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प्रेम दीवानी राजकुमारी

प्रजा में एक भी ऐसा स्त्री पुरुष वृद्ध बच्चा नहीं था, जो की दयालु दानवीर अहिंसा प्रेमी राजा छत्रपाल के सुशासन से खुश ना हो। इसलिए जब उनकी रानी की लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो जाती है, और अपनी रानी से जुदाई के बाद उन्हें भी हृदय रोग हो जाता है, तो उनके राज्य की पूरी प्रजा उनकी सेहत के लिए रात दिन ईश्वर से प्रार्थना करती है। राज वैद्य जब उनके हृदय रोग से हार मानकर राज दरबार में कहता है कि "अब महाराज का हृदय रोग से बचना असंभव है।" तो उसी रात राजा छत्रपाल की 17 वर्ष की इकलौती पुत्री मीनाक्षी की वृद्धि दाई मां राजकुमारी मीनाक्षी के पास आकर कहती है कि "महाराज का हृदय रोग बिल्कुल ठीक हो सकता है, अगर महाराज को पारिजात वृक्ष के फूलों का रस निकाल कर नियमित वह रस का सेवन कराया जाए।"
अपनी दाई मां की यह बात सुनकर राजकुमारी मीनाक्षी की पिता की जान बचने की उम्मीद जाग जाती है। और वह उसी समय राज्य के प्रमुख मंत्री सुमंत को आदेश देती है कि "पारिजात वृक्ष के फूल कहीं से भी ढूंढकर लाएं।" राजकुमारी मीनाक्षी खुद पारिजात के वृक्ष से अनजान थी, इसलिए राजकुमारी मीनाक्षी सारी जानकारी अपनी दाई मां से लेती है। दाई मां राजकुमारी मीनाक्षी को बताती है कि "हजारों साल पहले एक राजकुमारी को भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था, उस राजकुमारी का नाम पारिजात था। और बहुत कोशिश करने के बाद जब सूर्य भगवान ने उसका प्यार स्वीकार नहीं किया था, तो प्रेम में तड़प तड़प कर उस पारिजात नाम की राजकुमारी की जान चली गई थी। और पारिजात राजकुमारी की जहां समाधि बनाई गई थी, वह स्वयं एक पेड़ उग आया था, और धीरे-धीरे पारिजात राजकुमारी के नाम पर उस पेड़ का नाम पारिजात पड़ गया था, क्योंकि वह पेड़ सूर्य को देखकर खिल उठता था और रात को सूर्य डूबने के बाद मुरझा जाता था। रात को वह पेड़ ऐसा लगता था, कि जैसे वह रो रहा है।" दाई मां की बात सुनने के बाद राजकुमारी मीनाक्षी की पारिजात वृक्ष के विषय में जानने की और उत्सुकता बढ़ जाती है। वह इसलिए रात को ही दाई मां को अपने शाही बगीचे में लेकर जाती है। पारिजात वृक्ष की पूरी जानकारी लेने के लिए और शाही बगीचे में झूले पर बैठकर पारिजात वृक्ष के विषय में दाई मां से जानकारी लेने लगती है। इस बार दाई मां राजकुमारी मीनाक्षी को बताती है कि हरिवंश पुराण में इस वृक्ष और फूलों का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसका जन्म समुद्र मंथन से हुआ था, जिसे इंद्र ने स्वर्ग ले जाकर अपनी वाटिका में रोप दिया था। फिर राजकुमारी मीनाक्षी दाई मां से पूछती है कि "दाई मां पारिजात का वृक्ष धरती पर कैसे आया।" तो दाई मां राजकुमारी मीनाक्षी को फिर से बताती है कि पौराणिक मान्यता के अनुसार पारिजात के वृक्ष को स्वर्ग से लाकर धरती पर लगाया गया था। नरकासुर के वध के पश्चात एक बार श्री कृष्ण स्वर्ग गए और वहां इंद्र ने उन्हें पारिजात का पुष्प भेंट किया