रायफल न‌ लाने की मूर्खता पर अपने को हज़ार बार कोसा, क्योंकि बारह नंबर बंदूक की मार इतनी दूर नहीं होती।
बाघ थोड़ी देर बाद अपने शिकार की ओर शाही शान से चला। और पचास- साठ गज़ दूर रह गया। उसने बंदूक़ को बग़ल में दबाया और उंगली बंदूक़ के घोड़े पर रखी। उसने बाघ को इतने समीप से पहले कभी नहीं देखा था। ... साक्षात यमराज की मूर्ति उसके सामने आ गई। हृदय की धड़कन तो कुछ सेकंड के लिए न मालूम कितनी तीव्र हो गई। बाघ से उसे सहसा डर नहीं लगता पर इस आकस्मिक स्वागत के लिए वह तैयार न था। बाघ उससे बेख़बर उसके पास से दबे पाँव गुज़रा। वह समझ गया, इसका ध्यान अपने शिकार पर केंद्रित है। मुझे उस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। यही सोचकर वह उस पर गिद्ध दृष्टि गड़ाए हूए था।
तभी किसी लड़की ने बाघ को देखा और चीख़ पड़ी। बाघ ने लड़की पर छलांग लगाई तभी सतनाम ने बाघ पर गोली चला दी। बाघ दहाड़ा और घायल होकर लड़की से सटकर गिर पड़ा। सतनाम ने लड़की को उठाया और पहाड़ी की ढलान पर लुढ़कता हुआ नीचे पहुंच गया।
फायर की आवाज सुनकर रिज़ोर्ट के सुरक्षा गार्ड आ गए थे। उन्होंने लड़की को पहचान लिया। 'यह सिमरन मान हैं, मंत्री जी की बेटी।' ‌वह लड़की को लेकर उसके कमरे में गया।
सिमरन ने पापा को बताया- 'वह मंगेतर के साथ पहाड़ी के ऊपर उगता सूरज देखने गई थी। अचानक झाड़ियों से बाघ निकला, जिसे देखकर मैं चीख़ पड़ी। रविन्द्र मुझे छोड़कर भाग गया। बाघ ने मुझ पर छलांग लगाई। मेरी चीख़ सुनकर सतनाम ने उसे गोली मार दी और मुझे गोद में लेकर रोल करते हुए नीचे ले आए। रविन्द्र मुझसे आंख नहीं मिला पाया, चुपचाप खिसक गया। कितना नीच है -छी ...?
'वाहे गुरु की कृपा से तुम बच गई।' फिर उन्होंने सतनाम से कहा, 'तुमने मेरी बेटी की जान बचाई, 'बोलो क्या ईनाम चाहिए?' उसने कहा, ' आपका आशीर्वाद।' फिर हाथ जोड़कर कहा, 'मुझे चलना होगा, मां बाट जोह रही होगी।'
तभी डी.एफ.ओ आ गए। उन्होंने अपनी दूरदर्शिता के क़सीदे पढ़ते समय मंत्री जी को बताया, 'किस तरह वह उनकी रक्षा के लिए वीर शिकारी को लेकर आए थे।' फिर उन्होंने सतनाम का आभार व्यक्त किया और ड्राइवर से घर तक पहुंचाने को कहा।
सिमरन सोचने लगी, 'सिखों के शौर्य के क़िस्से उसने मां से सुने थे। क्या सतनाम उन जैसा है?' वह मन-ही-मन उससे प्रेम करने लगी। उसने पापा से कहा, 'मैं उस देवी के दर्शन करना चाहती हूं, जिसने ऐसे वीर पुत्र को जन्म दिया।' पापा ने बेमन से उसे परमीशन दे दी।
रास्ते में पक्षियों ने उन्हें गाना सुनाया। छोटी नदियां कल- कल बह रहीं थीं। अचानक ही सिमरन धीरे से बोली, 'मेरी ज़िंदगी सिर्फ एक इंसान की तावेदार है। सिर्फ वही इंसान मेरी खुशी की ज़िम्मेदारी ले सकता है।' सिमरन ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, उसके लिए मेरे मन में एक ख़ास जगह है, एक ख़ास एहसास है। सच-सच कहूं तो मैं आपसे मुहब्बत करती हूं। यदि आप नहीं मिले तो मैंने जो समय साथ गुज़ारा है, वह पूरे जीवन को रौशन करने के लिए काफी है।'