वह पुष्प श्री कृष्ण ने देवी रुक्मणी को दे दिया देवी सत्यभामा को देवलोक से देवमाता अदिति ने चिर यौवन का आशीर्वाद दिया था। तभी नारद जी आए और सत्यभामा को पारिजात वृक्ष के पुष्प के बारे में बताया कि उस पुष्प के प्रभाव से देवी रुक्मणी भी चिर यौवन हो गई है। यह जान सत्यभामा क्रोधित हो गई और श्रीकृष्ण से पारिजात वृक्ष लेने की जिद करने लगी तब भगवान श्री कष्ण ने इस समस्या का समाधान निकाला और इस वृक्ष को इस प्रकार लगाया कि वह सत्यभामा की खिड़की के पास स्थित था, लेकिन इसके फूल देवी रुकमणी के परिसर पर गिरते थे।" और फिर दाई मां राजकुमारी मीनाक्षी को बताती है कि "पारिजात वृक्ष को कल्पवृक्ष कहा जाता है। महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान माता कुंती की पूजा में फूल उपलब्ध कराने के लिए इसे धरती पर लाया गया था। पांडवों की माता कुंती और उनकी भाभी के बीच इस बात को लेकर बहस हुई की एक प्रमुख शिव मंदिर में पहले कौन जल अर्पण करेगा। अनंत यह निर्णय लिया गया कि जो भगवान शिव को स्वर्ण पुष्प चढ़ाएगा उसे ही यह अधिकार मिलेगा। कुंती को स्वर्ग में स्थित एक पौराणिक वृक्ष के बारे में जानकारी थी, जिसके फूल सूखने पर स्वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं।" पारिजात वृक्ष के विषय में सुनते सुनते राजकुमारी मीनाक्षी वैसे ही पारिजात के पेड़ के प्रेम जाल में फस ने लगती है, जैसे राजकुमारी पारिजात सूर्य भगवान के प्रेम जाल में फंसी हुई थी। उसके मन में प्रेम भावनाएं आने का दूसरा कारण यह भी था कि शाही बगीचे में तरह-तरह के फूलों की खुशबू ऊपर से खूबसूरत चांदनी रात और राजकुमारी का यौवन दोबारा। फिर दाई मां राजकुमारी मीनाक्षी को बताती है कि "इसके फूल अत्यधिक सुगंधित छोटे पंखुड़ियों वाले और सफेद रंग के होते हैं। फूल के बीच में चमकीला नारंगी रंग होता है। इसके सामान्य नाम है हरसिंगार दुखों का पेड़ जैस्मीन रात की रानी और इसके लाभ चिर यौवन इसकी सुगंध से तनाव कम होता है। और मस्तिक को शांति मिलती है। और यह फूल जिसके घर आंगन में खिलते हैं, वहां हमेशा शांति और समृद्धि का निवास होता है। और इसके फूल हृदय रोग के लिए बहुत लाभकारी होते हैं। इसके फूल पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। मां लक्ष्मी को पारिजात वृक्ष के फूल बहुत प्रिय हैं। कमल के फूल के साथ पारिजात वृक्ष के फूल मां लक्ष्मी को चढ़ाए जाते हैं। गणपति बप्पा को भी पारिजात के फूल चढ़ाए जाते हैं। पारिजात वृक्ष के और फूलों के विषय में बताते बताते वृद्ध दाई मां थक जाती है, लेकिन राजकुमारी मीनाक्षी के व्यवहार से दाई मां को ऐसा लगने लगता है कि राजकुमारी मीनाक्षी पूरे जीवन पारिजात के वृक्ष की बातें सुनते सुनते थके कि नहीं क्योंकि पारिजात के वृक्ष का नाम आते ही राजकुमारी मीनाक्षी के चेहरे पर एक अनोखी रौनक छा जाती थी। बेचारी बूढ़ी दाई मां नहीं समझ पा रही थी कि राजकुमारी मीनाक्षी पारिजात के पेड़ की प्रेम दीवानी हो गई है और जल्दी से जल्दी अपने प्रेमी पारिजात के पेड़ से मिलन करना चाहती है। इसलिए उसी समय राजकुमारी मीनाक्षी अपनी सबसे करीबी दासी को आदेश देती है कि "वह इसी समय प्रमुख मंत्री सुमंत को कहे कि मैं उनके साथ पारिजात के फूल लेने जाऊंगी और अपने शाही बगीचे में पारिजात का पेड़ लगाने के लिए पारिजात का पौधा लाऊंगी। महाराज अपने प्रमुख मंत्री सुमंत को आदेश देकर राजकुमारी मीनाक्षी की इच्छा पूरी करने के लिए पारिजात के पौधे को अपने महल के साही बागीचे में लगवा देते हैं। पारिजात के पौधे को शाही बगीचे में इस तरह से लगवाया गया था कि वह राजकुमारी मीनाक्षी के कमरे के रोशनदान से साफ दिखाई दे। शारदीय नवरात्रि आने वाले थे, भोर के समय पारिजात के फूल खिले हुए थे, राजकुमारी मीनाक्षी स्नान करके एक वर्ष के इंतजार के बाद अपने प्रेमी पारिजात के वृक्ष और फूलों से मिलने की तैयारी कर रही थी, तो उसी समय राजकुमारी मीनाक्षी की अपने कमरे के रोशनदान से नजर जाती है कि एक युवक पारिजात के वृक्ष और फूलों से कुछ छेड़खानी कर रहा है। राजकुमारी मीनाक्षी उसी समय तुरंत अपने सैनिकों को उस युवक को गिरफ्तार करने का हुकुम देती है। और सैनिकों से कहती है कि "उसे बेरहमी से कोड़े मारते हुए मेरे पास लाओ।" सैनिक राजकुमारी मीनाक्षी के सामने उस युवक को कोड़े मरने के बाद पेश करते हैं। जब सैनिक उस युवक को कोड़े मार रहे थे, तो राजकुमारी मीनाक्षी अपने कमरे के रोशनदान से उसे कोड़े लगते देख रही थी। वह युवक शाही बगीचे का नया माली था। देखने में वह युवक किसी राजकुमार से कम दिखाई नहीं दे रहा था। राजकुमारी मीनाक्षी को पारिजात के वृक्ष और फूलों की देखभाल के लिए वह युवक बहुत पसंद आता है। इसलिए राजकुमारी मीनाक्षी उस युवक से क्षमा मांग कर उसे शाही बगीचे का नया माली नियुक्त कर देती है। राजकुमारी उसके फटे पुराने वस्त्रों को देखकर और एक बेगुनाह को सजा का पश्चाताप करने के लिए बहाने से दस सोने की मोहरे देती है और उस युवक से कहती है कि इन मोहरों से अपने नए वस्त्र खरीद लेना।"और यह कहने के बाद उसका नाम पूछती है। वह माधव नाम का युवक सोच रहा था, राजकुमारी मीनाक्षी या तो पागल है या अपने पिता जैसे दानवीर रहम दिल है जो वस्त्र खरीदने के लिए दस सोने की मोहरे दे रही है। और राजकुमारी मीनाक्षी उस युवक का नाम माधव से बदल कर पारिजात रख देती है। माधव अपने मन ही मन बहुत हंसता है, कि बेवकूफ राजकुमारी पारिजात के वृक्ष की प्रेमिका है। और घर जाकर अपनी मां छोटी बहन को राजकुमारी मीनाक्षी का सारा किस्सा सुना कर बहुत मगन होता है। राजकुमारी मीनाक्षी से रोज मिलने और बातें करने से माधव धीरे-धीरे राजकुमारी मीनाक्षी के रंग-रूप मधुर वाणी का दीवाना होने लगा था। और एक दिन उसके द्वारा पारिजात वृक्ष के फूलों की बहुत अच्छी तरह से देखभाल करने की वजह से राजकुमारी मीनाक्षी उस के दोनों हाथों की हथेली को प्यार से चुमती है। और हाथों के चुंबन के बाद माधव राजकुमारी मीनाक्षी के प्रेम में पूरी तरह दीवाना हो जाता है। माधव के हाथों की हथेली के चुंबन के बाद राजकुमारी मीनाक्षी को ऐसा एहसास होता है कि पारिजात का पेड़ स्वयं