सतनाम ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, 'दूसरा हाथ भी दो।' उसने उसके दोनों हाथ चुमे और उसकी ओर देखकर कहा, 'तुम्हारी आंखों में सच्चाई झलक रही है।'
वे बहुत खुश थे, उन्होंने अपना सही जीवन साथी तलाश लिया था। मुहब्बत के इज़हार से ज़्यादा ज़रूरी मां को बताना था। उसकी मां दरवाज़े पर इंतज़ार कर रही थी। बोली, 'यह चांद का टुकड़ा कहां से ले आया?' उसने कहा, 'मां अभी तक तो यह लड़की है, तुझे भा गई तो चांद का टुकड़ा हो जाएगी।' लड़की ने मां के पैर छुए। मां ने अपनी ओढ़नी उस पर डाल दी और आशीर्वाद दिया।
तभी मंत्री जी लाव लश्कर के साथ आ गए।उन्होंने सिमरन से कहा, 'दर्शन हो गए हो, तो चलो।' भयभीत सिमरन ने मां की ओर देखा, आंखों ही आंखों में कहा, 'मां मुझे बहू बना लो।' मां ने उसके सिर पर हाथ रख कर कहा, 'दासता की ज़ंजीरों से मुक्त होने तक मेरा मुंडा तेरा इंतज़ार करेगा। उसने मां की ओर कृतार्थ नज़रों से देखा और आत्मविश्वास से लबरेज़ चल पड़ी
सिमरन सवीमिंग पूल के पास घूमती फिरती विरह व्यथा का अनुभव करती। फिर अतीत में खो जाती। सिमरन की यह दशा देखकर उसकी मां को मन- ही- मन चिंता होने लगी। सिमरन की मां फिर एक दिन मंत्री जी से बोली, 'तुम्हारी एक ही लड़की है वह जैसे बिना इलाज के मरी जा रही है।' डॉक्टर आया देख- सुनकर बोला, 'बीमारी- बीमारी कुछ नहीं, मनोवैज्ञानिक आघात है। समय रहते दूर नहीं किया तो जीना मुहाल कर सकता है।'
सिमरन की मां, बेटी को देखकर तनिक हंसती हुई बोली, 'रविन्द्र से ब्याह हो जाने पर सब कुछ अन्यंत्र चला जाएगा।' इस बार सिमरन ने गर्दन घुमाई फिर बोली, 'उससे विवाह में नहीं करूंगी।' ... 'विवाह नहीं करोगी?' ... 'नहीं, किसी प्रकार भी नहीं।' ... तुम्हें पता है, 'तुम्हारे पापा को रविन्द्र के पापा ने मंत्री बनाया है। अगर रविन्द्र से तुम्हारा विवाह नहीं हुआ तो हम सड़क पर आ जायंगे।' सिमरन ने कहा, 'पापा ने मंत्री बनने के लिए अपनी बेटी का सौदा किया है, कैसे पिता हैं वह -छी? 'मैंने धर्म को साक्षी मानकर सतनाम को अपने पति के रूप में स्वीकारा है। संसार में उसे छोड़कर कोई भी पुरुष मुझे स्पर्श नहीं कर सकता।'
सिमरन की चीत्कार बाहर तक जा पहुंची। क्या हुआ, क्या हो गया, कहते हुए मंत्री जी दौड़ते हुए आए। सिमरन मूर्छित पड़ी हुई थी। उसके हाथ में विष की शीशी, प्यार की दास्तां बयान कर रही थी।
सिमरन की आत्महत्या का समाचार सुनकर, सतनाम और उसकी मां भागते हुए अस्पताल पहुंचे। सतनाम की मां ने उसके हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, 'तूने मुझसे बहू बनने का वादा किया था।' ... एक ग़ैर औरत का अपनी बेटी के प्रति असीम प्रेम देखकर, सिमरन के पापा का पितृत्व जाग गया। उन्होनें कहा, 'बेटी मुझे माफ कर दे, सतनाम ही‌ तेरे लिए योग्य वर है।' पास खड़े सतनाम की आंखों में आंसू देखकर, सिमरन में जीने की लालसा पैदा हो गई। वह होश में आ गई, उनकी ख़ुशियां लौट आईं। कुछ दिन बाद धूमधाम से उनका विवाह हुआ जिसमें मंत्री जी ने समधन के साथ जी भरकर नृत्य किया।
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