माधव के रूप में अपनी प्रेमिका राजकुमारी मीनाक्षी यानी कि मुझसे मिलने मेरे पास आया है। उस दिन राजकुमारी मीनाक्षी के साथ सच्चा प्रेम होने के बाद माधव को राजकुमारी मीनाक्षी और पारिजात वृक्ष के फूलों के साथ राजकुमारी के सच्चे प्रेम का एहसास हो जाता है। उसे पता था कि मैं अगर अपने सच्चे और पवित्र प्रेम का इजहार राजकुमारी मीनाक्षी के सामने कर दूंगा, तो वह भी किसी की प्रेमिका है, इसलिए वह मेरे सच्चे प्रेम की कदर करेगी। और उसके मन का यह विश्वास सच साबित होता है। राजकुमारी मीनाक्षी को पारिजात के वृक्ष और फूलों से जुड़ी हर एक चीज से प्रेम था। क्योंकि पारिजात वृक्ष के फूलों की वजह से ही उसके पिता महाराज का हृदय रोग बिल्कुल सही हो गया था। और राजकुमारी मीनाक्षी का पारिजात राजकुमारी जैसे पारिजात पेड़ से सच्चा प्रेम था। इसलिए राजकुमारी मीनाक्षी को माधव पारिजात वृक्ष का मानव रूप महसूस होता है। और दोनों के प्रेम की चर्चा महाराज तक पहुंच जाती है। राजा छत्रपाल राजकुमारी मीनाक्षी और माधव को मृत्युदंड देने की घोषणा कर देते हैं। राजकुमारी मीनाक्षी और माधव की अंतिम इच्छा थी कि हम दोनों को एक साथ पारिजात वृक्ष पर फांसी पर लटकाया जाए और फांसी देने से पहले हम दोनों के गले में पारिजात वृक्ष के फूलों की माला पहनाई जाए। दोनों की इच्छा के अनुसार जैसे ही फांसी दी जाती है, तो वहां एक देवता तुल्य युवक ना जाने कहां से प्रकट हो जाता है। और जल्लाद को फांसी देने से रोक देता है। उस देवता तुल्य युवक के व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित होकर राजा छत्रपाल भी कुछ समय के लिए फांसी रोकने का आदेश दे देते हैं। वह युवक महाराज और सभी सभा गणों नागरिकों को प्रणाम करने के बाद कहता है कि "दुष्ट मनुष्य का धर्म होता है, दुष्टता फैलाना उसकी दुष्टता के कारण धरती पर सभी जीव जंतु प्रकृति को दुख और कष्ट ही मिलता है। और धर्मी मनुष्य सबकी सुख की कामना करता है। अर्थ यह है कि पारिजात के वृक्ष और उसके फूलों ने अपने गुणों से धरती पर हमें आनंद सुख ही दिया है, हमसे कुछ भी लिया नहीं है, राजकुमारी मीनाक्षी ने उसके गुणों की कदर की और उससे जुड़ी हर एक चीज से पवित्र सच्चा प्रेम किया तो इसमें गलत क्या किया प्रेम का बीज धरती पर रहने वाले जीव के मन में परमात्मा ने बोया है।" यह सब कह कर वे युवक भीड़ में कहीं अदृश्य हो जाता है। वहां पर स्थित सभी मंत्री नागरिक महाराज पर उसकी बातों का बहुत प्रभाव पड़ता है। और महाराज को खुद पारिजात के फूलों के गुणों का महत्व पता था क्योंकि पारिजात के फूलों के रसों का सेवन करने से उनका हृदय रोग ठीक हुआ था। इसलिए इन सब बातों को ध्यान में रख कर राजा छत्रपाल माधव माली को पांच गांव दान में देकर राजकुमारी मीनाक्षी से उसका खुशी से विवाह करवा देते हैं। पड़ोसी राज्यों में भी महाराज के इस फैसले का स्वागत होता है। और एक चर्चा पूरी दुनिया में होने लगती है, कि "स्वयं पारिजात के पेड़ ने राजा छत्रपाल की राज्यसभा में आकर राजकुमारी मीनाक्षी और माधव को मिलाया है।"